Monday, April 11, 2011

लोकतंत्र की आवाज


शुक्र है कि सरकार सही समय पर चेत गई और लोकपाल कानून की तैयारी पर अन्ना हजारे की बातें मानकर एक अनर्थ होने से बचा लिया। अफसोस इस बात का है कि सरकार ने यह कदम दबाव और अपनी राजनीतिक मजबूरियों में उठाया। अगर अन्ना के पक्ष में पूरा देश एकसाथ नहीं उठ खड़ा होता और पांच राज्यों में चुनाव का वक्त नहीं होता तो क्या सरकार इतनी आसानी से जनमत की आवाज सुनने को तैयार हुई होती! शायद नहीं। करीब आधी सदी से देश को लोकपाल का झुनझुना सुनाया जा रहा है। केंद्र में बनने वाली हर सरकार, चाहे उसका मुखिया कांग्रेस हो, बीजेपी या अन्य कोई दल, भ्रष्टाचार के मुद्दे पर अब तक एक ही रास्ते जाती दिखी है। भाषणों में भ्रष्टाचार मिटाने के आसमानी वादे लेकिन व्यवहार में ठीक उल्टा। यही कारण है कि भ्रष्टाचार आज हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया है। जिस देश से जनता की गाढ़ी कमाई के हजारों, लाखों करोड़ रुपये बैखौफी से डकार कर विदेशी बैंकों के हवाले कर दिए जाते हों, जहां राजनेता, अफसर और व्यापारिक घराने अपनी काली कमाई का हिसाब-किताब बेहिचक माफिया और देश के दुश्मनों के हाथ सौंप देते हों, वहां लोकतंत्र की विश्वसनीयता कब तक बनी रहेगी! देश की नजर में लोकपाल कानून का रास्ता रोकने में तमाम राजनीतिक दलों की समान भागीदारी रही है और यही गुस्सा अन्ना हजारे के आंदोलन में रह-रह कर फूटता दिखा। यह आंदोलन भ्रष्टाचार से अधिक, देश चलाने की भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ था। उम्मीद है कि व्यवस्था से जुड़ा वर्ग देश के इस तेवर की अनदेखी करने की हिम्मत नहीं करेगा और जल्दी ही भ्रष्टाचार के राक्षस को मिटाने का अचूक हथियार हमारे हाथ होगा। लेकिन हराम की कमाई पर पलने के आदी आसानी से इस कानून के लिए रास्ता छोड़ देंगे, यह नहीं लगता। इसीलिए अन्ना ने न केवल इसके लिए एक डेडलाइन की घोषणा कर दी है बल्कि भविष्य के उन अभियानों की घोषणा भी कर दी है जिनसे लोकतंत्र को आम आदमी के लिए मुफीद बनाया जा सके। चुने गये प्रतिनिधियों के अक्षम साबित होने पर उन्हें हटाने का अधिकार भी एक ऐसा ही कदम है जिसके लिए भविष्य में आंदोलन छिड़ सकता है। आज की लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोगों की भागीदारी बस चुनाव तक सीमित रह गयी है और चुने जाने के बाद जनप्रतिनिधि अमूमन अपनी जिम्मेदारियां भूल कर सत्ता के खेल में मग्न हो जाते हैं। अगर यह भय हो कि नाराज मतदाता उन्हें बीच में भी हटा सकते हैं तो निश्चित रूप से जिम्मेदारियों को लेकर वे अधिक सतर्क रहेंगे। बहरहाल, लोकपाल कानून का स्वरूप तय करेगा कि सत्तावर्ग ने इस जनांदोलन को कितनी गम्भीरता से लिया है। इतना तो तय है कि अब लोकपाल कानून को न तो बनने से रोका जा सकता है और न इसकी धार कुंद की जा सकती है। संसद इसे एकस्वर से पारित करे और स्वतंत्रता दिवस पर देश को यह उपहार दे, यही हमारी कामना है।


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