Friday, April 22, 2011

चाय बागानों में गुम उरांव परंपरा


इस पर आम सहमति रही है कि सामाजिक पर्यावरण बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी है कि आदिवासियों को उनके पारंपरिक परिवेश में ही जीवनयापन के भरपूर अवसर प्रदान किए जाएं लेकिन मध्य भारत की एक प्रमुख जनजाति 'उरांव' इन दिनों अपनी पहचान बनाए रखने के लिए जूझ रही है। साम्यवादी सामाजिक संरचना के लिए चिर परिचित रहे उरांवों का संकट चाय बागानों से उपजा है। उनकी भाषा, संस्कार, त्योहार सभी लुप्त होने के कगार पर हैं। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार और उड़ीसा के लगभग एक दर्जन जिलों में उरांवों का वास है। यह दुर्भाग्य ही था कि उनके पुश्तैनी गांवों के आसपास दुर्लभ खनिजों का अकूत भंडार था। देश के विकास के नाम पर उनका खनन शुरू हुआ और इस अंधी दौड़ ने उनकी पीढ़ियों पुरानी जमीन निगल ली। मजबूर वनपुत्र पेट भरने के लिए या तो खदानों में काम करने लगे या दूर चले गये। और धीरे-धीरे उनका अपनी जमीन से नाता टूटता गया। आज उरांवों की जनजातीय अस्मिता बाहरी प्रभाव की चपेट में आकर खंडित हो रही है। पश्चिम बंगाल और असम के कोई दो हजार चाय बागानों में लगभग दस लाख आदिवासी पत्ती तोड़ने के काम में लगे हैं। इनमें अधिकांश महिलाएं हैं जो उरांव जनजाति से हैं। इनकी सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान पूरी तरह धूमिल हो चुकी है। आर्थिक और शारीरिक शोषण को उन्होंने अपनी नियति मान लिया है । लगभग डेढ़ सौ साल पहले जब अंग्रेजों ने आदिवासी अंचल में खनन शुरू किया तो उनकी निगाह मुंडा, खड़िया, संथाल, उरांव आदि आदिवासी औरतों की पत्ती चुनने की विशिष्ट शैली पर पड़ी । सन 1881 से 1891 के दौरान हर साल लगातार कोई 19 हजार श्रमिक दक्षिण बिहार से असम के चाय बागानों में गये । बीते कुछ सालों के दौरान 27000 आदिवासी दार्जिलिंग और जलपाईगुड़ी के चाय बागानों में गये। आज इन लोगों की तीसरी या चौथी पीढ़ी वहां काम कर रही है। अब वे यह भूलते जा रहे हैं कि उनकी जनजाति की कोई अनूठी सांस्कृतिक या सामाजिक पहचान भी हुआ करती थी । बागान की आधुनिकता में उरांवों की सांस्कृतिक गतिविधियां भी गुम हो गई हैं । इनका मुख्य नृत्य 'करमा' है। चूंकि पहाड़ी इलाकों में करमा गाछ (पेड़) मिलता ही नहीं है, जाहिर है वहां करमा का आयोजन संभव नहीं है। पीढ़ियों से चली आ रहीं लोक कथाओं को अपनी अगली पीढ़ी तक पहुचाने का तारतम्य टूट गया है। क्योंकि बागानों में काम करने वाली औरतों के पास इतना समय नहीं होता है कि वे अपने बच्चों को कहानियां सुना सकें। ठेठ उरांव महिला की पहचान 'तीन गोदना' (त्रिशूल) से होती है, जो यहां देखने को नहीं मिलता है। चाय बागानों में पुरुषों को नौकरी बहुत कम दी जाती है। इसके चलते यहां के पुरुष निकम्मे होते जा रहे हैं। सीमा पार से चोरी का सामान लाना, नशीली दवाएं बेचना इनका धंधा हो गया है। उधर औरतें भी शोषण की शिकार हैं। उन्हें दिन भर में 25 पाउंड पत्ती तोड़ना जरूरी होता है। अतिरिक्त पत्ती पर मात्र 25 पैसे प्रति किलोग्राम ही दिया जाता है। इस प्रकार सारे दिन खटने के बाद एक महिला को महीने भर में मुश्किल से चार-पांच सौ रुपए मिल पाते हैं। उरांवों के हरेक गांव में अलग से रात्रि घर हुआ करता है जिसे धुमकुरिया कहते हैं। शाम होने पर उरांव युवक-युवतियां नाचते-गाते हैं। बागानों में रहने वाले युवाओं को अलबत्ता तो शाम को नाचने-गाने की सुध ही नहीं रहती है, फिर उन्हें ऐसे किसी सामाजिक क्लब के बारे में जानकारी ही नहीं है। इस जनजाति में लड़की की शादी की उम्र 21से 25 साल हुआ करती है, लेकिन यहां शादी 14 साल में ही की जा रही है। लड़कियों को शारीरिक शोषण से बचाने के लिए उनकी जल्दी शादियां की जा रहीं हैं। यही कारण है कि बागानों की आदिवासी बालाओं में पारंपरिक चमक और फुर्ती देखने को नहीं मिलती है। जनजातियों में हाथ से बनी मदिरा (हंडिया) पीने का चलन है। पर बागानों में इसकी जगह चिलैया या दारू ने ले ली है। बागान के दरवाजों पर ही दारू का ठेका मिल जाएगा। एक बगीचे में एक दिन दस हजार रुपए का बोनस बंटा। उस दिन वहां की चिलैया की दुकान की बिक्री सात हजार की थी। यहां के दूषित माहौल से बच्चे भी अछूते नहीं है। जब पत्ती तोड़ने का चरम सीजन होता है तब ठेकेदार (स्थानीय बोली में सरदार) स्कूल से बच्चों को भी खदेड़ लाता है। चूंकि वहां चप्पे-चप्पे पर वीडियो हाल और ड्रग्स के अड्डे खुले हैं, सो बच्चों को इनकी लत लग गई है। इसके लिए पैसे की पूर्ति की खातिर वे बागानों में काम करना सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं। विडंबना है कि बागान में काम करने वालों को आदिवासी नहीं माना जाता। यानी जनजातियों को मिली आरक्षण व अन्य सुविधाओं से ये महरूम हैं। चाय बागानों में होम हो रही देश की बेशकीमती मौलिक संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण हेतु सरकार और स्वयंसेवी संस्थाओं को जल्दी गंभीरता से सोचना होगा। क्योंकि पृथकतावादी ताकतों को फलने-फूलने का मौका ऐसे ही स्थानों पर मिलता है जहां सामाजिक और आर्थिक शोषण को नजरअंदाज किया जाता है।


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