Wednesday, April 20, 2011

सिविल सोसाइटी की राजनीति


यह आम रास्ता नहीं है। हम किसी भी रास्ते पर अक्सर यह लिखा हुआ देखते हैं। हमारी यह देखने की आदत तब से बनी हुई है जब यहां अंग्रेजों का राज था। जहां सेना के सदस्य सामूहिक तौर पर रहते हैं, वहां भी इस तरह के वाक्य पढ़ने को मिलते हैं। अंग्रेजी में इसे सिविलियन कहते हैं। अर्थात वह रास्ता खास लोगों के लिए है। रास्ते के साथ सार्वजनिक नहीं जुड़ा रहता है लेकिन इस शब्द की रचना में यह बात शामिल होती है। शब्दों की रचना में उसका एक ऊपरी अर्थ होता है लेकिन उसके भीतर कई अर्थ घुले-मिले होते हैं। रास्ते को जब आम नहीं खास के लिए कहते हैं तो यहां दो तरह के लोगों की बात शुरू हो जाती है। एक के पास उस रास्ते का इस्तेमाल करने का विशेषाधिकार है यह बात सार्वजिनक होती है और इस विशेषाधिकार को आम लोगों द्वारा स्वीकृति देने का आदेश इसमें निहित होता है। इस तरह हमें पहले आम और खास का पता चलता है। आम का कोई चेहरा नहीं होता। आम एक राजनीतिक दशर्न की उपज है। गांधी ने कहा कि अंग्रेजों को इस देश से जाना चाहिए। यह आम भावना थी। मतलब भारतीय जनमानस यह चाहता था। क्यों चाहता था क्योंकि वह स्वशासन में विश्वास करता है। लोकतंत्र में जब आम की बात की जाती है तो आम का अर्थ समझा जाता है कि समाज में लोग भाईचारा चाहते हैं। लोग समान अधिकार चाहते हैं। जब किसी गरीब को सामने खड़ा कर कहा जाता है कि देश का आम आदमी यह कह रहा है तो उस चेहरे के जरिये यह जताने की कोशिश होती है कि जो समाज में समान अधिकार और बराबरी के स्तर से वंचित है, उसकी यह भावना है। यानी समान अधिकार और बराबरी का दशर्न उसकी भावना में निहित होता है। इस तरह बराबरी और समान अधिकार पूरी समाज रचना के कार्यक्रम से जुड़ा है। भारतीय समाज की रचना जिस तरह हुई है, उसमें कई तरह की विविधताएं हैं। लेकिन इन विविधताओं में आम की तलाश मुश्किल नहीं है। जानबूझकर उसे मुश्किल बनाया गया है। आम आदमी को परिभाषित करने पर जोर बढ़ा है तो यह खास की तरफ राजनीति को ले जाने की योजना से जुड़ी हुई है। जैसे कहते हैं कि आम आदमी महंगाई से त्रस्त है। यह बात तब कही जाती है जब तमाम विविधताओं के बावजूद सबकी परेशानी का एक कारण है। ऐसे मौके पर एक गरीब चेहरे के जरिये उस त्रस्तता का चेहरा इसीलिए दिखाया जाता है कि वह सबसे ज्यादा परेशान है। इससे परेशानी का आलम जाना जा सकता है। अब हमारे समाज में आम और सिविल सोसायटी की बात की जाती है। पहले सभी को आम के जरिये ही संबोधित किया था। धीरे-धीरे खास तरह की राजनीति का विकास इसी तरह से होता है। अब आम के बजाए सिविल सोसायटी पर जोर दिया जाता है। सिविल सोसायटी का हिन्दी और दूसरी भाषाओं में अनुवाद नागरिक समाज होता है। अनुवाद की राजनीतिक दृष्टि से उसके अर्थ की रचना होती है। भारतीय समाज ने अंग्रेजों के बाद संविधान तैयार किया कि वे उसके अनुसार अपना समाज चलाएंगे। कहा गया कि भारत में जो लोग रहते हैं वे सभी देश के नागरिक हैं और उनके बीच अधिकारों के स्तर पर बराबरी है। लेकिन अब नई बात हम कहते हैं कि नागरिकों की जीत हुई। नागरिकों ने मिल-जुलकर कुछ प्रयास किया तो उसे नागरिक पहल कहते हैं। कहीं जुलूस, धरना-प्रदर्शन किया तो उसे नागरिक आंदोलन कहते हैं। यह नागरिक वाली बात कहां से आ गई, यह सवाल अपने आप से हम सब पूछते हैं। देश के किसी शहर में हम देख सकते हैं कि वहां सिविल लाइंस नाम का इलाका या मुहल्ला है। तमाम लोगों ने अपने होशो हवास में अपने शहर या कस्बे में सिविल लाइंस बनते देखा है। मेरे शहर में वहां पढ़े-लिखे लोग गये। पढ़े-लिखे का अर्थ विश्वविद्यालयों से डिग्री लेने वाले और नौकरी पेशा लोग थे। वकील थे। अफसर थे। विश्वविद्यालयों में पढ़ाने वाले थे। व्यापारी तब उस इलाके में नहीं रहते थे। सिविल लाइंस एक प्रभाव वाला इलाका था। सत्ता संचालन में उसकी भूमिका थी। समाज में पैसे वाले लोग भी उन इलाकों में महंगी जमीन लेने लगे। गांव के सामंत भी आ गये। इस तरह शहर में जो सिविल सोसायटी बनी वह सिविल सोसायटी हम सबकी जुबां पर है। मुहल्ले की तरह ही सिविल सोसायटी के संगठन भी खड़े हो गये हैं। सिविल सोसायटी के विस्तार के साथ संगठनों के लिए एक नया नाम आया जिसे गैर सरकारी संगठन ( एनजीओ) कहते हैं। लोकतंत्र में यह सिविल सोसायटी बहुत प्रभावशाली दिख रही है। इतनी प्रभावशाली हो गई है कि आम की भाषा में भी बात करने वाले इससे घबराने लगे हैं। संविधान समाज के अनुकूल समाज की रचना करने के लिए आंदोलन करने का सबका अधिकार हैं। लेकिन आंदोलन-आंदोलन में फर्क दिखने लगा है। एक तरफ लाख लोग हों और दूसरी तरफ हजार दो हजार सिविल सोसायटी तो सिविल सोसायटी का आंदोलन आंदोलन कहलाता है। यह उसके प्रभाव और असर को जाहिर करता है। जो सरकार आम आदमी की बात करती है और उसे अपनी ताकत बताती है वह भी इससे घबराती है। यहां तक कि वह गालियां देते हुए पूरी राजनीति को खारिज करता है, तब भी। यह विडम्बना है कि राजनीति में आम आदमी का मुहावरा चलता है और सिविल सोसायटी उसको भ्रष्ट बताती है। ऐसा इसीलिए कि राजनीति में आम आदमी का मुहावरा तो चलता है लेकिन वह सत्ता के लिए मुरब्बा ही है। इसीलिए सिविल सोसायटी जब गालियां देती है तो उसकी भाषा को स्वीकृति मिलती है। इस स्वीकृति ने सिविल सोसायटी की राजनीति समझने में दिक्कतें खड़ी की हैं। दरअसल, सिविल सोसायटी बात आम की ही करती है लेकिन वह राजनीति से ये कहते हुए राजनीति करती है कि राजनीति बुरी चीज होती है। वह अपना राजनीतिक एजेंडा आगे बढ़ाती है। उसका राजनीतिक एजेंडा क्या है , वह जैसा समाज और जैसे चाहता है उसके मुताबिक काम होना चाहिए। यहां ठहरकर सिविल सोसायटी की रचना-प्रक्रिया को याद करें। बात इस तरह उलट गई है कि गांधी को आम आदमी चाहिए था और सिविल सोसायटी को केवल गांधीगीरी चाहिए। इसीलिए अब किसी गांधीवादी को भी सिविल सोसायटी चाहिए। दोनों में संबंध गहरे हुए हैं। पूरी राजनीति की यही विडम्बना है। समाज में परिवर्तन के लिए जितनी तरह की शक्तियां सक्रिय हैं, उन्हें सिविल सोसायटी का समर्थन चाहिए और अपने कार्यक्रमों के लिए सिविल हीरों की मांग करती है। मीडिया सिविल सोसायटी को आम की तरह प्रस्तुत करती है। मीडिया पहले सिविल सोसायटी के जरिये आम का प्रतिनिधित्व कराती थी, अब उसे आम के रूप में पेश करती है। मीडिया को भी अपने समाज का एक सांगठनिक आधार मिल गया है। उसकी बड़ी पूंजी को राहत मिलती है। सिविल सोसायटी के पास तकनीक है। वह मिनटों में सोशल नेटवर्किंग के जरिये घर से ही भावनाएं एक-दूसरे को प्रगट कर देती है। एक के पास भूमंडलीकरण की नागरिकता है और दूसरा नागरिक नहीं है,देश के लोग है। भूमंडलीकरण के नागरिक अपनी तरह से समस्याओं से निपटते हैं। भ्रष्टाचार एक आम समस्या है। इंदिरा गांधी ने कहा कि पूरी दुनिया में भ्रष्टाचार हैं। उन्होने इस समस्या को टाला था। हर राजनीतिज्ञ और राजनीति तरह-तरह से भ्रष्टाचार को टालती है लेकिन इस समस्या से देश के लोग आमतौर पर मुक्ति चाहते हैं और यह राजनीति से जुड़ी समस्या है। नागरिक समाज भी भ्रष्टाचार को राजनीतिक (विचारों समेत) समस्या के बजाए प्रक्रियागत समस्या मानता है।


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