भारतीय लोकतंत्र में उत्पीडि़त, परेशान और अनाथ लोगों की मदद के लिए सत्ता से संबद्ध प्रभावशाली लोगों को डिस्कि्रशनरी पॉवर यानी विशेषाधिकार दिया गया कि वे अपने विवेक से देश को खुशहाल बनाने के लिए काम करेंगे, लेकिन अफसोस कि यहां के विशेषाधिकार ने अपनी राह बदल ली। उसी कहावत की राह पर विशेषाधिकार भी चल पड़ा, जिसमें कहा जाता है, अंधा बांटे रेवड़ी चिन्ह-चिन्ह अपनों को देय। इस लोकोक्ति और आज के हालात में थोड़ा-सा अंतर यह है कि विशेषाधिकार स्वरूप जो लाभ सत्ता से जुड़े लोग अपनों को पहुंचा रहे हैं, वे अंधे नहीं हैं। वे सबकुछ देखते, सुनते, जानते हुए अपनों की मदद में जुटे हुए हैं। नतीजा यह होता है कि उत्पीडि़त का उत्पीड़न और दुखियों का दुख घटने के बजाय बढ़ता चला जाता है और वहीं इसके उलट समृद्धों की समृद्धि और खुशहालों की खुशहाली भी पूरी रफ्तार से बढ़ती जाती है। यों कहें कि विशेषाधिकार के प्रयोग की दिशा बदल गई है। नतीजतन, इस हालात से चिंतित राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री विशेषाधिकार में संशोधन के बारे में सोचने लगे हैं। प्रधानमंत्री ने मान भी लिया है कि भ्रष्टाचार पर नकेल को डिस्कि्रशनरी पॉवर पर लगाम की जरूरत है। खुद के विवेक के मुताबिक किसी काम को करना या करवाना। इसके तहत मंत्री सीधे तौर पर सरकारी जमीन आवंटित कर सकते हैं। किसी भी जमीन के इस्तेमाल के नियम-कानूनों में फेरबदल कर सकते हैं। किसी भी प्रशासनिक अधिकारी का तबादला कर सकते हैं और किसी को नियुक्ति दे सकते हैं। केंद्र सरकार के 38 मंत्रालयों के पास विशेषाधिकार है, उनमें भी कुछ मंत्रालय खास हैं। इनमें गृह मंत्रालय, रेलवे, कृषि, दूरसंचार, पेट्रोलियम, जनजातीय मामले, एचआरडी, शहरी विकास और पर्यटन मंत्रालय आदि शामिल हैं। इनके अलावा देश में कई और मंत्रालय भी हैं, जिनके पास कमोबेश नियुक्ति, वर्क ऑर्डर, लाइसेंस और विशेष रियायत देने का डिस्कि्रशनरी पॉवर है। सरकार अब इन्हीं अधिकारों पर अंकुश लगाने की तैयारी में है। यह विशेषाधिकार जनता की बेहतरी, देश को आगे ले जाने, विकास का पैमाना तय करने के लिए बना था। अब वही विशेषाधिकार भ्रष्टाचार का औजार बन गया है। दरअसल, मंत्रियों का विवेकाधीन कोटा भ्रष्टाचार की वजह माना जा रहा है। इसीलिए अब सरकार पर भी उंगली उठ रही है। इससे तंग प्रधानमंत्री को यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इस भ्रष्टाचार से जूझने की राह दिखाई तो इस पर लगाम की कवायद शुरू हुई। इसी के तहत विशेषाधिकार पर अध्ययन और उसके संशोधन पर फैसले के लिए मंत्रियों का एक समूह (जीओएम) बना है। सिर्फ उन मंत्रियों को इस जीओएम के गठन से असर पड़ेगा, जिनके पास विशेषाधिकार के तहत परमिट या लाइसेंस देने का अधिकार है। ऐसा नहीं है कि केवल विवेकाधीन कोटे को समाप्त करने से सभी समस्याएं हल हो जाएंगी। भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम में लगे लोगों के अनुसार डिस्कि्रशनरी पॉवर भ्रष्टाचार का महज एक तरीका मात्र है और इसके अलावा भी हजारों तरीके ऐसे हैं, जिससे भ्रष्टाचार बढ़ सकता है। अगर सरकार डिस्कि्रशनरी पॉवर को समाप्त करने का फैसला करती भी है तो ये भ्रष्टाचार को खत्म करने की एक शुरुआत भर होगी। प्रधानमंत्री ने तो साफ कह दिया है कि मंत्रियों के विशेषाधिकारों को खत्म करने की जो बातें हो रही हैं, उनमें हज का कोटा घटा-बढ़ा दिया जाए या किसी को समय से पहले पासपोर्ट मिल जाए या फिर किसी का रेलवे रिजर्वेशन कनफर्म हो जाए। किसी को रेलवे का पास दे देना या किसी को स्कॉलरशिप दे देना भी विशेषाधिकार है। पीएम का मानना है कि इस तरह के विशेषाधिकार से बड़ा नुकसान नहीं होता है और न ही इसकी वजह से बड़ा घपला हो सकता है। मैं विशेषाधिकार के सहारे होने वाले बड़े घपले-घोटाले को रोकने की सोच रहा हूं, जैसे कोई मंत्री अपने चहेते को एक रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से दिल्ली में दस एकड़ जमीन दे देता है। किसी कंपनी को अलीगढ़ में एसईजेड खोलने के लिए पांच लाख रुपये में 500 एकड़ जमीन दे देना। हजारों करोड़ रुपये का स्पेक्ट्रम एक हजार करोड़ रुपये में किसी कंपनी के नाम कर देना। विकास के नाम पर देश के कुछ जिलों को सरकारी सहायता देना, जबकि दूसरे जिलों के लिए कुछ नहीं करना। बिहार का रेलमंत्री बिहार के लिए नई ट्रेनों का एलान कर दे, लेकिन ज्यादा ट्रैफिक के बावजूद तमिलनाडु को कुछ नहीं मिले। सिंचाई के लिए बड़ा डैम पंजाब में बनाना, लेकिन बिहार के किसानों की सिंचाई की जरूरतों की अनदेखी करना। सरकारी बैंक का चेयरमैन चाहे तो किसी को भी हजारों करोड़ रुपये का लोन पास कर सकता है। पैसा डूबने पर फिर से जांच में करोड़ों रुपये खर्च कर सकता है। ये सब विशेषाधिकार हनन के ही नमूने हैं। इसी पर रोक लगाने की जरूरत है। हाल के दिनों में भ्रष्टाचार के बढ़ते मामलों की सबसे बड़ी वजह यह है कि सरकार ने आर्थिक उदारीकरण को तो लागू करने में तत्परता दिखाई, लेकिन उसी से मिलते-जुलते प्रशासनिक उदारीकरण की कभी बात ही नहीं की। किसी मंत्री के एक फैसले से या किसी सचिव के एक हस्ताक्षर से अगर किसी कंपनी को या किसी एनजीओ को पांच हजार करोड़ रुपये का फायदा हो जाए तो समझ लीजिए कि हम ऐसे सिस्टम में काम कर रहे हैं, जहां घूसखोरी नहीं होना ही अचरज की बात है। मामला चाहे केंद्र का हो, राज्य का हो या किसी जिले का, विशेषाधिकार हर स्तर पर खत्म होना चाहिए। वैसे यह खुशी की बात है कि प्रधानमंत्री ने जीओएम को विशेषाधिकार कोटा खत्म करने पर सुझाव देने को कहा है। संविधान द्वारा राष्ट्रपति को यह विशेषाधिकार प्रदान किया गया है कि वह अपने पद के किसी कर्तव्य के निर्वहन तथा शक्तियों के प्रयोग में किए जाने वाले किसी कार्य के लिए न्यायालय के प्रति उत्तरदायी नहीं होगा। भारतीय लोकतंत्र में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्रियों, राज्यपालों, सुप्रीम कोर्ट के जज आदि को कुछ विशेषाधिकार दिए गए हैं, जिनके तहत उन्हें हवाई अड्डों पर सुरक्षा जांच से छूट मिली हुई है। विशेषाधिकारों के पक्ष में जो एक तर्क उचित लगता है, वह यह है कि विशेष पदों पर काम कर रहे लोगों को इनसे अपने काम-काज में सुविधा मिलती है। विशेषाधिकार कानून का जिस तरह से दुरुपयोग होता है, उसे देख यही कहा जा सकता है कि इसमें बदलाव की जरूरत है। तकरीबन छह दशक से देश के कई हिस्से इस कानून के जख्म का दर्द झेल रहे हैं। मणिपुर से लेकर नागालैंड और कश्मीर के लोगों की जिंदगी को इस कानून ने नरक बना दिया है। इसके तहत सेना के पास किसी को भी गोली मार देने का पूरा अधिकार है। दुखद यह है कि इस कानून का सेना ने खूब दुरुपयोग किया है। बहरहाल, विशेषाधिकार कानून के तहत जिस रफ्तार से आम नागरिक को लाभ मिलना चाहिए, उससे ज्यादा तेज गति से नुकसान झेलना पड़ रहा है। उस नुकसान का दंश झेल रहे लोग यह सोच नहीं पाते कि आखिर उन्हें करना क्या है? वैसे यह अच्छी पहल है कि प्रधानमंत्री ने विशेषाधिकार कानून में बदलाव के बारे में सोच रहे हैं। उम्मीद है कोई सकारात्मक परिणाम भी सामने आएगा|
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