राजीव गांधी के राजनीतिक जीवन को लील जाने वाले बोफोर्स घोटाले के पिटारे से इस बार ऐसा खुलासा हुआ है, जिससे सरकार और कांग्रेस दोनों सकते में हैं। स्वीडन के पूर्व पुलिस प्रमुख और मामले की जांच से जुड़े रहे स्टेन लिंडस्ट्रोम ने 25 वर्ष बाद इस मामले में जुबान खोली है। एक साक्षात्कार में स्टेन का कहना है कि बोफोर्स तोप खरीद सौदे में हुए 64 करोड़ रुपये के घोटाले में तब के प्रधानमंत्री राजीव गांधी के खिलाफ कोई साक्ष्य नहीं है। राजीव ने इस सौदे में घूस तो नहीं ली थी, लेकिन पर्याप्त साक्ष्यों के बावजूद उन्होंने मुख्य आरोपी और इतालवी व्यापारी अट्टावियो क्वात्रोची को कानूनी फंदे से बचाया। स्टेन ने यह भी खुलासा किया कि फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन का इस मामले से कोई लेना-देना नहीं था, लेकिन भारतीय जांच अधिकारियों ने जबरन उनका नाम इस घोटाले में घसीटा। स्टेन लिंडस्ट्रोम ने एक बेबसाइट को दिए साक्षात्कार में कहा है कि राजीव गांधी ने बोफोर्स एबी कंपनी से कोई घूस नहीं ली। इस बात के साक्ष्य नहीं हैं कि 1500 करोड़ रुपये के सौदे में राजीव गांधी ने रिश्वत ली, लेकिन उन्होंने क्वात्रोची को बचाने की कोशिशों पर कोई रोक नहीं लगाई और मामले की लीपापोती के प्रयासों को मूकदर्शक बनकर देखते रहे। क्वात्रोची के खाते में धन हस्तांतरण के पुख्ता सबूतों के बाद भी उन्होंने इस मामले में कुछ भी नहीं किया। लिंडस्ट्रोम ने आगे कहा कि बोफोर्स तोप सौदे में दलाली के मामले में बहुत से भारतीय संस्थानों का बचाव किया गया। निर्दोष लोगों को सजा दी गई, जबकि दोषियों को जाने दिया गया। क्वात्रोची के खिलाफ पुख्ता सबूत थे। फिर भी स्वीडन या स्विट्जरलैंड में किसी को उनसे पूछताछ की अनुमति नहीं दी गई। गौरतलब है कि 24 मार्च 1986 को भारत सरकार और स्वीडन की हथियार बनाने वाली कंपनी के बीच 400 होवित्जर फिल्डगन की आपूर्ति के लिए 15 अरब अमेरिकी डॉलर का कांट्रेक्ट हुआ था। स्वीडिश रेडियो के इस खुलासे के बाद कि बोफोर्स खरीद में घूस के तौर पर एक बड़े भारतीय नेता और सेना के अधिकारियों को बिचौलियों के माध्यम से भारी रकम दी गई है, भारतीय राजनीति में भूचाल ला दिया था। राजीव गांधी की राजनीति बोफोर्स कांड की बलि चढ़ गई। तब से लेकर अब तक बोफोर्स घोटाले की गूंज राजनीति के गलियारों में गूंजती रही है और यह सिलसिला अनवरत जारी है। 20 दिसंबर 2000 को क्वात्रोची को मलेशिया में गिरफ्तार भी किया गया, लेकिन वह जमानत पर छूट गया। भारत सरकार तथा सीबीआइ ने कभी गंभीरता से क्वात्रोची के भारत प्रत्यर्पण और उस पर मामला चलाने का प्रयास नहीं किया। वर्ष 2008 में तो क्वात्रोची के खिलाफ रेड-कॉर्नर नोटिस तक वापस ले लिया गया। सीबीआइ की इस मामले में निष्कि्रयता से एक सवाल यह भी उठा कि क्या क्वात्रोची का बचाव कर सीबीआइ राजीव-सोनिया को क्लीन चिट देना चाहती है? अब जबकि स्टेन लिंडस्ट्रोम ने खुद ही इस सच से पर्दा उठा दिया है कि राजीव गांधी ने ही क्वात्रोची को बचाने के प्रयास किए तो पहली नजर में पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी इस मामले के सहभागी बनते हैं। देश के प्रधानमंत्री से यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वह किसी भी घोटाले-घपले में मूल दर्शक बन देश की अस्मिता के साथ खिलवाड़ करे। राजीव गांधी की इसी परंपरा को शायद वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी कुशलतापूर्वक निभा रहे हैं। दोषी न होते हुए भी दोषी का साथ देना नैतिकता के आधार पर दोष साबित करता है और इस वजह से देश राजीव गांधी को बोफोर्स घोटाले का दोषी मानता रहेगा। 64 करोड़ के घोटाले के लिए आम जनता के 250 करोड़ खर्च करने के बाद भी यदि कांग्रेस यह कहती है कि राजीव इस मामले में बेदाग थे तो यह इस देश का न केवल दुर्भाग्य है, बल्कि जनता के साथ एक बेहूदा मजाग भी है। जहां तक बात राजीव गांधी के मित्र रहे फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन की है तो उन पर लगा दलाली का दाग तो धुल गया, लेकिन उनके दिल में जो कसक बाकी है, उसे कौन मिटाएगा? कांग्रेस में गांधी परिवार की राजनीति इतनी ओछी निकली कि दोस्ती को भी दागदार कर दिया गया। अमिताभ ही क्या, इस वाकये से तो अच्छे से अच्छा दोस्त भी शक का शिकार होता रहेगा। कांग्रेस लाख दलीलें दे, लेकिन बोफोर्स घोटाला राजीव गांधी के नाम पर लगा ऐसा दाग है, जिसे कभी नहीं मिटाया जाएगा। कांग्रेस लाख जतन करे, लेकिन बोफोर्स पार्टी नेताओं की नींदें उड़ाता रहेगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
Monday, April 30, 2012
’अग्नि‘ पर इतराने वालों से कुछ सवाल
| भारत में अंध-देशभक्त उग्र राष्ट्रवाद की ऐसी ताकते हैं कि अग्नि-5 को छोड़े जाने का स्वागत गाजे-बाजे और तलवारें भांजने के साथ किया गया। राजनीतिक दलों ने रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन ( डीआरडीओ) की वैज्ञानिक उपलब्धि के लिए उसकी जमकर तारीफ की। किसी ने यह तक नहीं सोचा कि 1950 के दशक की पुरातन प्रौद्योगिकी को कोई मौलिक चीज कैसे कह सकता है और यह भी कि इस तरह की उपलब्धियां जनसंहार के हथियारों तक ही सीमित क्यों हैं? किसी भी पार्टी ने उस पगलाई सी खुशी की आलोचना नहीं की, जो मीडिया में साफ तौर पर नजर आई। किसी ने भी मिसाइलों और परमाणु हथियारों की दौड़ के खतरों की चेतावनी नहीं दी, जो पूरे क्षेत्र को बुरी तरह से अस्थिर कर सकती है। चीन में ‘ग्लोबल टाइम्स’ की शत्रुतापूर्ण प्रतिक्रिया पर भी प्रतिक्रिया कोई अधिक संतुलित नहीं थी। चीन के सरकारी समाचार पत्र ने बेहद कड़े शब्दों में कहा था कि भारत एक ‘ मिसाइल भ्रम’ में पड़ा है परंतु चीन के साथ हथियारों की दौड़ में कुल मिलाकर वह कहीं नहीं खड़ा होता है। अगर भारत के पास चीन के ज्यादातर हिस्सों तक पहुंचने वाली मिसाइलें मौजूद हैं, तो भी इसका यह अर्थ नहीं कि चीन के साथ विवाद के दौरान अहंकारी होने से उसे कुछ हासिल हो जाएगा। भारत को यह साफ-साफ पता होना चाहिए कि चीन की परमाणु क्षमता अधिक शक्तिशाली और भरोसेमंद है। इस चीनी विचार की अच्छाई-बुराई जो भी हो, यह साफ है कि भारत के बेलेस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को सिर्फ पाकिस्तान नहीं बल्कि चीन भी एक सामरिक खतरा मानता है। आखिरकार अग्नि को बीजिंग, शंघाई और पूर्वी चीन के दूसरे शहरों तक पहुंचने के लिए बनाया गया है। चीन की बदले की कार्रवाई काफी मंहगी पड़ेगी। पर इस हषारेन्माद के बीच कोई इस खतरे पर बात नहीं कर रहा है। हषरेन्माद अन्य कारणों से भी अनुचित है। अग्नि भारत के जिस इंटीग्रेटिड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम का हिस्सा है, वह तकनीकी तौर पर किसी शानदार सफलता से बहुत दूर है। 1983 में शुरू हुए इस कार्यक्रम को पृथ्वी, अग्नि, आकाश, त्रिशूल और नाग मिसाइलों को 1997 तक विकसित कर लेना था। समय सीमा निकलने के 10 साल बाद और लागत में 400 गुने की बढ़ोतरी के बावजूद केवल कम दूरी की मारक क्षमता वाली पृथ्वी और अग्नि के तीन आधे-अधूरे प्रारूप ही तैयार हो पाए थे। डीआरडीओ को द्रव्य ईंधन से ठोस ईंधन प्रोपलशन में जाने में गंभीर समस्याएं आ रहीं थीं। परमाणु ऊर्जा विभाग की ही तरह डीआरडीओ ने भी कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं समय पर पूरी नहीं की हैं, जिनमें मेन बेैटिल टैंक, परमाणु ऊर्जा चलित पनडुब्बियां और हल्के लड़ाकू विमान शामिल हैं। जल्द ही यह घोषणा करना एक आदत बन गई कि दो या तीन परीक्षण उड़ानों के बाद, जिनमें से सब सफल नहीं थीं, मिसाइल को विकसित किया जा चुका है। दूसरे देशों में मिसाइलों को तब तक शमिल नहीं किया जाता है जब तक कि 8 या 12 परीक्षण उड़ानों में उनकी विसनीयता और सटीकता प्रमाणित नहीं हो जाती है। अनेक प्रकार की मिसाइलों को शामिल करने और उनको चलाने में भारतीय सेना और वायु सेना को समस्याओं का सामना करना पड़ा है। हारकर 2008 में आईजीएमडीपी को खत्म कर दिया गया था। पिछले नवम्बर में भारत ने 3,500 किलोमीटर क्षमता की अग्नि-4 का विकास और परीक्षण बजट में दिए गए मूल से दोगुना अधिक समय लगाने के बाद किया था। इसमें तीसरी अवस्था को जोड़कर डीआरडीओ ने इसकी मारक क्षमता को 5,000 किलोमीटर कर दिया। यह अब भी आईसीबीएम से पीछे है, जिसकी न्यूनतम मारक क्षमता को अनेक देश 5,500 या 8,000 किलोमीटर मानते हैं। खुद डीआरडीओ मानता है कि अग्नि-5 केवल 80 प्रतिशत स्वदेशी है। इस दावे पर भी चीनी विशेषज्ञों ने गंभीर सवाल उठाए हैं कि अग्नि-5 को ट्रक से भी छोड़ा जा सकता है। उनका कहना है कि इसका 50 टन का वजन सड़कों और पुलों के मामले में भारत के आदिम उपरी ढांचे को देखते हुए समस्या पैदा करेगा। इस सब की परवाह कए बगैर डीआरडीओ अब यह डींग हांक रहा है कि वह 2 मीटर की अग्नि-5 को मल्टी इंडिपेंडेटली टारगेटिड री-ऐंट्री विहिक्लस (एमआईआरवी) अर्थात अनेक वारहेड्स से लैस करना चाहता है, जो भिन्न-भिन्न निशानों पर चोट कर सकें। पर एमआईआरवी को अभी पूरी तरह से चीन भी विकसित नहीं कर पाया है। डीआरडीओ अगि- 5 का इस्तेमाल सेटेलाइट-रोधी अस्त्र के रूप में भी करना चाहता है। वह ऐसी मिसाइलें भी विकसित करना चाहेगा जिनका इस्तेमाल दोबारा किया जा सकता हो। इनमें से हरेक रास्ता आपसी होड़ और लागतों के बेहद ऊंचे होने के खतरों से भरा है। अगर हमारे देश का सिद्धांत पहले प्रयोग नहीं अर्थात भारत पर जब तक परमाणु अस्त्रों से पहले हमला नहीं होता वह हमला नहीं करेगा; के साथ भरोसेमंद न्यूनतम अवरोधक विकसित करना है, तो इतने भारी खर्च का कोई अर्थ नहीं रह जाता है। सेटेलाइट-रोधी मिसाइलों का विचार बाहरी अंतरिक्ष के सैन्यीकरण के विरुद्ध भारत के बार-बार दोहराए गए दृष्टिकोण के विरुद्ध है। इस प्रकार का सैन्यीकरण गंभीर खतरों से भरा है, जिनमें बैलेस्टिक मिसाइल प्रतिरक्षा या ‘सन ऑफ स्टार वार्स‘ भी शामिल है, जिससे हथियारों की दौर तेज होकर नए स्तरों पर पहुंच जाएगी। दोबारा इस्तेमाल होने वाली मिसाइल का विचार तो सीधे-सीधे आर्थिक तबाही का नुस्खा है। इस प्रकार के फैसलों या इरादों का एलान करना डीआरडीओ का काम नहीं है। यह विशेषाधिकार राजनीतिक नेतृत्व का है। 1998 में परमाणु परीक्षण कराने के लिए भाजपा और डीआरडीओ के जोड़ को छूट देकर भारत ने सुरक्षा के लिए भारी कीमत अदा की है। सही बात तो यह है कि परमाणु हथियारों ने भारत और पाकिस्तान को अधिक असुरक्षित बना दिया है। दोनों देशों के लाखों निहत्थे नागरिकों पर परमाणु मिसाइलों के आक्रमण का खतरा मंडराने लगा है, जिससे बचने का कोई उपाय नहीं है। दोनों देश भारी मात्रा में बमों के ईंधन के ढेर लगा रहे हैं। अपने यूरोनियम समृद्धि कार्यक्रम का विस्तार भी करने के साथ पाकिस्तान प्लूटोनियम उत्पादन की नई सुविधाओं का निर्माण कर रहा है। इन दो राष्ट्रों के बीच नाममात्र के लिए भी हथियार नियंतण्रकी कोई प्रक्रिया नहीं चल रही है। 50 साल तक भारत परमाणु निवारण के खिलाफ एक सैद्धांतिक द्दष्टिकोण पर कायम रहा है। हमने प्रतिरोध को नैतिक रूप से घृणित कहा था क्योंकि इसके मूल में मानव जीवन के प्रति निर्मम अवमानना और शत्रु देश के लाखों नागरिकों की हत्या करने की तत्परता है। भारत ने कहा था कि निवारक हथियारों की दौड़ की ओर ले जाता है, जो अधिक असुरक्षा पैदा करती है, और जो आर्थिक रूप से विनाशकारी हो सकती है। इससे शीतयुद्व के जमाने में अमेरिका और सोवियत संघ की अगुआई में दोनों गुटों द्वारा परमाणु हथियारों के भयानक जखीरे, मिसाइलों की होड़ तथा जनसंहार और परंपरागत शस्त्रास्त्रों पर लगातार बढ़ते हुए खचोर्ं के साथ इसका सच बाहर आता है। 1950 के दशक के प्रारंभ में प्रत्येक गुट के पास जो थोड़े से परमाणु हथियार थे, वे हथियारों की दौड़ के चलते 1960 के दशक में कई सौ और 70 के दशक में कई हजार तक हो गए थे। 1980 के दशक के मध्य तक ये 70,000 की भयावह संख्या को पार कर गए थे, जो सारी दुनिया को 50 बार खत्म करने के लिए काफी थे। पल भर में छोड़े जाने वाली मिसाइलों के सिरों पर हजारों परमाणु सिरे लगा दिए गए थे। यह एक बड़ी त्रासदी है कि नई दिल्ली ने परमाणु प्रतिरोधकों के सच को अपनी चेतना से मिटा दिया है। वह चीन के साथ मिसाइल और परमाणु हथियारों की दौड़ में लग गया है, जो आर्थिक आकार और सैनिक खर्च दोनों के मामले में भारत से तीन गुना बड़ा है। भारत को ठहर कर दोबारा सोचना और चीन तथा पाकिस्तान के साथ होड़ को कम करने के कूटनीतिक विकल्पों को तलाशना चाहिए। |
सड़कों पर बहता दूध
इसे देश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि यहां किसानों के पसीने पर मौज करने वाले नकली किसानों (बिचौलियों, आढ़तियों, व्यापारियों) की फौज हर कदम पर मुस्तैदी से तैनात है। इन नकली किसानों की करतूतों के चलते कभी किसानों को खेत में खड़ी गन्ने की फसल आग के हवाले करनी पड़ती है तो कभी आलू-प्याज से सड़कें पट जाती हैं। आज जो आलू 16 रुपये किलो बिक रहा है, महज तीन महीने पहले उसी आलू को मुफ्त में लेने वाले नहीं मिल रहे थे। ताजा वाकया दूध का है। जिस देश में दूध को संतान के समान मानकर पैरों के नीचे पड़ने से बचाने की पंरपरा रही हो, वहां दूध सड़कों पर बहाया जा रहा है। वह भी उस समय, जब सरकार दूध उत्पादन बढ़ाने के लिए 17,000 करोड़ रुपये के नेशनल डेयरी प्लान का आगाज कर रही हो। इसके तहत अगले दस साल में सालाना दूध उत्पादन 12.5 करोड़ टन से बढ़ाकर 20 करोड़ टन करने का लक्ष्य रखा गया है, लेकिन दूधियों के विरोध प्रदर्शन को देखते हुए इस योजना की सफलता पर अभी से संदेह प्रकट किया जाने लगा है। दूधियों के गुस्से की मूल वजह दूध की खरीद-बिक्री पर बिचौलियों का बढ़ता वर्चस्व है, जिससे न तो उनकी लागत निकल पा रही है और न ही उपभोक्ताओं को कम कीमत का लाभ मिल रहा है। दूसरी ओर शायद ही कोई ऐसा महीना गुजरता हो, जब देश के किसी न किसी हिस्से से दूध की कीमतों में बढ़ोतरी की खबरें न आती हो। उद्योग संगठन एसोचैम के एक हालिया सर्वेक्षण के मुताबिक महानगरों में पिछले पांच सालों में एक औसत व्यक्ति की कमाई जहां 38 फीसदी बढ़ी है, वहीं दूध, सब्जी, मसाले जैसी आवश्यक वस्तुओं की कीमतें 72 फीसदी बढ़ चुकी हैं। देखा जाए तो दूध महंगाई की मूल वजह निजी डेयरी कंपनियों की बढ़ती भूमिका है। दरअसल, उदारीकरण के दौर में सहकारिता की मूल भावना खंडित हुई, जिससे दूध की खरीद-बिक्री में निजी डेयरी कंपनियों का हस्तक्षेप बढ़ा। मुनाफे से तिजोरी भरने में माहिर कंपनियां दोनों ओर से लूट रही हैं। जिस दूध को वे शहरों में 38 से 40 रुपये प्रति लीटर बेच रही हैं, उसके लिए महज 12 से 24 रुपये प्रति लीटर का भुगतान करती हैं। इससे भी विडंबनापूर्ण बात यह है कि पिछले साल की तुलना में इस साल दूध का उत्पादन अधिक हुआ है और स्किम्ड मिल्क पाउडर (एसएमपी) के निर्यात पर रोक लगी हुई है। फिर पिछले सीजन में आयात हुआ 30,000 टन एसएमपी और 15,000 टन बटर ऑयल का स्टॉक पड़ा है। इससे उपलब्धता की कोई कमी नहीं है। इसी को देखते हुए कंपनियों ने दूध के खरीद मूल्य में 1 से 4 रुपये प्रति लीटर तक की कटौती कर दी है। इससे दूध उत्पादकों के सामने दोहरी कठिनाई पैदा हो गई। एक तो उनकी आमदनी घटी तो दूसरी ओर चारे और पशु आहार के दाम बढ़ने से उनकी लागत बढ़ गई। देश को दूध के मामले में आत्मनिर्भर बनाने में आणंद को मॉडल बनाकर पूरे देश में चलाए गए ऑपरेशन फ्लड की मुख्य भूमिका रही है। 1950 और 60 के दशक में दूध उत्पादन महज 1.2 फीसदी की दर से बढ़ रहा था। आबादी के मुकाबले कम उत्पादन के चलते दूध की दैनिक उपलब्धता 1951 के 132 ग्राम प्रति व्यक्ति से घटकर 1971 में 114 ग्राम रह गई। वहीं ऑपरेशन फ्लड के बाद यह दर बढ़कर 4.3 फीसदी हो गई, जिससे दूध की उपलब्धता में तेजी से इजाफा हुआ। दूध उत्पादन में हुई बढ़ोतरी की तीन बड़ी वजहें थीं- ग्रामीण उत्पादकों को शहरी बाजार उपलब्ध कराने के लिए विपणन ढांचे की स्थापना, हरित क्रांति के चलते चारे की बढ़ी उपलब्धता और ग्रामीण परिवारों का सस्ता श्रम। यह ऑपरेशन फ्लड का ही कमाल है कि आज दूध उत्पादन के मामले में भारत दुनिया में पहले नंबर पर है। देश में दूध का उत्पादन किसी भी फसल की तुलना में अधिक है और किसानों को प्रति इकाई सबसे ज्यादा कमाई भी कराता है। फसलों की बरबादी की क्षतिपूर्ति करने और छोटे किसानों व महिलाओं को रोजी-रोटी मुहैया कराने में दूध उत्पादन ने उल्लेखनीय भूमिका निभाई है। भले ही ऑपरेशन फ्लड के चलते देश में श्वेत क्रांति हुई, लेकिन आणंद मॉडल में दूध का संग्रह और परिवहन बढ़ा। पहले दूध की खपत घर में या गांव या नजदीक के कस्बे में होती थी। अब डेयरी सहकारी संस्थाओं की बदौलत दूध गांव से निकलकर शहरों और महानगरों में जाने लगा। शहरों के निवासियों को 24 घंटे सुगमता से दूध के पैकेट मिलने लगे, लेकिन गांवों से दूध गायब हो गया। आज आप किसी भी गांव में दोपहर के समय जाएं तो वहां दूध के दर्शन होना मुश्किल है, क्योंकि जैसे-जैसे दिन चढ़ता है, वैसे-वैसे दूधियों का कारवां नजदीकी कस्बों-शहरों का रुख कर लेता है। खुद दूध उत्पादकों के बच्चे दूध पीना बंद करके चाय पीने लगे, क्योंकि दूध की बिक्री से होने वाली आमदनी परिवार के लिए ज्यादा अहम हो गई। देखा जाए तो ऑपरेशन फ्लड की शुरुआत ही महानगरों में दूध की आपूर्ति के लिए की गई थी। स्वयं आणंद की दुग्ध सहकारिता की स्थानपना ही इसलिए हुई, क्योंकि तीन सौ मील दूर मुंबई शहर को दूध की जरूरत थी। आणंद मॉडल के डेयरी विकास ने कई समस्याएं भी पैदा कीं। चारे के उत्पादन और खेतों में भारी रासायनिक खाद और कीटनाशक दवाओं का इस्तेमाल व दूध उत्पादन बढ़ाने के लिए नुकसानदेह हारमोनयुक्त इंजेक्शनों का प्रचलन बढ़ा। इस दूध के सेवन से तरह-तरह की बीमारियां भी फैल रही हैं। फिर इस पद्धति में गाय-भैसों की देसी नस्लों की भी उपेक्षा हुई और विदेशी नस्लों का प्रचलन बढ़ा। चूंकि आणंद पद्धति में दूध उत्पादन को व्यवसाय का रूप दे दिया गया, इसलिए इस मॉडल में दूधियों को मिलने वाली और उपभोक्ताओं द्वारा चुकाई जाने वाली कीमत अंतराल का एक बड़ा हिस्सा पैंकिंग, प्रोसेसिंग, परिवहन, प्रबंधन, विज्ञापन में जाता है, जिससे दूध की लागत कई गुना बढ़ जाती है। इसे कोलकाता की दूध आपूर्ति से समझा जा सकता है। आणंद (गुजरात) से कोलकाता तक प्रतिदिन रेफ्रिजरेटेड रेल टैंकरों से दूध भेजा जाता है। दुनिया में दूध का इतना लंबा परिवहन सिर्फ हमारे यहां होता है। दो हजार किलोमीटर तक ताजे दूध की आपूर्ति को भले ही टेक्नोलॉजी का कमाल कहा जा सकता है, लेकिन यह बिजली, डीजल और रेलवे की बरबादी है। जब गुजरात, राजस्थान जैसे सूखे प्रदेशों में श्वेत क्रांति संभव है तो गीले बंगाल में क्यों नहीं? आणंद मॉडल का कमाल तो तब माना जाएगा, जब कोलकाता के लिए दूध उसके आसपास के ग्रामीण इलाकों में पर्याप्त मात्रा में पैदा होने लगे। बढ़ती आय और खान-पान की आदतों में बदलाव के चलते दूध और दूध से निर्मित पदार्थो की मांग तेजी से बढ़ रही है। इस मांग को तभी पूरा किया जा सकेगा, जब आणंद मॉडल को विकेंद्रित, मितव्ययी और पर्यावरण अनुकूल बनाया जाए। इसकी शुरुआत नेशनल डेयरी प्लान से होनी चाहिए। इससे दूध उत्पादकों को उनके पसीने की वाजिब कीमत मिलेगी और उपभोक्ताओं को गुणवत्ता युक्त दूध सहजता से उपलब्ध हो सकेगा। फिर इससे दूध उत्पादन से बिक्री तक के हर चरण पर मौजूद बिचौलियों की भूमिका अपने आप कम हो जाएगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
सचिन के सम्मान पर सियासत
सचिन तेंदुलकर को राज्यसभा सदस्य के रूप में मनोनीत करने की सिफारिश की गई है और बताया गया है कि उनके नाम को राष्ट्रपति की मंजूरी मिल गई है, लेकिन इसी के साथ क्रिकेट की दुनिया में बुलंदियां छू चुके क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले 39 वर्षीय तेंदुलकर को लेकर कुछ विवाद भी उठ खड़े हुए हैं, खास तौर से इलेक्ट्रानिक मीडिया में इस पर खासी बहस चल रही है। हालांकि जाने-अनजाने मीडिया ने इस पूरे प्रकरण के एक सांविधानिक पहलू की नितांत अनदेखी कर दी। संविधान के अनुसार साहित्य, विज्ञान, कला और सामाजिक सेवाओं के क्षेत्र में विशेष ज्ञान अथवा व्यावहारिक अनुभव रखने वालों को राज्यसभा के सदस्य के रूप में मनोनीत करने का प्रावधान है। राष्ट्रपति यह मनोयन केंद्र सरकार की सिफारिश पर करते हैं, लेकिन यहां ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि यह मनोनयन साहित्य, विज्ञान, कला और सामाजिक सेवाओं के क्षेत्र में किया जाता है। खेल को इससे बाहर रखा गया है। ठीक उसी तरह जैसे भारत रत्न का सम्मान भी हाल तक साहित्य, विज्ञान, कला और सामाजिक सेवाओं के क्षेत्र में ही देने का प्रावधान था। हालांकि पिछले वर्ष नवंबर मे सरकार ने इस नियम को संशोधित करते हुए एक आदेश जारी कर इस सूची में खेल को भी शामिल कर लिया है और अब खेल के क्षेत्र में भी विशिष्ट योगदान करने वाले महान भारतीय सपूतों को यह सम्मान दिया जा सकता है। यहां यह बताते चलें कि यह संशोधन भी दरअसल सचिन के लिए भारत रत्न सम्मान देने की मांग उठने के बाद ही हुआ। राज्यसभा में मनोनयन के लिए इसी तरह संविधान में संशोधन करने की जरूरत होगी, क्योंकि तकनीकी आधार पर खेल के क्षेत्र में विशेष ज्ञान अथवा व्यावहारिक अनुभव रखने वालों को मनोनीत करने का प्रावधान संविधान के अनुरूप नहीं है। हमारे राज्यसभा के इतिहास में यह पहला मौका होगा जब किसी खिलाड़ी को मनोनीत किया जा रहा हो। इससे पहले दारा सिंह को जरूर मनोनीत किया गया था, लेकिन उनका मनोनयन भी खिलाड़ी के रूप में न होकर कला (फिल्म) के क्षेत्र में उनके योगदान के आधार पर किया गया था। वैसे तकनीकी अर्हता को छोड़ दें तो सचिन तेंदुलकर का कद इतना बड़ा है कि वह किसी राज्यसभा सदस्यता के मोहताज नहीं हैं। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में 100 शतकों का रिकार्ड और सबसे ज्यादा रन बनाने के अतिरिक्त कई विश्व रिकार्ड कायम करने वाले इस महान भारतीय खिलाड़ी ने पूरे विश्व में देश का नाम ऊंचा किया है। इसके साथ ही एक शालीन और अच्छे इंसान के रूप में जाने जाने वाले इस व्यक्ति में भारतीयता और राष्ट्रीय भावना भी कूट-कूट कर भरी हुई है। तभी शिवसेना को आड़े हाथों लेते हुए उन्होंने कहा था कि महाराष्ट्र केवल मराठियों का नहीं, बल्कि सभी भारतीयों का है। इस देश में विभिन्न विघटनकारी ताकतों के बीच क्रिकेट अपनी सीमाओं के बावजूद एक मजबूत एकताकारी संघटक के रूप में मौजूद है और इसके प्रतीक के रूप में सचिन निश्चित रूप से हर बड़े सम्मान के हकदार हैं, बल्कि अधिकांश भारतीयों को यह उम्मीद थी कि भारत रत्न के नियमों में परिवर्तन के बाद सचिन को यह सम्मान दिया जाएगा। जल्दी ही उन्हें इस सम्मान से शायद नवाजा भी जाए। राज्यसभा के मनोनयन के तकनीकी पक्ष के अलावा भी विवाद के कुछ अन्य पहलू भी हैं। एक तो यही कि राज्यसभा में मनोनयन का मकसद यह है कि विशेष ज्ञान अथवा व्यावहारिक अनुभव रखने वाले लोगों को की क्षमताओं का लाभ उठाया जाए, क्योंकि ये चुनाव के माध्यम से राजनीति में नहीं आ सकते या आना नहीं चाहते हों। इन क्षेत्रों से जुड़ी हस्तियों से यह उम्मीद की जाती है कि वे सिर्फ शोभा न बनकर रहें, देशसेवा मे भी जुड़ें, लेकिन पूरे आदर के साथ मैं कहना चाहता हूं कि दुर्भाग्यवश इन महान लोगों में से अनेक का प्रदर्शन उनकी प्रतिष्ठा के अनुरूप नहीं रहा। चाहे सुर साम्राज्ञी लता मगेश्कर हों या अभिनेत्री वैजयंती माला अथवा चित्रकार एमएफ हुसैन हों या दारा सिंह या जया बच्चन हों। इस मामले में शबाना आजमी या जावेद अख्तर जैसे कुछ लोग अवश्य हैं जिन्होंने अपने मनोनयन के साथ पूरा न्याय किया। सुनील दत्त या शत्रुघ्न सिन्हा जैसे लोग भी हैं जिन्होंने पूरी सक्रियता दिखाई। सचिन को देखें तो हर्ष भोगले जैसे विश्लेषकों का कहना सही है कि अपने क्षेत्र में उनका अभूतपूर्व योगदान है, लेकिन यह भी सही है कि उन्हें सामाजिक और राजनीतिक जीवन का कोई खास अनुभव नहीं है। यह बहुत जरूरी है कि पहले वे इस देश के समाज और जीवन से जुड़ें और समझें ताकि वे देश के लिए कुछ ऐसा ही योगदान कर सकें जो उन्होंने क्रिकेट के क्षेत्र में किया। यहां फिल्म जगत से एक उदहारण दिया जा सकता है कि फिल्म की दुनिया में शाहरुख खान और आमिर खान, दोनों ने ही देश का नाम ऊंचा किया है, लेकिन अगर राज्यसभा के मनोनयन की बात की जाए तो आमिर के सामाजिक, सांस्कृतिक कार्यो के सामने शाहरुख कहीं भी नहीं ठहरते। विवाद से जुड़ा एक अन्य पहलू राजनीतिक है। कई विश्लेषकों द्वारा कहा जा रहा है कि विभिन्न घोटालों में उलझी और अनेक मोर्चो पर नाकामी झेल रही वर्तमान सरकार और कांग्रेस सचिन के नाम को भुनाकर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश कर सकती है। हालांकि मायावती ने सचिन तेंदुलकर को मनोनीत किए जाने का स्वागत किया, लेकिन साथ ही कांग्रेस की आलोचना करते हुए यह भी कहा कि तेंदुलकर जैसे लोगों को मनोनीत करने के पीछे जनता कांग्रेस की नीयत को अच्छी तरह समझती है। शिवसेना ने नामांकन के समय को लेकर गुगली फेंकी और कहा कि सचिन को राज्यसभा में लाने के बजाय भारत रत्न दिया जाना चाहिए था। उमर अब्दुल्ला ने कहा कि सचिन राज्यसभा के मुकाबले शायद भारत रत्न का सम्मान ज्यादा पसंद करते। कुछ ऐसा ही सुर भाजपा के भी कुछ सदस्यों का था। माकपा के गुरुदास दासगुप्ता ने सौरव गांगुली का नाम उछालकर एक अलग ही बाउंसर फेंका। (लेखक दिल्ली विवि में प्राध्यापक हैं) 1ी2श्चश्रल्ल2ी@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे
भारतीय अर्थव्यवस्था की साख पर सवाल
भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए यह बेहद चिंता का विषय है कि अंतरराष्ट्रीय के्रडिट रेटिंग एजेंसी स्टैंडर्ड एंड पुअर्स (एसएंडपी) ने भारतीय अर्थव्यवस्था की रेटिंग का आकलन स्थिर से घटाकर नकारात्मक कर दिया है। रेटिंग एजेंसी ने यह भी आशंका व्यक्त की है कि भारत की नकारात्मक रेटिंग अगले 24 महीने के दौरान और कम हो सकती है। यह स्थिति पहले से ही अंतर्विरोध और अविश्वास की संकट से जूझ रही संप्रग सरकार के लिए एक जबरदस्त चुनौती है। हालांकि वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने विश्वास जताया गया है कि भारतीय अर्थव्यवस्था सात फीसदी की रफ्तार से आगे बढ़ेगी, लेकिन यह आश्वासन कोरा ही जान पड़ता है। क्या शेयर बाजार में लगातार गिरावट, विदेशी निवेशकों द्वारा की जा रही बिकवाली, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में कमी और विदेशी मुद्रा की आवक में गिरावट भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए शुभ लक्षण कहे जा सकते हैं। दूसरी ओर सरकार विपरीत परिस्थितियों से घिरी हुई है और वह नीतिगत स्तर पर ठोस निर्णय लेने में सक्षम नहीं दिख रही है। उसकी उदासीनता हैरान करने वाली है। ऐसे में इस निष्कर्ष पर पहुंचना कठिन हो जाता है कि आने वाले दिनों में भारतीय अर्थव्यवस्था में कोई सुधार होने वाला है। आर्थिक चुनौतियों को लेकर सरकार चाहे जो भी दावा करे, लेकिन उसमें चुनौतियों से निपटने का सामर्थ्य और राजनीतिक इच्छाशक्ति बिल्कुल नहीं दिख रहा है। अभी पिछले ही दिनों वित्त मंत्रालय में मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु द्वारा अमेरिका यात्रा के दौरान वाशिंगटन की संस्था कार्नेगी एंडाओमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस में स्वीकार किया गया कि भारत में आर्थिक सुधारों की रफ्तार बेहद धीमी है और 2014 के आम चुनाव से पहले प्रमुख सुधारों को आगे बढ़ाना मुश्किल होगा। हैरानी की बात यह है कि सरकार बदहाल हो रही अर्थव्यवस्था की हकीकत को ईमानदारी से स्वीकार करने के बजाय भोथरे तर्को से उसे झुठलाने और देशवासियों को किसी तरह अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों का हवाला देकर बरगलाने का काम कर रही है। यहां सरकार को समझना होगा कि सच्चाई पर पर्दा डालकर वह बहुत अधिक दिनों तक अपनी छवि दुरुस्त नहीं रख सकती है। इससे तो समस्या और अधिक जटिल ही होगी। वैसे भी बदतर अर्थव्यवस्था के लिए सरकार की नीतिगत निष्कि्रयता को ही जिम्मेदार माना जा रहा है। ऐसा नहीं है कि एसएंडपी और कौशिक बसु द्वारा सरकार की निष्कि्रयता को कोई पहली बार उजागर किया गया है। इससे पहले भी देश के शीर्ष उद्यमियों द्वारा सरकार की अर्थनीति और उसकी कार्यशैली को लेकर आलोचना की जा चुकी है। अब तो सरकार की अर्थनीति की नाकामी की चर्चा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी की जाने लगी है। पिछले दिनों अमेरिका के प्रमुख अखबार वॉल स्ट्रीट के एक ब्लॉग में मनमोहन सिंह को अर्थशास्त्री नहीं, बल्कि टेक्नोक्रैट कहा गया है। ब्लॉग में भारत के जीडीपी ग्रोथ रेट में गिरावट, रुपये की कीमतों में गिरावट और शेयर बाजार में आ रही गिरावट जैसी कुछ चिंताओं का हवाला देते हुए कहा गया है कि मनमोहन सिंह एक ऐसी सरकार की अगुवाई कर रहे हैं जिसके पास न तो कोई नीति है और न ही जनसमर्थन। अखबार की इस साफगोई से यूपीए सरकार भले ही बहुत इत्तेफाक न जाहिर करे, लेकिन उसके पास इस बात का कोई भी जवाब नहीं है कि आखिर देश में आर्थिक सुधारों का एजेंडा मजाक बनकर क्यों रह गया है? क्या वजह है कि सरकार देश में व्याप्त नकारात्मक माहौल को खत्म कर पाने में असमर्थ दिख रही है और क्या वजह है कि खेतों से लेकर कंपनियों तक हर क्षेत्र में लोगों की प्रगति रुकी हुई है? आखिर ऐसा क्यों है कि सरकार के लाख चाहने के बावजूद भी महंगाई थमने का नाम नहीं ले रही है। ऐसे कौन से कारण हैं कि सत्ता के साझीदार सहयोगी दलों को ही सरकार की नीयत और उसकी नीतियों पर भरोसा नहीं रह गया है। सरकार इन यक्ष सवालों के आगे घुटने टेक चुकी है। दरअसल इसका मुख्य कारण सरकार के पास ठोस आर्थिक नीति का अभाव और देशहित में कठोर निर्णय न ले पाने की दुर्बलता है। अमेरिकी उद्योग चैंबर ने भी मनमोहन सरकार की नीतिगत निष्कि्रयता को लेकर कई तरह की आशंकाएं जााहिर की हैं। अब ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि इस बदतर हालात में भारत सरकार विदेशी निवेशकों को प्रेरित करने के लिए उपयुक्त माहौल का भरोसा किस तरह दे पाएगी। वह भी तब जबकि सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार ने ही भविष्यवाणी कर दी है कि 2014 से पहले आर्थिक सुधार नहीं होने वाले हैं। अब बाजार का भविष्य सरकार के हाथ से निकलता साफ दिख रहा है। यह कम दुर्भाग्यपूर्ण नहीं है कि सरकार में महत्वपूर्ण पदों पर प्रसिद्ध अर्थशास्ति्रयों के आसीन होने के बावजूद भी देश की अर्थव्यवस्था पटरी पर नहीं आ पा रही है। अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर को लेकर देश में संशय का माहौल है। खेती के क्षेत्र में उत्पादन बढ़ा है, लेकिन किसानों की स्थिति में कोई सुधार होता नहीं दिख रहा है। आर्थिक सुधार के फैसले न लिए जाने से उद्योग जगत भी हैरान व निराश है। कोई समझ नहीं पा रहा है कि आखिर किन वजहों से सरकार आर्थिक सुधार कार्यक्रमों को ठंडे बस्ते में डाल रही है। कौशिक बसु की यह आशंका कि घपले-घोटाले के कारण सरकार फैसले लेने से डर रही है, बिल्कुल भी गलत नहीं है। 2जी स्पेक्ट्रम से लेकर कॉमनवेल्थ गेम्स जैसे अनगिनत घोटालों को कोई कैसे भूल सकता है। इसके अलावा विडंबना यह कि वह घोटालेबाजों का बचाव भी कर रही है। ए. राजा, कनिमोरी व कलमाड़ी जैसे प्रमुख नेताओं और कई नौकरशाहों के जेल जाने से सरकारी मशीनरी भयभीत है। हालात कितना बदतर है यह इसी बात से समझा जा सकता है कि खुद प्रधानमंत्री को नौकरशाहों से अपील करनी पड़ रही है कि वे साहसिक और त्वरित फैसले करने से न हिचकें और बेझिझक होकर काम करें। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि नौकरशाहों को त्वरित फैसले लेने की नसीहत देने वाली सरकार के मुखिया और उनकी सरकार खुद कड़े फैसले क्यों नहीं ले पा रहे? एफडीआइ, खाद्य सुरक्षा, लोकपाल, पेंशन बिल और एनसीटीसी जैसे तमाम मसलों पर वह क्यों चुप्पी साधे हुए है। बार-बार अपने सहयोगी दलों के दबाव में आखिर सरकार क्यों आ जाती है? सरकार के आचरण से तो ऐसा लगता है मानों देश में सरकार नाम की कोई चीज ही नहीं रह गई है। ऐसे में यह उम्मीद रखना कि सरकार आर्थिक सुधारों की दिशा में कड़े फैसले लेगी मुश्किल जान पड़ता है। नीतिगत फैसले न लिए जाने के कारण ही आज अर्थव्यवस्था रसातल में जा रही है। जीडीपी में लगातार गिरावट आ रही है। सेवा क्षेत्र के विस्तार के बावजूद गुणवत्ता घट रही है। भुगतान संतुलन की स्थिति जटिल होती जा रही है। सरकार चालू खाते का घाटा तय सीमा में रखने में असमर्थ है। सब्सिडी के बोझ का रोना रोने वाली सरकार सब्सिडी को तर्कसंगत बनाने की दिशा में कोई पहल नहीं कर रही है। ऐसे में राजकोषीय घाटा बढ़ना तय है। पर त्रासदी यह है कि अपनी नाकामी का बचाव सरकार वैश्विक अर्थव्यवस्था का हवाला देकर कर रही है। इसमें कहीं कोई दो राय नहीं कि विश्व की बदहाल अर्थव्यवस्था से भारत खुद को अलग नहीं कर सकता, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी रहे और कोई निर्णय न ले। सरकार को चाहिए कि आर्थिक सुधारों की दिशा में कड़े कदम उठाए। आर्थिक सुधार न होने के कारण ही विकास का पहिया थमा हुआ है। संसद में कई आर्थिक सुधारों से संबंधित कई बिल स्वीकृति के इंतजार में हैं। सरकार उसे अमलीजामा पहनाने में नाकाम दिख रही है। यह स्थिति देश की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद खतरनाक है। इसके लिए यदि कोई दोषी है तो वह केंद्र सरकार और उसकी नीतियां हैं। सरकार के रणनीतिकार बार-बार रोना रो रहे हैं कि गठबंधन सरकार की वजह से देश में आर्थिक सुधार कार्यक्रम आगे नहीं बढ़ पा रहे। हालांकि सरकार का यह तर्क देश की जनता के साथ छल है। सत्ता में बने रहने के लिए आर्थिक सुधारों की बलि लेना आखिर किस तरह देशहित में है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
बोफोर्स के जिन्न की वापसी
बोफोर्स तोप सौदा प्रकरण में स्वीडन के पूर्व पुलिस प्रमुख स्टेन लिंडस्ट्रोम के ताजा खुलासे से संप्रग सरकार, कांग्रेस पार्टी और नेहरू-गांधी परिवार की फिर फजीहत हो रही है। ये सभी पक्ष 25 साल पहले बोफोर्स सौदे में ली गई दलाली के आरोपियों को बचाने में दिन-रात जुटे रहे। लिंडस्ट्रोम द्वारा उठाए गए कुछ प्रमुख मुद्दे इस प्रकार हैं। इस बात के कोई साक्ष्य नहीं हैं कि राजीव गांधी ने घूस ली, किंतु इस मामले में भारत और स्वीडन में जो लीपापोती की गई उस सबको वह देखते रहे और रोकने के लिए कुछ नहीं किया। गांधी परिवार के करीबी मित्र अट्टावियो क्वात्रोची को घूस की रकम मिलने के पुख्ता सबूत हैं। बोफोर्स ने तोप सौदे में घूस की रकम उसकी कंपनी ए.ई. सर्विसेज के माध्यम से क्वात्रोची के खाते में हस्तांतरित की। क्वात्रोची को दी गई रकम राजनीतिक भुगतान थी। भारत और स्वीडन में क्वात्रोची से पूछताछ की किसी को इजाजत नहीं दी गई। बोफोर्स के अध्यक्ष मार्टिन अर्डबो इस तथ्य को लेकर सहमे हुए थे कि क्वात्रोची को किए गए भुगतान का सार्वजनिक तौर पर खुलासा हो सकता है। अर्डबो ने अपनी डायरी में लिखा था कि क्यू की पहचान कभी उजागर नहीं होनी चाहिए, क्योंकि उसकी आर के साथ निकटता है। कुछ भारतीय जांचकर्ता अमिताभ बच्चन को गलत ढंग से फंसाने के लिए लिंडस्ट्रोम पर दबाव डाल रहे थे और बोफोर्स मामले की जांच में भारतीय जांचकर्ताओं ने लीपापोती करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। जहां तक कांग्रेस पार्टी का संबंध है लिंडस्ट्रोम के इस बयान का वक्त इससे खराब नहीं हो सकता था। फिलहाल संप्रग राजनीतिक और प्रशासनिक दलदल में धंसा हुआ है और बजट सत्र का दूसरा चरण शुरू ही हुआ है। यह हास्यास्पद है कि कांग्रेस विपक्षी दलों और मीडिया से बोफोर्स मामले को तूल देने के लिए माफी मांगने के लिए कह रही है। इससे बड़ा विरोधाभास और कुछ नहीं हो सकता कि यह मांग तब की जा रही है जब दलाली के सारे तथ्य स्थापित हो चुके हैं और यहां तक कि क्वात्रोची के खाते में 73 लाख डॉलर की रकम जाने के प्रमाण भी हैं। बोफोर्स की कहानी 1980 में शुरू हुई जब सेना ने तोपों की खरीदारी के लिए दबाव बनाया। तोप की आपूर्ति की तीन प्रमुख कंपनियां थीं-फ्रांस की सोफ्मा, स्वीडन की एबी बोफोर्स और ऑस्टि्रया की वोएस्ट अल्पाइन। मूल्यांकन प्रक्रिया के दौरान सोफ्मा सबसे आगे रही, किंतु निर्णायक चरण में बोफोर्स ने सोफ्मा को पछाड़ दिया। सीबीआइ द्वारा स्वीडन और स्विट्जरलैंड से जुटाए गई सामग्री से पुष्टि हो जाती है कि बोफोर्स की सफलता में क्वात्रोची का बड़ा हाथ था। 1985 में बोफोर्स ने ए.ई. सर्विसेज के साथ साथ समझौता कि अगर 31 मार्च, 1986 तक बोफोर्स तोप आपूर्ति का करार हो जाता है तो कंपनी को तीन प्रतिशत कमीशन मिलेगा। हैरत की बात यह है कि राजीव गांधी सरकार ने 24 मार्च, 1986 को बोफोर्स सौदे को हरी झंडी दे दी। दो माह बाद सरकार ने करार की कुल राशि के 20 फीसदी का भुगतान कर दिया और बोफोर्स ने 73.43 लाख डॉलर ए.ई. सर्विसेज के स्विट्जरलैंड स्थित नोर्डफाइनेंज बैंक के खाते में हस्तांतरित कर दिए। बाद में यह राशि क्वात्रोची और उसकी पत्नी की दूसरी फर्म कोलबार इंवेस्टमेंट्स में हस्तांतरित कर दी गई। एक इटालियन क्वात्रोची ने करार को अंतिम तिथि से पहले ही कराने में सफलता कैसे हासिल की और इस असाधारण काम में उसे किसने सहयोग दिया? ये सवाल अप्रैल, 1987 में स्वीडिश रेडियो के इस खुलासे के बाद से मथ रहे हैं कि भारत से सौदा हासिल करने के लिए बोफोर्स ने दलाली दी थी। इसके पश्चात, नौवें दशक के मध्य में सीबीआइ स्विट्जरलैंड से कुछ दस्तावेज लेकर आई जिनसे पुष्टि होती थी कि बोफोर्स ने क्वात्रोची को 73 लाख डॉलर की राशि दी थी। जब 2004 में संप्रग सरकार सत्ता में आई तो मनमोहन सिंह सरकार ने सुनियोजित ढंग से क्वात्रोची को बरी करने के उपाय तलाशने शुरू कर दिए। तत्कालीन कानून मंत्री एचआर भारद्वाज ने लीपापोती ऑपरेशन की निगरानी की। क्वात्रोची के खिलाफ इंटरपोल नोटिस जारी होने के बावजूद अजर्ेंटीना में उसकी गिरफ्तारी के बाद भारद्वाज ने सुनिश्चित किया कि उसका भारत में प्रत्यारोपण न हो सके। इसके बाद मनमोहन सिंह सरकार ने नेहरू-गांधी परिवार और क्वात्रोची की दो अन्य असाधारण सेवाएं कीं। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के अनुरोध पर ब्रिटिश सरकार ने क्वात्रोची के इंग्लैंड स्थित खाते को सील कर दिया था। संप्रग सरकार ने एक भारतीय कानून अधिकारी को गोपनीय रूप से इंग्लैंड भेजा, जिसने ब्रिटिश सरकार को सूचित किया कि क्वात्रोची के खाते से सील हटाने पर भारत सरकार को कोई आपत्ति नहीं है। अनुरोध के तुरंत बाद क्वात्रोची के खाते से रोक हटा दी गई और उसने तुरंत खाते से 73 लाख डॉलर निकालकर दूसरे देश के दूसरे बैंक खाते में हस्तांतरित कर दिए। इसके बाद सरकार ने नेहरू-गांधी परिवार की सेवा करते हुए सीबीआइ के माध्यम से अदालत में क्वात्रोची के खिलाफ आपराधिक मामलों को खत्म करा दिया। लिंडस्ट्रोम के खुलासे पर हमारी जांच एजेंसी, हमारी न्याय व्यवस्था और कांग्रेस के नेताओं को शर्मिदा होना चाहिए। पिछले 25 सालों से देश एक सरल सवाल का जवाब मांग रहा है कि जब बोफोर्स ने सौदा भारत के साथ किया था तो उसने गांधी परिवार के मित्र क्वात्रोची को 73 लाख डॉलर की राशि का भुगतान क्यों किया? मनमोहन सरकार ने इंग्लैंड की सरकार को क्वात्रोची के बैंक खाते पर लगी रोक हटाने को क्यों कहा, ताकि वह लूट की रकम खाते से निकाल सके? क्वात्रोची को रकम मिलने की पुष्टि होने के बावजूद मनमोहन सिंह सरकार ने सीबीआइ से उसके खिलाफ मामले वापस लेने को क्यों कहा? इससे एक और सवाल उठता है-क्या कभी बोफोर्स का भूत शांत हो सकेगा? इसका दो टूक उत्तर है-नहीं। यह भूत बार-बार नेहरू-गांधी परिवार को सताने के लिए आता रहेगा। इस मामले को खत्म करने की तमाम कोशिशों के बावजूद पिछले साल आयकर अपील ट्रिब्यूनल ने कहा कि बोफोर्स ने क्वात्रोची को कमीशन दिया था। इस प्रकार किसी न किसी कारण से यह मामला बार-बार खुलता रहेगा। 1970 में इंदिरा गांधी ने भारत को अस्थिर और कमजोर करने वाले विदेशी हाथ के बारे में आगाह किया था। अगर हम राष्ट्रीय संप्रभुता की रक्षा करना चाहते हैं तो बोफोर्स घोटाले की 25वीं वर्षगांठ पर इंदिरा गांधी की विदेशी हाथ की चेतावनी पर गौर फरमाना होगा। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं) 1ी2श्चश्रल्ल2ी@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे
व्यावसायिक कोर्स में शामिल होगा हाथों का हुनर : सिब्बल
सरकार ने बुधवार को उम्मीद जगाई है कि हाथों के हुनर को भी व्यवसायिक कोर्सों में जोड़ा जाएगा और उसी विषय में डिग्री दी जाएगी। सरकार नौवीं कक्षा से आगे के स्तर पर व्यवसायिक शिक्षा पाठ्यक्र म पेश करने करने जा रही है जिस पर 2013 से अमल किया जाएगा। लोकसभा में मेनका गांधी के पूरक प्रश्न के उत्तर में मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा, हमने राष्ट्रीय व्यवसायिक शिक्षा पाठ्यक्र म ढांचा (एनसीईक्यूएफ) तैयार किया है जिसे केंद्रीय शिक्षा के सलाहकार बोर्ड की मंजूरी मिल गई है। इसे आगामी शैक्षणिक सत्र से लागू किए जाने की योजना है। उन्होंने कहा, एनसीईक्यूएफ के तहत नौवीं, 10वीं, 11वीं और 12वीं कक्षा के स्तर पर व्यवसायिक शिक्षा पाठ्यक्र म लागू करने की योजना है। सिब्बल ने कहा कि हमने डिग्री कालेजों में बीएससी व्यवसायिक पाठ्यक्र म भी लागू करने की योजना बनाई है। इस विषय में विविद्यालयों के कुलपतियों के साथ चर्चा की गई है। गौरतलब है कि कुछ समय पहले बिहार के शिक्षामंत्री पी के शाही के नेतृत्व में राज्यों के शिक्षामंत्रियों की समिति ने राष्ट्रीय व्यवसायिक शिक्षा पाठ्यक्र म ढांचे को अंतिम रूप दिया है और उसे मंजूर कर लिया गया है। सिब्बल ने कहा कि इस विषय में कई उद्योगों के साथ चर्चा की गई है, जिसमें कपड़ा उद्योग, आटोमोबाइल उद्योग, मीडिया एवं मनोरंजन, विनिर्माण, आतिथ्य एवं पर्यटन आदि शामिल हैं। मंत्री ने कहा, हम क्षेत्रीय कौशल परिषद के साथ सक्रि यता के साथ काम कर रहे हैं और इसे जल्दी ही अंतिम रूप दे दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि हमने देश में 100 सामुदायिक कालेज स्थापित करने के लिए राज्यों के मंत्रियों को लिखा है और उनसे स्थान की पहचान करने को कहा है। बच्चे बीच में पढ़ाई नहीं छोड़ेंगे: सरकार ने बुधवार को कहा कि साल 2020 तक यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाएगा कि स्कूलों में दाखिल कोई भी बच्चा बीच में अपनी पढ़ाई नहीं छोड़े। इस उद्देश्य के लिए लड़कियों को स्कूल जाने को प्रोत्साहित करने पर विशेष जोर दिया जाएगा। लोकसभा में पी एन पूनिया, शीशराम ओला के प्रश्न के उत्तर में मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा कि जब तक प्राथमिक, उच्च प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर अधिक बच्चियां पढ़ाई करने आगे नहीं आएंगी तब तक उच्च शिक्षा में उनकी हिस्सेदारी नहीं बढ़ेगी। सिब्बल ने कहा कि सरकार ग्रामीण क्षेत्रों में आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध नहीं होने की बात स्वीकार करती है। इस लिहाज से 12वीं पंचवर्षीय योजना में हर जिले में एक डिग्री कॉलेज खोलने का तथा ग्रामीण क्षेत्रों में करीब 80 हजार करोड़ रुपये खर्च करने की योजना है। उन्होंने कहा कि सरकार ने मॉडल स्कूल खोलने की योजना को आगे बढ़ाया है। इस उद्देश्य के लिए अभी केंद्र एक तिहाई धन देता है। लेकिन यह पाया गया है कि इसके कारण राज्य सरकारों की ओर से कम प्रस्ताव सामने आते हैं। अब हमने विचार किया है कि केंद्र सरकार इसके लिए 65 प्रतिशत धन दे जबकि पूर्वोत्तर राज्यों के लिए केंद्र की हिस्सेदारी 90 प्रतिशत हो। निजी संस्थानों पर अंकुश लगाने के संदर्भ में एक प्रश्न के उत्तर में मंत्री ने कहा कि सरकार ने शिक्षा कदाचार विधेयक बनाया है जिसे दोनों सदनों को पारित करने की जरूरत है। इसके कानून बनने के बाद निजी संस्थानों की अनियमितताओं पर लगाम कसी जा सकेगी।
सरकार शौचालयों के निर्माण के लिए धनराशि बढ़ाएगी
यह जिक्र करते हुए कि ग्रामीण क्षेत्रों में शौचालयों के निर्माण के लिए आवंटन राशि बहुत कम है, सरकार ने बुधवार को कहा कि वह संपूर्ण स्वच्छता अभियान के तहत प्रति परिवार धनराशि 2200 रुपए से बढ़ाकर 9900 रुपए करेगी। ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने यहां यूनीसेफ द्वारा आयोजित क्षेत्रीय सम्मेलन में कहा, ‘राज्य और केंद्र सरकार द्वारा दी जाने वाली कुल 2200 रुपए की सहायता शौचालय बनाने के लिए बहुत कम धनराशि है, इसकी वजह है कि नेता और नई दिल्ली में स्वच्छता के लिए काम करने वाले नौकरशाह उन शौचालयों का कभी उपयोग नहीं करते जिनके लिए वे सहायता देते हैं जबकि हम आशा करते हैं लोग उनका उपयोग करें।’
पेयजल एवं स्वच्छता विभाग के भी प्रभारी रमेश ने कहा, ‘हम अपनी सहायता में बड़े कंजूस हैं। अब हम इन नियमों की समीक्षा करेंगे और शीघ्र ही हम बदलाव की अधिसूचना जारी करेंगे।’ उन्होंने कहा कि सरकार आवंटन रािश प्रति परिवार 9900 रुपए करने पर काम कर रही है जिसके लिए 5400 रुपए संपूर्ण स्वच्छता अभियान से और शेष 4500 रुपए महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी से आएगी। रमेश ने कहा कि दोनों को इसलिए साथ लाया जा रहा है ताकि ग्रमीण काम योजना और स्वच्छता कार्यक्र म की धनराशि का उपयोग कर बेहतर सामुदायिक सुविधा तैयार की जा सके। उन्होंने कहा कि यह शर्म की बात है कि देश में भी 60 फीसद महिलाओं को मूलभूत शौचालय सुविधाएं उपलब्ध नहीं करा पाया है। उन्होंने कहा, ‘हमारे लिए इससे ज्यादा कुछ शर्मनाक बात नहीं हो सकती। जबतक हमारे अंदर शर्म की भावना, गुस्से की भावना पैदा नहीं होती, हम कुछ नहीं करने जा रहे हैं। यह सामान्य रूप से चलने वाली बात होगी।’
उन्होंने कहा, ‘हम शौचालय बनाते हैं जिनका उपयोग नहीं होने जा रहा। हम सब्सिडी के रूप में धन देते हैं जो बीच में गायब होने जा रही है। मैं मानता हूं कि हमें इसे स्वीकार करना चाहिए कि यह हमारे लिए शर्म की बात है, हमारे मन में गुस्सा पैदा होनी चाहिए और हमें इसे राष्ट्रीय जुनून बनाना चाहिए।’
यह जिक्र करते हुए कि देश के 40 फीसद स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग से शौचालय सुविधा नहीं है, रमेश ने कहा, ‘यदि मैं इस बात की प्राथमिकता तय करना चाहूंगा कि कहां सरकारी धन की आवश्यकता है तो ग्रामीण स्कूलाू में लड़कियों के लिए शौचालय सुविधाओं को उन्नत करने में काफी धन लगाने की जरूरत है।’ उन्होंने कहा कि संपूर्ण स्वच्छता अभियान के तहत कुछ राज्य सरकारों द्वारा प्रदत आंकड़े और ग्रामीण क्षेत्रों में शौचालयों के निर्माण पर जनगणना आंकड़े बिल्कुल भिन्न हैं। कहा, 2200 से बढ़ाकर 9900 रुपए की जाएगी यह रकम12वीं योजना में भी जारी रहेगा एनआरएचएम
घोटालों और विवादों में घिरा राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) पांच साल और जारी रखा जाएगा। प्रधानमंत्री डा. मनमोहन की अध्यक्षता में बृहस्पतिवार को होने वाली कैबिनेट की बैठक में तीन महत्वपूर्ण प्रस्ताव पेश किए जा रहे हैं। इनमें सबसे प्रमुख एनआरएचएम को विस्तार देना है। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन का कार्यकाल 11वीं योजना के समापन के साथ ही समाप्त हो रहा है। 11वीं योजना पिछले महीने 31 मार्च को समाप्त हो गई है। 12वीं पंचवर्षीय योजना पहली अप्रैल से शुरू हो गई है लेकिन असल में इस योजना को अभी औपचारिक रूप से शुरू होना बाकी है। एनआरएचएम योजना 2005-06 में शुरू की गई थी। अब तक इस योजना पर करीब 75 हजार करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं लेकिन इसका एक भी लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सका है। इसमें 7 लक्ष्य निर्धारित किए गए थे। पहला- मातृ मृत्यु दर 254 प्रति एक लाख से घटाकर 100 प्रति एक लाख, दूसरा- शिशु मृत्यु दर 30 प्रति एक हजार, तीसरा- प्रजनन दर घटाकर 1000 पर 21 करना, चौथा- 2009 तक सभी गांवों को पीने का साफ पानी उपलब्ध कराना, पांचवां- बच्चों में कुपोषण को घटाकर वर्तमान दर का 50 प्रतिशत करना, छठा- महिलाओं और बालिकाओं में एनीमिया को काबू करना और सातवां- बालिका लिंग अनुपात 935 प्रति एक हजार करना। लेकिन ये सातों लक्ष्य मंजिल से बहुत दूर रह गए। मातृ मृत्यु दर 2004-05 में 254 प्रति एक लाख थी जो 14 प्वाइंट प्रतिवर्ष की दर से घट रही है ऐसे में 2012 के आखिर तक यह दर 154 प्रति एक लाख रह जाएगी जो लक्ष्य 100 प्रति एक लाख से बहुत दूर है। केरल और तमिलनाडु ने यह लक्ष्य हासिल कर लिया है जबकि असम, मध्य प्रदेश, राजस्थान में यह बहुत ज्यादा है। असम में 390 प्रति एक लाख है। उत्तर प्रदेश में 359, गुजरात में 145, पश्चिम बंगाल में 148 राजस्थान में, 318 बिहार में 261 प्रति एक लाख है। शिशु मृत्यु दर 2006 में 37 प्रति एक हजार था। 2009 में यह घटकर 50 प्रति एक हजार हो गई लेकिन 2012 तक लक्ष्य से दूर 44 प्रति एक हजार रहेगी। आबादी की रफ्तार कम करने के लिए जनसंख्या स्थिरीकरण कार्यक्रम भी इसी योजना के तहत चला है। लक्ष्य था एक हजार पर 21 बच्चे। लेकिन अभी यह एक हजार पर 26 है। 2012 के अंत तक यह 24 प्रति हजार हो जाएगी। सभी गांवों में साफ पीने का पानी उपलब्ध कराने का लक्ष्य 2009 तक रखा गया था लेकिन आज भी 70 हजार गांवों में साफ पानी है ही नहीं। यह योजना अपने लक्ष्यों के इतर घोटालों और विवादों से चर्चा में आई है। उत्तर प्रदेश में बड़े बड़े नेता और अधिकारी जेल में हई। कु छ अधिकारियों ने आत्महत्या कर ली है। राजस्थान में कांग्रेस के बड़े नेताओं के पुत्र घोटालों में फंसे पाए गए हैं। अन्य राज्यों में भी बुरा हाल है। इसके बावजूद सरकार एनआरएचएम को 12वीं योजना में भी जारी रखने का प्रस्ताव कर रही है। इस योजना में पांच साल में तीन लाख करोड़ रुपए खर्च करने का अनुमान लगाया गया है। बच्चों में यौन उत्पीड़न रोकने के लिए कानून में संशोधन : बच्चों में यौन उत्पीड़न रोकने के लिए कानून में संशोधन किया जा रहा है। एम्स में जीवन के लिए संघर्ष करते हुए मौत के मुंह में गई बच्ची फलक की घटना के बाद ऐसी घटनाओं को रोकने के उपाय के साथ बाल अपराध की सीमा में 18 वर्ष तक के युवाओं को शामिल करने का प्रावधान किया जा रहा है। घरेलू काम वाली भी यौन उत्पीड़न के दायरे में : घर में काम करने वाली महिलाएं भी कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न कानून के दायरे में आएंगी। इस बाबत बृहस्पतिवार को कैबिनेट में प्रस्ताव लाया जा रहा है।
धार्मिक यात्राओं पर सब्सिडी का औचित्य
तीर्थ यात्रियों को कभी पंडे लूटते हैं तो कभी मौलवी, तो कभी सरकारी अफसर। खासतौर से हज जैसी पावन यात्रा पर हाजियों के साथ जो दुर्व्यवहार होता है या जिस प्रकार से उन्हें हर मोड़ पर लूटा जाता है, वह एक अति वेदना का विषय है। एक गरीब मुसलमान की यह महत्वाकांक्षा होती है कि जीवन में एक बार अवश्य वह हज करे और जब पूर्व जीवन की गाढ़ी कमाई जोड़ वह हज पर जाता है तो सरकारी एजेंसियां और भारतीय हज कमेटी सभी गरीब हाजियों का शोषण करते हैं। आखिर ऐसा क्यों होता है? हर वर्ष वही समस्या। वैसे तो भारतीय संविधान ने अल्पसंख्यकों को अनेक सुविधाएं प्रदान की हैं, मगर उनका ठीक प्रकार से प्रयोग नहीं होता। भारतीय हाजियों की सुविधाओं के लिए 1959 में हज एक्ट लागू किया गया। इसकी सहायता से हज पर हाजियों को बहुत कम खर्च करना पड़ता है। इसके लिए मुतवल्ली (अभिभावक) बनाया गया सेंट्रल हज कमेटी को। आजकल एक हाजी को लगभग 70,000 रुपये हज कमेटी में इस तीर्थ यात्रा के लिए जमा कराने होते हैं। बदले में बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, जिनका बकौल शायर वही हाल होता है कि वह वायदा क्या, जो वफा हुआ! कहा जाता है कि हरम शरीफ (मक्का) के निकट हाजियों को ठहराया जाएगा, उच्च चिकित्सा और दवाएं प्रदान की जाएंगी। वातानकूलित बसों में यात्रा कराई जाएगी आदि। कहां जाती है करोड़ों की सब्सिडी सऊदी अरब जाने से पहले ही हाजियों की समस्याएं शुरू हो जाती हैं। हर बड़े शहर में हज गृह होते हैं, जिनका संचालन राज्य हज कमेटियां करती हैं। फ्लाइट से पहले आस-पास के गांव-कस्बों से हाजी इन्हीं हज गृहों में रहते हैं, जहां न तो उनके लिए और न ही उनके साथ छोड़ने आए अतिथियों के लिए कोई विशेष व्यवस्था है। यों तो केंद्रीय हज कमेटी एक हज डेलिगेशन भी भेजती है, जिसकी जिम्मेदारी भारतीय हाजियों की समस्याओं का समाधान करना है, मगर होता इसका उलटा है। गरीब हाजियों को तो सुविधाएं उपलब्ध होती नहीं। हां, यह अवश्य होता है कि कुछ लोग उन पर हाथ मार लेते हैं। हज यात्रा के घपले वास्तविक हज के समय से बहुत पहले से ही शुरू हो जाते हैं। अनेक लोग सऊदी अरब में सुविधाओं व इंतजाम की चौकसी के नाम पर चार से छह यात्राएं कर लेते हैं और कई बार एक-एक महीने तक रुक कर आते हैं। पूरे 137 करोड़ की सब्सिडी भारतीय सरकार हाजियों को प्रदान करती है। वह कहां जाती है? इसका कोई हिसाब-किताब नहीं होता। 137 करोड़ की सब्सिडी के असल हकदार वे हाजी होते हैं, जो भारतीय हज कमेटी द्वारा हज करते हैं। लिहाजा, हज कराने वाली प्राइवेट टूर कंपनियां भी अपने ग्राहकों को हज कमेटी के मार्फत ही भेजती हैं, मगर उनके ठहरने का बंदोबस्त अलग से करती हैं। ये कंपनियां अपने हाजियों को अलग इमारतों में पहले से तयशुदा ब्लैक के दामों में ठहराती हैं। इसमें होता यह है कि रकम तो हाजी देता है ए-कैटेगरी की, मगर उसे ठहराया जाता है सी-कैटेगरी के मकानों में। जो पैसा चला गया, वह फिर कहां वापस मिलता है। अब इससे होता यह है कि सरकारी छूट के वास्तविक हकदारों की संख्या कुछ कम हो जाती है। फिरअंत में निजी टूर कंपनियों की मदद लेने वाले हाजियों को भी हज कमेटी की सूची में शामिल कर लिया जाता है। यह एक ऐसी तकनीकी दरार है, जिससे गरीब हाजियों का अरसे से शोषण होता चला आया है। हज यात्रा के नाम पर धांधलियों का सिलसिला बड़ा लंबा है। हाजियों के लिए सरकार द्वारा दिए गए अनुदानों के बदले में मुसलमानों को प्राय: सुनना पड़ता है कि संप्रदाय विशेष को ही यह संतुष्टिकरण क्यों? इसी प्रकार से सिखों, ईसाइयों, यहूदियों और हिंदुओं को भी उनकी तीर्थ यात्राओं के लिए विशेष अनुदान मिलना चाहिए। मुसलमानों को दिए जाने वाले इस अनुदान को हड़पने के लिए तरकीबों की कमी नहीं है। इसकी शिकायतें समय-समय पर की जाती रही हैं, मगर नतीजा वही ढाक के तीन पात! हज कमेटी हज यात्रा पर जाने वालों से कई माह पहले ही अर्जियां ले लेती है और प्रति अर्जी के साथ में लगभग 6,000 रुपया बजरिया ड्राफ्ट या चैक वसूल लिए जाते हैं, जिनमें लगभग 300 रुपये पंजीकरण और हज कमेटी के दान खाते के होते हैं। पांच-साढ़े पांच हजार की मोटी रकम हज यात्रियों की दवा, यात्रा और अरब में उनके ठहरने की व्यवस्था के लिए वसूली जाती है। सवाल यह है कि इस मोटी रकम की क्या जरूरत है? इस संबंध में हज कमेटी का तर्क है कि अरब में इमारतें बुक कराने का कुछ एडवांस भी देना पड़ता है, जिसकी भरपाई के लिए यह रकम ली जाती है। हज यात्रियों की अर्जियां की बड़ी संख्या के कारण यह रकम भी करोड़ों में पहुंचती है। शायद यही कारण है कि हज कमेटी का सदस्य बनने के लिए इतनी मारा-मारी होती है। इस रकम को हज कमेटी बैंक में डाल भारी ब्याज भी ऐंठती है। चूंकि हर राज्य में हज पर जाने वालों का कोटा तय है, इसलिए जो हाजी नहीं जा पाते, उन्हें उनके पैसे लौटा दिए जाते हैं। मजे लूटते माननीय भारतीय हाजियों की यातनाओं को लेकर एक जनहित याचिका उच्च न्यायालय के अधिवक्ता मुहम्मद अत्यब सिद्दीकी ने अदालत में दायर की है, जिसमें केंद्रीय हज कमेटी के विरुद्ध कई मामले इस धांधली के संबंध में उठाए गए हैं। इस याचिका में कहा गया है कि हाजी भारतीय हज कमेटी को संपूर्ण हज यात्रा के लिए पैसा देता है। इसमें दिल्ली/मुंबई/बेंगलूर/मद्रास/कोलकाता से जेद्दा और वापसी का हवाई टिकट तो होता ही है, साथ में वह खर्च भी होता है, जो सऊदी अरब में यातायात और भिन्न स्थानों पर रहने के लिए भी होता है। एक हाजी से वातानकूलित बसों का पूरा पैसा लिया जाता है- जेद्दा में मक्का तक, मक्का से मीना तक, मीना से अराफात तक, अराफात से मुजदलिफा तक और फिर वापस मुजदलिफा से अराफात तक, अराफात से मीना तक, मीना से मक्का तक, मक्का से मदीना तक और मदीना से जेद्दा तक! इस प्रकार पहले चरण में लगभग 1500 किलोमीटर वातानकूलित गाडि़यों की रकम ऐंठ ली जाती है। वास्तविकता यह होती है कि वातानकूलित तो छोडि़ए, पुरानी और बदहाल बसों में हाजियों को डंगर की भांति ठूंस दिया जाता है। हां, वातानकूलित गाडि़यों में हज डेलिगेशन के माननीय सदस्य यात्रा का मजा लूटते हैं। पाकिस्तान, बांग्लादेश और मलेशिया के हाजियों की सहायता के लिए ये देश अपने विशेष खिदमतगार तैयार रखते हैं, जो झंडे लिए और वर्दी पहने अपने-अपने देशों के हाजियों का मार्गदर्शन करते हैं। इसी प्रकार इनके अपने चिकित्सा दल हैं। दो साल पहले जब मीना के खेमों में आग लगी तो बहुत से बुज़ुर्ग हिंदुस्तानी हाजियों की जानें पाकिस्तानी और बांग्लादेशी हाजियों के डॉक्टरों ने बचाई। अगर बेचारे भारतीय हाजी अपने हज डेलिगेशन और डॉक्टरों के भरोसे रहे तो शायद उनका हज हो ही न पाए! एक अन्य गूढ़ समस्या यह है कि दिल्ली, मुंबई, मद्रास आदि में हाजियों को डिपार्चर (गमन) से दो-तीन रोज पहले बुला लिया जाता है। इसी प्रकार से हज पूर्ण होने पर उन्हें जेद्दा हवाई अड्डे पर 24 घंटे या अधिक समय तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है, जो थकान से चूर-चूर हाजी को बिल्कुल निढाल कर देती है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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