Saturday, April 9, 2011

जन आंधी से बैकफुट पर सरकार


जिस तरह भ्रष्टाचार के खिलाफ आमजन स्वत:स्फूर्त अन्ना हजारे की आवाज से आवाज मिला रहा है, वह सरकार व अन्य राजनीतिक दलों के लिए खतरे की घंटी है। भ्रष्टाचार अब काफी समय बाद मुद् दा बनने जा रहा है क्योंकि जनता ने इस आंदोलन से राजनीतिक दलों को दूर रखकर यह जता दिया है कि वे सभी हमाम में नंगे हैं। इसलिए सरकार को बिना विलम्ब किये जन लोकपाल विधेयक को मान लेना चाहिए ताकि जनता के टूटते भरोसे पर विराम लग सके
राजधानी दिल्ली का राजनीतिक तापमान अचानक गर्म हो उठा है। भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रभावी कानून 'जन लोकपाल' के गठन को लेकर गांधीवादी समाजसेवी अन्ना हजारे भूख हड़ताल पर हैं। उनकी इस पहल को अप्रत्याशित जन-समर्थन मिल रहा है। समूचे देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ माहौल बन रहा है। बच्चे, बूढ़े और नौजवान सभी उनके समर्थन में सड़कों पर उतर रहे हैं। देश के हर भाग में इसकी गूंज सुनाई देने लगी है। लोग जगह-जगह धरना, प्रदर्शन और केंडिल मार्च के जरिये अपनी एकजुटता दिखा रहे हैं तो इंटरनेट तथा एसएमएस के जरिये जन समर्थन का अभियान अपने चरम पर पहुंच गया है। सभी उद्वेलित हैं और यह जनहुंकार कारवां बनता जा रहा है। अन्ना की इस आंधी ने सरकार की परेशानी बढ़ा दी है। वह बेहद दबाव में आ गयी है। 'अन्ना' की आवाज को जो 'जन स्वर' मिलता दिख रहा है, उससे स्पष्ट हो जाता है कि आमजन भ्रष्टाचार से किस तरह त्रस्त है और वह इसके निदान के लिए कड़ा कानून चाहता है? सरकार का प्रस्तावित लोकपाल बिल दंतविहीन है, जो भ्रष्टाचारियों के बचाने में मददगार साबित होगा क्योंकि उसमें कई प्रावधान काफी लचर हैं। इसीलिए इस समाजसेवी ने समाज के विभिन्न क्षेत्रों के विशिष्ट लोगों के साथ मिलकर जन लोकपाल का विकल्प सरकार के समक्ष प्रस्तुत किया है ताकि भ्रष्टाचार पर अंकुश लग सके और भ्रष्टाचारी सलाखों के पीछे हो। आज यूपीए 2 सरकार में एक के बाद एक घोटाले उजागर हो रहे हैं। सरकार उसे रोक पाने में विफल रही है। सीवीसी के पद पर अभी थॉमस की नियुक्ति को लेकर हुई छीछालेदर से सरकार की कमजोरी और उजागर हुई है। इससे स्पष्ट हो चला है कि भ्रष्टाचार निरोधक संस्थाएं कितनी प्रभावी हैं? इसीलिए पहली बार किसी कानून के लिए इतना जन समुदाय एकजुट होकर खड़ा हुआ है। उसे सरकारी विधेयक में प्रस्तावित कमजोर संस्था नहीं चाहिए बल्कि वह जवाबदेह संस्था की वकालत कर रहा है। जन लोकपाल विधेयक इसी का विकल्प है। वैसे प्रशासनिक सुधार आयोग की तरफ से वर्ष 1967 में लोकपाल की स्थापना का सुझाव आया था। 1969 में लोकसभा ने उसे पारित भी कर दिया था किंतु अभी तक वह मृग मरीचिका ही साबित हुआ है। इस अवधि में आठ बार सरकारी विधेयक के रूप में और छह बार गैर-सरकारी विधेयक के रूप में इसे पारित करने की कोशिशें जरूर हुईं पर किसी न किसी बहाने उसमें रोड़ा अटकाया जाता रहा है। आज चहुंतरफा सरकार के प्रस्तावित विधेयक और हजारे के प्रस्तावित विधेयक को लेकर र्चचा हो रही है। सरकारी विधेयक सरकारी कानूनविदों और अफसरों ने तैयार किया है, जिसमें प्रधानमंत्री के प्रतिरक्षा तथा विदेशी मामलों में उसे कार्रवाई का अधिकार नहीं होगा। सांसदों के विरुद्ध यदि भ्रष्टाचार के आरोप लगे तो उनकी जांच लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति की अनुमति के बिना नहीं हो सकती। इसके अलावा सरकारी लोकपाल का जजों व नौकरशाही से कोई लेना-देना नहीं होगा। उसे भ्रष्टाचार के किसी मामले का स्वत: संज्ञान लेने और न ही एफआईआर दर्ज करने का अधिकार होगा जबकि जन लोकपाल विधेयक में सीबीआई और निगरानी आयोग को लोकपाल के अधीन रखा गया है। लोकपाल को शक्ति सम्पन्न बनाया गया है। निश्चित समय में भ्रष्टाचार की जांच करना और दोषियों को दंडित करना इसका काम होगा। इस काम के लिए उसे किसी की अनुमति लेने की जरूरत नहीं होगी। वह पूर्ण स्वायत्त होगा। लोकपाल की नियुक्ति में प्रधानमंत्री, गृहमंत्री तथा विपक्षी नेताओं का कोई हाथ नहीं होगा। वह अफसरों और जजों की भी जांच करने में सक्षम होगा। भ्रष्ट अधिकारियों की बर्खास्तगी तथा दोषी पाये जाने पर कम से कम पांच साल और अधिकतम आजीवन कारावास का प्रावधान है। इसके अलावा घोटाले की वजह से हुए नुकसान की भरपाई भी दोषी लोगों द्वारा करने का उल्लेख है। ऐसे में दोनों विधेयकों में फर्क स्पष्ट है। सरकारी भ्रष्टाचार को खत्म करने के विधेयक का प्रारूप खुद सरकार बनायेगी। ऐसे में वह खुद पर कितनी सख्ती करेगी? वह तो अपने बचने का रास्ता निकाल लेगी। हुआ ऐसा ही है। यानी रक्षा संबंधी कोई घोटाला होता है तो किसी पर मुकदमा ही नहीं चल सकता। दूसरे, प्रधानमंत्री व सत्तारूढ़ दल के सांसदों के विरुद्ध भ्रष्टाचार के मामलों में लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति से अनुमति पाना सरल नहीं है। इतना ही नहीं, नौकरशाहों का भ्रष्टाचार नेताओं के भ्रष्टाचार से सूक्ष्म होता है। उन्हें पकड़ने के लिए पुरानी व्यवस्था के हवाले छोड़ दिया गया है। भ्रष्ट अफसर का विभाग ही उसकी जांच करेगा, जो उसके उच्च अफसर की अनुमति के बगैर संभव नहीं है। आज सीवीसी जिस तरह लकवाग्रस्त संस्था हो चुकी है, इसी तरह पुराने विधेयक के अनुसार लगभग वैसी ही संस्था लोकपाल के रूप में खड़ी हो जायेगी। इन्हीं खामियों को देखते हुए देश के जाने-माने विधिवेत्ताओं, समाजसेवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं , रिटायर अफसरों व जजों ने काफी माथापच्ची कर यह जन लोकपाल विधेयक तैयार किया है, जो जनता के सामने है। अन्ना हजारे दृढ़ता के साथ कह रहे हैं कि इसके लागू हो जाने के बाद 90 प्रतिशत भ्रष्टाचार पर स्वत: अंकुश लग जायेगा। इसीलिए भ्रष्टाचार से ऊब चुकी जनता उनके साथ तेजी से जुड़ रही है। देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ माहौल बन रहा है। यह सरकारी नाकामी के खिलाफ जन प्रतिक्रिया है। लोग ऊंचे पदों पर बैठे लोगों के भ्रष्ट आचरण से ऊब चुके हैं। इस विधेयक के माध्यम से ऐसी संस्था की परिकल्पना की गई है, जो स्वतंत्र हो, जिसके पास जांच करने का व्यापक अधिकार हो, उसका अपना पूर्णकालिक स्टाफ हो और उसकी जांच का निष्कर्ष सरकार पर बाध्यकारी हो। साथ ही साथ भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वालों को सुरक्षा देने की जिम्मेदारी भी लोकपाल की ही हो। आज सरकार भ्रष्टाचार की काली छाया से घिरी हुई है। नये-नये घोटाले उजागर हो रहे हैं। अदालतों से जुड़े भ्रष्टाचार के प्रकरणों के उजागर होने के बाद जनता का धैर्य टूटने लगा है। ऐसे में लोकपाल विधेयक पर होने वाली बहस कई मामलों में अलग है। अब वह बहस सिर्फ कानून बनाने तक सीमित नहीं है बल्कि उस कानून के स्वरूप और उसके अमल को लेकर है। लोग सरकारी विधेयक को नाकाफी मानकर विरोध कर रहे हैं। इस जन दबाव को सरकार ने भांप लिया है। इसी के चलते सरकार ने अन्ना हजारे के प्रस्ताव के तीन बिंदुओं को स्वीकार करने की अपनी सहमति जता दी है, जिसमें लोकपाल विधेयक का मसौदा तैयार करने के लिए संयुक्त समिति का गठन करने, इसमें सरकार व नागरिक समाज के प्रतिष्ठित व्यक्तियों के आधे-आधे सदस्य रखने तथा मानसून सत्र में विधेयक लाना शामिल है किंतु गतिरोध अभी अधिसूचना जारी करने के सवाल को लेकर बना हुआ है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपने को इसके दायरे में लाने की सहमति दे चुके हैं लेकिन यदि जन लोकपाल का प्रारूप मौलिक स्वरूप में पारित होता है तो कुछ मामलों में संवैधानिक संकट खड़ा हो सकता है। अब इस अड़चन को सरकार कैसे दूर कर पाएगी, यह देखना होगा। आज जिस तरह भ्रष्टाचार के खिलाफ आमजन स्वत:स्फूर्त अन्ना हजारे की आवाज से आवाज मिला रहा है, वह सरकार व अन्य राजनीतिक दलों के लिए खतरे की घंटी है। भ्रष्टाचार काफी समय बाद मुद्दा बनने जा रहा है क्योंकि जनता ने इस आंदोलन से राजनीतिक दलों को न जुड़ने देकर यह जता दिया है कि वे सभी हमाम में नंगे हैं। इसलिए सरकार व राजनीतिक दलों के लिए यह कठिन समय है। यह नये बदलाव की आहट है। अन्ना हजारे इसके प्रतीक बनकर उभरे हैं। इसलिए सरकार को बिना विलम्ब किये जन लोकपाल विधेयक को मान लेना चाहिए ताकि जनता के टूटते भरोसे पर विराम लग सके।


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