अगले सप्ताह से लंदन ओलंपिक शुरू होने जा रहा है। हैरत की बात है कि खेल की शब्दावली अब राजनीति में भी चल रही है। आजकल किनारे करने की बड़ी चर्चा है। हर कोई एक-दूसरे को हाशिये पर ढकेलने में लगा है। जब एपीजे अब्दुल कलाम ने राष्ट्रपति चुनाव न लड़ने का फैसला लिया और शिवसेना तथा जनता दल (यू) ने पाला बदल लिया तो राजग किनारे लग गया। प्रणब मुखर्जी की उम्मीदवारी को समर्थन देने के साथ ममता बनर्जी के आक्रामक तेवर भी शांत हो गईं। अंत में खबर आई कि शरद पवार ने भी विद्रोह का बिगुल बजा दिया है, क्योंकि कांग्रेस ने उन्हें कोने में धकेल दिया है। दरअसल शरद पवार और उनका दल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को हाशिये पर धकेल दिए जाने का कोई पूर्वानुमान नहीं लगा पाया। ममता बनर्जी को तथाकथित कोने में धकेले जाने के बाद स्वाभाविक था कि कांग्रेस अब सबके होश ठिकाने लगाने के काम में जुट जाएगी। कमजोर मानसून के बावजूद लंबे समय से अटके हुए आर्थिक सुधार तेज करने के प्रयास जारी हैं, हामिद अंसारी का फिर से उपराष्ट्रपति बनना आसान नजर आ रहा है और राहुल गांधी ने भी बड़ी राजनीतिक जिम्मेदारी निभाने के लिए सैद्धांतिक सहमति प्रदान कर दी है। संक्षेप में, सुख के दिन फिर से लौट आए हैं और कांग्रेस तथा संप्रग की पौ-बारह है। ऐसे अनुपयुक्त माहौल में शरद पवार को क्या सूझी कि वह प्रदर्शित करने लगे कि वह सर्कस के शेर नहीं हैं? निश्चित तौर पर उन जैसा सुलझा हुआ राजनेता इस बात पर सरकार से बाहर होने नहीं जा रहा है कि उसे मंत्रिमंडल की बैठक में सीटों की व्यवस्था पसंद नहीं आ रही है? अगर महाराष्ट्र में कांग्रेस के शीर्ष स्तर से आने वाली फुसफुसाहट को संकेत माना जाए तो शरद पवार को कोने में धकेले जाने का अहसास तब हुआ जब राकांपा कोटे के मंत्री के सिंचाई घोटाले में फंसने तथा दिल्ली में महाराष्ट्र सदन के निर्माण में छगन भुजबल के रिश्तेदारों के शामिल होने पर हंगामा मचा। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री द्वारा जारी किए गए श्वेतपत्र में सिंचाई मामले पर सवाल उठाए गए हैं। कहा गया कि ये दोनों घोटाले सार्वजनिक किए जाने वाले थे और कोने में धकेल दिए गए पवार के पास सरकार से बाहर होने की धमकी देने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था। चूंकि गठबंधन धर्म का मतलब हो गया है कि इसमें शामिल प्रत्येक पार्टी को बिना किसी भय या संकोच के अपनी मनमानी करने का अधिकार है इसलिए राकांपा नेताओं ने भी इस राजनीतिक अधिकार का बेधड़क इस्तेमाल किया। आधी रात को कुछ इसी तरह की साठगांठ कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के मुखिया के बीच हुई थी, जिसके बाद ममता बनर्जी हतप्रभ रह गई थीं। सवाल यह है कि आखिर शरद पवार ने खुद को ठगा-सा महसूस क्यों किया? यह सही है कि उनके लोकसभा में नौ सांसद हैं, जबकि संप्रग सरकार में शामिल होने वाले नवीनतम दल अजित सिंह के राष्ट्रीय लोकदल के महज चार सांसद। इतने कम संख्या बल के बावजूद रालोद प्रमुख ने नागरिक उड्डयन के महानिदेशक को पद से हटा दिया। यह अधिकारी समस्या बनता जा रहा था। अजित सिंह को तो महसूस नहीं हुआ कि उन्हें किनारे कर दिया गया है, न ही कांग्रेस को अपने इस छोटे सहयोगी के संभावित कपट से शर्मसार होना पड़ा है। तब महाराष्ट्र में दो घोटालों के उद्देश्यपरक खुलासे से शरद पवार के मन में कोने में धकेले जाने का ख्याल क्यों आया? क्या कांग्रेस को खुद को कोने में धकेले जाने का अहसास हुआ है? क्या उसका चेहरा शर्म से लाल हुआ है कि उसने एक हथियारों के सौदागर को रक्षा सौदे की गोपनीय फाइलें दिखा दीं? इस दलाल की काबिलियत महज यह है कि उसके पिता ने 1980 में इंदिरा गांधी की वापसी का प्रसिद्ध नारा उछाला था। इन विचित्र घटनाओं का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सरकार ने लोकतंत्र व सभ्य शासन की धुरी यानी शर्म-हया से पूरी तरह पल्ला झाड़ लिया है। सीबीआइ के संपूर्ण क्षय पर सरकार को जरा भी शर्म नहीं आती। यह इस बात से सिद्ध हो जाता है कि पवार के विद्रोह की खबर आने के बाद ट्विटर पर अनेक टिप्पणियां आईं, जिनमें संभावना जताई गई है कि अब राकांपा नेता के दरवाजे पर सीबीआइ दस्तक देने ही वाली है। भारत के आधुनिकीकरण के प्रमुख पैरोकार की छवि वाले योजना आयोग के उपाध्यक्ष के चेहरे पर भी शर्म का नामोनिशान नहीं है, जो राजनीतिक समीकरणों के आधार पर राज्यों को पैसा देता है। संप्रग में राजनीति हताशा की हदों को छू गई है। अगर कांग्रेस पवार की छवि को कलंकित करना चाहती है तो उन्हें डरने की जरूरत नहीं है। संभवत: उन्हें अहसास हो गया है कि कांग्रेस के संकटमोचक इस बात से अनभिज्ञ हैं कि सरकार के साथ लंबे सहयोग के नतीजे खराब ही निकलने हैं। मंत्रिमंडल और सरकार से बाहर निकलने का नतीजा जोखिम भरा हो सकता है। पवार ऐसे समझौते पर राजी हो सकते हैं, जिससे महाराष्ट्र में उनके हितों की रक्षा हो सके। वह महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज च ाण को हटाने पर भी जोर दे रहे हैं। आखिरकार, यह मुद्दा केवल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी से ही नहीं जुड़ा है, बल्कि इसमें कांग्रेस नेताओं से संबंध रखने वाली बिल्डर लॉबी भी शामिल है, जो पृथ्वीराज च ाण को हटाने के लिए पूरा जोर लगा रही है, किंतु इस समझौते से अल्पकालिक शांति ही खरीदी जा सकती है। दीर्घकाल में पवार जगन मोहन रेड्डी के रास्ते पर चलने से ही संतुष्ट हो सकते हैं, जिन्होंने कांग्रेस से सीधा मुकाबला किया और अपनी राजनीतिक शक्ति को कायम रखा। जगनमोहन रेड्डी सीधे जनता के बीच उतरे और उनकी क्षेत्रीय भावनाओं को अपने पक्ष में भुनाया। भाजपा संप्रग सरकार की असफलताओं के कारण उपजे सत्ताविरोधी रुझान का पूरा लाभ उठाने की स्थिति में नजर नहीं आती। इसलिए 2014 के चुनाव में एक नया मोर्चा बनने की प्रचुर संभावना नजर आ रही है। लगता है कि शरद पवार इसी खेल के प्रति अपनी प्राथमिकताओं का इशारा कर रहे हैं। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं) 1ी2श्चश्रल्ल2ी@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे
Monday, July 23, 2012
Saturday, July 14, 2012
उम्मीद से कम क्यों रह गये मनमोहन
विगत जून माह में अंतरराष्ट्रीय पत्रिका द इकोनॉमिस्ट ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बारे में कुछ टिप्पणी की थी। अब टाइम पत्रिका ने जुलाई अंक की अपनी कवर स्टोरी में कहा है कि भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अंडर अचीवर यानी उम्मीद से कम साबित हुए हैं। वैसे तो बतौर अर्थशास्त्री और आर्थिक नीति-निर्माता खासी प्रसिद्धि है, लेकिन हाल के घटनाक्रमों खासतौर से आर्थिक हालात प्रधानमंत्री की क्षमताओं पर एक प्रश्न चिह्न जरूर लगाया है। टाइम पत्रिका का कहना है कि प्रधानमंत्री में आगे बढ़कर देश को पुन: आर्थिक वृद्धि के रास्ते पर लाने के लिए इच्छाशक्ति नहीं है। आर्थिक वृद्धि में धीमापन, भारी-भरकम राजकोषीय घाटा और डॉलर के मुकाबले रुपये में गिरावट जैसी भयंकर चुनौतियों के सामने संप्रग सरकार दिशाहीनता का प्रदर्शन कर रही है। घरेलू-विदेशी निवेशक ठंडे पड़ गए हैं। पिछले तीन सालों की अपनी दूसरी पारी में प्रधानमंत्री का आत्मविश्वास डगमगाता हुआ दिखाई दे रहा है। अपने मंत्रियों पर भी उनका कोई नियंत्रण नहीं रहा। टाइम पत्रिका का यह भी कहना है कि लोक लुभावने कार्यक्रमों के प्रति रुझान के कारण सरकार देश को आगे बढ़ाने वाले विधेयकों को पारित करवाने की दिशा में आगे नहीं बढ़ रही। द इकोनॉमिस्ट और टाइम जैसी विदेशी पत्रिकाएं संप्रग सरकार को आर्थिक मोर्चे पर इसलिए लिए भी अक्षम बता रही हैं कि वह लंबित विधेयकों को पारित नहीं करवा पा रही है। खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश तय नहीं कर पा रही है। इन पत्रिकाओं का कहना है कि इन्हीं सब कारणों से आर्थिक शिथिलता आ रही है। लेकिन वास्तव में इसका कारण अकुशल प्रबंधन और संप्रग सरकार की गलत आर्थिक नीतियां हैं। प्रधानमंत्री खुद भी मानते हैं कि अर्थव्यवस्था की सेहत बिगड़ रही है। केंद्रीय सांख्यिकी संगठन द्वारा हाल ही में प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2011-12 में जीडीपी की वृद्धि दर मात्र 6.5 प्रतिशत ही रह गई है, जो पिछले दो सालों में 8.4 प्रतिशत रही थी। अगर औद्योगिक उत्पादन की बात करें तो इस वर्ष औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर घटकर मात्र 2.9 प्रतिशत ही रह गई है। हाल की तिमाहियों में तो यह नकारात्मक तक पहुंच गई थी। राजकोषीय घाटा जीडीपी के छह प्रतिशत तक पहुंच रहा है। पिछले 4-5 महीनों में रुपये में लगभग 20 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। खाद्यान्नों और अन्य खाद्य पदार्थो के संतोषजनक उत्पादन के कारण और खाद्य मुद्रास्फीति थमने के बावजूद अन्य पदार्थो की कीमतें थमने का नाम नहीं ले रही। डॉलर के मुकाबले रुपये की गिरावट और कच्चे तेल की कीमतों की वृद्धि के चलते मुद्रास्फीति ने आम आदमी का जीना मुहाल कर दिया है। विकास का गलत पैमाना प्रधानमंत्री हों या अन्य नीति-निर्माता, लगातार विकास का आधार जीडीपी ग्रोथ को मानते हैं। उनका मानना है कि अगर जीडीपी नौ प्रतिशत तक बढ़ जाए तो देश की सारी समस्याओं का समाधान हो जाएगा। इसलिए जीडीपी को विकास का पैमाना मान लिया जाता है। हम देखते हैं कि ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना (2007-12) के दौरान आर्थिक वृद्धि की दर लगभग आठ प्रतिशत रही, लेकिन इसके बावजूद देश में लगभग 30 प्रतिशत लोग अब भी गरीबी रेखा से नीचे हैं। वर्ष 2004-05 और 2009-10 के बीच 20 लाख से भी कम अतिरिक्त रोजगार का सृजन हो पाया। स्वास्थ्य संबंधी आंकड़ों के अनुसार कुपोषण की स्थिति यथावत है यानी जीडीपी ग्रोथ के बावजूद मानव विकास में स्थितियां बेहतर नहीं हो रही हैं। इसका कारण यह है कि एक ओर तो असमानताएं बढ़ रही हैं तो दूसरी ओर अर्थव्यवस्था का वह क्षेत्र जो देशवासियों के लिए खाद्य सुरक्षा दिला सकता है, उपेक्षित पड़ा हुआ है। कृषि क्षेत्र जो अर्थव्यवस्था में 60 प्रतिशत हिस्सा रखता है, विकास की इस तथाकथित प्रक्रिया से पूर्णतया अछूता पड़ा है। 1980-81 में जो क्षेत्र जीडीपी में 38 प्रतिशत योगदान देता था, अब मात्र 13.9 प्रतिशत ही योगदान दे रहा है। द इकॉनोमिस्ट के अनुसार ऐसा लगता है कि भारत की ग्रोथ की कहानी का अंत होने जा रहा है। बता दें कि दुनिया के अर्थशास्त्री भारत की नीची विकास दर को अपमानबोधक हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ का नाम दिया करते थे। दुनिया में देश की आर्थिक ताकत का डंका बजाने के लिए जरूरी है कि हमारे नीति निर्माता विकास के पैमाने को सही करें। सिर्फ जीडीपी ग्रोथ नहीं, सभी क्षेत्रों में एक-सा विकास, खाद्य सुरक्षा की गारंटी, गरीबी व बेरोजगारी का निराकरण ही हमारे विकास को स्थाई बना सकते हैं। हमारे रुपये की दुर्गति आर्थिक कुप्रबंधन का जीता जागता उदाहरण है। पिछले कुछ समय से भारतीय रुपया विदेशी मुद्राओं की तुलना में लगातार कमजोर होता जा रहा है। फरवरी 2012 यानी 4-5 महीने पहले एक डॉलर की विनियमय दर 48.7 रुपये थी, वह अब 57-58 रुपये प्रति डॉलर के आस-पास है। माना जाता है कि बढ़ता व्यापार घाटा इसका कारण है और इसके लिए जिम्मेदार है सोने-चांदी का बढ़ता आयात, अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती तेल की कीमतें और चीन से लगातार बढ़ता आयात। रुपये की कमजोरी के लिए विदेशी संस्थागत निवेशकों द्वारा बड़े पैमाने पर विदेशी मुद्रा का अंतरण भी काफी हद तक जिम्मेदार माना जा रहा है। नीतियों में बदलाव की दरकार यह सही है कि अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों पर हमारा ज्यादा नियंत्रण नहीं है, लेकिन हम निश्चित रूप से निर्णय कर सकते हैं कि आयात का स्त्रोत क्या हो। यदि हम ईरान से कच्चे तेल का आयात करें तो हम डॉलर की बजाय 45 प्रतिशत भुगतान रुपये में कर सकते हैं। सोने का आयात 2011-12 में 50 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया, जो 2010-11 में 25 बिलियन डॉलर था। सोने का बढ़ता आयात रुपये के लिए मुश्किलें खड़ा कर रहा है। यह बताना ठीक होगा कि 2जी घोटाला और सोने का आयात, दोनों जुड़े हुए हैं। घोटालों के बाद काले धन को सोने के रूप में परिवर्तित किया जा रहा है। सोने के आयात पर प्रभावी नियंत्रण लगाने की जरूरत थी, लेकिन सरकार ने पूरे साल कुछ नहीं किया और देश भयंकर भुगतान संकट में पड़ गया। चीन से आयात पर अंकुश लगाने की जरूरत है, लेकिन सरकार इस दिशा में कोई कदम नहीं उठा रही। यही नहीं, विदेशी निवेशकों की कारगुजारियों के कारण देश को करों के रूप में हर वर्ष कम से कम एक लाख करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है, लेकिन सरकार उन पर अंकुश लगाने के बजाय उन्हें तरह-तरह की रियायतें दे रही है। इस वर्ष के बजट में प्रस्तावित गार कानून में भी ढिलाई के संकेत दिए जा रहे हैं। यदि सरकार इच्छाशक्ति नहीं दिखाती है तो हमारा भुगतान संकट और ज्यादा बढ़ सकता है। अर्थव्यवस्था की इन तमाम बदहालियों के बावजूद सरकार नीतिगत विकल्प सुझाने में असफल दिखाई दे रही है। आर्थिक वृद्धि की दर के घटने का एक बड़ा कारण फैक्ट्री उत्पादन में धीमापन है और यह मुख्यत: दो कारणों से है- एक, कच्चे माल और ईधन की कीमतों में वृद्धि और दूसरा, ब्याज दरों में लगातार वृद्धि। कच्चे माल और ईधन की कीमतों में वृद्धि रुपये की कमजोरी के कारण ज्यादा हुई है और इसके लिए जरूरी है कि रुपये को मजबूत बनाया जाए। ब्याज दरों में वृद्धि मुद्रा स्फीति के कारण है और इसके लिए जरूरी है कि मुद्रास्फीति को काबू में किया जाए। ब्याज दरों में कमी करते हुए ही हम फैक्ट्री उत्पादन, इंफ्रास्ट्रक्चर और अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों में निवेश को प्रोत्साहित करते हुए अर्थव्यवस्था को बचा सकते हैं। (लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं)
मनरेगा का कामयाब सफर
महात्मा गांधी ने कहा था कि संदेह के क्षणों में हमें सबसे गरीब आदमी के चेहरे का ध्यान करना चाहिए और खुद से पूछना चाहिए कि क्या हमारा यह कदम उसके लिए किसी काम का हो सकता है? फरवरी 2006 में शुरू की गई महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) योजना के पीछे यही भावना काम कर रही थी। यह संभवत: विश्व में सबसे बड़ी और सर्वाधिक महत्वाकांक्षी सार्वजनिक परियोजना है। लागू होने के छह साल बाद मनरेगा का महत्व तथा ग्रामीण भारत के करोड़ों घरों के लिए मजबूत सामाजिक सुरक्षा आज स्वयंसिद्ध है। इस योजना में अब तक 1200 करोड़ रोजगार-दिनों का कार्य हुआ है और ग्रामीण क्षेत्रों के गरीबों को 1,10,000 करोड़ रुपये मजदूरी के तौर पर दिए जा चुके हैं। इसकी जबरदस्त लोकप्रियता इस बात से जाहिर है कि हर साल औसतन एक-चौथाई परिवारों ने इस योजना का लाभ उठाया है। करीब 80 फीसदी परिवारों को धनराशि सीधे बैंक या डाकखाना खाते के माध्यम से दी गई। गरीबों के वित्तीय समावेश की दिशा में यह अभूतपूर्व कदम है। मनरेगा हाशिये पर धकेल दिए गए समाज के सशक्तीकरण का ठोस प्रयास है। मनरेगा में अब तक जितना काम दिया गया है उसका 51 फीसदी अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति के लोगों के हिस्से में गया है, जबकि महिलाओं की कुल काम में 47 फीसदी हिस्सेदारी रही। वास्तव में, मनरेगा ने महिलाओं को काम का शानदार अवसर मुहैया कराया है और वे इसका लाभ भी उठा रही हैं। इससे पहले महिलाएं या तो बेरोजगार रहती थीं या फिर उन्हें बहुत कम वेतन पर काम दिया जाता था। स्वतंत्र अध्ययनों से पता चलता है कि मनरेगा से न केवल ग्रामीण क्षेत्र में मजदूरी में वृद्धि हुई है, बल्कि मजदूरी की परंपरागत लैंगिक असमानता भी कम हुई है। मजदूरी सुरक्षा उपलब्ध कराने के साथ-साथ मनरेगा ने टिकाऊ ग्रामीण संरचना के लिए संपदा निर्माण पर जोर दिया है। मनरेगा के तहत अब तक करीब एक करोड़ 46 लाख कार्यो का निष्पादन हो चुका है। इनमें से आधे से अधिक काम जल संचयन, सूखे से बचाव, बाढ़ से सुरक्षा, सिंचाई, भूमि विकास और ग्रामीण संपर्क व्यवस्था बेहतर करने की दिशा में हुए हैं। आम तौर पर अध्ययनों से संकेत मिलता है कि मनरेगा के कामों से भूजलस्तर में बढ़ोतरी हुई है, पानी की उपलब्धता बढ़ी है और मिट्टी की उर्वरता में सुधार हुआ है। मनरेगा के दौरान होने वालों कार्यो की बदोलत जल उपलब्धता बढ़ने से बंजर भूमि के बड़े हिस्से को खेती योग्य बनाया जा सका है। मनरेगा के कारण ही परंपरागत रूप से काम की तलाश में दूसरे प्रांतों में जाने वालों की संख्या में भारी गिरावट आई है। इसके कारण पिछड़े क्षेत्रों के गरीब तबकों के लोगों में पहचान और आत्मविश्वास का भाव तो जाग्रत हुआ ही है, मोलभाव की नई शक्ति भी विकसित हुई है। उपलब्धियों के बीच मनरेगा के क्रियान्वयन के दौरान कुछ समस्याएं भी पैदा हुई हैं, जिनका जल्द समाधान निकाला जाना चाहिए। मनरेगा की कुछ प्रमुख चुनौतियां यह सुनिश्चित करना है कि योजना सार्थक मांग पैदा करे, वेतन के भुगतान में देरी न हो, काम की गुणवत्ता में सुधार हो और शिकायत निवारण तंत्र को मजबूत बनाया जाए। इसके अलावा योजना में सेंध और घपले-घोटालों पर अंकुश लगाया जाए। ग्रामीण विकास मंत्रालय की एक सुधार कार्ययोजना (जिसे मनरेगा 2.0 नाम दिया गया है) मनरेगा के जीवन चक्र के अनेक आयामों पर इन समस्याओं का समाधान निकालने का प्रयास करती है। इनमें शामिल हैं लाभार्थियों का समय से नामांकन, खर्च की सही निगरानी और काम के बेहतर मूल्यांकन की व्यवस्था। मार्च 2012 में स्वीकृत कार्यो की सूची में तीस नए काम जोड़ दिए गए। इन कामों से मनरेगा और ग्रामीण जीवन, खासतौर पर कृषि के बीच बेहतर साम्य बनेगा और ग्रामीण भारत में स्वास्थ्य व पारिस्थितिकीय हालात में सुधार आएगा। मनरेगा 2.0 में योजना में पारदर्शिता तथा जवाबदेही संबंधी प्रावधानों का विशेष ध्यान रखा गया है। सामाजिक आडिट की प्रक्रियाओं को मजबूत किया जा रहा है। राज्यों को निर्देश दिए जा रहे हैं कि मनरेगा की ग्राम सभा द्वारा साल में कम से कम दो बार जांच के लिए सामाजिक आडिट इकाइयों का गठन किया जाए। सामाजिक आडिट के लिए नियंत्रण एवं महालेखा परीक्षक (कैग) को तमाम राज्यों में मनरेगा के प्रदर्शन का आकलन करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इसके अलावा ग्राम सभाओं में मनरेगा के खातों के प्रमाणन की व्यवस्था की गई है। यह व्यवस्था इस साल 20 फीसदी ग्राम पंचायतों में शुरू की जा रही है। सूचना प्रसारण प्रौद्योगिकी से योजना के हर चरण में पारदर्शिता आएगी। मनरेगा संबंधी समस्त सूचना इंटरनेट पर उपलब्ध है। वर्तमान में 12 करोड़ जॉब कार्ड बने हुए हैं। आइसीटी आधारित प्रणाली के माध्यम से उपस्थिति दर्ज कराना, इलेक्ट्रानिक पद्धति से मस्टर रोल तैयार करना और वेतन का भुगतान करना शामिल हैं। ये सूचनाएं पंचायत, विकासखंड, जिला और राज्य स्तर पर भी उपलब्ध रहेंगी। राज्य सरकारों के साथ मिलकर केंद्र सरकार इलेक्ट्रानिक फंड मैनेजमेंट सिस्टम भी लागू करना चाहती है, जिससे मनरेगा राशि की समयबद्ध उपलब्धता और परिचालन संभव हो सकेगा। मनरेगा का आधार प्रणाली के साथ एकीकरण भी किया जा रहा है। मांग संवृद्धि, अधिकार आधारित ढांचा और अभूतपूर्व आकार के कारण मनरेगा ने अब तक के तमाम पुराने श्रम कार्यक्रमों को मीलों पीछे छोड़ दिया है। मनरेगा निश्चित रूप से एक आदर्श योजना के तौर पर उभरी है, जिसका अध्ययन और आकलन विश्व के अनेक देशों में हो रहा है। स्वतंत्र अध्ययनों से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि गरीब तबके पर योजना का महत्वपूर्ण सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। अभी तक क्रियान्वयन संबंधी कुछ मुद्दों का समाधान नहीं निकल पाया है, अगर हम इन्हें हल कर लें तो गरीबी उन्मूलन, प्राकृतिक संसाधनों का पोषण और ग्रामीण रूपांतरण के औजार के तौर पर मनरेगा की क्षमता और बढ़ जाएगी। मनरेगा 2.0 के रूप में सरकार की नई पहल ग्रामीण विकास की दिशा में बढ़ाया गया एक महत्वपूर्ण कदम है और इससे योजना का पूरा लाभ गरीबों को मिल पाएगा। (लेखक केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री हैं) 1ी2श्चश्रल्ल2ी@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे
राष्ट्रीय दलों के दरकते दक्षिणी दुर्ग
| कर्नाटक इन दिनों सुर्खियों में है। भाजपा शासित इस राज्य की राजनीतिक उलझन सुलझाने की पार्टी हाईकमान की कोशिश परवान नहीं चढ़ पा रही है। पार्टी को टूटने से बचाने के लिए केंद्रीय नेतृत्व पूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा के समक्ष कठपुतली बन गया है। बृहस्पतिवार (12 जुलाई) को जगदीश शेट्टर द्वारा मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के साथ लग रहा था कि कर्नाटक का राजनीतिक संकट फिलहाल टल गया है किंतु तेजी से बदले घटनाक्रम ने इस पर पानी फेर दिया है। शेट्टर 250 करोड़ रुपये के जमीन घोटाले में फंस गए हैं। लोकायुक्त 19 जुलाई को उनके खिलाफ मुकदमा चलाने के संबंध में अपना फैसला देंगे। इससे उनके मुख्यमंत्री बने रहने को लेकर अटकलें लगनी शुरू हो गई हैं तो केंद्रीय नेतृत्व हलकान हो उठा है। कुछ इसी तरह का राजनीतिक रंग कांग्रेस शासित आंध्रप्रदेश का भी है। यहां भी पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व की अदूरदर्शिता के कारण उसका मजबूत किला ढहने की ओर है। वह स्वर्गीय वाईएस राजशेखर रेड्डी के पुत्र जगनमोहन की विरासत समझने में नाकाम रही तो तेलंगाना जैसे नाजुक मामले को सुलझाने में लापरवाही के चलते कांग्रेस यहां अपना राजनीतिक आधार गंवाने पर आमादा है। यह दोनों राज्य भाजपा और कांग्रेस के लिए काफी महत्वपूर्ण हैं। कर्नाटक में येदियुरप्पा के नेतृत्व में सरकार बनाकर भाजपा ने अपने राजनीतिक विस्तार का संकेत दिया था तो 2009 के आम चुनाव में कांग्रेस को मिली कुल 207 सीटों में आंध्र से जीते 33 सांसदों का बड़ा योग है। क्या दोनों पार्टियां (भाजपा-कांग्रेस) चुनावों में अपने-अपने इन राज्यों में अपना पूर्व का इतिहास दोहरा पाएंगी? कर्नाटक में चार साल के दौरान शेट्टर भाजपा के तीसरे मुख्यमंत्री हैं। येदियुरप्पा को भ्रष्टाचार के आरोप में लोकायुक्त की रिपोर्ट के चलते अपना पद छोड़ना पड़ा था। उन्होंने सदानंद गौड़ा को अपना उत्तराधिकारी बनाया था। उन्हें उम्मीद थी कि गौड़ा उनके ‘यस मैन’ की तरह काम करेंगे, किंतु हुआ इसके उलट। गौड़ा अपनी साफ-सुथरी छवि बनाने में लग गए। प्रशासन में भ्रष्टाचार खत्म करने के उनके अभियान के चलते येदि खेमे की कमाई के रास्ते बंद हो गए। इतना ही नहीं, उन्होंने येदि के परिवार के खिलाफ अदालतों में दर्ज जमीन हड़पने और रित के मामलों में उन्हें बचाने की कोशिश नहीं की। इससे येदियुरप्पा खफा हो गए और गौड़ा को बेदखल करने में लग गए। इसी क्रम में उन्होंने अपने समर्थक नौ मंत्रियों से इस्तीफा दिलवाकर केंद्रीय नेतृत्व को संकट में डाल दिया। राष्ट्रपति चुनाव में फजीहत से बचने और आसन्न विस चुनाव के चलते पार्टी हाईकमान येदि को नाराज कर कोई खतरा मोल नहीं लेना चाहता था। इसीलिए एक ईमानदार मुख्यमंत्री की बलि चढ़ाने में उसे तनिक गुरेज नहीं हुआ। चूंकि राज्य में लिंगायत समुदाय का 18-21 प्रतिशत मत है और येदि उसके सर्वमान्य नेता हैं। इसी कारण केंद्रीय नेतृत्व येदि के आगे शीष्रासन कर रहा है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि कांग्रेस ने लिंगायत समुदाय के नेता बीमार मुख्यमंत्री वीरेंद्र पाटिल को हटाने की भूल की थी, जिससे समुदाय के लोग कांग्रेस से अलग हो गए थे। यह उदाहरण भी भाजपा नेतृत्व के मन में निश्चित ही रहा होगा। शेट्टर की ताजपोशी को भी दूरगामी राजनीति का हिस्सा माना जा रहा है। शेट्टर भी लिंगायत हैं। ऐसे में येदि उनका विरोध कर अपने समुदाय में ही कमजोर होंगे, उनकी राजनीतिक सौदेबाजी कम होगी। फिर उन्हें उनकी हद बताने में आसानी होगी। यह सच है कि येदि, शेट्टर का पहले विरोध कर चुके हैं। विकल्प के अभाव में उन्होंने शेट्टर को गले लगाया है। इसलिए वे येदि के हाथ की कठपुतली कतई नहीं बनेंगे। किंतु वह सत्ता संभालते ही जमीन घोटाले में फंस गए हैं। मामला लोकायुक्त के समक्ष विचाराधीन है। यदि आरोपों में दम साबित हुआ तो उन पर मुकदमा चलेगा। फिर वह मुख्यमंत्री की कुर्सी पर कितने दिन टिके रह सकेंगे, यह अंदाज लगाना अभी मुश्किल है। इस मामले ने पार्टी नेतृत्व की भी नींद हराम कर दी है। क्योंकि कर्नाटक में अपनाई गई उसकी राजनीतिक शैली की पहले ही जगहंसाई हो रही है। उसके राजनीतिक कौशल पर भी उंगलियां उठ रही हैं। उल्लेखनीय यह है कि 2008 में कर्नाटक में सत्तारोहण के बाद शीर्ष नेतृत्व ने माना था कि इससे देश के दक्षिणी भाग में पार्टी के प्रवेश का द्वार खुला है। इसीलिए येदि की हर सनक के आगे उसे अभी तक झुकना पड़ा है। उसका यह तर्क कितना उचित अथवा अनुचित है यह तो आने वाले समय तय करेगा, किंतु प्रश्न यह है कि गौड़ा को जिस तरह हटाया गया है, क्या उससे वोक्कलिंगा समुदाय के लोग नाराज नहीं होंगे? क्या भाजपा यहां अकेले लिंगायत समुदाय के बदौलत सत्ता में आ सकेगी? यह कमजोर फैसला भाजपा पर भारी पड़ सकता है। साथ ही भ्रष्टाचार के विरुद्ध भाजपा की आवाज कुंद करने में कर्नाटक की यह राजनीतिक पटकथा महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। ऐसा नहीं है कि कर्नाटक में ही प्रांतीय नेतृत्व, राष्ट्रीय नेतृत्व पर भारी पड़ा है। गुजरात, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश के प्रांतीय क्षत्रपों के समक्ष भी केंद्रीय नेतृत्व बेबस और लाचार साबित हुआ है। यह स्थिति भाजपा के भविष्य के लिए कतई ठीक नहीं है। कर्नाटक की ही तरह वर्ष 2009 में आंध्र में मिली यादगार जीत से कांग्रेस की बांछे खिल गई थीं। किंतु सितम्बर, 2009 में वाईएसआर की दुर्घटना में मौत के बाद पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने वहां की जमीनी हकीकत समझने में चूक कर दी। उनके पुत्र जगनमोहन रेड्डी की यात्रा को लेकर पार्टी में विवाद खड़ा हो गया। यह यात्रा जगन ने उन परिवारों के प्रति संवेदना जाहिर करने के लिए निकाली थी, जिनके सदस्यों ने वाईएसआर की मौत के बाद आत्महत्या कर ली थी। इसी के बाद जगन के पर करतने के लिए पार्टी नेतृत्व ने रोसैया की जगह किरन कुमार रेड्डी को मुख्यमंत्री की गद्दी पर बैठा दिया। फलत: नवम्बर, 2010 में जगन कांग्रेस से अलग हो गए और मार्च, 2011 में उन्होंने नई पार्टी बनाई। अभी 12 जून को 18 विधानसभा तथा एक लोकसभा सीट के उपचुनाव में उनकी वाईएसआर कांग्रेस को मिली जीत ने राज्य में कांग्रेस को बुरी तरह हिला दिया है। आंध्र में जगन का यह राजनीतिक प्रभाव कांग्रेस की गलतियों के कारण हुआ है। आय से अधिक सम्पत्ति मामले में यद्यपि जगन जेल में हैं, किंतु जिस तरह उनके प्रतिष्ठानों पर छापे डाले गए, परिवारजनों को प्रताड़ित किया गया, उसे आंध्र की जनता कांग्रेस की उत्पीड़नात्मक कार्रवाई मान रही है और उसकी सहानुमूति जगन के प्रति बढ़ती जा रही है। अभी कुछ दिनों पहले ही जगन की मां विजयलक्ष्मी ने प्रधानमंत्री से एक जांच अधिकारी द्वारा परेशान किए जाने की शिकायत की है। ऐसे में कांग्रेस का यह मजबूत किला ढहता नजर आ रहा है। पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व की बेचैनी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि आंध्रप्रदेश के केंद्रीय प्रभारी को चार बार बदला जा चुका है। इसके अलावा तेलंगाना मामले के कुप्रबंधन ने रही-सही कसर पूरी कर दी है। यहां तक कि बजट सत्र के दौरान इस सवाल को लेकर कांग्रेस के सांसद भी बेकाबू हो उठे थे। उन्हें संसद की कार्यवाही में गतिरोध उत्पन्न करने के लिए निलंबित तक किया जा चुका है। उधर तेलंगाना की मांग दिनोंदिन और मुखर हो रही है तथा कांग्रेस आंदोलनकारियों के निशाने पर है। किंतु कांग्रेस की असल मुसीबत यह है कि यदि वह तेलंगाना की मांग मानती है तो गोरखालैंड, विदर्भ और हरित प्रदेश के तूफानों को रोक पाना उसके लिए मुश्किल होगा। ऐसे में कांग्रेस के समक्ष यहां दोहरी चुनौती है और इस मुसीबत का अहसास भी है। किंतु केंद्रीय नेतृत्व अपनी पिछली गलतियों से सबक लेने को तैयार नहीं है। कुल मिलाकर कर्नाटक में भाजपा और आंध्र में कांग्रेस की अपनी राजनीतिक उलझन सुलझाने की हर कोशिश और उलझती जा रही है। इससे क्षेत्रीय दलों की बांछे खिल गई हैं। यह परिदृश्य इन दोनों बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों के सिकुड़ते राजनीतिक आधार का संकेत नहीं तो क्या है? इसका सीधा असर 2014 के चुनाव पर पड़ने से रोका न जा सकेगा। क्या इन दोनों पार्टियों का केंद्रीय नेतृत्व अपनी गलतियों से कोई सबक लेगा? | |
पाक-साफ नहीं चीन के मंसूबे
यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत पिछले साढ़े छह दशकों से चीन से दोस्ती की पहल कर रहा है और वह दोस्ती की आड़ में अपने खतरनाक मंसूबों को अंजाम दे रहा है। पिछले दिनों चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के अखबार ‘ग्लोबल टाइम्स’ में छपे एक लेख में उसने अपनी खतरनाक मंशा फिर जाहिर की है। उसने भारत को आगाह करते हुए कहा है कि उसे 1962 के युद्ध से सबक लेना चाहिए। तत्कालीन युद्ध के कारणों को स्पष्ट करते हुए कहा गया है कि उसका मकसद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को अमेरिका और पूर्व सोवियत संघ के प्रभाव में आने से रोकना था। उसका दावा है कि उस वक्त चीन के नेता माओत्से तुंग के गुस्से का असली निशाना वाशिंगटन और मास्को थे न कि भारत। चीन के इस रहस्योद्घाटन में कितनी सच्चाई है यह तो वही जाने लेकिन लेख की भाषा बौखलाहट भरी और भारत को धमकाने के अंदाज वाली लगती है। सवाल है कि उसकी इस बौखलाहट की वजह क्या है? क्या वह घरेलू मोच्रे पर अपनी मुश्किलों से उबर नहीं पा रहा है? या वैिक जगत में भारत की बढ़ती ताकत और आर्थिक चुनौतियों से घबरा रहा है? कारण जो भी हो लेकिन दक्षिण एशिया में भारत के बढ़ते प्रभाव और अमेरिका से नजदीकियों ने उसकी चिंता बढ़ा दी है। नेपाल, बांग्लादेश, म्यांमार, ताइवान और वियतनाम आदि पड़ोसी देशों से सुधरते भारत के रिश्ते भी उसे रास नहीं आ रहे हैं। म्यांमार में लोकतंत्र बहाली की संभावना और वहां उसकी घटती ताकत ने भी उसे बेचैन किया है। उधर उसके मित्र पाकिस्तान की वैिक स्तर पर धूमिल होती छवि ने उसे नए राजनीतिक समीकरण पर सोचने को मजबूर कर दिया है। इन परिस्थितियों में चीन का खुद को असहज महसूस करना और चिढ़ बढ़ना स्वाभाविक है। दूसरी ओर दक्षिणी चीन सागर में वियतनाम के साथ मिलकर भारत द्वारा तेल और गैस निकालने की योजना से वह और आशंकित है। उसने धमकी भरे अंदाज में कहा है कि यहां बिना इजाजत के किसी भी प्रकार की गतिविधि को वह अपनी संप्रभुता पर हमला मानेगा और उसका करारा जवाब देगा। उसका दावा है कि दक्षिणी चीन सागर और उसके द्वीपों पर सिर्फ उसका अधिकार है। लेकिन भारत ने चीन के दावे को खारिज कर स्पष्ट कर दिया है कि वियतनाम के साथ भारतीय कंपनी ओएनजीसी के तेल निकालने का कार्यक्रम अंतरराष्ट्रीय कानूनों के मुताबिक है और वह इससे पीछे नहीं हटेगा। बहरहाल, ग्लोबल टाइम्स के लेख में 1962 के युद्ध परिणामों की चर्चा कर उसने यह संकेत जरूर दे दिया है कि वह दक्षिणी चीन सागर में भारत की दखलांदाजी को चुपचाप सहन करने वाला नहीं है। लेख में उसने कहा भी है कि चीनी लोग शांतिप्रिय हैं लेकिन अपनी जमीन की रक्षा करने में समर्थ हैं। तो क्या यह माना जाए कि दक्षिणी चीन सागर को मुद्दा बनाकर चीन भारत पर हमला कर सकता है और क्या इस हमले का ठीकरा भी भारत के ही सिर फोड़ेगा? ग्लोबल टाइम्स में प्रकाशित लेख में कहा गया है कि पचास साल पहले भारत सरकार चाहती थी कि चीन कॉलोनियल शक्तियों की तय सीमा स्वीकार करे किंतु चीन ने उसे खारिज कर दिया। उसने आरोप लगाया है कि नेहरू सरकार ने अमेरिका और सोवियत संघ के उकसावे में आकर 1959 से 1962 के बीच भारत-चीन सीमा पर समस्याएं खड़ी कीं। चीन ने सफाई दी है कि 1962 के युद्ध का उद्देश्य भारत की जमीन कब्जाना नहीं बल्कि शांति-स्थापना था। क्या इसका अर्थ यह निकाला जाए कि चीन फिर शांति स्थापना के नाम पर भारत पर हमले की योजना बना रहा है? कुछ समय पहले न्यूयार्क टाइम्स ने खुलासा किया था कि चीन पाक अधिकृत कश्मीर में सामरिक रूप से महत्वपूर्ण गिलगित-बल्तिस्तान क्षेत्र में हाईस्पीड सड़कें और रेल संर्पकों का जाल बिछा रहा है ताकि युद्धकाल में भारत तक उसकी पहुंच आसान हो सके। पूर्व सेना प्रमुख वीके सिंह ने भी दावा किया था कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में चीन की कई कंस्ट्रक्शन टीमें काम कर रही हैं। इनमें चीनी इंजीनियरों की टुकड़ियां भी मौजूद हैं। प्रख्यात पत्रिका फोर्ब्स ने भी भविष्यवाणी की है कि 2020 तक भारत-चीन आमने-सामने हो सकते हैं। चीन कभी भी सीमा विवाद को बहाना बनाकर भारत पर हमला बोल सकता है। चीन सीमा विवाद सुलझाने को लेकर कभी भी गंभीर नहीं रहा है, जबकि भारत कई बार ठोस पहल कर चुका है। सीमा विवाद से जुड़े दस्तावेजों के आदान-प्रदान में उसने कोई अभिरुचि जाहिर नहीं की है और न वह अपने दावे का नक्शा उपलब्ध कराने को तैयार दिखता है। विडंबना यह भी है कि भारत के जिन क्षेत्रों पर उसका एक इंच का भी दावा है, उससे हटने का कहीं कोई संकेत नहीं है। 15 मई, 1954 को पं. नेहरू ने चीन से मधुर संबंध बनाए रखने के लिए चीनी प्रमुख एन लाई के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। दोनों देशों के बीच व्यापारिक गतिविधियां बढ़ाने और मधुर रिश्ते के उद्देश्य से उन्होंने 19 अप्रैल, 1960 को दिल्ली में चाऊ एन लाई के साथ सीमा विवाद सुलझाने की कोशिश भी की लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात रहा। 1987 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने आार्थिक, व्यापार, विज्ञान और तकनीक से जुड़े मसलों पर मध्य साझा कार्यसमूह बनाने पर समझौता किया लेकिन चीन एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा। 11 मार्च, 2005 को फिर भारतीय पहल पर रिश्तों को नया आयाम देने की कोशिश हुई लेकिन चीन का रवैया निराशाजनक ही रहा। आज भी वह तवांग और अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा छोड़ने को तैयार नहीं है। भारत-चीन के बीच सर्वाधिक विवाद पश्चिमी (लद्दाख) और पूर्वी (अरुणाचल प्रदेश) सेक्टर को लेकर है। पश्चिमी सेक्टर में भारत का चीन के कब्जे वाले अक्साई चीन पर लगभग 3800 वर्ग किमी का दावा है जबकि पूर्वी सेक्टर में अरुणाचल प्रदेश के लगभग 90 हजार वर्ग किमी पर उसका दावा है। त्रासदी यह भी है कि वह अरुणाचल प्रदेश से चुने गए किसी भी भारतीय सांसद को वीजा नहीं देता है और भारत की मनाही के बावजूद कश्मीर के लोगों को स्टेपल वीजा जारी करता है। ऐसे में इतना तो स्पष्ट है कि चीन भारत से मधुर संबंध बनाने को लेकर संजीदा नहीं है।
पलटवार बिना नहीं समाधान
भारत को न केवल आतंकवादियों से खतरा है बल्कि गुमराह उन कुछ भारतीय मुसलमानों से भी है, जो देश को बर्बाद करने के मकसद पर आमादा हैं। इतना तो कहा ही जा सकता है कि भारत सरकार एक पक्ष है, जो जवाबी कार्रवाई न कर सकने की अपनी निष्क्रियता के कारण उनकी क्रूर साजिश की शिकार है। इसमें कोई दो राय नहीं कि भारतीय संविधान से हरेक को कुछ निश्चित तरह की आजादी हासिल है। लेकिन न तो भारत के और न दूसरे देशों का संविधान किसी समूह को इसकी इजाजत देता है कि वह इन छूटों का लाभ उठा कर अपने देश को बर्बाद कर दे। सऊदी अरब से प्रत्यावर्तित और मुंबई के 26/11 कांड के सरगना सैयद जबीउद्दीन अंसारी उर्फ अबू जंदल ने पूछताछ के दौरान खुलासा किया है कि दुबई में दो साल के अपने प्रवास के दौरान उसने आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देने के लिए लश्कर-ए-तय्यबा में 50 युवकों की भर्ती की है। उसने यह भी कबूला कि वह रियाद और दुबई में अपने संपकरे के जरिये हवाला के माध्यम से केरल और महाराष्ट्र में लश्कर के आत्मघाती दस्ते तैयार करने के लिए रकम भेजता था। आतंकवादी संगठन लश्कर में भर्ती के लिए पाकिस्तान, भारत, बांग्लादेश और श्रीलंका से युवक चुने जाते थे। अबू जंदल ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में लश्कर में, भर्ती किए गए 250 युवकों को आतंकी वारदातों के लिए ट्रेंड भी किया था। इनमें से आठ लड़के मुंबई के 26/11 की तरह ही 2011 में कहर बरपाने के लिए छांटे गए थे। इस बारे में इंटरपोल की तरफ से सतर्कता सूचना (रेडकॉनर्र नोटिस) जारी होने के बाद बिहार के इंजीनियर फसीह मेहमूद को भारत के विभिन्न ठिकानों पर आतंकी हमले करने और आतंक संबंधी वारदातों को अंजाम देने के लिए सऊदी अरब में गिरफ्तार किया गया है। साफ है कि यह सब हुआ अमेरिकी दबाव या दखल के कारण। दुर्भाग्यवश, टाडा (आतंकवादी और विध्वंसकारी विरोधी अधिनियम) के खात्मे के बाद से भारत सरकार ऐसा कानून बनाने में बुरी तरह विफल रही है, जो इस तरह की संगीन आतंकवादी वारदातों से कारगर तरीके से निबट सके। वास्तव में, सरकार के घुटने कमजोर होने और यहां तक कि दिशाविहीन नीतियों के चलते ही चारों ओर अव्यवस्था फैली हुई है। एक तरफ, केंद्रीय गृह मंत्री पाकिस्तान और उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई को भारत में आतंकवादी घटनाओं के लिए जिम्मेदार मानते हैं और दूसरी ओर तथाकथित अलगाववादियों को, जो वास्तव में आतंकवादी हैं, पाकिस्तान के उच्चायुक्त बातचीत के लिए दिल्ली बुलाते हैं। जाहिर है, यह मुलाकात दुआ-सलाम के लिए तो नहीं होगी। उन्हें इसमें यह बताने के लिए बुलाया जाता है कि किस तरह वह भारत में आतंकवाद और उपद्रव फैलाएं। दरअसल, धारा 124 अ के तहत राजद्रोह का कानून कभी उन अग्रिम मोच्रे के आतंकवादियों के विरुद्ध नहीं किया गया जो अलगाववादियों का मुखौटा लगाए हैं। यही वजह है कि आज जम्मू-कश्मीर के तीन हिस्से में से एक घाटी में इस्लामीकरण का काम लगभग पूरा हो चुका है। एक रिपोर्ट के मुताबिक अनंतनाग शहर का नाम जल्दी ही इस्लामाबाद कर दिया जाएगा। आदि शंकराचार्य नामक पहाड़ का नाम तख्त-ए-सुलेमान रखा गया है। हरि पहाड़ का नाम कोह-ए-मरान रखा जाने वाला है। इसी तरह, 700 गांवों के नाम भी बदले जाने हैं। श्रीनगर हवाई अड्डे का नाम शेख-अल-आलम हवाईअड्डा रखा जाने वाला है। अगर यह रिपोर्ट सच है तो वाकई गंभीर बात है क्योंकि किसी शहर, गांव या राज्य के नाम भारत सरकार की इजाजत के बिना नहीं बदले जा सकते। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नक्लसवाद या माओवाद को भारतीय सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया है। लेकिन या तो वे भूल गए हैं या जानबूझकर आतंकवाद और कश्मीरी आतंकवादियों को भी देश के लिए समान से रूप से विध्वंसकारी नहीं बता रहे हैं। मैं इस पर भरोसा नहीं करता कि भारत की समस्या के लिए आईएसआई या पाकिस्तान पर तोहमत लगाना वास्तविक समस्या है। दरअसल, समस्या इससे निबटने में हमारी दयनीय और पीलियाग्रस्त कार्रवाई के चलते है। जम्मू-कश्मीर सरकार का फरमान श्रीनगर के कुछ हिस्सों के आगे नहीं चलता। सरकार ने श्रीनगर से विशेष सशस्त्र सैन्य बल अधिनियम जैसे ही हटाया, उसके अगले ही दिन आधे से ज्यादा पुलिसकर्मी हलाक कर दिए गए थे। संसद पर 2001 के 13 दिसम्बर को हुए हमले में गिरफ्तार आतंकवादी की सर्वोच्च न्यायालय से भी फांसी की सजा बरकरार रखी गई है लेकिन सरकार एक वाहियात बिना पर उस आदेश पर अमल करने में ढीला-ढाला रवैया अपनाती है कि अभी दया याचिका पर विचार होना बाकी है। यह होते-होते सात साल बीत गए हैं। यही स्थिति, पाकिस्तान के उस आतंकवादी की है, जिसकी मुंबई हमले में फांसी की सजा के ऐलान हुए चार साल बीत चुके हैं। वास्तव में, भारत इन लचर तकरे की आड़ में कि वह कानून की लंबित प्रक्रियाओं का पालन कर रहा है, अपने को धोखा दे रहा है। इससे उसकी स्थिति पूरी दुनिया में हास्यास्पद हो गई है जबकि उसकी सर्वोच्च अदालत तक इन आतंकियों को फांसी की सजा सुना चुकी है। इस रवैये ने भारत को धर्मशाला या सराय बना दिया है, जहां आतंकवादी आ सकते हैं, ठहर सकते हैं; जो चाहें कर सकते हैं और फिर छूट भी सकते हैं। यह स्थिति इसलिए है कि हम अब भी देश को 1863 में ब्रिटिश सरकार के बनाए कानूनों- भारतीय दंड संहिता, भारतीय साक्ष्य अधिनियम और अपराध प्रक्रिया संहिता से चला रहे हैं। तब इज्जत के लिए हत्या और आतंकवाद जैसे संगीन जुर्म सामने नहीं थे। आपराधिक न्याय पण्राली को मजबूत करने के आड़े-तिरछे प्रयासों के कारण अदालतों में लंबित मुकदमों के निबटारे में दशकों का समय लगता है। सीबीआई में 20-20 सालों से मुकदमें लंबित हैं। तिस पर भी आप मांग करें कि जब सुरक्षा बल के साथ मुठभेड़ हो रही हो गवाह पेड़ के पीछे छिपे हों या आधी रात को जब आतंकवादी सीमा पार कर भारत में दाखिल हो रहे हों तो उस समय भी किसी प्रत्यक्षदर्शी को मौजूद रहना जरूरी है। इसी तरह, जब नक्सली मारे जा रहे या छत्तीसगढ़ में जब नक्सलियों ने सीआरपीएफ के 76 जवानों को भून दिया तब भी गवाह को मौजूद रहना चाहिए था। हालांकि पूरी दुनिया अपराध और अपराधियों के बारे में जानती है, फिर भी हत्यारे और आतंकवादी कानूनी छेदों और सरकार की न्यायिक व आपराधिक न्यायिक पण्राली की उदासीनता के चलते छूट जाते हैं। यही वह वजह है कि जब कोई भी ट्रैफिक नियमों का पालन नहीं करता। ऐसे परिदृश्य में मीडिया ने 26/11 में भारतीय मुस्लिम अबू जंदल की संलिप्तता का खुलासा कर सही किया है। दरअसल, ऐसे ही लोग उस मुसलमान समुदाय को बदनाम करते हैं जबकि 99.9 फीसद आबादी देशभक्त है। लेकिन मौजूदा भारतीय कानून के तहत इस मामले का कोई नतीजा नहीं निकलेगा क्योंकि पुलिस को दिया गया बयान कानून की अदालत में मान्य नहीं है, जब तक उसका समर्थन करता कोई साक्ष्य न हो। जब तक हम आतंकियों के देश में दाखिल होने के बिंदु से ही वैसी सख्ती नहीं दिखाएंगे जैसी वे सुरक्षा बलों और निदरेष नागरिकों के प्रति दिखाते हैं, समस्या जस की तस रहेगी। तथाकथित जेहादियों का विास है कि आतंक बरपाते समय मौत होने पर उन्हें जन्नत नसीब होती है; जहां हूर उनका इंतजार कर रही हैं और अल्लाह से भी मुलाकात हो जाती है। आतंकवादियों की मन्नत पूरी करने में अपनी सरकार विफल हो जाती है। होना यह चाहिए कि आतंकवादी जब भी देश पर हमला करें तो अल्लाह से मिलने की उनकी इच्छा जितनी जल्दी हो, जन्नत भेज कर पूरी कर दी जाए। यह काम जितनी जल्दी हो जाए, उतना ही अच्छा। (लेखक सीबीआई के पूर्व निदेशक हैं। उनकेआलेख में व्यक्त विचार निजी हैं)
कांग्रेस के भटकाव का सच
दिशाहीन का कोई भविष्य नहीं। सही दिशा में गति प्रगति है और गलत दिशा में गति दुर्गति। कांग्रेस दिशाहीन हो गई है। यह बात कांग्रेस के ही वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद ने स्वाभाविक रूप में कही है। उन्होंने कांग्रेस के लिए नई विचारधारा की जरूरत भी बताई है। हालांकि हाईकमान के दबाव में उन्होंने अपने वक्तव्य की नई व्याख्या भी की है, पर नली से निकली गोली और जबान से निकली बोली वापस नहीं होती। खुर्शीद के मूल बयान और बाद के स्पष्टीकरण का सारांश एक जैसा है। वह राहुल गांधी से जिम्मेदारी संभालने की अपील कर रहे हैं। कांग्रेस और सरकार में जिम्मेदारी लेने वाले नेतृत्व का अभाव है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सरकार के मुखिया हैं। संविधान के अनुसार सरकार के सारे अच्छे-बुरे नतीजों की जिम्मेदारी उनकी ही है, पर डॉ. सिंह वास्तविक प्राधिकार से वंचित हैं। सत्ता संचालन का मुख्य केंद्र सोनिया गांधी हैं। वह जो कहती हैं, मनमोहन सिंह वही करते हैं, वही दोहरा देते हैं। सोनिया शासन करती हैं, जिम्मेदारी नहीं लेतीं। मनमोहन सिंह वास्तविक शासक नहीं हैं तो भी तमाम आलोचनाओं के शिकार होते हैं। कांग्रेस राजनीतिक दल की तरह नहीं चलती। सरकार और उसके मुखिया व्यावहारिक सत्ता संचालन नहीं करते। दोनों दिशाहीन हैं। खुर्शीद की जुबान नहीं फिसली। उनके मुंह से सच्चाई ही निकली है। खुर्शीद ने कोई नया रहस्योद्घाटन नहीं किया। केंद्र सरकार सभी मोर्चो पर असफल हुई है। भारत के प्रतिष्ठित समाचार माध्यमों द्वारा भी केंद्र और कांग्रेसी नेतृत्व वाले सत्तारूढ़ संप्रग पर तमाम टिप्पणियां की गई हैं। विपक्ष ने भी संसद से सड़क तक केंद्र और कांग्रेस को दिशाहीन बताया है, लेकिन अमेरिकी पत्रिका टाइम के आकलन से हड़कंप मचा है। हम भारत के लोग विदेशी आवाज पर ज्यादा ध्यान देते हैं और स्वदेशी की उपेक्षा करते हैं। कांग्रेसी दिशाहीनता और विचारहीनता के चलते ही संप्रग बेमेल अवसरवादी जमावड़ा है। कांग्रेस अपने सत्ता साझीदार तृणमूल कांग्रेस को भी साथ नहीं रख पाती। वह सरकारी प्रलोभनों और बेजा दबावों के जरिये सपा, बसपा जैसे कट्टर विरोधियों को साधकर संसदीय बहुमत का गणित ठीक रखती है। आर्थिक विकास दर 9 प्रतिशत से घटकर 5 प्रतिशत हो गई है। औद्योगिक विकास दर घटी है। रुपये का अवमूल्यन लगातार जारी है। भ्रष्टाचार संस्थागत हुआ है। कांग्रेस व केंद्र की कोई कश्मीर नीति नहीं है। केंद्र द्वारा मनोनीत वार्ताकारों ने अलगाववादी रिपोर्ट बनाई है। आतंकवाद से लड़ने के प्रश्न पर भी कांग्रेस व केंद्र दिशाहीन हैं। यहां कड़े आतंकवाद निरोधक कानून का अभाव है। यही स्थिति माओवादी हिंसा की भी है। भारत विश्व का सबसे बड़ा जनतंत्र है। कांग्रेस इस देश की सबसे पुरानी पार्टी है। यही सत्तारूढ़ गठबंधन का नेतृत्व कर रही है। कांग्रेस का दिशाहीन और विचारहीन होना खतरनाक है। कांग्रेस पार्टी नहीं सोनिया गांधी की प्रापर्टी की तरह शेष बची है। सोनिया गांधी ही इसकी वर्तमान हैं और राहुल गांधी इसके भविष्य। यही दोनों कांग्रेस के स्वामी हैं। राजनीतिक दल विचार से चलते हैं। जनोन्मुखी दिशा में गतिशील हों तो लोकप्रिय होते हैं। कांग्रेस के पास कोई राष्ट्रीय नेता नहीं। न संगठन में और न सरकार में। प्रधानमंत्री भी जननेता नहीं हैं। वह अपनी निष्ठा के चलते ही दोबारा प्रधानमंत्री हैं। उन्हें कामकाजी प्रधानमंत्री होने का अवसर भी नहीं मिला। उनके पास पद है, पर प्राधिकार नहीं। वह मंत्रिपरिषद गठन के अधिकार से लैस हैं, लेकिन यह काम सोनिया गांधी करती हैं। वह सरकारी रिकॉर्ड में केंद्र सरकार के नीति नियंता हैं, लेकिन नीति निर्माण में उनका कोई हाथ नहीं। राहुल गांधी भी संगठनकर्ता या अनुभवी राजनेता नहीं हैं। वह सोनिया के पुत्र होने के कारण कांग्रेस में नंबर दो हैं। प्रधानमंत्री ने भी उन्हें प्रधानमंत्री पद का सुयोग्य दावेदार बताया था। खुर्शीद ने भी राहुल से आगे आने की अपील की है। कांग्रेसजन अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं। सोनिया गांधी और उनकी कांग्रेस ने नया इतिहास बनाया है। अब तक के सारे प्रधानमंत्री जननेता या राजनीतिक गठबंधनों की उपज थे। सोनिया ने देश को मनोनीत प्रधानमंत्री दिया है। मनमोहन सिंह ने भी नया इतिहास गढ़ा है। वह प्रख्यात अर्थशास्त्री हैं, लेकिन आर्थिक विकास दर, औद्योगिक विकास दर और रुपये के अवमूल्यन जैसे आर्थिक हादसे उन्हीं के राज में घटे। महंगाई पंख फैलाकर उड़ी, वह बस देखते रहे। सिंगापुर के प्रधानमंत्री ने फिक्की एसोचैम व सीआइआइ की बैठक में निवेश नीति की आलोचना की है। प्रधानमंत्री जो चाहते थे, नहीं कर पाए। वह जो नहीं चाहते थे, रोज वही करते रहे, कर रहे हैं। नेहरू, इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी इसी पद पर रहकर प्रतिष्ठित हुए। इंदिरा गांधी ने 1971 में पाकिस्तानी सेना के लगभग 90 हजार सैनिकों से हथियार डलवाए, पाकिस्तान का इतिहास और भूगोल बदल गया। वाजपेयी ने परमाणु विस्फोट किया। आर्थिक प्रतिबंध लगे, लेकिन वह नहीं झुके। अब चीन आंख दिखा रहा है, पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी भीतर तक घुस आए हैं। वह कभी उचित प्रतिकार नहीं कर पाए। वरिष्ठ कांग्रेसजन भी उन्हें महत्व नहीं देते। सब जानते हैं कि वह सत्ता के असली चेहरे नहीं, बल्कि मनोनीत मोहरे हैं। दलों के गठन में विचार की केंद्रीय भूमिका होती है। नेता या दल प्रबंधक विचार का विकल्प नहीं होते। विचार का विकल्प दूसरा विचार ही हो सकता है। राष्ट्रवाद पुष्ट विचार है। स्वाधीनता पूर्व की कांग्रेस भी राष्ट्रवादी थी, लेकिन अब विचारहीन है। वह अमेरिकी पूंजीवादी नीतियों के कारण दक्षिणपंथी है, लेकिन घोर सांप्रदायिक राजनीति केचलते अल्पसंख्यकवादी है। विचारविहीनता के चलते ही कांग्रेस में दिशाहीनता है। भाजपा और वामदल छोड़ अधिकांश दल विचारधारा को बेकार समझते हैं और दलों को प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह चलाते हैं। कांग्रेस ऐसे ही व्यक्तिवादी दलों की सूची में पहले स्थान पर है। सीताराम केसरी को हटाकर सोनिया गांधी का अध्यक्ष बनने का ढंग इतिहास का एक दुखद अध्याय है। फिर कांग्रेस का राष्ट्रवादी चरित्र खत्म हो गया। पहले की कांग्रेस राष्ट्रवादी विचारधारा की संगम थी। आज विचारहीनता का आलम यह है कि कांग्रेस मुस्लिम लीग से बढ़कर सांप्रदायिक है। दिशाहीनता का आलम यह है कि कांग्रेसजन अवसरवादी राजनीति के मेले में खो गए बच्चों जैसे अनाथ हैं। सोनिया गांधी जिम्मेदारी लेती नहीं। जो शुभ है उसका श्रेय सोनिया और राहुल को जाता है और पापकर्मो की जिम्मेदारी प्रधानमंत्री या उनकी सरकार की, लेकिन सारा देश और अब अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी बोल रहा है कि सोनिया ही सत्ता संचालक हैं। वह ही दिशाहीनता और विचारहीनता का केंद्र हैं। खुर्शीद ने गलत क्या कहा है? (लेखक उ.प्र. विधानपरिषद के सदस्य हैं) 1ी2श्चश्रल्ल2ी@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे
Thursday, July 12, 2012
रचना का आधार भगवान या विज्ञान!
मजे की बात यह कि विवादों का यह खेल विज्ञान नहीं, बल्कि मीडिया के आंगन में खेला जा रहा है और यह बखेड़ा सिर्फ इसलिए कि व्यावसायिक मजबूरियों के चलते एक प्रकाशक ने इन पहेलीनुमा कणों को ‘गॉड पार्टिकल’ का नाम दे दिया। सन् 1993 में नोबेल पुरस्कार विजेता भौतिक विज्ञानी लियोन लेडरमैन ने ब्रह्मांड के जन्म की गुत्थी पर एक किताब लिखी। इसके शीषर्क में इन कणों पिछले हफ्ते जब से तथाकथित ‘गॉड पार्टिकल’ की खोज की घोषणा हुई है, ‘विज्ञान बनाम भगवान’ की बहस तेज हो गई है। को ‘गॉडडैम पार्टिकल’ के नाम से पुकारा गया था। संपादक को यह यह नाम कुछ ज्यादा नहीं जंचा, इसलिए उसने इन्हें ‘गॉड पार्टिकल’ का नाम दे दिया। नतीजा सबके सामने है, किताब भी खूब लोकप्रिय हुई और यह सनसनीखेज नाम भी। लेकिन वैज्ञानिक हमेशा इस नाम से परहेज करते रहे और आज भी कर रहे हैं। वैज्ञानिक हलकों में इन अबूझ कणों को ‘हिग्स कण’ या ‘हिग्स-बोसोन कण’
कहा जाता है और यही सही भी है। दरअसल इन कणों की पहेली सीधे ब्रह्मांड के जन्म और इसके मौजूदा स्वरूप को लेकर है। ब्रह्मांड की उत्पत्ति लगभग साढ़े तेरह अरब वर्ष पूर्व शून्य में हुए एक महाविस्फोट से मानी जाती है जो ‘बिग-बैंग’ के नाम से प्रसिद्ध है। पिन की घुंडी जैसे सूक्ष्म आकार में समायी अनंत सघनता से शुरू हुए इस विस्फोट ने चंद सेकंड्स के भीतर हमारे सूरज से भी दो हजार गुना बड़ा आकार धारण कर लिया। इस अति गर्म स्वरूप में सृष्टि के कुछ प्रारंभिक कण विचर रहे थे। लगभग पांच लाख वर्ष बाद इसका मिजाज थोड़ा ठंडा हुआ तो इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन और न्यूट्रॉन जैसे प्रारंभिक कणों ने मिलकर ब्रह्मांड के पहले अणुओं हाइड्रोजन और हीलियम की रचना की। फिर ब्रह्मांड आकार लेने लगा जिसके परिणामस्वरूप गैलेक्सी, सौर-मंडल, तारे-सितारे और ढेर सारे अन्य ब्रह्मांडीय पिंडों की रचना हुई। इतना कुछ जानने के बाद एक सवाल यह भी खड़ा हो गया कि ब्रह्मांड का संचालन कैसे हो रहा है। इसके सबसे पुख्ता जबाब को ब्रह्मांड का ‘स्टैंर्डड मॉडल’ कहा जाता है। इसके अनुसार ब्रह्मांड की रचना बारह बुनियादी कणों से हुई है जो सृष्टि के चर-अचर, चेतन-अचेतन सभी पदाथरें में मौजूद हैं। साथ ही इस सृष्टि का संचालन चार बल करते हैं, जो हमें दिखाई नहीं देते, पर जिनका असर स्पष्ट रूप से अनुभव किया जा सकता है। गुरुत्वाकषर्ण ऐसा ही एक अहम बल है। बुनियादी कणों की बात करें तो ये वो कण हैं जो परमाणु से भी छोटे होते हैं या कह सकते हैं कि परमाणु के टूटने से ये कण अस्तित्व में आते हैं जैसे इलैक्ट्रॉन, प्रोटॉन और न्यूट्रॉन आदि। ये कण सृष्टि के हर पदार्थ में मौजूद हैं। स्टैंर्डड मॉडल का जब गहराई से अध्ययन किया गया तो इसमें एक कमी दिखी। कुछ बुनियादी कणों में मास यानी द्रव्यमान या वजन मौजूद होता है जबकि कुछ में नहीं। उदाहरण के तौर पर रोशनी की सबसे छोटी इकाई फोटॉन द्रव्यमान के मामले में शून्य है, लेकिन प्रत्येक परमाणु का अभिन्न घटक प्रोटॉन द्रव्यमान का पुलिंदा है। बुनियादी कणों के बीच यह फर्क कैसे आया? स्टैंर्डड मॉडल इस सवाल का जबाब नहीं दे पा रहा था। सन् 1964 में ब्रिटेन के वैज्ञानिक पीटर हिग्स और उनके सहयोगियों ने एक ऐसे कण की परिकल्पना की जो अपने गिर्द एक शक्तिशाली बल-क्षेत्र या फील्ड का निर्माण करता है। जब भी कोई बुनियादी कण इस फील्ड से गुजरता है तो वह इससे द्रव्यमान ग्रहण कर आकार प्राप्त कर लेता है। वैज्ञानिक कहते हैं कि सारी सृष्टि इसी तरह बनी है और हिग्स कण पूरी सृष्टि में व्याप्त हैं। कुछ ऐसी ही परिकल्पना आइंस्टीन और भारतीय वैज्ञानिक सत्येन्द्रनाथ बोस ने भी की थी। इसलिए द्रव्यमान प्रदान करने वाले इन कणों को हिग्स-बोसोन कण भी कहा जाता है। भौतिक विज्ञान में परिकल्पना करना अलग बात है और उस परिकल्पना को प्रयोगों के आधार पर प्रमाणित कर देना अलग बात। लेकिन अगर चाह है तो राह निकल ही आती है। यूरोपियन ऑर्गनाइजेशन फॉर न्यूक्लियर रिसर्च (सीईआरएन) के तहत दुनिया के लगभग 3000 वैज्ञानिकों ने जेनेवा में धरती के भीतर 300 फुट लंबी सुरंग बनाकर एक महाप्रयोग किया जिसमें बेहद उच्च ऊर्जा वाले प्रोटॉनों की टक्कर से इन कणों की मौजूदगी का संकेत मिला। इसके लिए दस अरब डॉलर की लागत से लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर नामक विशाल मशीन बनाई गई जो उच्च ऊर्जा के प्रहार को अपने तक सीमित रखने में समर्थ थी। कुछ लोगों को शक था कि मशीन इतनी अधिक ऊर्जा को नहीं सह पाएगी और दुनिया में पल्रय जैसी घटना घट सकती है, परन्तु ऐसा कुछ नहीं हुआ। इस महामशीन में प्रोटॉन्स को प्रकाश के वेग से दौड़ाकर आपस में टकराया गया। इससे उत्पन्न ऊर्जा के विश्लेषण से हिग्स-बोसोन कण की मौजूदगी का संकेत मिला। दरअसल विश्लेषण के दौरान ऊर्जा की जो उछाल दिखाई दे रही है वह हिग्स-बोसोन कण की खूबियों से मिलती-जुलती है, इसलिए इसे अभी केवल एक संकेत माना जा रहा है, ना कि इन कणों की मौजूदगी की पुष्टि। माना जा रहा है कि ये कण पूरी सृष्टि में हर जगह हर तरफ बिखरे हुए हैं और इनकी वजह से ही अन्य कणों को आकार मिल रहा है। यदि हिग्स-बोसोन कण न होते तो सभी बुनियादी कण प्रकाश के वेग से लगातार भागते रहते। उनमें न ठहराव होता और न द्रव्यमान। यानी सृष्टि की रचना ही न हुई होती। अपनी इसी खूबी के कारण इन कणों को ईर के समकक्ष या ईर जैसा मानने की सोच उत्पन्न हुई और इन कणों की खोज को भगवान की तलाश पूरी होने जैसी घटना मान लिया गया। जबकि विज्ञान की नजर में यह ठोस भौतिक विज्ञानी खोज है जो सृष्टि की उत्पत्ति व संचालन समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। ब्रह्मांड की उत्पत्ति को लेकर समाज का एक वर्ग इसे दैवी या ईरीय शक्ति की महिमा बताकर वैज्ञानिक खोजों को निर्थक साबित करने की कोशिश करता है। अनेक धर्मो में सृष्टि की रचना का श्रेय एक महाशक्ति को दिया जाता है जो इसे संचालित भी करती है। धर्म और विज्ञान के बीच का यह अंर्तद्वंद्व आदिकाल से चला आ रहा है परन्तु आज विज्ञान अधिक मजबूती के साथ ऐसी मान्यताओं को मानने से इनकार कर रहा है। दुनिया के जाने-माने भौतिक विज्ञानी स्टीफेन हॉकिंग ने 2010 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘द ग्रैंड डिजाइन’ में माना है कि ब्रह्मांड की रचना किसी एक शक्ति द्वारा नहीं हुई है। उन्होंने बताया कि विभिन्न पदाथरें का व्यवहार और गुण भौतिक विज्ञान की शाखा ‘क्वांटम मैकेनिक्स’ से संचालित होते हैं, जबकि ब्रह्मांड और सृष्टि के पिंड गुरुत्वाकषर्ण से बंधे हैं और सापेक्षता के नियमों के तहत गति करते हैं। हॉकिंग ने यह भी बताया कि ब्रह्मांड अनंत है और अरबों ब्रह्मांड नियमों के अनुसार अपनी-अपनी गति और विकास की राह पर चल रहे हैं। ऐसे में ब्रह्मांड की उत्पत्ति को भौतिक विज्ञान का डिजाइन मानना उचित होगा, किसी दैवी शक्ति का नहीं। यह भी कहा जाता है कि वह कौन-सा कारण है जिससे केवल पृथ्वी पर ही जीवन की उत्पत्ति हुई। यदि पृथ्वी थोड़ा-सा सूरज की ओर खिसक जाती तो यहां इतना ज्यादा तापमान होता कि जीवन नहीं पनप पाता। इसी तरह यदि यह सूरज से थोड़ा दूर हट जाती तो भी कम तापमान के कारण जीवन उद्भव या विकास नहीं हो पाता। सही तापमान और रसायनों की मौजूदगी के कारण ही यहां डीएनए बना, जिससे जीवन की उत्पत्ति मुमकिन हुई। प्रतिष्ठित भौतिक विज्ञानी मार्टिन रीस ने छह बुनियादी बलों को सृष्टि का सूत्रधार माना है। उनके मुताबिक यदि इनमें कोई बदलाव होता तो आज हम इस सृष्टि में मौजूद नहीं होते। प्रसिद्ध विज्ञान लेखक र्रिचड डॉकिंस ने अपनी किताब ‘द गॉड डिल्यूजन’ में अनेक ऐसे वैज्ञानिक साक्ष्य प्रस्तुत किए हैं जो विज्ञान को सृष्टि का रचयिता मानते हैं। वैज्ञानिक कहते है कि हिग्स-बोसोन कण की खोज अंतिम सच्चाई नहीं है। अभी सृष्टि के अनेक रहस्यों से पर्दा उठना बाकी है और इस कोशिश में हिग्स-बोसोन कण बहुत काम आएंगे। बिग-बैंग के बाद से ब्रह्मांड लगातार फैल रहा है। इसके साथ पदार्थ यानी मैटर का बिखराव भी हो रहा है। परन्तु, हिसाब लगाने पर पता चलता है कि बहुत मैटर गायब है या कहें दिख नहीं रहा है। इसे वैज्ञानिक डार्क मैटर कहते हैं जिसके बारे में बहुत कुछ जानना बाकी है। इसी तरह पदार्थ के उलट व्यवहार करने वाले एंटी-मैटर की तलाश भी जारी है। कहत हैं डार्क मैटर की तरह ब्रह्मांड में डार्क एनर्जी भी है जिसके बारे में ज्यादा पता नहीं है। सुपर सिमिट्री के नाम से मशहूर सिद्धांत कहता है कि ब्रह्मांड के हर कण का एक जोड़ीदार है जो द्रव्यमान में इससे भारी है। इसका पता लगाना भी एक चुनौती है। दूसरी ओर हिग्स- बोसोन कण के व्यावहारिक उपयोगों को तलाशने की कवायद भी शुरू हो गई है। कुल मिलाकर हिग्स-बोसोन कणों की खोज ब्रह्मांड को समझने की ओर बड़ा कदम है, परन्तु यह विशुद्ध विज्ञान है, भगवान से इसका कोई लेना-देना नहीं।वायदा कारोबार में धोखा किया तो जेल
हकीकत के बजाय हवा में कारोबार (वायदा कारोबार) करने में धोखाधड़ी करने वालों को पांच लाख से लेकर 50 लाख रुपए का जुर्माना और एक साल की सजा हो सकती है। इस प्रावधान के साथ बृहस्पतिवार को होने वाली कैबिनेट की बैठक में वायदा कारोबार नियमन विधेयक पेश किया जा रहा है। भारत में वायदा कारोबार की रफ्तार की एक बानगी देखिए। 2003 में फिर से खोले गए इस जुआ जैसे कारोबार ने पहले साल ही एक 1.30 लाख करोड़ रुपए का कारोबार किया और 2010-11 में यह 100 लाख करोड़ रुपए पार गया। लेकिन इसका दुखद पहलू है कि यह कारोबार हकीकत में 5 प्रतिशत से भी कम होता है। वायदा कारोबार के कारण चीजें महंगी होती है। आजकल देश में बढ़ी महंगाई भी का वायदा करोबार भी एक कारण है। इसकी कारण तमाम राजनीतिक दल इस पर प्रतिबंध लगाने की मांग कर रहे हैं। वायदा करोबार से किसानों के बजाए बिचौलियों और व्यापारियों को फायदा होता है। लेकिन सरकार अब गुड्स यानी वस्तुओं के क्षेत्र में भी वायदा कारोबार को खोलने जा रही है। 2003 से लटके इस विधेयक को 2010 में फिर से लोकसभा में पेश किया गया था और इसे विचार करने के लिए स्थायी समिति को सौंपा गया था। समिति ने सिफारिश की थी कि वायदा कारोबार को इस तरह से नियंत्रित किया जाए कि उसका फायदा किसानों को मिले। इसके लिए किसानों को जागरूक किया जाए। सूत्रों का कहना है कि नए ड्राफ्ट में वायदा कारोबार में धोखा करने वालों को एक साल की सजा के साथ जुमार्ना की राशि 5 लाख से 50 लाख रुपए तक किया जा रहा है। मूल विधेयक में यह राशि 25 लाख रुपए थी। यह भी प्रावधान किया जा रहा है कि एक अपीलीय पंचाट होगा जो इस कारोबार की शिकायतें सुनेगा और इस पंचाट के फैसलों को केवल सुप्रीम कोर्ट में ही चुनौती दी जा सकेगी। सेल के विनिवेश प्रस्ताव पर भी होगा विचार : सार्वजनिक क्षेत्र की स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) में 10.82 प्रतिशत सरकारी हिस्सेदारी के विनिवेश के लिए विनिवेश विभाग बृहस्पतिवार को मंत्रिमंडल की मंजूरी लेगा। शेयर बाजार में नीलामी के जरिए होने वाले इस विनिवेश से सरकार को 4,000 करोड़ रुपए की राशि मिलने की उम्मीद है। सेल में होने वाला यह विनिवेश बिक्री पेशकश अथवा नीलामी के जरिए किया जाएगा। वर्तमान में सेल में सरकार की 85.82 प्रतिशत हिस्सेदारी है।
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