अन्ना हजारे भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए एक मजबूत लोकपाल की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हैं, लेकिन लोकसभा में सरकार ने जो लोकपाल विधेयक पारित कराया है, उससे ऐसी उम्मीद नहीं है। हालांकि लोकपाल को संवैधानिक दर्जा देने का उसका प्रस्ताव गिर गया है। इसलिए अब उसे नए सिरे से लोकपाल विधेयक को फिर लोकसभा में लाना पड़ेगा। अन्ना चाहते हैं कि सरकार ऐसा मजबूत लोकपाल कानून बनाए, जिसके तहत आम जनता भ्रष्टाचार की शिकायत कर सके और लोकपाल भ्रष्ट कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई कर सके। अन्ना यह भी चाहते हैं कि इन कर्मचारियों में लेखपाल, ग्राम विकास अधिकारी और थाने के पुलिसकर्मियों के स्तर तक के कर्मचारियों को भी शामिल किया जाए ताकि जनता को उनके भ्रष्टाचार से बचाया जा सके। आमतौर पर जनता का सरकार के छोटे कर्मचारियों और बाबुओं से पाला पड़ता है और जब भी वह किसी काम से इनके पास जाता है तो बिना रिश्वत के उसका काम नहीं होता है, लेकिन सरकार इन कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे में नहीं लाना चाहती है। सरकार यह भी नहीं चाहती है कि सीबीआइ को लोकपाल के अधीन लाया जाए या लोकपाल की कोई स्वतंत्र जांच एजेंसी हो। सरकार लोकपाल की नियुक्ति और उसे हटाने का अधिकार भी किसी पारदर्शी व्यवस्था के बजाय अपने हाथ में रखना चाहती है। अन्ना हजारे और सरकार के बीच टकराव का यही मूल कारण है। अब उन्होंने कहा कि वह आगामी पांच राज्यों के विधानसभा के चुनावों में जनता के पास जाएंगे और लोकपाल का विरोध करने वाले जनप्रतिनिधियों को हराने की अपील करेंगे। लेकिन संप्रग सरकार के मंत्री और नेता मजबूत और अधिकार संपन्न लोकपाल लाने के बजाए एक कमजोर लोकपाल बिल को लोकसभा से पास कराया है, जिसकी बागडोर हमेशा सरकार के हाथ में रहेगी। ऐसे लोकपाल से मंत्रियों के भ्रष्टाचार की जांच की उम्मीद नहीं की जा सकती है। कांगे्रस के नेता शुरू से ही भ्रम पैदा करने वाले बयान देते रहे हैं। कभी वह अन्ना को ही भ्रष्ट, भगौड़ा या संघ का एजेंट बताते हैं तो कभी उनकी टीम के सदस्यों पर लांछन लगाते हैं। कांग्रेस के नेता कहते हैं कि अन्ना कर्नाटक या उत्तर प्रदेश अथवा मध्य प्रदेश सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ जाकर आंदोलन क्यों नहीं करते हैं? पर अन्ना जिस लोकपाल कानून की मांग कर रहे हैं, अगर वह लागू कर दिया जाए तो केंद्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्तों को वह अधिकार मिल जाएगा, जिससे भ्रष्टाचार पर काफी हद तक लगाम लगाई जा सकती है। इस कानून को राज्य नहीं, बल्कि केंद्र सरकार को बनाना है। इसलिए अन्ना केंद्र सरकार से यह मांग कर रहे हैं। वह लोकशाही में जनता जनार्दन को ही सबसे ऊपर मानते हैं। इसीलिए वह जनांदोलन के जरिये सरकार पर कानून बनाने के लिए दबाव बना रहे हैं। पर सरकार तरह-तरह के बहाने करके मजबूत लोकपाल बनाने से बचना चाहती है। संप्रग की सरकार लोकपाल बिल की ड्रॉफ्टिंग से लेकर उसके निर्माण की सारी प्रक्रियाओं में जनता की मांग की उपेक्षा करती रही है। यहां तक कि संसद में पारित प्रस्तावों को भी स्थाई समिति में कांग्रेस के सदस्यों ने विरोध किया है। लोकसभा में पेश विधेयक में सीबीआइ को लोकपाल के दायरे से बाहर रखना दर्शाता है कि विधेयक कितना बेकार है। कमजोर सरकारी विधेयक भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में उन गरीबों की मदद नहीं करेगा, जो रिश्वतखोरी से सबसे ज्यादा पीडि़त हैं, जिन्हें कोई भी काम कराने के एवज में घूस देनी पड़ती है। सरकार सीबीआइ को नियंत्रण से इसलिए मुक्त नहीं करना चाहती, क्योंकि ऐसा करते ही कई मंत्री जेल की हवा खाने लगेंगे। इस बिल में 90 फीसदी नेताओं और 95 फीसदी सरकारी कर्मचारियों, राजनीतिक दलों और कंपनियों को बाहर रखा गया है, लेकिन मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारे, महिला मंडल, रामलीला कमेटियां, दुर्गा पूजा कमेटियां, युवा क्लब, खेल क्लब, प्रेस क्लब, मजदूर, किसान संगठन आदि इसके तहत रख दिए गए हैं। लोकपाल सदस्यों को हटाने और निलंबित करने पर सरकार का ही नियंत्रण होगा। बिल के प्रावधान सीबीआइ को भी कमजोर करने वाले हैं। सीबीआइ से पूछताछ और अभियोजन का अधिकार छीनकर उसे टुकडे़-टुकड़े कर निष्कि्रय किया जा रहा है। सीबीआइ निदेशक की चयन समिति में पीएम, नेता प्रतिपक्ष और मुख्य न्यायाधीश को रखा गया है। दोनों ही नेताओं के खिलाफ सीबीआइ से जांच की उम्मीद कैसे की जाएगी। ऐसे में वे क्यों चाहेंगे कि कोई सशक्त व्यक्ति इस पद पर आए। जैसा बिल बनाया गया है, उससे लगता है कि जान-बूझकर भ्रष्टाचारियों को बचाने की पूरी व्यवस्था की गई है। लोकसभा में पारित विधेयक के कानून बन जाने के बाद सीबीआइ पूरी तरह से निष्कि्रय हो जाएगी। आज सीबीआइ पूछताछ, जांच, अभियोजन खुद करती है। अब सीबीआइ से पूछताछ और अभियोजन को छीना जा रहा है तो सीबीआइ के टुकड़े-टुकड़े करके उसे निष्कि्रय बनाया जा रहा है। ग्रुप सी और डी कर्मचारी पूरी तरह से लोकपाल के दायरे के बाहर है। ग्रुप सी और डी कर्मचारियों के मामले में लोकपाल केवल पोस्ट ऑफिस की तरह सारी शिकायतें सीवीसी को भेजेगा। सीवीसी पर लोकपाल का किसी भी तरह से नियंत्रण नहीं होगा। नियंत्रण के नाम पर सीवीसी लोकपाल को केवल त्रैमासिक रिपोर्ट भेजेगा। सीवीसी के 232 कर्मचारी 57 लाख ग्रुप डी के भ्रष्टाचार की तहकीकात कैसे करेंगे? यह एक बहुत बड़ा प्रश्न है? इस बिल की एक बड़ी विडंबना यह है कि ग्रुप सी और डी के अधिकारियों के खिलाफ अभियोजन कौन करेगा, इस पर बिल मौन है। आजादी के बाद पहली बार भ्रष्टाचार के मुकदमे में भ्रष्टाचारी अफसरों और नेताओं को मुफ्त में वकील सरकार मुहैया कराएगी और उन्हें हर तरह की कानूनी सलाह देगी। शिकायतकर्ता के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने के लिए आरोपी अधिकारी और नेता को सरकार मुफ्त में वकील मुहैया कराएगी। भ्रष्ट अधिकारी के खिलाफ तो शिकायत होने के बाद जांच होगी और शिकायत के लगभग दो साल बाद मुकदमा होगा, लेकिन शिकायतकर्ता के खिलाफ मुकदमा शिकायत करने के अगले दिन ही जारी हो जाएगा। भ्रष्ट अधिकारियों को निकालने की ताकत लोकपाल को नहीं, बल्कि उसी विभाग के मंत्री की होगी। आज तक जो मंत्री भ्रष्टाचार के खिलाफ जांच के आदेश नहीं देते थे, क्या वे भ्रष्ट अधिकारियों को नौकरी से निकालेंगे? अगर लोकपाल के कर्मचारी भ्रष्ट हो गए तो क्या होगा? सरकारी बिल कहता है कि लोकपाल खुद ऐसे मामलों की जांच करेगा। प्रश्न उठता है कि क्या लोकपाल खुद अपने ही कर्मचारियों के खिलाफ एक्शन लेगा? जन लोकपाल में सुझाव दिया गया था कि लोकपाल के कर्मचारियों की शिकायत के लिए एक स्वतंत्र शिकायत प्राधिकरण बनाया जाए। सरकार ने इसे नामंजूर कर दिया है। टीम अन्ना ने यह भी कहा था कि लोकपाल की कार्यप्रणाली पूरी तरह पारदर्शी हो। इसके साथ ही हर मामले की जांच पूरी होने के बाद उससे संबंधित सभी रिकॉर्ड वेबसाइट पर डाले जाएं। ऐसा नहीं होने पर यह भ्रष्टाचार का अड्डा बन जाएगा। भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वालों को संरक्षण देने की बात इस बिल में कहीं नहीं की गई है। कांग्रेस के सांसद और प्रवक्ता यह बात कई बार कह चुके हैं कि सरकार एक सशक्त लोकपाल बिल जाएगी और भ्रष्टाचार के खिलाफ उसकी जंग जारी रहेगी, लेकिन संसद की स्थायी समिति में उसके सदस्यों ने जिस तरह से अपने रुख को बदला उससे उसके इरादों पर सवाल खड़े हो गए हैं। संसद ने अगस्त में सर्वसम्मति से जो प्रस्ताव पारित कराया था, उसमें समूची नौकरशाही को लोकपाल के दायरे में लाने की बात कही गई थी। उसी प्रस्ताव के बाद अन्ना हजारे ने अनशन खत्म करने का फैसला किया था, लेकिन स्थाई समिति में कांग्रेस के सदस्यों का व्यवहार एकदम उल्टा रहा है। समिति की आखिरी बैठक में आम राय से यह तय हुआ था कि ग्रुप सी के बाबुओं को लोकपाल के दायरे में रखा जाएगा, लेकिन इसके दूसरे ही दिन समिति के कांग्रेसी सदस्य इस बात से पलट गए। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
Thursday, December 29, 2011
अल्पसंख्यक आरक्षण का असर
वामपंथियों और समाजवादियों के दबाव के कारण ही संप्रग-1 सरकार ने मुसलमान समाज की समस्या का अध्ययन करने के लिए दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश राजेंद्र सच्चर की अध्यक्षता में 9 मार्च, 2005 को एक आयोग का गठन किया। आयोग ने 17 नवंबर, 2006 को अपनी रिपोर्ट शासन को दी और शासन ने 30 नवंबर, 2006 को संसद के दोनों सदनों में रिपोर्ट पेश की। रिपोर्ट से मुस्लिम समाज के बारे में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए जैसे मुसलमानों की साक्षरता दर राष्ट्रीय औसत से पांच फीसदी कम है। छह वर्ष से लेकर 14 वर्ष के आयुवर्ग के मुस्लिम बच्चों में से 25 फीसदी कभी स्कूल गए ही नहीं। जो बच्चे स्कूल जाते भी हैं, वे जल्द ही स्कूल छोड़ देते हैं। हाईस्कूल तक जाते-जाते फेल होने वाले बच्चों में भी मुस्लिम लड़कियां अव्वल हैं। मुश्किल से चार फीसदी मुस्लिम बच्चे ग्रेजुएशन कर पाते हैं क्योंकि इनकी बस्तियों में या आस-पास अच्छे स्कूलों की कमी है। अधिकांश मुसलमान बच्चे सरकारी स्कूल की जगह मदरसे में जाना पसंद करते है। पढ़ाई-लिखाई के अभाव में स्वत: रोजगार तलाशना इनकी मजबूरी है। इसलिए पूरे देश में वेंडर अथवा हॉकर का काम करने वालों में 12 प्रतिशत मुस्लिम हैं। 16 प्रतिशत किसी दुकान में काम करते हैं और 70 फीसदी महिलाएं घरेलू कार्य में रत हैं। नियमित वेतन वाली नौकरियों में मुसलमानों की हिस्सेदारी न के बराबर है। इसीलिए ग्रामीण क्षेत्र में गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करने वाली आबादी में 38 फीसदी और शहरी क्षेत्र में 27 फीसदी मुसलमान हैं। ग्रामीण हलकों में 40 प्रतिशत बड़ी मुस्लिम बस्तियों के आस-पास स्वास्थ्य सेवाएं नगण्य हैं। इतनी दुर्दशा के निदान का उपाय उसी सरकार द्वारा नियुक्त एक दूसरे कमीशन ने सुझाया। सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश जस्टिस रंगनाथ मिश्रा ने संस्तुति की कि मुसलमानों की दशा सुधारने के लिए सरकारी नौकरियों में इनकी आबादी के समतुल्य आरक्षण किया जाए। उनका कहना है कि भारत के संविधान में सरकारी नौकरियों में 50 से अधिक आरक्षण की व्यवस्था पर प्रतिबंध है और अल्पसंख्यक के नाम से भारतीय संविधान के किसी वर्ग के लिए जगह आरक्षित करने की गुजांइश नहीं है। आरक्षण के लिए जो भी संवैधानिक प्रावधान हैं वे अनुसूचित जनजाति तथा पिछड़े वर्गो के लिए हैं। इसलिए अल्पसंख्यक वर्ग की दयनीय दशा को देखते हुए आरक्षण के विस्तार की आवश्यकता है जो संविधान में संशोधन करके ही दिया जा सकता है। कमीशन के अनुसार अल्पसंख्यकों का अलग से 15 फीसदी आरक्षण होना चाहिए, जिसमें 10 फीसदी मुसलमानों का हो। भारत के पांच प्रमुख राज्यों की चुनाव घोषणा की प्रथम संध्या पर सरकार ने सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्ग के लिए 27 फीसदी आरक्षण के ही कोटे से अल्पसंख्यक समाज के पिछडे़ वर्ग के लिए 4.5 फीसदी आरक्षण का आदेश प्रसारित कर दिया। यदि मंडल आयोग की संस्तुतियों को देखा जाए तो पिछड़ी जातियों की कुल संख्या संपूर्ण आबादी की 52 प्रतिशत है। इसमें हिंदू, मुसलमान, इसाई, सिख, बौद्ध, जैन, सभी वगरें की पिछड़ी जातियां शामिल हैं। उनकी संस्तुति में इन सभी वगरें के पिछड़ों को आरक्षण की परिधि में लाकर 27 प्रतिशत आरक्षण देने की बात कही गई थी। अब उसी आरक्षण में से 4.5 प्रतिशत आरक्षण अल्पसंख्यक समाज को दे देना समझ से परे है। इस आरक्षण का लाभ अत्यधिक पिछड़े मुस्लिम समाज के बच्चे कैसे उठा सकेंगे? इसका अधिकांश लाभ इसाइयों और बौद्धों को मिलेगा। सरकार ने बहुत ही चालाकी के साथ चुनाव की पूर्व संध्या पर मुस्लिम समाज को नए सिरे से ठगने का काम किया है ताकि वह पंजाब की चुनावी रैलियों आरक्षण को सिखों के लिए बता सके, उत्तर-प्रदेश के चुनावी भाषण में मुसलमान एजेंडे में रहेगा और गोवा में इसाई समाज के लिए आरक्षण की घोषणा की जाएगी। हमेशा की तरह कांग्रेस की यह बाजीगरी मुसलमान समाज को कभी राहत नहीं दे सकती। कांग्रेस ने इस समाज को हमेशा वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया है। 1990 में जब वीपी सिंह की सरकार ने सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्गो के लिए 27 फीसदी आरक्षण का आदेश निकाला था, तो इसका सबसे जोरदार विरोध कांग्रेस ने ही किया था। राजीव गांधी ने संसद में विपक्ष के नेता की हैसियत से 6 सितंबर, 1990 को जोरदार भाषण दिया था और उसमें मंडल आयोग की संस्तुतियों को खत्म कर देने की मांग की थी। उन्होंने बार-बार इस बात पर बल दिया कि आरक्षण के कानून का मकसद केवल एक जाति है। आज के मंत्री राजीव गांधी के उन भाषणों को नए सिरे सुनें तो उन्हें शर्मिंदगी होगी कि हमारे नेता ने आरक्षण का विरोध किया। आज उनके शिष्यगण आज के अल्पसंख्यक समाज को ठगने के लिए मंडल कमीशन की संस्तुति को इस्तेमाल कर रहे हैं। 1977 में जनता पार्टी की उत्तर प्रदेश, बिहार की सरकारों ने 15 फीसदी आरक्षण का इंतजाम पिछड़े वगरें के लिए किया था, जिसमें मुस्लिम जातियां भी शामिल थीं। इस आरक्षण की व्यवस्था के बावजूद मुसलमानों की स्थिति लगातार बिगड़ती ही गई। यदि सरकार में इस बड़े अल्पसंख्यक समाज की तरक्की के लिए थोड़ी भी इच्छाशक्ति है तो सच्चर और मिश्रा कमीशन की संस्तुतियों के अनुसार कार्य करे। मंडल आयोग और छेदीलाल आयोग तो मूलत: पिछड़े वगरें के लिए बने थे। उन आयोगों की तरफ ताकने के बजाय सरकार मुस्लिमों के कल्याण के लिए कुछ ठोस उपाय करे। (लेखक राज्यसभा के सदस्य हैं)
Wednesday, December 28, 2011
निराशा के बीच नई उम्मीदें
कभी धूप, कभी छाया-भारत की कहानी सदा से यही रही है। भारत की प्रतिष्ठा या बदनामी इसी पर निर्भर होती है कि कब कितनी धूप है और कब कितनी छाया। भ्रष्टाचार ने पूरे साल माहौल को धुंधला बनाए रखा। शासकीय अकर्मण्यता ने राष्ट्र को अलग से पीड़ा दी है। 2011 में एक के बाद एक भ्रष्टाचार के कई कंकाल सरकार की अलमारी से बाहर आए। राष्ट्रमंडल खेल सफल रहे, लेकिन ये खेल फर्जी ठेकों, बढ़ा-चढ़ा कर दिखाए गए खर्च और खराब प्रबंधन के कारण बदनाम हो गए। जब राष्ट्रमंडल खेलों के कर्ता-धर्ता सुरेश कलमाड़ी और सहयोगी गिरफ्तार कर लिए गए तो राष्ट्र ने खुद को शर्मिदा महसूस किया। सरकारी अलमारी से निकला एक और कंकाल 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला था। एक अनुमान के मुताबिक इसने राजकीय खजाने को, 40 हजार करोड़ का चूना लगाया, जबकि एक अन्य आंकड़ा एक लाख 76 हजार करोड़ का है। इस दौरान एक सकारात्मक घटना भी हुई। गांधीवादी अन्ना हजारे सामने आए। उन्होंने भ्रष्टाचार से निपटने के लिए लोकपाल की संस्था बनाने की मांग की। हजारे वास्तव में सरकार के प्रति सिविल सोसायटी की नाराजगी का प्रतिनिधित्व करते दिखे। लोकपाल की मांग को लेकर हजारों लोग सड़क पर उतर आए। जनता के भारी दबाव और अन्ना के अनशन के कारण संबंधित बिल लाने के लिए संसद का शीतकालीन सत्र बढ़ाना पड़ा। एक नए प्रकार का भारत आकार लेने लगा। लोगों को यह अहसास हो गया कि उनकी आवाज तभी सुनी जाएगी जब वे उसे उठाएंगे। यह देखने लायक था कि कांग्रेस को छोड़कर सभी राजनीतिक पार्टियां एक मंच पर इकट्ठा थीं। दुर्भाग्य से सरकार उस समय सक्रिय हुई जब मामला हाथ से निकल चुका था। उसने अपनी विश्वसनीयता वापस लाने के लिए भी कुछ नहीं किया। शासकीय अकर्मण्यता का असर अर्थव्यवस्था पर पड़ा। कीमतें बढ़ने लगीं और मुद्रास्फीति दो अंकों का आंकड़ा छूने लगी। इससे भी ज्यादा खराब था औद्योगिक उत्पादन में आई गिरावट। देशी और विदेशी, दोनों तरह के निवेशकों ने हाथ खींच लिए और रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 18 प्रतिशत गिर गया। पहले का आशावाद, खासकर लोगों का आत्मविश्वास, कम हो गया और आर्थिक मंदी के भय से लोग आशंकित हो उठे। आर्थिक सुधारों के मसीहा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह संसद के सामने खुदरा कारोबार (रिटेल) में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का प्रस्ताव लाए। विकास के कामों पर खर्च करने के लिए पैसा जुटाने के लिए पेंशन बिल लाया गया। रिटेल में एफडीआइ के भय का इतना असर हुआ कि राजनीतिक पार्टियां जिनमें कांग्रेस के सहयोगी दल भी थे, इसके विरोध में एक साथ हो गए। यह प्रधानमंत्री के लिए एक और झटका था। उनके प्रति लोगों का विश्वास इसलिए भी हिल गया है, क्योंकि वह विकास दर को पहले की तरह नौ प्रतिशत तक ले जाने में सक्षम नहीं दिख रहे। यह अब 7 प्रतिशत के आसपास घूम रही है। यह विकास दर न्यूनतम है, क्योंकि इससे नीचे आने पर कारखानों में तालाबंदी और भारी बेरोजगारी होगी। कांग्रेस ने अपनी प्रतिष्ठा थोड़ी बचा ली, क्योंकि भाजपा ने पेंशन बिल पर उसका समर्थन किया, लेकिन एफडीआइ पर 26 प्रतिशत की सीमा लगाकर। साल के आखिरी दिनों ने देश के 65 प्रतिशत गरीबों के लिए खाद्य सुरक्षा के उपायों को सामने आते देखा। पीछे की सीट से ड्राइव कर रही कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री को इसे अपनाने के लिए बाध्य किया। हालांकि यह योजना पहले से दबाव झेल रहे राजकोष पर 95 हजार करोड़ का बोझ डालेगी, लेकिन यह यूपी, पंजाब और उत्तराखंड समेत पांच राज्यों के चुनाव में कांग्रेस के लिए वोट जुटा सकती है। मुख्यमंत्री जयललिता के विरोध के बावजूद तमिलनाडु के कुडनकुलम में एक हजार मेगावाट वाले न्यूक्लियर पॉवर प्लांट को खोले जाने की घोषणा में प्रधानमंत्री की देर से आई मजबूती दिखाई देती है। उनका ऐसा ही संकल्प मार्च में खुदरा कारोबार में एफडीआइ लाने की घोषणा में दिखाई दिया था। आर्थिक सुधारों की लॉबी ने अभी तक उम्मीद नहीं छोड़ी है। मनमोहन सिंह सरकार का उजला पक्ष यह है कि उसने पड़ोसी देशों से रिश्ते सुधारे हैं। भारत के साथ समीकरण के महत्व को रेखांकित करने के लिए मनमोहन सिंह ने रूस की यात्रा की और चीन तथा अमेरिका के राष्ट्रपति से मिले। भारत अगले साल संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनने की उम्मीद कर रहा है, क्योंकि उसे रोकने वाले अकेले देश चीन ने अच्छे संकेत दिए हैं। अगले साल और आने वाले साल दर साल तक भारत के पक्ष में सबसे बड़ी बात यह है कि देश लोकतंत्र और पंथनिरपेक्षता के मूल्यों के लिए प्रतिबद्ध हो रहा है। हिंदू और मुसलमान एक साथ रहना सीख गए हैं। अल्पसंख्यक अपनी बात मजबूती से रख रहे हैं, क्योंकि खुशहाली में उनका हिस्सा अभी भी कम है। सुरक्षा बलों की संयुक्त कमान ने माओवादियों के महत्वपूर्ण नेता किशन को मार गिराया। फिर भी माओवादी अपने संघर्ष से पीछे नहीं हटे हैं, क्योंकि ज्यादातर जगहों पर गरीबी और पिछड़ापन उन्हें आगे बढ़ने में मदद करते हैं। सच है कि अगले साल भारत सात प्रतिशत की विकास दर को ही कायम रख पाएगा, लेकिन गरीबी हटाने के लिए 9 प्रतिशत की विकास दर चाहिए। इसलिए यह साल चुनौती भरा होगा। शायद पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का यह कथन सच है कि आने वाली पीढि़यों को अधिक मेहनत करनी पड़ेगी। फिर भी, लोगों ने खुद में और देश में जो विश्वास पैदा कर लिया है वह उम्मीद जगाता है कि 2012 में सूरज की रोशनी फैलती जाएगी और अंधेरा छंटता जाएगा। आशावाद हर भारतीय का कर्तव्य है। (लेखक प्रख्यात स्तंभकार हैं)
Monday, December 19, 2011
सोनिया के दबाव में खाद्य सुरक्षा बिल पर मुहर
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के वीटो के बाद खाद्य सुरक्षा विधेयक को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मंजूर कर दिया है। यूपी के सियासी दंगल में राहुल को खाद्य सुरक्षा विधेयक का अस्त्र मुहैया कराने के लिए सरकार अब इसे सोमवार को संसद में पेश कर सकती है। यह बात अलग है कि संसद में पेश होने के बाद इसे स्थायी समिति के पास विचार के लिए भेजा जाना तय है। इससे देश की करीब एक तिहाई आबादी को सस्ती दरों पर अनाज उपलब्ध कराया जा सकेगा। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में हुई मंत्रिमंडल की बैठक में इस विधेयक पर बहुत ज्यादा चर्चा नहीं हुई। सूत्र बताते हैं कि सिर्फ खाद्य सब्सिडी को लेकर संक्षिप्त चर्चा हुई, लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष का इस विधेयक को लेकर पूरी सरकार पर इतना ज्यादा दबाव था कि बैठक में इस पर तुरंत सहमति की मुहर लग गई। राकांपा सुप्रीमो और खाद्य मंत्री शरद पवार व दूसरे सहयोगी दलों की चिंताओं को भी संप्रग अध्यक्ष का ड्रीम बताते हुए इसे अब न रोकने के लिए प्रधानमंत्री ने मना लिया। वैसे तो खुद कांग्रेस के मंत्री भी मौजूदा आर्थिक हालात और जन वितरण प्रणाली के ढांचे के मद्देनजर इस कानून के पक्ष में अभी नहीं हैं। खाद्य सुरक्षा कानून का लाभ देश की 63.5 प्रतिशत आबादी को मिलेगा। ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाली 75 तो शहरी क्षेत्रों में 50 प्रतिशत आबादी इसके दायरे में आएगी। ग्रामीण और शहरी गरीबों को प्रति व्यक्ति 7 किलो प्रति माह के हिसाब से अनाज मिलेगा। कानून में 5 व्यक्तियों की इकाई को परिवार माना गया है। इसको लागू करने में सरकार पर पहले साल 95000 करोड़ रुपये की सब्सिडी का बोझ आएगा। यह तीसरे साल तक 1.50 लाख करोड़ रुपये हो जाएगा। वर्तमान में सरकार 31000 करोड़ रुपये खाद्य सब्सिडी पर खर्च कर रही है। इसके अतिरिक्त तीसरे साल देश में कृषि उत्पादों के भंडारण के लिए गोदाम बनाने पर 50000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि की आवश्यकता होगी। खाद्य मंत्री केवी थामस ने कहा था कि इसको लागू करने के लिए करीब 3.5 लाख करोड़ रुपये की आवश्यकता होगी। इसके तहत अब गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों, गरीबी रेखा से ऊपर के परिवारों और अंत्योदय अन्न योजना के तहत आने वाले वर्ग के प्रावधान को समाप्त कर दिया गया है। इसके विपरीत अब प्राथमिकता वाले और सामान्य उपभोक्ता वर्ग के तहत जनता को बांटा गया है। प्राथमिकता वर्ग में आने वाले गरीबों को एक रुपये प्रति किलो की दर पर मोटा अनाज, दो रुपये किलो के हिसाब से गेहूं और 3 रुपये किलो के हिसाब से चावल दिया जाएगा, जबकि सामान्य उपभोक्ता वर्ग को अनाज के समर्थन मूल्य का 50 फीसदी देना होगा। जिन गरीबों को अनाज दिया जाना है उनकी संख्या सामाजिक आर्थिक जनगणना के नतीजे आने के बाद तय होगी।
Thursday, December 8, 2011
देश के 51 करोड़ लोगों की रोजाना की कमाई मात्र 75 रुपये
केंद्र और राज्य सरकारें गरीबों के उत्थान व उनकी आर्थिक दशा में सुधार के बड़े- बड़े दावे भले ही करें, लेकिन हकीकत यह है कि भारत में गत तीन दशकों में आर्थिक असमानताएं बढ़ी हैं। विभिन्न तबकों की आमदनी के बीच फासला बहुत ज्यादा बढ़ गया है। अमीरों की आमदनी गरीबों की आमदनी से 12 फीसदी ज्यादा है। देश की एक अरब इक्कीस करोड़ की आबादी के 42 फीसदी हिस्से (तकरीबन 51 करोड़ लोग) की एक दिन की आमदनी आज भी महज 1.25 डॉलर (करीब 75 रुपये) ही है। अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) के महासचिव एंजल गुरिया द्वारा पेरिस में जारी रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में समानतावादी कहलाने वाले मुल्कों में गरीब-अमीर के बीच का फासला बढ़ा है। दुनिया के 10 फीसदी अमीरों की आमदनी गरीबों की तुलना में 9 गुना ज्यादा है। चीन और मेक्सिको में अमीरों की आमदनी गरीबों की आमदनी से 25 प्रतिशत ज्यादा है। ओईसीडी ने उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर अपनी रिपोर्ट में भारत,चीन, अर्जेटीना, ब्राजील, इंडोनेशिया, रूस और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों का आकलन किया है। इन सात देशों में से भारत में गरीबी दर सबसे ज्यादा है, जहां 42 फीसदी आबादी की प्रतिदिन की आमदनी मात्र 1.25 डॉलर है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में गत तीन दशकों में आर्थिक असमानताएं बढ़ीं हैं, विभिन्न तबकों की आमदनी के बीच फासला बहुत ज्यादा बढ़ गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि जहां, ब्राजील, इंडोनेशिया और अर्जेटीना में पिछले कुछ सालों में अमीरों और गरीबों के बीच का आर्थिक फासला घटा है, वहीं चीन, भारत, दक्षिण अफ्रीका और रूस में ये बढ़ा है। आमदनी में अंतर की वजह से लोगों के बीच का फासला बढ़ रहा है। इसके अलावा तकनीकी विकास का फायदा केवल ज्यादा प्रशिक्षित कामगारों को ही मिल पाया है। ओईसीडी का कहना है कि बाजार की दृष्टि से देखा जाए तो टैक्स और दूसरी कल्याणकारी योजनाओं से सभी तबकों के बीच की असमानता दूर होती है, लेकिन 1990 के दशक से ये योजनाएं ज्यादा कारगर साबित नहीं हुई हैं। यही कारण है कि दुनिया के ज्यादातर देशों में कल्याणकारी योजनाएं पिछले 15 सालों में फलदायी साबित नहीं हो पाई। अमीरों पर कम टैक्स लगाए जाने को, इस रिपोर्ट में अमीरों और गरीबों के बीच बढ़ते फासले का दूसरा कारण बताया गया है। रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने के लिए कदम उठाए जाने चाहिए और ज्यादा मजदूरों को काम में लगाने की कोशिश की जानी चाहिए। सरकारों को अपनी टैक्स प्रणाली में बदलाव लाना होगा और अमीरों पर टैक्स का ज्यादा भार डालना होगा। ओईसीडी के महासचिव एंजल गुरिया के मुताबिक, संगठन की रिपोर्ट उस धारणा को दूर करती है जिसकेमुताबिक आर्थिक बढ़ोतरी का फायदा वंचित तबकों तक भी पहुंचता है। उन्होंने कहा, जब तक समग्र बढ़ोतरी नहीं होती, तब तक अमीरों और गरीबों के बीच का फासला बढ़ता रहेगा। सरकारों को इससे निपटने के लिए जल्द ही कदम उठाने होंगे। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अमीरों-गरीबों के बीच बढ़ते फासले को ही एक नई चुनौती बताया है। उन्होंने ट्रिकल डाउन थ्योरी की तीखी आलोचना करते हुए कहा, अमेरिका में रिपब्लिकन पार्टी की वो नीति हमेशा असफल रही है, जिसके तहत अमीरों से कम टैक्स लिया जाता है।
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