Friday, September 30, 2011

शिक्षा पर उदासीनता


शासन के शीर्ष पदों पर बैठे लोग अपने सामाजिक दायित्वों के निर्वहन को लेकर गंभीर नहीं, इसका एक नया प्रमाण यह है कि अभी कई राज्यों ने शिक्षा अधिकार कानून के संदर्भ में अधिसूचना तक जारी नहीं की है। अधिसूचना जारी न करने वाले राज्यों में महाराष्ट्र, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे बड़े राज्य तो हैं ही, केंद्रीय सत्ता की नाक के नीचे रहने वाला दिल्ली भी है। यह लेटलतीफी तब है जब छह से चौदह साल तक के बच्चों को मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा देने का कानून बने हुए डेढ़ साल होने वाले हैं। इस कानून पर अमल महज सामाजिक दायित्व की पूर्ति ही नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया भी है। हालांकि सभी राज्य सरकारें शिक्षा की महत्ता का बखान करती रहती हैं, लेकिन जब इस दिशा में कुछ करने की बारी आती है तो वे तरह-तरह के बहाने से लैस हो जाती हैं। यह ठीक नहीं कि केंद्र सरकार इन बहानों को तवज्जो दे रही है। शिक्षा अधिकार कानून पर अमल में लापरवाही
बरतने वाले राज्यों पर दबाव बनाने में केंद्र सरकार की यह दलील शायद ही काम आए कि इस कानून के हिसाब से अधिसूचना न जारी करने वाले राज्यों को नए स्कूलों के लिए धन नहीं दिया जाएगा। कोई आश्चर्य नहीं कि केंद्र सरकार की इस सख्ती के बावजूद राज्य सरकारें हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाएं। यह शिक्षा अधिकार कानून के प्रति राज्य सरकारों की उदासीनता ही है कि उन्होंने बार-बार याद दिलाए जाने के बाद अधिसूचना जारी की और कुछ राज्य तो अभी भी ऐसा करने में आनाकानी कर रहे हैं। इससे अधिक आश्चर्यजनक और कुछ नहीं हो सकता कि पिछले वित्तीय वर्ष के अंत तक सिर्फ 15 राज्यों ने शिक्षा अधिकार कानून पर अमल की अधिसूचना जारी की थी। जिस कानून को सामाजिक उत्थान के साथ-साथ राष्ट्र निर्माण की दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना गया हो उसके संदर्भ में राज्य सरकारों का ढीला-ढाला रवैया सवाल खड़े करने वाला है। राज्य सरकारों के रवैये से यह स्पष्ट है कि इस कानून के अमल में अभी और देर होगी। ध्यान रहे कि अधिसूचना जारी करने मात्र से 6 से 14 वर्ष तक के सभी बच्चों को स्कूलों में दाखिला नहीं मिलने वाला। ऐसा तो तब होगा जब पर्याप्त स्कूल, शिक्षक और अन्य संसाधन जुटा लिए जाएंगे। इस संदर्भ में इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि संसाधनों के मामले में राज्य सरकारें आर्थिक तंगी का रोना रोती रहती हैं। हालांकि सर्वशिक्षा अभियान के तहत 6 से 14 वर्ष के सभी बच्चों को शिक्षा प्रदान करने में खर्च होने वाले धन का बड़ा भाग केंद्र सरकार वहन कर रही है, फिर भी राज्य सरकारें अपनी कमजोर आर्थिक स्थिति का हवाला देने से बाज नहीं आ रहीं। राज्य सरकारों के ऐसे आचरण को देखते हुए इसकी उम्मीद और भी कम है कि वे सर्वशिक्षा अभियान के तहत संचालित होने वाले स्कूलों की दशा सुधारने और उनमें गुणवत्ता प्रधान शिक्षा के लिए सचेत होंगी। इससे इंकार नहीं कि 6 से 14 वर्ष के सभी बच्चों को स्कूलों में दाखिला दिलाना एक बड़ा काम है, लेकिन यह काम तब और दुरूह हो जाएगा जब राज्य सरकारें उसमें रुचि नहीं लेंगी। जब राज्य सरकारें इस मामले में उदासीनता का परिचय देंगी तब फिर यह लगभग तय है कि निजी क्षेत्र के स्कूल इस कार्य में सहयोग देने के लिए स्वेच्छा से तैयार होने वाले नहीं हैं।

Wednesday, September 28, 2011

इतराने को कुछ नहीं है हमारे पास


आंकड़े फिर से छलने के लिए आ गए हैं। फिजा को अनुकूल बनाने का हर उपाय आजमाया जा रहा है। जी, हां! पीपीपी यानी पर्चेजिंग पॉवर पैरिटी के आधार पर भारत दुनिया की शीघ्र ही तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है। इंटरनेशनल मॉनीटरिंग फंड यानी आइएमएपफ का आकलन है कि भारत जापान को पछाड़कर इस साल दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का खिताब खुद हासिल कर सकता है। जापान अभी दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। पहले और दूसरे स्थान पर क्रमश: अमेरिका और चीन का कब्जा है। कहने-सुनने में यह अच्छा लगता है। रोमांच भी महसूस होता है, लेकिन सोचने और एहसास करने की बात है कि भारत में एक तरफ जहां इतने बड़े पैमाने पर पर्चेजिंग पॉवर है कि वह जापान जैसे देश को पछाड़ने की कगार पर खड़ा है, वहीं दूसरी ओर विडंबना यह है कि भारत दुनिया के सबसे ज्यादा गरीब लोगों का निवास स्थान है। भारत में 40 करोड़ से ज्यादा लोग सरकारी पैमाने के हिसाब से ही गरीबी रेखा के नीचे हैं। क्या उनका जीडीपी से कोई रिश्ता नहीं होना चाहिए? अगर सकल घरेलू उत्पाद का मतलब सिर्फ देश के एक तबके का उत्पाद है यानी सकल घरेलू उत्पाद पर अगर एक तब्के का ही कब्जा है तो फिर इसे देश का सकल घरेलू उत्पाद क्यों कहते हैं? इसे क्यों नहीं ईमानदारी से कुछ भारतीयों का घरेलू उत्पाद कहते हैं। लोकतंत्र के कुछ पाखंड बहुत भयावह होते हैं। लोकतंत्र मर्यादा और लिहाज के नाम पर गेहूं के साथ घुन के पीस जाने को ज्यादती नहीं, मूल्य बताता है। यह खतरनाक है। बहरहाल, जो आइएमएफ का आकलन है, वह 2010 के आंकड़ों के आधार पर है, जिनके मुताबिक पिछले साल जापान की अर्थव्यवस्था 4.31 लाख करोड़ डॉलर की थी, जबकि भारत की अर्थव्यवस्था इसी दौरान 4.06 लाख करोड़ की थी। अब चूंकि इसी साल मार्च में जापान पर जबरदस्त सूनामी की मार पड़ी है, इसलिए विशेषज्ञों का आकलन है कि मोर्चे से अब जापान लगभग बाहर हो चुका है और नहीं हुआ तो हो जाएगा। दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के मुताबिक 2012 में भारतीय अर्थव्यवस्था के 7-8 फीसदी की दर से विकास की उम्मीद है। जब पूरे यूरोप की अर्थव्यवस्थाएं औसतन 2.5 की विकासदर से भी कुछ नीचे हों और अमेरिका एक ऐसे मोड़ पर आ खड़ा हुआ हो, जहां हर पल विकास के ठप होने की तलवार लटक रही हो, वहां भारत की अर्थव्यवस्था की यह गतिशीलता रोमांचित तो करती ही है, भारतीय होने के नाते गर्व भी दिलाती है। लेकिन सवाल है कि एक तरफ जहां भारतीय अर्थव्यवस्था आसमान चूमने की ओर बढ़ रही है, ठीक उसी समय बड़ी तादाद में गरीब भारतीय पाताल की तरफ क्यों धंसे जा रहे हैं? यह विचित्र विरोधभास है कि दुनिया एक पैमाने पर तो हमें अमेरिका, जापान और चीन के बराबर खड़ा करती है तो दूसरी तरफ हमारा शुमार अंगोला, हैती जैसे देशों में होता है। यह विडंबना नहीं तो और क्या है? इसका साफ मतलब है कि भारत में लोकतंत्र का भले नाम हो, लेकिन यहां भी विकास एक खास तबका का ही हो रहा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के पूर्वानुमानों में भारत को चमकते सूरज के देश की संज्ञा दी गई है और उगते सूरज के देश पर हमारा वर्चस्व होगा, इसका अनुमान व्यक्त किया गया है। लेकिन यह अनुमान इस हकीकत पर नजर क्यों नहीं घुमाता कि चमकते सूरज के देश में एक बहुत बड़ी आबादी अंधकार के कुंए में क्यों धंसी जा रही है? क्या उसे रोशनी पसंद नहीं? क्या उसे चमकने में कोई रुचि नहीं? नहीं, ऐसा नहीं है। दरअसल, लोकतंत्र की ढाल ने मलाईदार तबके को यह सहूलियत और विशिष्टता दे दी है कि दूसरों के लिए मलाई में हिस्सेदारी का कोई विधान ही नहीं बन रहा। हम इसीलिए हंसी का पात्र भी बन रहे हैं कि एक तरफ तो हमसे दुनिया के बड़े से बड़े देश डर रहे हैं। हमारी अर्थव्यवस्था का आकार उनमें दहशत भर रहा है। दूसरी तरफ हमारी यह भारी-भरकम अर्थव्यवस्था अपने ही कुछ लोगों को बिल्कुल अनदेखा कर रही है। सिर्फ अनदेखा ही नहीं कर रही, बल्कि मौका पड़ने पर उनके ऊपर गिरकर अपने वजन से उनकी जान भी लेने पर उतारू है। समझ में नहीं आ रहा है कि जीडीपी के बढ़ने पर खुश हों या महंगाई के बढ़ने पर मातम मनाएं? भारत भले दुनिया के चुनिंदा देशों में अपनी हैसियत दर्शाने के लायक हो गया हो, लेकिन जब तक देश के बहुसंख्यक लोग इस स्थिति में नहीं पहंुच जाएंगे कि उन्हें भी फील गुड का एहसास हो, तब तक यह बिल्कुल बेकार की उपलब्धि होगी। जब तक जीडीपी का मतलब देश नहीं होगा, तब तक भारत की इस कामयाबी से सारे भारतीयों का दिल भी नहीं धड़केगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

Tuesday, September 27, 2011

घट रही गरीबों की संख्या


योजना आयोग के सदस्य अरुण मैड़ा का दावा
शहरी गरीबी रेखा को 32 रुपए प्रति व्यक्ति खपत के आधार पर निर्धारित करने के लिए आलोचना के शिकार योजना आयोग ने सोमवार को कहा कि देश में गरीबों की संख्या कम हो रही है। योजना आयोग के सदस्य अरुण मैड़ा ने आज एसोचैम के समारोह में कहा कि आज गरीबों की संख्या कम हो रही है, चाहे आप (आंकने के लिए) तेंदुलकर पद्धति को अपनाएं या फिर इससे पूर्व अपनाई जाने वाली पद्धति को। यह बयान योजनाआयोग के हाल में तेंदुलकर पद्धति से आंकी गई गरीबी रेखा पर मचे हंगामे के बाद आया है। इस आकलन में कैलोरी के अलावा स्वास्थ्य और शिक्षा को भी ध्यान में रखा गया है। सर्वोच्च न्यायालय में दायर एक हलफनामे में योजना आयोग ने कहा कि शहरी इलाकों में 32 रुपए प्रति दिन की खपत करने वाले को गरीब माना जाएगा। ग्रामीण इलाकों में यह सीमा 26 रुपए प्रति दिन तय की गई है। मैड़ा ने कहा, ‘‘तेंदुलकर समिति को इसके आकलन के लिए पद्धति सुझाने के लिए कहा गया था कि सरकारी कार्यक्र मों से हालात सुधर रहे हैं या नहीं।उन्होंने कहा कि गरीब सापेक्ष अवधारणा है और आज की गरीबी की तुलना पिछले दिनों से करना गलत होगा। उन्होंने कहा, ‘मेरा मानना है कि जो व्यक्ति आज 15,000 रुपए प्रति माह कमाता है वह गरीब है। गरीबी बेहद सापेक्ष चीज है। इसलिए देश में क्या हो रहा है गरीबी का स्तर भी इसी के आधार पर परिभाषित किया जाता है।तेंदुलकर समिति की पद्धति के आधार पर योजना आयोग के आकलन के मुताबिक एक मार्च 2005 को 40.74 करोड़ लोग गरीब थे और 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत की जनसंख्या 1.21 अरब हैं।

परिभाषा नहीं, गरीबी का मजाक


सरकार ने गरीबी की नई परिभाषा तय की है। योजना आयोग की माने तो देश के शहरी इलाकों में खाने पर 32 रुपये व ग्रामीण इलाकों में 26 रुपये रोज खर्च करने वाला व्यक्ति गरीब नहीं कहलाएगा। भले इतनी राशि में एक वक्त का खाना न आता हो लेकिन योजना आयोग की नजर में इतने रुपये गरीबी दूर करने के लिए काफी हैं। आयोग ने यह बताने की कोशिश की है कि शहरों हरेक महीने 965 रुपये और गांवों में 781 रुपये खर्च करने वाला व्यक्ति सरकार की नजर में गरीब नहीं है। प्रधानमंत्री के दस्तखत वाले योजना आयोग के इस हलफनामे पर सर्वोच्च न्यायालय 11 अक्टूबर को विचार करेगा। इस अजीबोगरीब आंकड़े को पेश करके योजना आयोग यह बताने की फिराक में है कि इस तरह के लोग बीपीएल कार्ड के दायरे में आने के हकदार नहीं हैं। दरअसल, गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों को जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ मिलता है। वर्तमान में 12 योजनाएं ऐसी हैं, जो बीपीएल को ध्यान में रखकर संचालित की जा रही हैं जबकि नौ कार्यक्रम उनके हितों की रक्षा के लिए संचालित हो रहे हैं। योजना आयोग गरीबी की नई परिभाषा देते समय यह भूल गया कि वि बैंक भी रोजाना एक डॉलर से कम खर्च करने वाले व्यक्ति को गरीबी रेखा से नीचे मानता है। फिर योजना आयोग का यह नया फामरूला कहां तक तर्कसंगत है? आयोग के इस हलफनामे पर पूरे देश में रोष है। विपक्ष ने भी सरकार पर हमला बोल दिया है तो कुछ मंत्री ने इस नये फामरूले पर आपत्ति जताई है। सरकार से बस एक ही सवाल है कि महंगाई के दौर में 26 रुपये में क्या मिलेगा? आज तो 1 किलो टोंड दूध का भी दाम बाजार में 27 रुपये है। इस राशि से 2 लीटर बोतल बंद पानी भी नहीं मिलता है। उसके लिए भी 30 रुपये चाहिए। आयोग ने गरीबी रेखा पर नया क्राइटीरिया सुझाते हुए कहा है कि गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले एक ग्रामीण को 26 रुपये और शहरी गरीब को 32 रुपये में 1776 कैलोरी मिल सकती है। आयोग की दलील है कि वि स्वास्थ्य संगठन ने भी एक व्यक्ति के लिए 1776 कैलोरी ही पर्याप्त मानी है। आयोग का कहना है कि दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और चेन्नई में चार सदस्यों वाला परिवार यदि महीने में 3866 रुपये खर्च करता है तो वह गरीब नहीं कहा जा सकता। आयोग ने गरीबी की यह नई परिभाषा 2010-11 के इंडस्ट्रियल वर्कर्स के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक और तेंदुलकर कमेटी की रिपार्ट के आधार पर तैयार की गई है। हालांकि हलफनामे के अंत में कहा गया है कि गरीबी रेखा पर अंतिम रिपोर्ट एनएसएसओ सव्रेक्षण 2011-12 के बाद पेश की जाएगी। इसमें हास्यास्पद यह है कि शहरी और ग्रामीण गरीबी का यह निर्धारण 2004-05 की कीमतों के आधार पर किया गया है, जबकि आज कीमतें तब के मुकाबले लगभग दोगुनी-तिगुनी हो गई है। सरकारी बाबुओं की तनख्वाहों और भत्तों में कई बार बढ़ोतरी हुई है, संगठित और निजी क्षेत्र की भी आय में इजाफा होता गया है। सांसदों और विधायकों के वेतन-भत्ते कई गुने बढ़े हैं लेकिन गरीबों की बेहतरी के बारे में सोचने के बजाए आंकड़ों में उनकी संख्या जहां तक हो सके घटा कर दिखाने की कोशिश हो रही है। दरअसल, योजना द्वारा बनाई गई गरीबी मापने की यह कसौटी देश के गरीबों के साथ शर्मनाक मजाक है। यही वजह है कि श्रीमती सोनिया गांधी की एनएसी के सदस्य इस कसौटी को लेकर आग बबूला है। एनएसजी सदस्यों का आरोप है कि योजना आयोग वास्तविकता से दूर सोच रहा है। आज की महंगाई में 32 रुपये में आता ही क्या है? यदि 32 रुपए को आधार बनाया गया तो मुट्ठी भर लोग ही बीपीएल की श्रेणी में आएंगे। समाज का बड़ा गरीब तबका लाभ लेने से वंचित रह जायेगा। राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की सदस्य अरुणा राय ने योजना आयोग की आलोचना करते हुए कहा कि सरकार इस आकलन से गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों की संख्या अवास्ताविक रूप से कम करना चाहती है ताकि गरीबों पर सरकारी खर्च कम किया जा सके। आखिर हमारे योजनाकार गरीबी की असली तस्वीर पर पर्दा क्यों डालना चाहते हैं? इसलिए कि वे ऐसा करके मौजूदा आर्थिक नीतियों की सार्थकता साबित करना और सरकार पर सब्सिडी का बोझ घटना चाहते हैं। वित्त मंत्रालय भी मानता है कि 35 करोड़ से ज्यादा लोगों को 2 रुपये प्रति किलो की दर से गेहूं और 3 रुपये प्रति किलो की दर से चावल दिया गया तो सरकार की मुश्किलें बढ़ जाएंगी। इसलिए गरीबों की संख्या सीमित करने की कोशिश हो रही है ताकि सरकार पर अधिक बोझ न पड़े। आजादी के छह दशक से यह बहस का विषय बना हुआ है कि गरीबी की परिभाषा क्या है? गरीबों की वास्तविक संख्या कुल कितनी है? बहरहाल, आज देश के सामने गरीबी के कई आंकड़े हैं, जिसे लेकर केंद्र हमेशा से भ्रम की स्थितियां पैदा करता रहा है। गरीबी मापने की जो सरकारी पद्धति है, उसे तमाम अर्थशास्त्री नकारते रहे हैं। दरअसल, सरकार में बैठे योजनाकारों ने गरीबी मापने का जो पैमाना तय किया है, वह गरीबी को छिपाने का काम करता है। इसलिए ही गरीबी की परिभाषा पर योजना आयोग और एनएसी के बीच मतभेद बना रहा है। 2004- 05 में योजना आयोग ने बताया था कि देश में 27.5 फीसद लोग गरीब हैं। 2009 में सुरेश तेंदुलकर समिति ने इसे खारिज करते हुए बताया कि 37 फीसद भारतीय गरीब हैं। उसी दौरान, अजरुन सेनगुप्त समिति ने अपनी रिपोर्ट में कुल आबादी के 77 फीसद हिस्से के गरीबी होने का अनुमान पेश किया था जबकि एन.सी सक्सेना की अध्यक्षता वाली समिति ने आधी यानी 50 फीसद आबादी को गरीब माना। अब योजना आयोग ने गरीबी की जो परिभाषा दी है, वह सचमुच हैरान करने वाली है। बेशक, आज अंतराष्ट्रीय स्तर पर भारत का रुतबा है। इस साल अमेरिका की नेशनल इंटेलिजेंस कौंसिल (एनआईसी) और यूरोपीय संघ की संस्था ईयूआईएसएस ने कहा है कि भारत अमेरिका और चीन के बाद वि का सबसे शक्तिशाली राष्ट्र है लेकिन दुनिया के सबसे भूखे और कुपोषणग्रस्त लोग भारत में ही रहते हैं। अत्यधिक भुखमरी के शिकार हर पांचवां व्यक्ति भारतीय है। वही अंतराष्ट्रीय खाद्य नीति शोध संस्थान द्वारा जारी वैिक भुखमरी सूचकांक में भूख से लड़ रहे 84 देशों की सूची में चीन व पाकिस्तान से भी नीचे भारत का 67वां स्थान है। चीन नौंवे और पाकिस्तान 52वें स्थान पर है। इतना ही नहीं, भारत को कुपोषण और भरण-पोषण के मामले में महिलाओं की खराब स्थिति के चलते ही काफी नीचे स्थान मिला है। ऐसे में योजना आयोग की गरीबी की यह नई परिभाषा समझ से परे है। इसलिए सरकार और योजना आयोग को कृत्रिम आंकड़े गढ़ने के बजाए हकीकत स्वीकार करनी चाहिए। गरीबी की इस अजीबोगरीब परिभाषा का असली मकसद मौजूदा आर्थिक नीतियों की सार्थकता साबित करना और बीपीएल योजनाओं में सरकारी खर्च घटाना है। इसलिए गरीबों की संख्या सीमित करने की कोशिश हो रही है। वित्त मंत्रालय मानता है कि 35 करोड़ से ज्यादा लोगों को 2 रुपये किलो गेहूं और 3 रुपये किलो चावल देने से सरकार की मुश्किलें बढ़ जाएंगी

बेसहारा बच्चों को संभालने के लिए बनी योजना


योजना के लिए 14 करोड़ रुपए का प्रस्ताव केंद्र को भेजा नशेड़ी, एचआईवी पीड़ित, विकलांग, बेसहारा व भिखारी बच्चों के विकास के लिए चलाया जाएगा सघन अभियान
दिल्ली सरकार के महिला एवं बाल विकास विभाग ने बेसहारा बच्चों के लिए एक बृहद योजना बनाई है। जिसे क्रियान्वित कराने के लिए केंद्र सरकार के पास 13 करोड़ 80 लाख 40 हजार रुपए का प्रस्ताव भेजा गया है। आर्थिक सहयोग के लिए स्वयंसेवी संस्थाओं से भी मदद की अपेक्षा की गई है। दिल्ली महिला एवं बाल विकास विभाग ने इस साल समन्वित बाल संरक्षण परियोजना का दायरा बढ़ा दिया है। बेसहारा बच्चों के लिए 25 नए शेल्टर होम खोलने का प्रस्ताव है। जिला स्तर पर बाल संरक्षण समिति का गठन किया जाएगा। अक्टूबर से स्टेटEOFप्शन रिसोर्स एजेंसी को संचालित करने की योजना है। साथ ही समन्वित बाल संरक्षण परियोजना के लिए 21 चिल्ड्रन होम, 3 आव्जव्रेशन होम, 1 प्लेस ऑफ सेफ्टी, एक स्पेशल होम, 6 चाइल्ड वेलफेयर कमेटी, 3 ज्यूनियाल जस्टिस बोर्ड, 5 शेल्टर होम (एनजीओ द्वारा संचालित), 51 एनजीओ और 11EOFप्शन एजेंसी का सहयोग लिया जाएगा। जिसके लिए अधिक धन की जरूरत महसूस की जा रही है। गौरतलब है कि दिल्ली महिला एवं बाल विकास विभाग ने केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को 27 जुलाई को वित्तीय सहायता की मंजूरी के लिए एक प्रस्ताव बनाकर भेज दिया है। कुल 13 करोड़ 80 लाख 40 हजार रुपए के प्रस्ताव में केंद्र सरकार की हिस्सेदारी 10 करोड़ 49 लाख 35 हजार और राज्य सरकार की हिस्सेदारी 3 करोड़ 7 लाख 77 हजार रुपए, जबकि गैर सरकारी संस्थाओं से 23 लाख 27 हजार रुपए की आर्थिक सहयोग की अपेक्षा की गई है। प्रस्ताव मंजूर होने के बाद बाल मजदूर, नशेड़ी बच्चे, एचआईवी से पीड़ित गरीब बच्चे, भीख मांगने वाले बच्चे व विकलांग बच्चों के लिए विशेष कार्यक्रम चलाए जाने की योजना है। बताते चलें कि केंद्र सरकार ने समन्वित बाल संरक्षण परियोजना के लिए पिछले साल दिल्ली महिला एवं बाल विकास विभाग को 2 करोड़ 14 लाख 79 हजार रुपए और राज्य सरकार ने मात्र 20 लाख रुपए दिए। महिला एवं बाल विकास विभाग ने केंद्र सरकार द्वारा आवंटित धन राशि में से एक करोड़ 44 लाख 16 हजार रुपए और राज्य सरकार द्वारा आवंटित धन राशि में से 15 लाख 28 हजार रुपए खर्च किए। इसप्रकार 75 लाख 35 हजार रुपए खर्च नहीं हो पाए। बताया जाता है कि गत वित्तीय वर्ष में काम करने का अवसर मात्र आठ महीने ही मिला।