Saturday, April 23, 2011

पानी पर नहीं मनमानी


नदियां हमारे जीवन से किस तरह जुड़ी हैं, इसका इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा कि पूरी दुनिया में सभ्यता और संस्कृति ने पहली किलकारी इन्हीं के सान्निध्य में भरी। जिस पानी का मानवीय जीवन और विकास से इतना नजदीकी रिश्ता रहा हो, उसके प्रति उसकी भावनाएं कभी क्रूर या लालची नहीं हो सकती। पानी का संग्रहण और उपभोग की ऐसी ही परंपराओं ने नदियों और दूसरे जल स्रेतों को अब तक बनाए और बचाए रखा है। पर अब स्थितियां पलट रही हैं। पानी उपभोग और बाजार की वस्तु हो गई है। विकास की नई सनक और समझ ने इनके अस्तित्व को ही खतरे में डाल दिया है। बाजार की ताकतों के साथ सरकार भी उसी दिशा में चल रही है। इस चिंता को पिछले दो-ढाई दशकों में कई स्तरों पर रेखांकित किया गया है। बहरहाल, केंद्र सरकार नदियों के जीवन के खिलाफ नहीं, ऐसा मानने और जताने के लिए उसे मजबूर होना पड़ा है। कम से कम एक नदी यमुना की सफाई और उसकी धारा को अविरल बनाए रखने की मांग आखिरकार वह मान गई है। कहने को यह राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर चले एक और अनशन का सुफल रहा। पर यह अनशन पिछले दिनों हुए समाजसेवी अन्ना हजारे के अनशन से कई मामलों में भिन्न था। इसमें मांग और अनशनकारी दोनों सामान्य और एक तरफ से अनाम थे और यही कारण रहा कि इस सामान्य और सादगीपूर्ण अनशन को न मीडिया ने पूछा और न ग्लैमर दुनिया के नामचीनों को यहां आने या उनकी मांग से जुड़ने का कोई कारण नजर आया। वैसे अगर ऐसा नहीं हुआ तो यह एक तरह से गनीमत की बात है, नहीं तो यह अनशन भी 'आयोजन' और उससे जुड़ी मांगें बस तात्कालिक आवेग भर बनकर रह जाते। यह अपने आप में कितनी विलक्षण और महत्व की बात है कि एक तरफ जहां इस देश की जनता शासन और उसके तंत्र के पोर-पोर तक पहुंच चुकी बेईमानी और भ्रष्टाचार से तंग आ गई है, उसके बावजूद अब भी विरोध के अहिंसक तरीके न सिर्फ प्रचलन में हैं बल्कि उसके प्रति लोग आस्थावान भी हैं। यमुना की पुनीत और जीवनदायिनी धारा को अतीत होते जो नहीं देख सके और राजधानी पहुंचकर अनशन करने के लिए बाध्य हुए, उसमें साधु-संत और आम किसान शामिल थे। उनकी मांगें पहले दिन से ही वाजिब और जरूरी थीं पर सरकार को उन्हें मानने में सात दिन लगे। जो फैसला हुआ है उसमें न सिर्फ दो बैराजों से पर्याप्त मात्रा में इस नदी में पानी छोड़ा जाएगा बल्कि इस पर नजर रखने के लिए एक समिति भी गठित की गई है, जिसमें पांच लोग सरकार के और तीन यमुना बचाओ आंदोलन के होंगे। दिलचस्प है कि इस फैसले के बाद अनशन तो टूट गया है पर धरना जारी है। इसके पीछे वजह है जनता के शासकों पर जनता का भरोसा नहीं होना। अनशन के बाद अब धरने पर बैठे लोगों ने कहा है कि जब तक वह कम से कम वृंदावन-मथुरा तक जल का समुचित प्रवाह नहीं देख लेते वे दिल्ली से नहीं लौटेंगे। उम्मीद करनी चाहिए कि सरकार भरोसे पर खरी उतरेगी और युमना को बचाने के लिए आंदोलन करने वालों की आशंका निमरूल साबित होगी। ऐसा हुआतो यह अहिंसक लड़ाई की ही एक और जीत नहीं होगी बल्कि अहिंसक मूल्यों वाली जीवनशैली का विस्तार भी इससे संभव हो सकेगा।

No comments:

Post a Comment