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Monday, April 23, 2012

निर्यात बढ़ाने के लिए कैसी हो नीति


इन दिनों देश की नई विदेश व्यापार नीति को अंतिम रूप दिया जा रहा है। नए परिदृश्य में निर्यातकों द्वारा नई विदेश व्यापार नीति में निर्यात बढ़ाने के लिए नए प्रोत्साहन, सुविधा, सहूलियतें और सरलता की अपेक्षाएं की जा रही हैं। पिछले वित्त वर्ष में निर्यात के लिए तय 300 अरब डॉलर के लक्ष्य के नतीजे अपेक्षा के अनुकूल नहीं हैं। आगामी वित्त वर्ष भारतीय निर्यातकों के लिए अपेक्षाकृत अधिक चुनौती भरा होगा। इसलिए वर्ष 2013-14 तक निर्यात को 500 अरब डॉलर के निर्धारित लक्ष्य तक ले जाने में भी भारी कठिनाइयां होंगी। निर्यात घटने और आयात बढ़ने के कारण विदेश व्यापार घाटा लगातार बढ़ रहा है। वस्तुत: वर्ष 2010-11 में भारत का विदेश व्यापार घाटा 132 अरब डॉलर के स्तर पर था जिसके वर्ष 2011-12 के दौरान 170 अरब डॉलर तक पहुंचने के संकेत हैं। घाटे के तेजी से बढ़ने का मुख्य कारण बढ़ते हुए आयात और घटते हुए निर्यात हैं। देश की आगे बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था के साथ आयात बढ़ रही है। देश में जिस तेजी से तेल का आयात बढ़ा है उससे तेल का आयात बिल चिंताजनक संकेत दे रहा है। भारत में कुल तेल की खपत का तीन चौथाई हिस्सा आयात होता है। यह लगातार बढ़ता जा रहा है। तेल के अलावा दूसरी चीजों के आयात में भी तेजी दर्ज की गई है। भारत का निर्यात घटने के पीछे अमेरिका और यूरोपीय देशों की आर्थिक बदहाली सबसे प्रमुख कारण है। यूरो जोन अर्थव्यवस्थाओं में खतरे से भारतीय निर्यात प्रभावित हुआ है। भारत के कुल निर्यात का लगभग 35 प्रतिशत अमेरिका और यूरोप के बाजार में पहुंचता है। इन देशों में भारतीय निर्यात के जो क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं उनमें जेम्स ऐंड ज्वैलरी, लेदर, टेक्सटाइल, आइटी, फार्मा और कुछ अन्य सेवा क्षेत्र शामिल हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि देश के वाणिज्य मंत्रालय ने कई ऐसे कदम उठाए हैं जिससे निर्यात क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद बंधी है। देश की ऑटोमोबाइल, फार्मास्यूटिकल्स, इलेक्ट्रॉनिक, केमिकल, इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी, ग्रीन टेक्नोलॉजी, लेदर, टेक्सटाइल और दूसरे अन्य क्षेत्रों के निर्यात को बढ़ाने के लिए नई पहल की गई है। निर्यात बढ़ाने के लिए ढुलाई लागत कम करने पर भी ध्यान दिया गया है। कई देशों में नया निर्यात बाजार खोजने की कवायद है। इन सबके बावजूद निर्यात की राह में कई मुश्किलें हैं। महंगे ब्याज, मांग में कमी, उत्पादन लागत और मजदूरी में बढ़ोतरी की वजह से भारतीय निर्यात क्षेत्र को वैश्विक बाजार में कड़े मुकाबले का सामना करना पड़ रहा है। देश के निर्यातक अपेक्षा कर रहे हैं कि नई विदेश व्यापार नीति में भारतीय निर्यात को वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी बनाने की रणनीति पर विचार हो। सरकार द्वारा परंपरागत पश्चिमी बाजारों की कमजोरी को देखते हुए निर्यात के नए और वैकल्पिक बाजार खोजने की तलाश में आगे बढ़ना होगा। आसियान देशों में निर्यात बढ़ाने के नए प्रयास करने होंगे। चीन में भी भारतीय निर्यात की नई संभावनाएं तलाशनी होंगी। माना जा रहा है कि भारत-आसियान मुक्त व्यापार समझौता यानी एफटीए के लागू होने के बाद भारतीय उद्योगों के लिए असीम अवसर पैदा हुए हैं। भारत आसियान देशों में निर्यात बढ़ा सकता है। इसी तरह खाड़ी देशों में भारत की निर्यात संभावनाएं उभरकर सामने आ रही हैं। लैटिन अमेरिकी देशों के साथ व्यापारिक संभावनाओं को खंगालने की नई पहल तेजी से आगे बढ़ाई जानी चाहिए। लैटिन अमेरिका के चिली, कोलंबिया, कोस्टारिका, डोमिनिकन रिपब्लिक, पनामा, पेरू और त्रिनिदाद व टोबैगो के साथ भारत का कारोबार तेजी से बढ़ सकता है। लैटिन अमेरिकी देशों में भारतीय निर्यातकों के लिए फार्मा, आर्गेनिक केमिकल, ऑटो पा‌र्ट्स, पेट्रोलियम उत्पाद व टेक्सटाइल क्षेत्र में काफी संभावनाएं हैं। अफ्रीकी देशों में भारत के निर्यात को बढ़ावा देने के प्रयास बढ़ाने होंगे। पड़ोसी देशों पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका, भूटान, थाईलैंड और नेपाल के साथ निर्यात बढ़ाने की नई कोशिशें जरूरी होंगी। भारतीय निर्यातक ब्रिक्स देशों के साथ कारोबार करने की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। ऐसे में मार्च 2012 के अंतिम सप्ताह में नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स के चौथे शिखर सम्मेलन के दौरान स्थानीय मुद्रा में कारोबार करने के फैसले से काफी मदद मिलेगी। बढ़ती निर्यात चिंताओं के बीच देश के निर्यातकों का मानना है कि नई विदेश व्यापार नीति में उनकी मदद के लिए सरकार द्वारा कुछ जोरदार कदम उठाए जाने चाहिए। भारतीय निर्यात को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में बनाए रखने के लिए निर्यातकों को कम ब्याज दर पर धन उपलब्ध कराया जाना चाहिए। वस्तुत: यह दर चीन सहित दुनिया के अन्य देशों की तुलना में बहुत अधिक है। इसके साथ ही सरकार के द्वारा निर्यातक इकाइयों को सस्ती और सुगम बिजली उपलब्ध करानी होगी। देश की निर्यातक इकाइयों में बुनियादी ढांचे की कमी हमेशा कष्ट देती है। भारत के इन्फ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में निवेश की कमी रही है, लेकिन एक-दो साल से नीतिगत मोर्चे पर फैसले न ले पाने की दिक्कतों से भी निवेश में कमी आई हैं। बिजली, परिवहन और ब्रॉडबैंड सहित हमारे बुनियादी विकास में जो बाधाएं सामने आ रही है उनसे निपटने के लिए हमें चीन की निर्यात नीति पर ध्यान देना चाहिए। चीन ने 1990 के दशक में ही इन्फ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में एक लाख बीस हजार करोड़ डॉलर के निवेश का लक्ष्य निर्धारित कर दिया था, जबकि भारत अब जाकर एक लाख करोड़ डॉलर खर्च करने की योजना बना रहा है। चीन में हर साल इन्फ्रास्ट्रक्चर पर 25 फीसदी खर्च बढ़ाया जाता रहा है, लेकिन भारत में इन्फ्रास्ट्रक्चर फाइनेंसिंग क्षेत्र में भारी दिक्कतें हैं। नई विदेश व्यापार नीति को अंतिम रूप देते समय इस बात पर भी ध्यान देना होगा कि वर्ष 2008 की मंदी से भी अधिक चिंताजनक 2012 की वैश्विक मंदी हो सकती है। इसके दुष्परिणामों से निर्यात तथा उद्योग-कारोबार को बचाने के लिए जिस तरह अमेरिकी और यूरोपीय बैंक सस्ती ब्याज दरों की बौछारें कर रहे हैं वैसी अपेक्षाएं भारतीय उद्योग जगत को भी है। भारत में भी निर्यात ब्याज दर घटाना होगा और निर्यातकों को करों में रियायतें देनी होंगी। मुद्रा परिवर्तनीयता पर लगने वाले सेवा कर को समाप्त करने के साथ-साथ विदेशों से मंगाई जाने वाली मशीनरी टैक्स को भी खत्म किया जाना चाहिए। ऐसे भी प्रावधान किए जाने चाहिए जिससे निर्यातकों को कई प्रकार की कठिन प्रक्रिया अपनानेसे छूट मिले। इन सबके साथ-साथ नई विदेश व्यापार नीति में मार्केट स्कीम व प्रोडक्ट स्कीम से निर्यातकों को लाभान्वित करना चाहिए। निर्यात के ऊंचे लक्ष्य को पाने के लिए नई विदेश व्यापार नीति को ऐसे प्रावधानों से सुसज्जित करना होगाा जिससे निर्यात में दुनिया के अन्य देशों से मिल रही कड़ी प्रतिस्पर्धा का मुकाबला करने के लिए भारतीय निर्यातक खड़े हो सकें और गुणवत्तापूर्ण उत्पादक के रूप में अपनी अलग पहचान बनाते हुए देश के निर्यात लक्ष्यों को हासिल कर सकें। (लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं)

निर्यात बढ़ाने के लिए कैसी हो नीति


इन दिनों देश की नई विदेश व्यापार नीति को अंतिम रूप दिया जा रहा है। नए परिदृश्य में निर्यातकों द्वारा नई विदेश व्यापार नीति में निर्यात बढ़ाने के लिए नए प्रोत्साहन, सुविधा, सहूलियतें और सरलता की अपेक्षाएं की जा रही हैं। पिछले वित्त वर्ष में निर्यात के लिए तय 300 अरब डॉलर के लक्ष्य के नतीजे अपेक्षा के अनुकूल नहीं हैं। आगामी वित्त वर्ष भारतीय निर्यातकों के लिए अपेक्षाकृत अधिक चुनौती भरा होगा। इसलिए वर्ष 2013-14 तक निर्यात को 500 अरब डॉलर के निर्धारित लक्ष्य तक ले जाने में भी भारी कठिनाइयां होंगी। निर्यात घटने और आयात बढ़ने के कारण विदेश व्यापार घाटा लगातार बढ़ रहा है। वस्तुत: वर्ष 2010-11 में भारत का विदेश व्यापार घाटा 132 अरब डॉलर के स्तर पर था जिसके वर्ष 2011-12 के दौरान 170 अरब डॉलर तक पहुंचने के संकेत हैं। घाटे के तेजी से बढ़ने का मुख्य कारण बढ़ते हुए आयात और घटते हुए निर्यात हैं। देश की आगे बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था के साथ आयात बढ़ रही है। देश में जिस तेजी से तेल का आयात बढ़ा है उससे तेल का आयात बिल चिंताजनक संकेत दे रहा है। भारत में कुल तेल की खपत का तीन चौथाई हिस्सा आयात होता है। यह लगातार बढ़ता जा रहा है। तेल के अलावा दूसरी चीजों के आयात में भी तेजी दर्ज की गई है। भारत का निर्यात घटने के पीछे अमेरिका और यूरोपीय देशों की आर्थिक बदहाली सबसे प्रमुख कारण है। यूरो जोन अर्थव्यवस्थाओं में खतरे से भारतीय निर्यात प्रभावित हुआ है। भारत के कुल निर्यात का लगभग 35 प्रतिशत अमेरिका और यूरोप के बाजार में पहुंचता है। इन देशों में भारतीय निर्यात के जो क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं उनमें जेम्स ऐंड ज्वैलरी, लेदर, टेक्सटाइल, आइटी, फार्मा और कुछ अन्य सेवा क्षेत्र शामिल हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि देश के वाणिज्य मंत्रालय ने कई ऐसे कदम उठाए हैं जिससे निर्यात क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद बंधी है। देश की ऑटोमोबाइल, फार्मास्यूटिकल्स, इलेक्ट्रॉनिक, केमिकल, इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी, ग्रीन टेक्नोलॉजी, लेदर, टेक्सटाइल और दूसरे अन्य क्षेत्रों के निर्यात को बढ़ाने के लिए नई पहल की गई है। निर्यात बढ़ाने के लिए ढुलाई लागत कम करने पर भी ध्यान दिया गया है। कई देशों में नया निर्यात बाजार खोजने की कवायद है। इन सबके बावजूद निर्यात की राह में कई मुश्किलें हैं। महंगे ब्याज, मांग में कमी, उत्पादन लागत और मजदूरी में बढ़ोतरी की वजह से भारतीय निर्यात क्षेत्र को वैश्विक बाजार में कड़े मुकाबले का सामना करना पड़ रहा है। देश के निर्यातक अपेक्षा कर रहे हैं कि नई विदेश व्यापार नीति में भारतीय निर्यात को वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी बनाने की रणनीति पर विचार हो। सरकार द्वारा परंपरागत पश्चिमी बाजारों की कमजोरी को देखते हुए निर्यात के नए और वैकल्पिक बाजार खोजने की तलाश में आगे बढ़ना होगा। आसियान देशों में निर्यात बढ़ाने के नए प्रयास करने होंगे। चीन में भी भारतीय निर्यात की नई संभावनाएं तलाशनी होंगी। माना जा रहा है कि भारत-आसियान मुक्त व्यापार समझौता यानी एफटीए के लागू होने के बाद भारतीय उद्योगों के लिए असीम अवसर पैदा हुए हैं। भारत आसियान देशों में निर्यात बढ़ा सकता है। इसी तरह खाड़ी देशों में भारत की निर्यात संभावनाएं उभरकर सामने आ रही हैं। लैटिन अमेरिकी देशों के साथ व्यापारिक संभावनाओं को खंगालने की नई पहल तेजी से आगे बढ़ाई जानी चाहिए। लैटिन अमेरिका के चिली, कोलंबिया, कोस्टारिका, डोमिनिकन रिपब्लिक, पनामा, पेरू और त्रिनिदाद व टोबैगो के साथ भारत का कारोबार तेजी से बढ़ सकता है। लैटिन अमेरिकी देशों में भारतीय निर्यातकों के लिए फार्मा, आर्गेनिक केमिकल, ऑटो पा‌र्ट्स, पेट्रोलियम उत्पाद व टेक्सटाइल क्षेत्र में काफी संभावनाएं हैं। अफ्रीकी देशों में भारत के निर्यात को बढ़ावा देने के प्रयास बढ़ाने होंगे। पड़ोसी देशों पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका, भूटान, थाईलैंड और नेपाल के साथ निर्यात बढ़ाने की नई कोशिशें जरूरी होंगी। भारतीय निर्यातक ब्रिक्स देशों के साथ कारोबार करने की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। ऐसे में मार्च 2012 के अंतिम सप्ताह में नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स के चौथे शिखर सम्मेलन के दौरान स्थानीय मुद्रा में कारोबार करने के फैसले से काफी मदद मिलेगी। बढ़ती निर्यात चिंताओं के बीच देश के निर्यातकों का मानना है कि नई विदेश व्यापार नीति में उनकी मदद के लिए सरकार द्वारा कुछ जोरदार कदम उठाए जाने चाहिए। भारतीय निर्यात को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में बनाए रखने के लिए निर्यातकों को कम ब्याज दर पर धन उपलब्ध कराया जाना चाहिए। वस्तुत: यह दर चीन सहित दुनिया के अन्य देशों की तुलना में बहुत अधिक है। इसके साथ ही सरकार के द्वारा निर्यातक इकाइयों को सस्ती और सुगम बिजली उपलब्ध करानी होगी। देश की निर्यातक इकाइयों में बुनियादी ढांचे की कमी हमेशा कष्ट देती है। भारत के इन्फ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में निवेश की कमी रही है, लेकिन एक-दो साल से नीतिगत मोर्चे पर फैसले न ले पाने की दिक्कतों से भी निवेश में कमी आई हैं। बिजली, परिवहन और ब्रॉडबैंड सहित हमारे बुनियादी विकास में जो बाधाएं सामने आ रही है उनसे निपटने के लिए हमें चीन की निर्यात नीति पर ध्यान देना चाहिए। चीन ने 1990 के दशक में ही इन्फ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में एक लाख बीस हजार करोड़ डॉलर के निवेश का लक्ष्य निर्धारित कर दिया था, जबकि भारत अब जाकर एक लाख करोड़ डॉलर खर्च करने की योजना बना रहा है। चीन में हर साल इन्फ्रास्ट्रक्चर पर 25 फीसदी खर्च बढ़ाया जाता रहा है, लेकिन भारत में इन्फ्रास्ट्रक्चर फाइनेंसिंग क्षेत्र में भारी दिक्कतें हैं। नई विदेश व्यापार नीति को अंतिम रूप देते समय इस बात पर भी ध्यान देना होगा कि वर्ष 2008 की मंदी से भी अधिक चिंताजनक 2012 की वैश्विक मंदी हो सकती है। इसके दुष्परिणामों से निर्यात तथा उद्योग-कारोबार को बचाने के लिए जिस तरह अमेरिकी और यूरोपीय बैंक सस्ती ब्याज दरों की बौछारें कर रहे हैं वैसी अपेक्षाएं भारतीय उद्योग जगत को भी है। भारत में भी निर्यात ब्याज दर घटाना होगा और निर्यातकों को करों में रियायतें देनी होंगी। मुद्रा परिवर्तनीयता पर लगने वाले सेवा कर को समाप्त करने के साथ-साथ विदेशों से मंगाई जाने वाली मशीनरी टैक्स को भी खत्म किया जाना चाहिए। ऐसे भी प्रावधान किए जाने चाहिए जिससे निर्यातकों को कई प्रकार की कठिन प्रक्रिया अपनानेसे छूट मिले। इन सबके साथ-साथ नई विदेश व्यापार नीति में मार्केट स्कीम व प्रोडक्ट स्कीम से निर्यातकों को लाभान्वित करना चाहिए। निर्यात के ऊंचे लक्ष्य को पाने के लिए नई विदेश व्यापार नीति को ऐसे प्रावधानों से सुसज्जित करना होगाा जिससे निर्यात में दुनिया के अन्य देशों से मिल रही कड़ी प्रतिस्पर्धा का मुकाबला करने के लिए भारतीय निर्यातक खड़े हो सकें और गुणवत्तापूर्ण उत्पादक के रूप में अपनी अलग पहचान बनाते हुए देश के निर्यात लक्ष्यों को हासिल कर सकें। (लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं)

Wednesday, May 25, 2011

विकास के लिए चुनौती जनसंख्या


फरवरी 2011 में पूरी हुई जनगणना के आंकड़े प्रकाशित हो चुके हैं, लेकिन 19 मई को केन्द्र सरकार ने ग्रामीण और शहरी इलाकों में गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों (बीपीएल) और देश में किस जाति तथा धर्म के कितने लोग हैं, इसकी गणना कराने का भी निर्णय लिया है। यह गणना जून से शुरू होकर दिसम्बर 2011 तक संपन्न हो जाएगी। गौरतलब है कि देश में जाति आधारित अंतिम जनगणना 1931 में हुई थी। कई राजनीतिक दल जाति आधारित गणना कराने की मांग कर रहे थे। शहरी बीपीएल आबादी की गणना भी पहली बार हो रही है। इस तरह की जनगणना के बाद तस्वीर साफ हो जाएगी कि देश के ग्रामीण और शहरी इलाकों में कितने लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे हैं। बीपीएल लोगों के साथ जाति और धर्म के आधार पर गणना कराने से यह भी स्पष्ट होगा कि देश मे किस जाति और धर्म में गरीब लोगों का अनुपात क्या है। इससे उनके कल्याण की योजनाएं बनाने में आसानी होगी। उल्लेखनीय है कि देश की जनसंख्या 121 करोड़ हो गई है जो अमेरिका, इंडोनेशिया, ब्राजील, पाकिस्तान और बांग्लादेश की कुल जनसंख्या से भी ज्यादा है। देश में पिछले एक दशक में 18.1 करोड़ नई आबादी जुड़ गई है और दुनिया की कुल आबादी में भारत की हिस्सेदारी 17.5 फीसद है। जबकि पृथ्वी के धरातल का मात्र 2.4 फीसद हिस्सा ही भारत के पास है। जनसंख्या के मामले में भारत 134 करोड़ की सर्वाधिक जनसंख्या वाले चीन के करीब पहुंचता जा रहा है। अमेरिकी एजेंसी पॉपुलेशन रेफरेंस ब्यूरो के अनुसार 2050 में भारत की जनसंख्या चीन को पीछे छोड़ते हुए विश्व में सर्वाधिक 162.8 करोड़ के आसपास हो जाएगी। यद्यपि नई जनगणना में देश की जनसंख्या वृद्धि दर में कमी देखी गई है फिर भी तेजी से बढ़ती जनसंख्या देश की आर्थिक-सामाजिक समस्याओं की जननी बन विकास के लिए खतरे की घंटी बन गई है। बढ़ती जनसंख्या देश में गरीबी, कुपोषण, शहरीकरण, मलिन बस्ती फैलाव जैसी कई चुनौतियां बढ़ा रही है । बढ़ती हुई जनसंख्या से देश में गरीबी और बेरोजगारी में बहुत बढ़ोतरी हो रही है। गरीबी घटाने के सारे लक्ष्य बार-बार चौपट हो रहे हैं। चूंकि गरीब परिवारों में पैदा होने वाले बच्चों की जन्म दर मध्य व उच्च वर्ग से बहुत अधिक है और उनके पास आगे बढ़ने के संसाधन कम हैं अतएव गरीब वर्ग का प्रतिशत बढ़ता जा रहा है। विश्व बैंक ने अपने एक अध्ययन में पाया है कि भारत में 42 फीसद जनसंख्या गरीबी-रेखा से नीचे जीवन व्यतीत कर रही है। यह भी स्पष्ट है कि बढ़ती आबादी का सीधा संबंध देश में बेरोजगारी बढ़ने से है। बेशक देश में आर्थिक विकास दर नौ फीसद है, लेकिन रोजगार के अवसर उतने चमकीले नहीं हैं। यहां बेरोजगारी की दर 7.8 फीसद है। यद्यपि देश में खाद्यान्न उत्पादन बढ़ रहा है, लेकिन बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण हर उत्पादन वृद्धि आवश्यकता से कम दिखाई पड़ती है। 2000 तक हम 20 करोड़ टन अनाज का उत्पादन करते थे और 2020 तक हमें 36 करोड़ टन अनाज की आवश्यकता पड़ेगी। इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल रिलेशन का कहना है कि भारत में खाद्यान्न की उत्पादकता घटने, ग्लोबल वार्मिग बढ़ने से मानसून के धोखे की आशंका, बायोडीजल के लिए अनाज का उपयोग और मोटे अनाज के इस्तेमाल को बढ़ावा न देने के कारण 2011 के बाद देश में सभी के लिए भोजन जुटाना और कठिन हो जाएगा। संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (यूएनएफएओ) की रिपोर्ट के अनुसार भारत में आम आदमी के पास पर्याप्त खाद्यान्न न होने के कारण भूख और कुपोषण की समस्या बढ़ती जा रही है भारत में भूख और कुपोषण से प्रभावित लोगों की संख्या विश्व में सबसे अधिक 23 करोड़ 30 लाख है। बढ़ती जनसंख्या देश की आवास समस्या को बढ़ा रही है। आवास की कमी देश के करोड़ों लोगों को दिन- प्रतिदिन के जीवन में तनावग्रस्त करते हुए दिखाई दे रही है। आवास एवं शहरी गरीबी निवारण मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार देश में लगभग 2.47 करोड़ मकानों की कमी पाई गई है। राष्ट्रीय नमूना सव्रेक्षण संगठन का निष्कर्ष है कि देश की अधिकांश रिहायशी इकाइयों में बुनियादी सुविधाओं की कमी के कारण आराम व सुख की जगह परेशानी एवं तनाव की स्थितियां दिखाई देती हैं। स्थिति यह है कि शहरों में मकानों की कमी के कारण साल-दर-साल मलिन बस्तियां तेजी से बढ़ती जा रही हैं। दुनिया की सबसे अधिक मलिन बस्तियां भारत में ही हैं। शहरी भारत के लगभग चार फीसद हिस्से पर मलिन बस्तियां बनी हुई हैं। नवीनतम आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2009 में देश के कोई 400 छोटे-बड़े शहरों में रहने वाले 30 करोड़ लोगों में से छह करोड़ से अधिक लोग 52 हजार मलिन बस्तियों में रहते हैं। निसंदेह भारतीय मलिन बस्तियों में जीवन की स्थितियां बहुत विकट हैं। यहां रहने वाले लोग कदम-कदम पर अनेकानेक कठिनाइयों और बदतर हालातों के बीच नारकीय जीवनयापन के लिए विवश हैं। नई जनगणना में एक चुनौतीपूर्ण परिदृश्य यह भी उभरकर सामने आया है कि देश में लड़कियां कम पैदा हो रही हैं या वे पैदा नहीं होने दी जा रही हैं। इसी कारण स्त्री- पुरुष अनुपात गड़बड़ा रहा है। यह अनुपात 2011 की जनगणना में 914/1000 का है, जो कि 1947 के बाद से सबसे कम है। यानी महिला भ्रूण हत्या के खिलाफ जो भी कदम उठाए जा रहे हैं, वे कुछ हद तक ही कारगर सिद्ध हो रहे हैं। इसमें कोई दो मत नहीं कि देश की बेलगाम जनसंख्या वृद्धि नित नई समस्याओं को जन्म दे रही है । लेकिन देश की युवा जनसंख्या को मानव संसाधन के रूप में बदलकर आर्थिक विकास का घटक भी बनाया जा सकता है। भारत की बढ़ी हुई आबादी मानव संसाधन के परिप्रेक्ष्य में हमारे लिए आर्थिक वरदान सिद्ध हो सकती है। एक ताजा अध्ययन के मुताबिक भारत की श्रम शक्ति नई वैश्विक जरूरतों के मुताबिक तैयार हो जाए तो वह भविष्य में एक ऐसी पूंजी साबित होगी, जिसकी मांग दुनिया के हर देश में होगी। विकसित देशों और कई विकासशील देशों में 2020 तक कामकाजी जनसंख्या की भारी कमी होगी, जबकि भारत में साढ़े चार करोड़ कामकाजी जनसंख्या अतिरिक्त होगी। ऐसे में 2020 तक अमेरिका, जर्मनी, जापान, ब्रिटेन, फ्रांस, स्पेन और रूस सहित अनेक देशों में कार्यशील लोगों की कमी के कारण लाखों रोजगार के अवसर भारतीय युवाओं की मुट्ठी में होंगे। चाहे युवा जनसंख्या का विकास संबंधी चमकीला पक्ष सामने है, लेकिन युवा आबादी को मानव संसाधन के रूप में परिवर्तित करना कोई सरल काम नहीं है। देश में युवा भरपूर हैं, लेकिन साक्षर कम हैं। जो साक्षर हैं, उनमें से भी अधिकांश नई रोजगार शिक्षा से बहुत दूर हैं। भारत की ख्याति दुनिया में भले ही एक ज्ञानवान अर्थव्यवस्था जैसी बन रही हो, लेकिन असलियत में यहां शिक्षा की दशा काफी बुरी है। बढ़ती हुई जनसंख्या की दृष्टि से हम शैक्षणिक संसधानों की व्यवस्था नहीं कर पा रहे हैं। राष्ट्रीय शैक्षिक संकुल की एडवांस रिपोर्ट 2011 में कहा गया है कि अभी 81 लाख बच्चे स्कूल से बाहर हैं और 5.6 करोड़ स्कूल छोड़ चुके हैं। ऐसे में हमें जनसंख्या नियंतण्रके बारे में गंभीरता से सोचना होगा। यद्यपि भारत दुनिया का पहला देश है, जिसने अपनी जनसंख्या नीति बनाई थी, लेकिन देश की जनसंख्या वृद्धि दर आशा के अनुरूप नियंत्रित नहीं हुई है। इस समय देश के कुछ लोग राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग के उस कथन को आवश्यक मान रहे हैं जिसमें कहा गया है कि जनसंख्या नियंतण्रका मामला सिर्फ लोगों की इच्छा के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। यद्यपि हम चीन की तरह एक दम्पत्ति एक बच्चे की नीति को कठोरता से न अपनाएं, किन्तु एक बार फिर से ‘हम दो हमारे दो’ जैसे नारे को मूर्तरूप दिया जा सकता है। जरूरी है कि भारत में जन-जागरूकता के विभिन्न माध्यमों का इस्तेमाल कर नियंत्रित आबादी और छोटे परिवार के फायदे समझाए जाएं। जरूरी है कि बढ़ती जनसंख्या के कारण देश के आर्थिक-सामाजिक, परिदृश्य पर भयावह होती जा रही चुनौतियों का सामना करने के लिए हम बढ़ती हुई जनसंख्या को उपयुक्त रूप से नियंत्रित करें तथा देश को आर्थिक महाशक्ति बनाने के लिए देश की नई आबादी को मानव संसाधन के रूप में विकसित करें।



Wednesday, April 20, 2011

बढ़ती आबादी यानी खाद्य संकट


पिछले एक दशक में देश में 18.1 करोड़ नई आबादी जुड़ गई है। जहां दुनिया की कुल आबादी में भारत की हिस्सेदारी 17.5 फीसद है वहीं पृथ्वी के कुल धरातल का मात्र 2.4 फीसद हिस्सा ही उसके पास है। अमेरिकी एजेंसी पॉपुलेशन रेफरेंस ब्यूरो के अनुसार 2050 में भारत की जनसंख्या चीन को पीछे छोड़ सर्वाधिक 162.8 करोड़ के आसपास हो जाएगी। तेजी से बढ़ती जनसंख्या देश के आर्थिक- सामाजिक विकास के लिए खतरे की घंटी है। चिंताजनक है कि इस समय देश की एक तिहाई आबादी भूख के साये में आगे बढ़ रही है। बढ़ती जनसंख्या के कारण गरीबी और भूख की समस्या मिटाने के सारे लक्ष्य फेल हो रहे हैं। चूंकि गरीब परिवारों में जन्मदर मध्य व उच्च वर्ग से बहुत अधिक है और उनके पास आगे बढ़ने के संसाधन कम हैं अत: गरीब वर्ग का विस्तार होता जा रहा है। स्पष्ट है कि देश में बढ़ती जनसंख्या के हिसाब से अनाज की मांग बढ़ रही है। 2010-11 में 23.58 करोड़ टन अनाज उत्पादन हुआ है और 2020 तक देश के लिए 36 करोड़ टन अनाज की आवश्यकता पड़ेगी जिसे उत्पादित करना चुनौतीपूर्ण होगा। इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल रिलेशन के अनुसार भारत में खाद्यान्न उत्पादकता घटने, ग्लोबल वार्मिग, मानसून के धोखे, बायोडीजल के लिए अनाज का उपयोग और मोटे अनाज को बढ़ावा न देने के कारण 2011 के बाद देश में सभी के लिए भोजन जुटाना और कठिन हो जाएगा। संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (यूएनएफएओ) की रिपोर्ट के अनुसार पर्याप्त खाद्यान्न के अभाव में भारत में भूख और कुपोषण की समस्या बढ़ रही है। यहां भूख और कुपोषण से प्रभावित लोगों की संख्या विश्व में सबसे अधिक (23 करोड़ 30 लाख) है। संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन और विकसित देशों के ऑग्रेनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक ऑपरेशन एंड डेवलपमेंट के संयुक्त अध्ययन में कहा गया है कि विकसित देशों की अपेक्षा भारत जैसे विकासशील देशों में खाद्यान्न परिदृश्य पर चिंता बढ़ गई है। खाद्यान्न के लिए विश्व बाजार पर विकासशील देशों की निर्भरता में वृद्धि होगी और कीमतों में वृद्धि से जन जीवन प्रभावित होने की आशंका है। इसमें दो राय नहीं कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में अनाज की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। पिछले तीन सालों में दुनिया में खाद्य सामग्रियों के दुगुने बढ़े दामों के कारण भूखों तक अनाज नहीं पहुंच रहा है। बढ़ती जनसंख्या के कारण खाद्यान्न की मांग पूरा करने के लिए कृषि वृद्धि दर बढ़ाने की जरूरत है। आंकड़े बताते हैं कि पहली पंचवर्षीय योजना यानी 1950-51 से लेकर 2010-11 तक जीडीपी की वृद्धि दर 300 फीसद रही लेकिन कृषि क्षेत्र की सिर्फ 75 फीसद। यानी कृषि क्षेत्र में एक और हरित क्रांति की जरूरत है। इसके तहत कृषि भूमि की उत्पादकता बढ़ाने के साथ खेती में लगे प्रति व्यक्ति की उत्पादन क्षमता बढ़ाए जाने का प्रयास होना चाहिए। इसके लिए आधारभूत सुविधाएं मजबूत बनाने की जरूरत है। सबसे जरूरी है बिजली और सड़क-व्यवस्था दुरुस्त करना। साथ ही कृषि उत्पादों की सप्लाई चेन, मार्केटिंग और विपणन आदि को आधुनिक बनाया जाना जरूरी है। बढ़ती जनसंख्या के परिप्रेक्ष्य में हमें आम आदमी के लिए उसकी क्रय शक्ति के अनुरूप रोटी की उपलब्धता संबंधी चुनौतियों को ध्यान में रखना होगा। इस हेतु आजादी के बाद उत्तरी राज्यों में कृषि संबंधी शोध तथा बेहतर तकनीक के ईजाद के लिए गठित मृतप्राय हो चुकी सरकारी एक्सटेंशन एजेंसियां पुनर्जीवित करनी होंगी। किसानों तक हरित क्रांति विषयक नये शोध, वैज्ञानिक विचार और तकनीक पहुंचानी होंगी। उन तक कृषि शिक्षा, रासायनिक खाद के स्वरूप, गुण-दोष और गलत प्रयोग के खतरों से संबंधित उपयोगी जानकारियां पहुंचानी होंगी। देश की मंडियों में बहुराष्ट्रीय कंपनियों की खाद्यान्न संबंधी खुली खरीद को नियंत्रित करना होगा। किसानों को बैंकों से आसानी से कर्ज मिले। ग्रामीण क्षेत्रों में लघु सिंचाई योजनाओं को बढ़ावा दिया जाए। कुल मिलाकर बढ़ती जनसंख्या के लिए खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने के हरसंभव प्रयासों के साथ जनसंख्या नियंतण्रके बारे में भी गंभीरता से सोचना होगा।