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Wednesday, April 20, 2011
परिपक्व होता लोकतंत्र
पश्चिम बंगाल में पहले चरण के चुनाव में मतदाताओं की भीड़ उसी तर्ज पर उमड़ती दिखी जैसी कि अन्य चार राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के दौरान दिखी थी। आरंभिक अनुमान बता रहे हैं कि अस्सी फीसद से अधिक मतदाता अपने लोकतांत्रिक अधिकार का इस्तेमाल करने पहुंचे। सुबह मतदान शुरू होने के समय से ही वोटरों की लंबी लाइनें लग गई और भीड़ की वजह से कई जगहों पर देर तक मतदान का काम जारी रखना पड़ा। ऐसा सिर्फ बंगाल में ही नहीं हुआ। तमिलनाडु, केरल, असम और पुडुचेरी में भी मतदाताओं का उत्साह देखने लायक था। और तो और, जम्मू-कश्मीर में जहां लंबे अरसे बाद पंचायत चुनाव हुए हैं वहां भी मतदाताओं की ऐसी ही भीड़ उमड़ती देखी गई। यहां तो आतंकियों और अलगाववादियों के मतदान से दूर रहने के फरमान भी धरे के धरे रह गए। मतदाताओं की ऐसी उमड़ती भीड़ लोकतंत्र के भविष्य के लिए उज्ज्वल संकेत है जो बताती है कि भ्रष्टाचार और कुशासन के तमाम किस्सों के बावजूद अभी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है। इन चुनावों का एक महत्वपूर्ण पहलू इनका हिंसामुक्त रहना भी है। राजनीतिक हिंसा के लिए कुख्यात बंगाल का पहला चरण भी शांतिपूर्ण ही रहा और कमोबेश यही स्थिति अन्य जगहों की भी रही। बेशक इस सफलता का बड़ा श्रेय चुनाव आयोग के अचूक और निष्पक्ष इंतजाम को दिया जाना चाहिए लेकिन असल बधाई के पात्र तो वे करोड़ों मतदाता हैं जिन्होंने शांत मन से सत्ता हस्तांतरण की इस प्रक्रिया में अपने लोकतांत्रिक हथियार का उत्साहपूर्वक इस्तेमाल किया। अब आप समझ सकते हैं कि क्यों सारी दुनिया आश्र्चयमिश्रित प्रशंसा से भारत के लोकतंत्र की तारीफ करती है। ऐसा भी नहीं कि हमारा लोकतंत्र एक आदर्शवादी व्यवस्था का रूप धारण कर चुका हो। अभी इसमें कमियों की भरमार है। इस व्यवस्था के तहत सत्ता चलाने का अधिकार पाने वाले राजनीति तंत्र पर आज भी भ्रष्टाचार और जिम्मेदारी से भागने के कलंक लग रहे हैं। राजनेताओं, अफसरशाहों और आर्थिक अपराधियों का भ्रष्ट त्रिकोण देश को लूटने और काली कमाई को विदेश भेजने के आरोपों से दागदार हो रहा है। लेकिन, इसके साथ ही हमारी लोकतांत्रिक संस्थाएं भी धीरे-धीरे ताकतवर होती जा रही हैं। आम लोगों में अधिकारों के प्रति जागृति और भविष्य को लेकर सतर्कता बढ़ रही है। इसका साफ संकेत पिछले दिनों अन्ना हजारे के अभियान में दिखा जिसमें सारा देश आहुति देने उठ खड़ा हुआ था। इन चुनावों में मतदाताओं के ऐसे जगे उत्साह के पीछे भी इस अभियान की भूमिका निश्चित रूप से रही होगी। अब समय आ गया है कि लोकतंत्र को और परिपक्व बनाने के लिए तत्काल चुनाव सुधारों पर काम शुरू हो जाए। पहली जरूरत है कि आपराधिक तत्वों को सत्ता की सीढ़ियों के आसपास भी फटकने नहीं दिया जाए और धनबल के बूते चुनाव जीतने की प्रवृत्ति पर लगाम लगाई जाए। चुनाव जीत कर जिम्मेदारी से भागने वालों को उनके पद से हटाने का कानून बने। व्यापक चुनाव सुधारों पर ही देश के लोकतंत्र का भविष्य निर्भर है। इसमें देरी खतरनाक होगी।
बढ़ती आबादी यानी खाद्य संकट
पिछले एक दशक में देश में 18.1 करोड़ नई आबादी जुड़ गई है। जहां दुनिया की कुल आबादी में भारत की हिस्सेदारी 17.5 फीसद है वहीं पृथ्वी के कुल धरातल का मात्र 2.4 फीसद हिस्सा ही उसके पास है। अमेरिकी एजेंसी पॉपुलेशन रेफरेंस ब्यूरो के अनुसार 2050 में भारत की जनसंख्या चीन को पीछे छोड़ सर्वाधिक 162.8 करोड़ के आसपास हो जाएगी। तेजी से बढ़ती जनसंख्या देश के आर्थिक- सामाजिक विकास के लिए खतरे की घंटी है। चिंताजनक है कि इस समय देश की एक तिहाई आबादी भूख के साये में आगे बढ़ रही है। बढ़ती जनसंख्या के कारण गरीबी और भूख की समस्या मिटाने के सारे लक्ष्य फेल हो रहे हैं। चूंकि गरीब परिवारों में जन्मदर मध्य व उच्च वर्ग से बहुत अधिक है और उनके पास आगे बढ़ने के संसाधन कम हैं अत: गरीब वर्ग का विस्तार होता जा रहा है। स्पष्ट है कि देश में बढ़ती जनसंख्या के हिसाब से अनाज की मांग बढ़ रही है। 2010-11 में 23.58 करोड़ टन अनाज उत्पादन हुआ है और 2020 तक देश के लिए 36 करोड़ टन अनाज की आवश्यकता पड़ेगी जिसे उत्पादित करना चुनौतीपूर्ण होगा। इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल रिलेशन के अनुसार भारत में खाद्यान्न उत्पादकता घटने, ग्लोबल वार्मिग, मानसून के धोखे, बायोडीजल के लिए अनाज का उपयोग और मोटे अनाज को बढ़ावा न देने के कारण 2011 के बाद देश में सभी के लिए भोजन जुटाना और कठिन हो जाएगा। संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (यूएनएफएओ) की रिपोर्ट के अनुसार पर्याप्त खाद्यान्न के अभाव में भारत में भूख और कुपोषण की समस्या बढ़ रही है। यहां भूख और कुपोषण से प्रभावित लोगों की संख्या विश्व में सबसे अधिक (23 करोड़ 30 लाख) है। संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन और विकसित देशों के ऑग्रेनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक ऑपरेशन एंड डेवलपमेंट के संयुक्त अध्ययन में कहा गया है कि विकसित देशों की अपेक्षा भारत जैसे विकासशील देशों में खाद्यान्न परिदृश्य पर चिंता बढ़ गई है। खाद्यान्न के लिए विश्व बाजार पर विकासशील देशों की निर्भरता में वृद्धि होगी और कीमतों में वृद्धि से जन जीवन प्रभावित होने की आशंका है। इसमें दो राय नहीं कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में अनाज की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। पिछले तीन सालों में दुनिया में खाद्य सामग्रियों के दुगुने बढ़े दामों के कारण भूखों तक अनाज नहीं पहुंच रहा है। बढ़ती जनसंख्या के कारण खाद्यान्न की मांग पूरा करने के लिए कृषि वृद्धि दर बढ़ाने की जरूरत है। आंकड़े बताते हैं कि पहली पंचवर्षीय योजना यानी 1950-51 से लेकर 2010-11 तक जीडीपी की वृद्धि दर 300 फीसद रही लेकिन कृषि क्षेत्र की सिर्फ 75 फीसद। यानी कृषि क्षेत्र में एक और हरित क्रांति की जरूरत है। इसके तहत कृषि भूमि की उत्पादकता बढ़ाने के साथ खेती में लगे प्रति व्यक्ति की उत्पादन क्षमता बढ़ाए जाने का प्रयास होना चाहिए। इसके लिए आधारभूत सुविधाएं मजबूत बनाने की जरूरत है। सबसे जरूरी है बिजली और सड़क-व्यवस्था दुरुस्त करना। साथ ही कृषि उत्पादों की सप्लाई चेन, मार्केटिंग और विपणन आदि को आधुनिक बनाया जाना जरूरी है। बढ़ती जनसंख्या के परिप्रेक्ष्य में हमें आम आदमी के लिए उसकी क्रय शक्ति के अनुरूप रोटी की उपलब्धता संबंधी चुनौतियों को ध्यान में रखना होगा। इस हेतु आजादी के बाद उत्तरी राज्यों में कृषि संबंधी शोध तथा बेहतर तकनीक के ईजाद के लिए गठित मृतप्राय हो चुकी सरकारी एक्सटेंशन एजेंसियां पुनर्जीवित करनी होंगी। किसानों तक हरित क्रांति विषयक नये शोध, वैज्ञानिक विचार और तकनीक पहुंचानी होंगी। उन तक कृषि शिक्षा, रासायनिक खाद के स्वरूप, गुण-दोष और गलत प्रयोग के खतरों से संबंधित उपयोगी जानकारियां पहुंचानी होंगी। देश की मंडियों में बहुराष्ट्रीय कंपनियों की खाद्यान्न संबंधी खुली खरीद को नियंत्रित करना होगा। किसानों को बैंकों से आसानी से कर्ज मिले। ग्रामीण क्षेत्रों में लघु सिंचाई योजनाओं को बढ़ावा दिया जाए। कुल मिलाकर बढ़ती जनसंख्या के लिए खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने के हरसंभव प्रयासों के साथ जनसंख्या नियंतण्रके बारे में भी गंभीरता से सोचना होगा।
कठिन होगी अन्ना की लड़ाई
अन्ना हजारे की लड़ाई की शुरुआत में जो आशंकाएं थीं, वह सच साबित हो रही हैं। पहले ड्रॉफ्टिंग समिति के सदस्य शांति भूषण के विरुद्ध संपत्ति की खरीद में कम स्टांप शुल्क का मामला सामने आना और फिर एक सीडी के जरिये चार करोड़ के रिश्वत की लेन-देन की साजिश इसके प्रमाण हैं। आखिर जो लोकतंत्र ताकतवर राजनीतिज्ञों के लिए नाजायज लूट और वंशवाद का हिस्सा बन चुकी है, वह क्यों चाहेंगे कि उनकी पकड़ कमजोर पड़े। नेता, नौकरशाह और कारोबारियों का गठजोड़ आम लोगों पर न केवल भारी रहा है, बल्कि वर्तमान व्यवस्था को जस की तस बनाए रखने की कवायद भी करता रहा है। व्यवस्था में कोई परिर्वतन न हो इसलिए देश के प्रधानमंत्री रह चुके एचडी देवगौड़ा के पुत्र और कर्नाटक के पूर्व मूख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी हद दर्जे की बेशर्मी से कह देते हैं कि आज गांधी होते तो वह भी भ्रष्ट होते अथवा राजनीति से दूर चले गए होते। दूसरी तरफ कपिल सिव्बल जैसे जिम्मेवार नेता कहते हैं कि पाठशाला में प्रवेश और राशन में भ्रष्टाचार का निदान इस विधेयक से होने वाला नहीं है। इसी तर्ज पर सलमान खुर्शीद ने कह दिया कि ईश्वरीय सत्ता के बावजूद अपराध होते ही हैं। कांग्रेस प्रवक्ताओं और कई कथित कानूनविद और बुद्धिजीवी लोकपाल विधेयक के मसौदे को तैयार करने वाली संयुक्त समिति को संवैधानिक व्यवस्था का हनन मानते हुए चुनौती दे रहे हैं। छह दशक से भी ज्यादा लंबे समय से जनता की गाढ़ी कमाई से खाद- पानी लेता रहा भ्रष्ट तंत्र कतई नहीं चाहता कि भ्रष्टाचार से निपटने की कोई मजबूत और कारगर संस्था वजूद में आए। इसलिए चंद भ्रष्टाचारी यह भ्रम बनाए रखना चाहते हैं कि भ्रष्टाचार इस देश से कभी खत्म नहीं होगा। इसलिए कुछ भ्रष्टाचारी भ्रष्टाचार को बंदरिया के उस मरे हुए बच्चे की तरह सीने से चिपकाए रखना चाहते हैं जो यह मानने को तैयार नहीं होती की बच्चा मर गया है। इन कथित भ्रष्टाचारियों को यह नहीं भूलना चाहिए कि सदियों से भारत पर काबिज रहे राजे-रजवाडे़ और दो सौ साल तक हुकूमत करने वाले अंग्रेजी राज का खात्मा भी जन अंदोलनों की देन है। इसलिए लोकपाल विधेयक आने में कई मुश्किलें आ सकती हंैं। समय लग सकता हैं, लेकिन लोकपाल अब आकर रहेगा। इसे शासन-प्रशासन जैसी कोई ताकत रोक नहीं पाएगी। जन लोकपाल में कठिनाइयां आना इसलिए भी लाजिमी है, क्योंकि केंद्र सरकार के जो मंत्री संयुक्त समिति के सदस्य हैं, वे अमेरिकी पूंजीवाद के हिमायती तो हैं ही औद्योगिक घरानों के निष्ठावान अनुयायी भी हैं। कपिल सिव्बल, पी चिदंबरम, प्रणब मुखर्जी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मुखर पक्षधर हैं। कानून मंत्री वीरप्पा मोइली जरूर पृथक जनहितैषी मानसिकता के हैं। इसलिए वह भ्रष्टाचार पर शिकंजा कसने के लिए मौजूदा कानूनों में बदलाव की पैरवी भी करते रहे हैं। नागरिक समाज के पहले विधेयक के रूप में लोकपाल की नियुक्ति प्रकिया में पदेन प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता को शामिल नहीं किया गया था, किंतु नए प्रारूप में इन्हें राज्यसभा के सभापति और लोकसभा के अध्यक्ष के स्थान पर लिया गया है। प्रधानमंत्री और प्रतिपक्ष नेता पद ठेठ राजनीतिक हैं। इन्हें अपनी स्थिति बहाल रखने के लिए कई तरह के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष समझौते करने व संतुलन बिठाने होते हैं। इसलिए इनकी निष्पक्षता प्रभावित हुए बिना नहीं रहती, जबकि राज्यसभा के सभापति उपराष्ट्रपति होते हैं। जिनकी प्रतिबद्धता, संवैधानिक मान-मर्यादा से जुड़ी होती है। आमतौर से लोकसभा अध्यक्ष विपक्षी दलों में से किसी निर्वाचित संसद सदस्य को ही बनाए जाने की परिपाटी है। हालांकि अपवादस्वरूप ही सत्ता दल के संासद को इस गरिमामय पद से नवाजा जाता है। इसलिए लोकसभा अध्यक्ष से भी निर्लिप्त रहकर काम करने की अपेक्षा की जाती हैं। लोकपाल के चयन में प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता के हस्तक्षेप से सीवीसी की तर्ज पर किसी भ्रष्ट नौकरशाह को बिठा देने की आशंका हमेशा बनी रहेगाी? लोकपाल विधेयक के ठोस प्रारूप में यह बदलाव इसे सीबीआइ, केंद्रीय सतर्कता आयोग, मानवाधिकार आयोग और महिला आयोग की तरह नखदंत विहीन बना देने की शुरुआत है। इसे सर्वोच्च न्यायालय, निर्वाचन आयोग और सीएजी की तरह एक मजबूत स्वायत्त संस्था बनाने की जरूरत है। यहां यह गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय और सीएजी पर यदि केंद्र सरकार का नियंत्रण होता तो 2 जी स्पेक्ट्रम और राष्ट्रमंडल खेल घोटालों से पर्दा उठता ही नहीं। हमारे देश में मजबूत संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करते हुए उन्हें राजनैतिक नियंत्रण में लाने की कवायद हर शासन काल में होती रही है।
अन्ना का आंदोलन और सत्ता की साजिश!
पिछले कुछ दिनों का घटनाक्रम चिंता का विषय है। लगता है कि देश की भ्रष्ट ताकतें भ्रष्टाचार निरोधी प्रभावी कानून तैयार करने की प्रक्रिया को पटरी से उतारने के लिए एकजुट हो गई हैं। हम एक साथ मिलकर उन ताकतों को पराजित कर सकते हैं। उन ताकतों की एक रणनीति यह है कि समिति में शामिल सामाजिक कार्यकर्ताओं की छवि खराब की जाए। अन्ना हजारे की चिट्ठी का यह अंश दरअसल उस पीड़ा की अभिव्यक्ति है, जो एक अच्छे काम को पटरी से उतारने की कोशिश से उपजी है। इस पीड़ा में अन्ना हजारे का क्षोभ भी कहीं गहरे तक साया है। ऐसी तकलीफ गांधी जी को भी आजादी मिलने के कुछ पहले हुई थी, जब उनकी सोच के मुताबिक काम करने से तब के प्रमुख कांग्रेसी हिचकने लगे थे और लगता था कि आजाद भारत के कांग्रेसियों को गांधी जी की जरूरत ही नहीं रह गई है। तब गांधी ने कहा था कि इसी देश की मिट्टी से वे दोबारा कांग्रेस से भी बड़ा आंदोलन खड़ा कर देंगे। गांधी जी की उस पीड़ा और अन्ना हजारे के क्षोभ भरे दर्द में एक अंतर है। दरअसल, गांधीजी को पीड़ा उनके अपने ही अनुयायियों से पहुंची थी, जबकि अन्ना को उनके आंदोलन के साथियों से ज्यादा दूसरे लोगों के हमलों का सामना करना पड़ रहा है। इसीलिए उनका क्षोभ गांधी से कहीं कम है, लेकिन उनका भी कर्म चूंकि बृहत्तर सामाजिक संदर्भो को पटरी पर लाने से जुड़ा है, इसीलिए दर्द भी है। जन लोकपाल की मांग को लेकर अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठे अन्ना की मांगों को मानना भारत सरकार की मजबूरी बन गई थी। दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के दावा करते न थकने वाली भारत सरकार को नव उदारीकरण के दौर में लोकतंत्र भी एक नाटक-सा होता जा रहा है। फिर पश्चिमी ताकतों के सामने लोकतांत्रिक होते दिखना भी उदारवाद का ही सहज विस्तार माना जा रहा है। ऐसे में भारत सरकार को लोकतांत्रिक दिखना जरूरी था। नए मीडिया माध्यमों, सोशल मीडिया आदि के जरिए दुनिया जितनी छोटी हुई है, उतनी शायद इससे पहले कभी छोटी नहीं थी। इसका सहज असर पूरी दुनिया में दिख रहा है। चूंकि हम बाकी दुनिया की तुलना में खुद को कहीं ज्यादा लोकतांत्रिक साबित करने का मौका नहीं छोड़ते, लिहाजा अन्ना हजारे के सामने हमारी सरकार को झुकना ही था। वह झुकी भी। खुद अन्ना को भी उम्मीद नहीं थी कि उनके अनशन के महज चार दिनों में इतना ज्यादा समर्थन मिल जाएगा, लेकिन भारी समर्थन ने उनके आत्मविश्वास को किस कदर बढ़ा दिया है कि जन लोकपाल के लिए गठित समिति की पहली बैठक में शामिल होने के लिए जाते वक्त यह कहने से नहीं चूके कि अगर उनका अनशन चार दिन और चल जाता तो केंद्र सरकार गिर जाती। उसी अन्ना का आत्मविश्वास महज दो दिनों बाद डोलने लगता है और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को चिट्ठी लिखने के लिए मजबूर होना पड़ता है तो जाहिर है कि उनके अंदर कहीं न कहीं कुछ अपने राजनीतिकों के दांवपेचों से कुछ न कुछ खदबदा रहा है। इटली के विद्वान मेकियावेली ने अपनी पुस्तक द प्रिंस में सत्ता के चरित्र की व्याख्या की है। इस व्याख्या के अनुसार सत्ताएं चाहे अधिनायकवादी हों या फिर लोकतांत्रिक, उनके मूल में एक समानता होती है, विरोधी सुरों को आसानी से स्वीकार नहीं करना। सत्ता का यह लौहआवरण ही है कि वह जल्द झुकती भी नहीं। इसका उदाहरण अपने ही देश के छोटे-छोटे आंदोलनों में दिख जाएगा। ऐसे में यह सोचना की सत्ता अन्ना के सामने झुक गई व जन लोकपाल की राह आसान हो गई, दरअसल दिवास्वप्न जैसा ही था। आंदोलन को तोड़ने की कोशिशें उसी दिन शुरू हो गई, जब आंदोलन की कामयाबी के लिए अन्ना से ज्यादा सोनिया गांधी को ज्यादा जिम्मेदार बनाने की कांग्रेसी कोशिशें शुरू हो गई। यही नहीं, जन लोकपाल के लिए गठित ड्राफ्ट कमेटी में शांतिभूषण और उनके बेटे प्रशांत भूषण के शामिल किए जाने को वंशवाद से जोड़कर देखा-दिखाया जाने लगा। इन चर्चाओं और खबरों के पीछे जहां सत्ताधारी खेमे के कुछ लोग जुटे हैं तो कई लोग ऐसे भी हैं, जिन्हें भगवा रंग से हर कीमत पर नाराजगी है। अन्ना हजारे ने नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी के ग्रामीण विकास की सफल योजनाओं के लिए प्रशंसा क्या कर दी, अन्ना की लानत-मलामत का जैसे मौका ही मिल गया। अन्ना जब नीतीश या नरेंद्र मोदी की प्रशंसा कर रहे थे तो उसके पीछे उनका सहज हृदय काम कर रहा था, लेकिन अन्ना के आंदोलन के आगे मजबूर हुए ताकतवर लोगों को अन्ना के इस बयान में भी खोट और सांप्रदायिकता नजर आने लगी। मोदी के हाथों हुए विकास कार्यो की बिना वजह आलोचना करने के लिए गोधरा का भूत जगाना दरअसल नरेंद्र मोदी पर हमला नहीं था, बल्कि अन्ना के आंदोलन को पटरी से उतारने की कोशिश ही थी। इसमें एक खास विचारधारा के लोग कुछ ज्यादा ही सक्रिय हैं। गांधीजी की अगुआई में जब कांग्रेस भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के केंद्र में थी, तब उसके साथ राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भी काम कर रहा था, सांप्रदायिकता विरोधी गांधीजी को भी आरएसस के साथ से परहेज नहीं था। गांधी की हत्या का आरोप आरएसस पर था, इसके बावजूद पंडित जवाहर लाल नेहरू के मंत्रिमंडल में भारतीय जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी शामिल थे। पंडित नेहरू ने खुद आरएसएस को गणतंत्र दिवस की परेड में मार्च पास्ट के लिए बुलाया था। इसका यह मतलब था कि देश के समग्र विकास में वे सबको साथ लेकर चलने की विचारधारा पर चलते थे। अन्ना के मोदी समर्थक बयान को उस नजरिए से क्यों नहीं देखा गया और उसकी आलोचना करने की कोशिशें तेज हो गई। साफ है कि अन्ना और उनकी टीम पर आरोप लगा-लगाकर उनकी साख को धक्का पहुंचाने की कोशिशें शुरू हो गई हैं। आखिर क्या वजह है कि अन्ना की साख को चोट पहुंचाने की कोशिशें तेज हो रही हैं। इसके दो कारण हैं। पहला कारण तो विशुद्ध राजनीतिक है। अन्ना ने जन लोकपाल के लिए जो आंदोलन चलाया है, निश्चित तौर पर उसका फायदा पूरे देश को होना है। लेकिन चूंकि अन्ना और उनके साथियों ने इसका राजनीतिक फायदा उठाने की कोई मंशा जाहिर नहीं की है और न ही उनकी कोई मंशा है भी। उनके पास राजनीतिक संगठन भी नहीं है। इसके चलते देर-सबेर जब चुनाव होंगे तो विपक्षी राजनीतिक धारा के एक वर्ग को डर है कि इसका फायदा भाजपा को हो सकता है। भाजपा कालेधन, स्विस बैंक में जमा धन और भ्रष्टाचार के मसले को लेकर 2009 के आम चुनावों से ही आंदोलन कर रही है। हालांकि उसे इसका फायदा नहीं मिल पाया, लेकिन अन्ना की साख भरी आवाज ने जब लोगों को जगा दिया तो भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन तो खड़ा हो गया, लेकिन चुनावी समर में जाहिर है कि यह सवाल उठाने का फायदा भाजपा को मिल सकता है। हालांकि शांतिभूषण या प्रशांत भूषण जैसे जिन लोगों पर सवाल उठाए जा रहे हैं, सच तो यह है कि वे खुद भी नहीं चाहेंगे कि अन्ना के साथ खड़े आंदोलन का फायदा भाजपा को मिले। इसके बावजूद अन्ना की साख को गिराने की कोशिशें जारी हैं। इसकी दूसरी वजह सत्ता के अहं को पहुंची चोट है, जिसका बदला वह चुकाना चाहेगी ही। वैसे सत्ता के इर्द-गिर्द भ्रष्टाचारियों का बोलबाला कुछ ज्यादा ही है। उन्हें एक और डर सता रहा है कि अगर जन लोकपाल बिल पास हुआ तो उनके तो हाथ-पांव ही बंध जाएंगे। इसके लिए वे अन्ना को ही जिम्मेदार मानते हैं और अन्ना को जनसमर्थन के मुद्दे पर पटखनी तो देने से फिलहाल वे रहे तो इसके लिए बेहतर उपाय यह है कि अन्ना की साख को ही चोट पहुंचाई जाए, लेकिन अन्ना की साख पर चोट पहुंचाने की कोशिश में जुटे लोगों को यह पता होगा ही कि अन्ना के लिए पूरा समाज है। अन्ना के पास कोई आर्थिक ताकत भी नहीं है। ऐसे लोगों के लिए समाज तभी उठ खड़ा होता है, जब उसकी साख होती है और अन्ना जैसे लोगों की साख एक दिन में नहीं आती। इसलिए उस पर चोट पहुंचाना भी आसान नहीं होता। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
सिविल सोसाइटी का संदेश
लेखक अन्ना हजारे के आंदोलन से शासकों को भूल सुधार के लिए एक अवसर मिलता देख रहे हैं…
जब सिविल सोसाइटी अपना धैर्य खो बैठती है तो वह सड़कों पर उतर आती है। सिविल सोसाइटी आक्रोशित है, किंतु है शांत। यह था वह परिदृश्य जो कुछ दिन पूर्व भारत में परिलक्षित हुआ था। माहौल ऐसा था कि जिसमें समग्र प्रणाली को लोग पूर्णतया गया गुजरा समझ रहे थे और उसमें आमूल-चूल परिवर्तन के पक्षधर थे। उनमें से हजारों समाज के विभिन्न वर्गो से संबद्ध थे जो एक गांधीवादी द्वारा दिए गए आ ान पर एकत्रित हुए थे। उनका आ ान था भ्रष्टाचार का उन्मूलन। अन्ना हजारे ने सरकार को भ्रष्ट जनों को दंडित किया जाना सुनिश्चित कराने के लिए विगत 42 वर्षो से लंबित लोकपाल संस्था के गठन संबंधी विधेयक को पुन: ड्राफ्ट करने के लिए एक दस सदस्यीय समिति के गठन पर बाध्य करने के लिए अनशन किया था। उनकी मांग थी कि इस दस सदस्यीय समिति में पांच सदस्य सत्ता पक्ष के हों और पांच सिविल सोसाइटी से हों। यह सिविल सोसाइटी का एक शुद्धीकरण था, जो ऊपर से नीचे तक व्याप्त भ्रष्टाचार की टीस तो अनुभव कर रही थी, किंतु स्वयं को असमर्थ और असहाय अनुभव कर रही थी। हजारे के अभियान ने सिविल सोसाइटी को एक संघर्ष में योगदान का अवसर प्रदान किया। घोटालों के उस घटाटोप से हताश सिविल सोसाइटी की लोकतांत्रिक राज्य व्यवस्था में आस्था ही तिरोहित सी हो रही थी। उस आस्था को अन्ना हजारे ने पुनर्जीवित किया। जब सरकार ने अन्ना हजारे की संयुक्त समिति के गठन की मांग मान ली तो उन्होंने अपना अनशन समाप्त किया। इससे जनसमूह, जिसमें अनिवार्यत: मध्यम वर्ग की ही बहुलता थी, को यह भरोसा हो गया कि भ्रष्टाचार का उन्मूलन हो जाएगा। हो सकता है कि लोगों की यह अपेक्षा से बहुत अधिक हो। हो सकता है कि वे लोकपाल के संस्थान को भ्रष्टाचार के उन्मूलन का माध्यम न मानकर अपने आप में एक लक्ष्य ही मान रहे हों। उनकी वरीयता चाहे जो हो, हजारे में उनका पूरा-पूरा विश्वास है। वे पूरी तरह उनके पीछे हैं, क्योंकि वे उनमें एक ऐसे व्यक्ति को देख रहे हैं जो भ्रष्टाचार का खात्मा करेगा। यह आंदोलन को अवमानित करने में आलोचकों और कुंठित बुद्धिजन ने हाथ मिला लिए हैं, किंतु वे इस बात को विस्मृत कर देते हैं कि ऐसा ही एक उपक्रम गांधीवादी जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में 1975 में हुआ था। 1975-77 में इंदिरा गांधी ने संस्थानों को आपातकाल के दौरान एक प्रकार से नष्ट कर दिया था। राज्यों में मुख्यमंत्रियों ने भी ऐसा ही किया था। प्रशासन को अब कमजोर कर एक ऐसी प्रणाली में बदला गया है जिसका संचालन राजनीतिज्ञों, नौकरशाहों, एजेंसियों और अपराधियों के गठबंधन से हो रहा है। चाहे कोई मुख्य सचिव हो या जांच प्रमुख, वह ऊपर से आदेश की प्रतीक्षा करता है। हजारे की उद्घोषणाओं पर मैं तनिक चिंतित भी हूं। आंदोलन के दौरान उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी के अहिंसात्मक मार्ग का स्थान शिवाजी के हिंसक तरीके भी ले सकते हैं। दूसरे शब्दों में हजारे के कहने का तात्पर्य यह है कि वह अपने लक्ष्य की सिद्धि अहिंसात्मक तरीके से करेंगे और यदि ऐसा नहीं हुआ तो आवश्यक होने पर उग्रवाद का भी सहारा लेंगे। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की उन्होंने जो प्रशंसा की है वह भी आंदोलन की उस भावना के विरुद्ध है जो अपने सार तत्व के रूप में सेक्युलर है। मोदी ने विकास के क्षेत्र में अच्छा काम किया है, किंतु यह तथ्य है कि उनके राज्य में 2,500 मुस्लिम मारे गए थे। फर्जी मुठभेड़ों के मामले अभी भी अदालतों में चल रहे हैं। उन्हें हजारे एक प्रमाणपत्र कैसे दे सकते हैं? हो सकता है कि उन्होंने यह सरल स्वभाव से कह दिया हो, किंतु उन्हें सतर्क रहना चाहिए था, क्योंकि लोगों ने उन्हें उच्चासन पर आसीन किया है। लोग क्या कर सकते है? बेहतर लोगों को आगे लाने के लिए एक प्रक्रिया अपेक्षित है। आज राजनीतिक प्रक्रिया इतनी महंगी हो गई है कि लोकसभा प्रत्याशी को पंद्रह करोड़ रुपया व्यय करना होता है। राजनीतिक दल अपने प्रत्याशियों की सूची में से अपराधियों को अलग नहीं करना चाहते। निर्वाचन आयोग दलों को इस बात के लिए आश्वस्त करने के लिए प्रयासरत है कि वे अपराधियों को परे रखें, किंतु कोई सफलता नहीं मिली। इसका तात्पर्य यह है कि चुनावी सुधार होने चाहिए ताकि ईमानदार लोग उनमें डटकर भाग ले सकें। धन और बाहुबली जन को बाहर रखना ही होगा। लोकपाल विधेयक के नए ड्राफ्ट को 30 जून तक अंतिम रूप देने पर सरकार और सिविल सोसाइटी में सहमति हुई है। वे सुधार उसका भाग नहीं हो सकेंगे। हजारे ने कहा है कि 15 अगस्त तक कानून बन जाना चाहिए। मुझे मंत्रियों के समूह की ओर से प्रतिरोध की आशंका है, जिसके प्रमुख वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी हैं। सरकार यह नहीं चाहती कि लोकपाल सीधे ही शिकायतें प्राप्त कर सके। उन्हें निपटाना दूर की बात है। मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने तो लोकपाल विधेयक का मखौल ही बना दिया। वह कहते हैं कि वह निर्धनों को शिक्षा और मेडिकल केयर उपलब्ध नहीं करा सकता। हम सभी जानते हैं कि लोकपाल देश की व्याधियों के लिए अचूक औषधि नहीं है, किंतु यह संस्थान जब स्थापित हो जाएगा तो यह देखेगा कि राजनीतिज्ञों, न्यायाधीशों और नौकरशाहों को जवाबदेह बनाया जाए। सरकार ने संयुक्त समिति की नियुक्ति संबंधी अधिसूचना के मामले में जो रवैया अपनाया उससे मैं चिंतित हूं। कांग्रेस के प्रवक्ता ने यह तर्क दिया कि यदि अधिसूचना जारी होती है तो उससे संविधान का मखौल हो जाएगा और एक ऐसा पूर्व उदाहरण हो जाएगा जो राष्ट्र के लिए भयावह होगा। इंदिरा गांधी ने कैबिनेट तक से परामर्श न कर आपातकाल थोपने की अधिसूचना जारी की थी। वह सीधे ही राष्ट्रपति के पास गई थीं और लगभग अर्द्धरात्रि में ही अधिसूचना पर हस्ताक्षर करा लिए थे। सत्तारूढ़ दल संवैधानिक औचित्य की बात कैसे कर सकता है जब उसने ही संविधान का कभी-कभार ही सम्मान किया है? बुनियादी तथ्य जो ध्यान देने योग्य है वह यह है कि शहरी मध्यम वर्ग ने पहली बार शांतिपूर्ण और सामूहिक ढंग से अपना क्षोभ व्यक्त किया है। मध्यम वर्ग दिन प्रतिदिन के घटनाक्रम का आकलन अध्ययन कर रहा है। दोनों पक्ष ही सिंह की सवारी कर रहे हैं, जब वे एक मत हों तभी उससे उतर सकते है। आंदोलन यह भी संकेत देता है कि देश खौल रहा है। यदि शासकों ने देश के सामान्य जन की आवश्यकताओं पर ध्यान नहीं दिया तो नीचे धधक रहा लावा फट सकता है। मैं महसूस करता हूं कि यही समय है जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह स्वयं को पुन: जनप्रिय बना सकते हैं। उन्होंने अपनी प्रतिष्ठा काफी हद तक गंवा दी है। उन्हें हस्तक्षेप करना चाहिए और ऐसा करते हुए वह दिखाई भी देने चाहिए। (लेखक प्रख्यात स्तंभकार हैं)
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