भट्टा-पारसौल के बाद सोमवार को नोएडा में किसान मांगों को लेकर सड़क पर उतरे। लाठी-डंडों से लैस सैकड़ों किसानों ने सेक्टर-76 पहुंच वहां चल रहा बिल्डरों का काम रुकवा दिया। तीन घंटे की कड़ी मशक्कत के बाद पुलिस-प्रशासन और प्राधिकरण अधिकारियों ने किसानों को शांत कराया और रुका हुआ काम दोबारा शुरू करवा दिया। मांगों को लेकर सड़क पर उतरे किसान नोएडा के सोरखा, ककराला, सर्फाबाद, पर्थला, गढ़ी चौखंडी, बरौला और सालारपुर सहित आसपास के गांव के थे। सुबह करीब 9 बजे सैकड़ों किसान सेक्टर-76 की तरफ चल दिए। लाठी-डंडा लिए इन किसानों में बुजुर्ग और बच्चे भी थे। सड़क पर किसानों के हुजूम की सूचना मिलते ही पुलिस-प्रशासन का पूरा अमला हरकत में आ गया। प्राधिकरण के उप मुख्य कार्यपालक अधिकारी सीबी सिंह के नेतृत्व में प्राधिकरण के प्रशासनिक अधिकारी दीप चन्द, सिटी मजिस्ट्रेट संजय चौहान, एसपी सिटी अनंत देव और प्राधिकरण के निरीक्षक अनिल समानिया दलबल के साथ मौके पर पहुंचे। किसान तब तक बिल्डरों का काम बंद करा चुके थे। अधिकारियों ने किसानों को समझा-बुझाकर बातचीत के लिए राजी किया। खुले में सभी किसानों के साथ बैठक कर अधिकारियों ने तीन घंटे तक उनकी समस्याएं सुनीं। किसानों ने मांग रखी कि बिल्डर को जिस दर पर जमीन बेची गई है, उन्हें उसका 50 फीसदी मुआवजा चाहिए। इसके अलावा उन्होंने गांव में आबादी की समस्या और पांच फीसदी के प्लॉट देने के लंबित मामलों का भी तत्काल निस्तारण करने की मांग रखी। किसानों की एक और शिकायत थी कि प्रशासन ने गलत तरीके से उनकी कुछ अतिरिक्त जमीनें अधिग्रहित कर ली हंै। इसका तत्काल हल निकाला जाए। अधिकारियों ने किसानों को उनकी मांगों के प्रति स्थिति स्पष्ट कर दी ताकि किसी तरह का संशय न रहे। अधिकारियों ने साफ कर दिया कि मुआवजा बढ़ाने का फैसला शासन स्तर पर किया जाना है, जिसका प्रयास जारी है। किसानों ने भी अधिकारियों की बात पर सहमति जताई। डीसीईओ सीबी सिंह ने बताया कि किसानों को पांच फीसदी के प्लॉट और आबादी निस्तारण के लिए 15 जून तक का समय दिया गया है। गलत तरीके से अधिग्रहित जमीन के शासनादेश आ चुका है। इसके मुताबिक जिलाधिकारी किसानों की समस्या सुनकर मामले का निस्तारण करेंगे। सभी किसान संतुष्ट होकर वापस लौट गए और रुका हुआ काम दोबारा चालू करा दिया गया।
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Tuesday, May 17, 2011
Saturday, April 16, 2011
Sunday, April 10, 2011
जनगणना से बाहर भूख और गरीबी की दुनिया
दिल्ली में बेघरों की गिनती और उन्हें यूनिक आईडी 'आधार कार्ड' सौंपने की मुहिम की शुरुआत बड़े तामझाम के साथ हुई थी परंतु जनगणना का काम पूरा होने तक भी यहां के अधिकतर बेघर इन गैर सरकारी संगठनों की परियोजना से बाहर ही हैं। 121 करोड़ के इस बड़े देश में हम कई राज्यों और कई छोटे देशों की कुल जनसंख्या से भी बड़े एक करोड़ से भी अधिक आबादी वाले देश की नागरिकताविहीन ऐ से राज्य का निर्माण कर रहे हैं जिसमें केवल भूख, गरीबी और अर्ध अपराधों की दुनिया में जाने की अंधी गहरी सुरंग के अलावा कुछ भी नहीं है
15वीं राष्ट्रीय जनगणना के शुरुआती आंकड़े देश के सामने आ चुके हैं। जनसंख्या वृद्धि की दर से लेकर लैंगिक अनुपात, स्त्री एवं पुरुषों में शिक्षा की स्थिति, आबादी का घनत्व, बढ़ती शिक्षा के बीच बढ़ते लिंग अनुपात की विषमताओं तक सभी आंकड़े देश के सामने आ चुके हैं। दुनिया की सबसे बड़ी जनगणना के बावजूद देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा ऐसा है जो इस सेंसस से बाहर रहते हुए देश की आधिकारिक नागरिकता से वंचित है।
नहीं बदले जनगणना के तरीके
दरअसल, जनगणना के पहले चरण में घरों एवं उसमें रहने वाले परिवारों की गणना करते हुए उन्हें सूचीबद्ध किया जाता है और अगले चरण में व्यक्तियों एवं उनसे सम्बंधित सूचनाओं का संग्रहण होता है। भारत में पहली जनगणना 1872 में और इसके पूर्व विगत जनगणना 2001 में हुई थी। शुरुआत से लेकर अभी तक जनगणना के तरीकों में कोई आधारभूत बदलाव नहीं हुआ है। घर-परिवार की परिभाषा को लेकर कुछ सतही बदलाव हुए हैं परंतु सवाल उनका है जिनके पास पुरानी या नई सरकारी परिभाषा वाला घर ही नहीं है।
दिल्ली में ही इतने बेघर
यदि देश की राजधानी की ही बात की जाए तो यहीं पर उनकी आबादी एक से डेढ़ प्रतिशत के बीच है। एक गैर सरकारी संगठन 'बेघर फाउंडेशन' के 2008 में किए एक सव्रे के अनुसार इन बेघरों की संख्या 88,723 थी। यह सव्रे रात के समय किया गया था जिस कारण रात में काम करने वाले ढेरों रिक्शा चालक, कुली और बोझा ढोने वाले कामगार इस सव्रे से बाहर रह गए। सव्रे करने वाले संगठन का भी मानना है कि यदि इसमें सव्रे से बाहर रहे लोगों को शामिल किया जाए तो शर्तिया यह आंकड़ा एक लाख से कहीं ज्यादा जाता है।
राष्ट्रीयता की सीमा में ही नहीं
राष्ट्रमंडल खेलों, राजधानी की खूबसूरती के नाम बेघर हुए झुग्गीवासियों और दिल्ली में लगातार जारी निर्माण कायरें के कारण पिछले दो सालों में बेघरों की संख्या को बेहिसाब बढ़ाया है। सरकारी आंकड़ों को सही माना जाए तो 2001 की जनगणना के अनुसार देश में बेघरों की संख्या 20 लाख थी परंतु बेघरों के लिए कार्यरत कई गैर सरकारी संगठनों के अनुसार बेघरों की संख्या का यह आंकड़ा कुल आबादी का कम से कम एक प्रतिशत तो अवश्य है। अर्थात देश में उनकी आबादी कभी भी एक करोड़ से अधिक है। इन बेघरों में 90 प्रतिशत के लगभग आबादी गणना से बाहर यानी नागरिकता और देश की औपचारिक राष्ट्रीयता हासिल करने की सीमा से परे हैं।
जिनकी गणना में जगह नहीं
देश की नागरिकता से अलग यह केवल एक आबादी है। इसके अलावा वे प्रवासी मजदूर जो मजदूरी कानूनों से बचने के लिए सरकारी या उनके हितों की वकालत करने वाली आंखों से बचाकर रखे जाते हैं, वे भी इसी दायरे में आते हैं। बांग्लादेशी या श्रीलंकाई तमिल शरणार्थी और सालों से भारत में रह रहे नेपाली कामगार कहां के नागरिक हैं? शहरों में किरायेदार परिवार मकान मालिक कई कारणों से जिनकी जानकारी सार्वजनिक नहीं करना चाहते हैं, वह भी नागरिकता के और उससे प्राप्त होने वाली दस्तावेजी पहचान से वंचित रह जाते हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर जो अक्सर अलग-अलग जगहों पर किरायेदार के तौर पर रहते हैं, उनका कहना है कि पिछले 20 सालों में उन्हें याद नहीं कि जनगणना से सम्बंधित जानकारी किसी ने उनसे मांगी हो।
समस्या सिर्फ भारतजनित नहीं
यह समस्या न केवल दिल्ली की है और न ही केवल देश की। यह कमोबेश एक विश्वव्यापी समस्या है। अल्प विकसित और विकासशील देशों से लेकर विकसित औद्योगिक देश भी वर्तमान उदारवादी नीतियों के कारण तीसरी दुनिया के देशों की इन समस्याओं का शिकार हो रहे हैं। दरअसल, सामाजिक दायित्वों को छोड़ निर्बाध विकास का जुनून जहां कुछेक के लिए अपार सम्भावनाओं के द्वार खोल रहा है, तो दूसरी तरफ नागरिक अधिकारों को भी खोती जा रही वंचितों की बढ़ोतरी के लिए भी जिम्मेदार है। उदारवादी विकास से अभिभूत नवउदारवादी विकासजनित आर्थिक विषमताओं के दुष्परिणामों से एकदम बेपरवाह अपने विकासगान में व्यस्त है।
कल्याण की रस्मअदायगी
गरीबी, बेकारी के कारण लगातार हाशिए पर धकेली जा रही दुनिया की एक बड़ी आबादी के लिए सामाजिक सुरक्षा और सामाजिक कल्याण की बात सरासर बेमानी है। क्योंकि जनगणना देश की आबादी के आकार, सामाजिक आर्थिक वितरण, जनसांख्यिकीय बनावट और विशेषताओं के आंकड़े उपलब्ध कराने का काम करती है जिसके आधार पर सरकार, प्रशासन और गैर सरकारी संगठन देश और जनता के लिए योजनाएं और उनको लागू करने का काम करते हैं। यदि राज्य और सरकार के पास अपने नागरिकों के वास्तविक आंकड़े और उनकी नागरिकता के ही प्रमाण नही हैं तो कल्याण किसका और कैसा? दरअसल इस बड़ी बेघर आबादी के लिए घोषित कल्याण योजनाएं सरकारी रस्म अदायगी से अधिक कुछ भी नहीं जान पड़ती हैं।
विचारणीय पहलू
देश की राजधानी दिल्ली में राज्य की मुख्यमंत्री ने बेघरों की गिनती और उन्हें यूनिक आईडी 'आधार कार्ड' सौंपने की मुहिम की शुरुआत बड़े तामझाम के साथ की थी, परंतु जनगणना का काम पूरा होने तक भी दिल्ली के अधिकतर बेघर इन गैर सरकारी संगठनों की परियोजना से बाहर ही हैं। 121 करोड़ के इस बड़े देश में हम कई राज्यों और कई छोटे देशों की कुल जनसंख्या से भी बड़े एक करोड़ से भी अधिक आबादी वाले देश की नागरिकताविहीन ऐसे राज्य का निर्माण कर रहे हैं जिसमें केवल भूख, गरीबी और अर्ध अपराधों की दुनिया में जाने की अंधी गहरी सुरंग के अलावा कुछ भी नहीं है।
सतर्कता से बढ़ाएं साक्षरता
बालिकाओं की निरक्षरता का सवाल बहुत सीधे-सीधे उनकी जाति और जनजाति पृष्ठभूमि से जुड़ा रहता है। इसलिए हमें ध्यान देकर यह देखना होगा कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की बेटियों की निरक्षरता कहां तक दूर हुई है? सवर्णो और द्विजों के परिवार की लड़कियां आजादी के बाद से ही शिक्षा केंद्रों की तरफ मुड़ चुकी हैं। असली सवाल दलित और आदिवासी लड़कियों की निरक्षरता का है
राष्ट्र के संदर्भ में ताजा जनगणना के आंकड़ों का असली अर्थ औसत के बजाए उसकी राष्ट्रीय विषमता का है। इसकी दो अतियां हैं। जब हम कहते हैं कि साक्षरता की रफ्तार बढ़ी है तो उसमें एक तरफ केरल है, जहां वह 90 प्रतिशत से अब 95 प्रतिशत तक पहुंच गई होगी तो दूसरी तरफ गढ़वाल और झारखंड के गांव होंगे, जहां आदिवासी स्त्रियों की साक्षरता 5 प्रतिशत से बढ़कर 7 प्रतिशत हो गई होगी। इसलिए 2011 की जनगणना के आरम्भिक परिणामों के बारे में जो सरकारी विवरण दिए जा रहे हैं, उसके संदर्भ में तीन सतर्कताएं बहुत जरूरी हैं।
स्त्री शिक्षा में बढ़ रही विषमता
पहली, हमारा कोई भी राष्ट्रीय आंकड़ा इस बात को बताने में असफल रहता है कि भारत के पिछड़े इलाकों का क्या हाल है? महिलाओं की साक्षरता दर में वृद्धि का अगर यह अर्थ हुआ कि केरल से लेकर आंध्र प्रदेश तक का हाल अच्छा है लेकिन हिंदी पट्टी और उड़ीसा और असम में परिस्थितियां चिंताजनक हैं तो औसत में बढ़ोतरी के बावजूद यह समझना होगा कि क्षेत्रीय विषमता, स्त्री साक्षरता के क्षेत्र में न सिर्फ बनी हुई है बल्कि बढ़ रही है। यह स्थिति सरकार और समाज दोनों के लिए चिंताजनक होना चाहिए। आंकड़ों की इस बाजीगरी में देश के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में जारी शिक्षा का अंतर छिप जाता है। नगर सौ साल पहले से ही शिक्षा के मामले में गांव से बहुत आगे चल रहे हैं।
देखिए योजनाओं के फल मिले?
इसलिए निरक्षता की असली चुनौती हमें ग्रामीण भारत से ही मिलती है। आज भी भारत के अधिकतर गांवों में बच्चों में प्रारम्भिक शिक्षा के प्रति आकर्षण पैदा करने के लिए स्कूल काफी नहीं हैं। इसके साथ दोपहर का भोजन, कपड़े, जूते, किताबें जैसी चीजों को भी जोड़ना जरूरी माना गया है। इससे जाहिर होता है कि ग्रामीण भारत के निर्धन वर्ग के लिए हमारी योजनाओं के क्या परिणाम निकले हैं? इसमें बालिकाओं की निरक्षरता का सवाल बहुत सीधे-सीधे उनकी जाति और जनजाति पृष्ठभूमि से जुड़ा रहता है। इसलिए हमें ध्यान देकर यह देखना होगा कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की बेटियों की निरक्षरता कहां तक दूर हुई है? सवर्णो और द्विजों के परिवार की लड़कियां आजादी के बाद से ही शिक्षा केंद्रों की तरफ मुड़ चुकी हैं। असली सवाल दलित और आदिवासी लड़कियों की निरक्षरता का है।
संकल्प और रणनीति
अब यह प्रश्न उठता है कि हमें आगे के लिए क्या करना चाहिए? इसके लिए तो सबसे पहले हमें समयबद्ध तरीके से निरक्षता उन्मूलन के लिए संकल्प और रणनीति अपनानी होगी; क्योंकि उदारीकरण के 20 बरस बाद अब यह प्रक्रिया न तो सरकार की जिम्मेदारी रही और न बाजार की। दोनों एक दूसरे पर दोष लगा चुके हैं। हमने विश्व बैंक से कर्जा लेकर स्त्री शिक्षा अभियान शुरू किया था और इधर, हमने शिक्षा का अधिकार कानून भी पास कर दिया। अब सरकार और बाजार दोनों कह सकते हैं कि हमने अपना जिम्मा पूरा कर दिया। अब निरक्षर बच्चों की जिम्मेदारी उनके मां-बाप की है। जब इसका दोष मां-बाप पर ही है तो अब हम उनको जेल में बंद करेंगे। इस तरह देश का नौकरशाही दिमाग निरक्षरता के सवाल को धुंध में ही रखने की कोशिश करता रहेगा।
शिक्षक को पद्म क्यों नहीं ?
दूसरी सतर्कता साक्षरता अभियान को सफल बनाने के लिए शिक्षा के काम को आकर्षक और सम्मानजनक बनाने की होनी चाहिए। आखिर हम खिलाड़ी, अभिनेता और व्यापारी को 'पद्म' सम्मान दे सकते हैं तो किसी शिक्षक को क्यों नहीं देते? इसलिए हमें आदर्श विद्यालय, आदर्श शिक्षक-शिक्षिका, आदर्श गांव और जिले को भी सम्मानित करने का कार्यक्रम शुरू करना पड़ेगा। अब शिक्षा की जि़म्मेवारी पंचायतों की हो चुकी है लेकिन हमें अपने जिले की पूर्ण सफल पंचायतों के नेताओं बारे में कोई जानकारी नहीं है, जिन्होंने शिक्षा के लिए अपने को समर्पित किया। न ही हम उनके बारे में जानते हैं जिन्होंने शिक्षा के नाम पर खाली धोखा किया है। सहयोग करने वाले का सम्मान और असहयोग करने वालों को दंड देने की तरफ हमको मुड़ना पड़ेगा। तीसरी सतर्कता। देश भर की विद्याशक्ति को निरक्षरता उन्मूलन में लगा देना होगा और हम हर 10 साल पर अपने सीमित सफलताओं के लिए एक-दूसरे को बधाई देंगे। तभी इस दिशा में कुछ हो सकता है लेकिन व्यापक असफलताओं के कारण राष्ट्र निर्माण का काम विशेष तौर पर स्त्री सशक्तीकरण का काम आधा-अधूरा रहेगा। इसलिए निरक्षरता पर किसी भी किस्म की अनदेखी और सहनशीलता की कोई गुंजाइश नहीं छोड़नी चाहिए। देश के लिए साम्प्रदायिकता, जातिवाद और भ्रष्टाचार जैसी अविलम्ब समाधान मांगने वाली समस्या हो चुकी है।
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