Showing posts with label ९ अप्रैल २०११. Show all posts
Showing posts with label ९ अप्रैल २०११. Show all posts

Sunday, April 10, 2011

मिश्रित परिणाम हैं जनगणना के


महारजिस्ट्रार एवं जनगणना आयुक्त, भारत सरकार (रजिस्ट्रार जनरल एंड सेन्सस कमिश्नर ऑफ इंडिया) डॉ. चन्द्रशेखर चन्द्रमॉली से आशीष कुमार 'अंशु' की बातचीत
वैसे इस विरोधाभास को कैसे समझा जाए कि एक तरफ तो लड़कियों में शिक्षा की दर बढ़ रही है। वे विभिन्न क्षेत्रों में लगातार आगे आ रहीं हैं। वहीं कन्या भ्रूण हत्याओं में बढ़ोतरी हो रही है। हम कहते नहीं थकते कि स्त्री-पुरुष में भेदभाव बीते जमाने की बात हो गई। दूसरी तरफ आंकड़े इन दावों को झुठलाते हैं। आबादी का घनत्व बढ़ना भी एक बड़ी समस्या है। अभी प्रति वर्ग किमी. पर लगभग 57 लोग रहते हैं। हमारे पास संसाधन सीमित हैं और जनसंख्या घनत्व के बढ़ने से हमारे जीवन स्तर में गिरावट आना तय है
पिछले साल की तुलना में वर्ष 2011 की जनगणना में क्या खास रहा है? पिछली जनगणना के दौरान जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर भारत में थोड़ी कठिनाई आई थी, जिसका सामना इस बार हमें नहीं करना पड़ा। इस तरह 2011 की जनगणना से प्राप्त आंकड़े पिछली बार की तुलना में अधिक सटीक हैं। इस बार हमें राज्य सरकारों के साथ स्थानीय जिलाधिकारियों का भी भरपूर सहयोग मिला। प्रत्येक जिलाधिकारी से हमें प्रमाण पत्र मिला कि जनगणना के दौरान सभी क्षेत्रों तक उनकी पहुंच बनी। कोई गांव, कस्बा या बस्ती हमारी पहुंच से इस बार बाहर नहीं रही। यह हमारे काम की एक बड़ी उपलब्धि थी।
इसका मतलब यह निकाला जाए कि इस बार की जनगणना शत-प्रतिशत सफल रही? एक अरब से अधिक की आबादी के बीच किया गया सव्रेक्षण शत-प्रतिशत ठीक होगा; यह दावा करना तो किसी के लिए भी कठिन है। निश्चित तौर पर कुछ लोग छूटे होंगे, अलग-अलग कारणों से। मेरा अनुमान है कि एक से दो प्रतिशत तक लोग छूटे होंगे। पिछली बार यह आंकड़ा लगभग 2.2 प्रतिशत लोगों का था। हम अब एक और सव्रेक्षण करेंगे, जिसके बाद हमारे विशेषज्ञों की टीम बता पाएगी कि इस बार हमारे सव्रेक्षण में हमारी पहुंच से कितने लोग दूर रहे। पहली बार जनगणना
पहली बार जनगणना के दौरान जीआईएस (ज्योग्राफिकल इन्फॉम्रेशन सिस्टम) तकनीक का उपयोग किया गया, किस प्रकार का अनुभव रहा? यह तकनीक बेहद उपयोगी है। इसके माध्यम से मैपिंग और जनगणना कार्यक्रम को लेकर रणनीति बनाने में बहुत मदद मिली। यह गूगल मैप से भी अधिक स्पष्ट तस्वीर उपलब्ध कराती है। इस बार प्रयोग के तौर पर हमने इसका उपयोग राज्यों की राजधानी में जनगणना के लिए किया। कुल 33 राजधानियों में यह उपयोग में लाया गया। महंगा होने के कारण इस तकनीक को पूरे देश में लागू तो नहीं किया जा सकता लेकिन हमारी कोशिश रहेगी कि अगली बार राजधानियों के साथ-साथ कुछ और बड़े शहरों को भी जीआईएस के साथ जोड़ा जाए।
जनगणना के नतीजों में यदि कुछ संतोषजनक और कुछ असंतोषप्रद नतीजों की बात करें तो वे कौन से परिणाम हैं? पहली बात तो यह कि अभी जो परिणाम आया है, वह अंतिम नहीं है। यह प्रोविजनल पोपुलेशन डाटा है। पिछले साल अंतिम रिपोर्ट आने में पांच साल का वक्त लगा था। इस बार हमारी कोशिश है कि इसे दो सालों में 2013 तक आप लोगों के बीच ले आएं। जनगणना के शुरुआती नतीजों पर बात करें तो लिंगानुपात के बीच जो फासला था, उसका कम होना सबसे बड़ी खुशी की बात है। प्रजनन दर में भी कमी आई है। जनसंख्या की बढ़ोत्तरी दर में कमी दिखाई दे रही है। एक खास बात और 2011 की जनगणना- परिणाम में पहली बार राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और ओडिसा में जनसंख्या विकास दर में कमी दर्ज की गई है। देश में स्त्री-पुरुष दोनों के बीच साक्षरता का बढ़ना वास्तव में बेहद उत्साह बढ़ाने वाला है। वहीं बच्चों के बीच लिंग अनुपात का बिगड़ना चिंताजनक भी है। वैसे इस विरोधाभास को कैसे समझा जाए कि एक तरफ तो लड़कियों में शिक्षा की दर बढ़ रही है। वे विभिन्न क्षेत्रों में लगातार आगे आ रहीं हैं। सफल हो रहीं हैं। वहीं दूसरी तरफ कन्या भ्रूण हत्याओं में बढ़ोतरी। एक तरफ हम यह कहते हुए नहीं थकते कि स्त्री-पुरुष में भेदभाव बीते जमाने की बात हो गई। हम बढ़ते भारत में जी रहे हैं; जहां दकियानूसी ख्यालों के लिए जगह नहीं है। दूसरी तरफ हमें जो आंकड़ें प्राप्त हुए हैं, वे इन दावों को झूठलाते हैं। आबादी का घनत्व बढ़ना भी एक बड़ी समस्या है। वर्तमान में प्रति वर्ग किलोमीटर पर लगभग 57 लोग रहते हैं। हमारे पास संसाधन सीमित हैं और जनसंख्या घनत्व के बढ़ने से हमारे जीवन स्तर में गिरावट आना तय है।
यह अक्सर सुनने में आता है कि जनगणना के दौरान जो व्यक्ति अपना नाम लिख पाता है, उसका नाम साक्षर के तौर पर दर्ज किया जाता है। क्या आप इस तरह की व्यवस्था से सहमत हैं? जो व्यक्ति अपना नाम लिख सकता है, उसे साक्षर मानने की बात से किसी की सहमति नहीं हो सकती है। जनगणना के दौरान भी ऐसे लोगों को साक्षर के तौर पर नहीं जोड़ा जाता। साक्षर को लेकर हमारा स्पष्ट मत है कि राईटिंग-रीडिंग- अंडरस्टैडिंग (लिखना-पढ़ना-समझना) अच्छी हो, उसके बाद ही उसे साक्षर के तौर पर नामित किया जाता है। इसीलिए सात साल से कम के बच्चे को कभी फॉर्म में साक्षर नहीं दिखलाया जाता। भले ही वह लिखना-पढ़ना दोनों जानता हो।
जनगणना के काम में शिक्षकों को लगाए जाने की कोई खास वजह? जनगणना के दौरान गांवों में स्कूल बंद होते हैं और बच्चों की पढ़ाई में बाधा आती है। क्या आपके पास शिक्षकों का कोई विकल्प नहीं है? हम लोगों ने इस विचार किया है। कुछ सुझाव भी आए जैसे एक सुझाव तो यह है कि जिन युवकों के पास काम नहीं है, उन्हें इससे जोड़ा जाए। चूंकि जनगणना के लिए गए युवकों को घर के अंदर प्रवेश मिलता है, इससे विधि-व्यवस्था पर हमेशा खतरा बना रहेगा। यदि इस काम में जनसंख्या नियंतण्रकी टीम को लगाए तो जनसंख्या सम्बन्धी उनके पूर्वाग्रह जनगणना में शामिल हो सकते हैं। यदि जल विभाग के लोगों को जोड़ें तो जल से सम्बन्धी जानकारी हमारे पास पक्की आएगी, इस बात पर विश्वास करना कठिन है। शिक्षकों को अपने साथ जोड़ने के पीछे सबसे बड़ी वजह यह है कि उनका समाज में बहुत सम्मान होता है। उनका सभी परिवारों के साथ उठना-बैठना है। उन पर विश्वास किया जा सकता है कि वे पूर्वाग्रह से मुक्त होंगे। जहां तक छूट्टी की बात है तो हमारे तरफ से दिया जाने वाला काम अधिक नहीं होता। हम तो यही चाहते हैं कि शिक्षक बच्चों को पढ़ाने के साथ-साथ ही शाम का थोड़ा वक्त निकाल कर इस फॉर्म को भरें। चूंकि 600 की आबादी पर एक महीने में 125 से 150 फॉर्म भरने होते हैं। जिन शिक्षकों को अपने घर से दूर सव्रेक्षण के लिए जाना होता है, उनकी संख्या कम है।
दुनिया के दूसरे देशों में होने वाली जनगणना के आलोक में यदि हम भारत की बात करें तो इसकी जनगणना की सबसे खास बात क्या है? अपने देश की जनगणना की खासियत यह है कि यहां अलग-अलग वर्ग के लिए अलग-अलग सवाल नहीं हैं। सभी वगरें के लिए एक सा सवाल है। सारे सवाल सामान्य हैं। गांव से लेकर शहर-महानगर तक सभी लोगों से एक ही सवाल यहां पूछे जाते हैं।
भारत की जनसंख्या-1901-2011 (आंकड़े मिलियन में)
2001-11 पहला दशक है (अपवाद दशक 1911-21) जिसमें पूर्व के दशकों की तुलना में जनसंख्या में वास्तविक गिरावट दर्ज की गई। 2011कीजनगणना जनगणना के इतिहास में वह मील का पत्थर है, जिसमें स्वतंत्रता के बाद पहली बार 2001-11 के दशक में तेजी से आबादी में गिरावट देखी गई। यह दर 2001-11 के दशक के 21.54 प्रतिशत से घटकर 17.64 प्रतिशत हो गई।

आबादी को मानव संसाधन में तब्दील करिए


भारी आबादी देश के लिए फायदेमंद होने की बात कोरी बकवास है। पश्चिमी मीडिया और विशेषज्ञों का पहले यह भरोसा था कि भारत की बढ़ती जनसंख्या निराशाजनक है । वहीं उन्होंने अब सुर बदल कर विशाल जनसंख्या वाले भारत को जनसांख्यिकी दृष्टि से लाभप्रद बता रहे हैंं। मैं इस बात से इत्तफाक नहीं रखता। मेरा पक्का भरोसा है कि 'जनसांख्यिकी लाभ' वस्तुत: 'जनसांख्यिकी' घाटा है। भारत में करोड़ों लोग निरक्षर, निम्न उत्पादकता वाले अकुशल और हाशिये के काम-धंधे में लगे हुए हैं। हम किस प्रकार उन्हें मानव सं साधन मान सकते हैं
भारत में जनगणना की शुरु आत 1872 से हुई थी और 2011वीं में 15वीं जनगणना पूरी हो गई है। इसके मुताबिक पिछले एक दशक के दौरान देश की आबादी में 18.1 करोड़ लोगों की बढ़ोतरी हुई है। यह ब्राजील जितनी आबादी है, जो दुनिया का पांचवां सबसे बड़ी आबादी वाला देश है। इस लिहाज से निश्चित तौर पर जनसंख्या वृद्धि एक समस्या बनी हुई है। लेकिन इस बार यानी 2001-2011 के बीच जनसंख्या वृद्धि की दर 17.64 प्रतिशत दर्ज की गई है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद यह पहला मौका है जब जनसंख्या वृद्धि दर में कमी देखने को मिली है। 1961 से 1981 के बीच जनसंख्या वृद्धि दर 24 फीसद से भी ज्यादा रही है, इस लिहाज से देखें तो कमी एक सकारात्मक संकेत है। अब तक जिन राज्यों को पिछड़ा समझा जाता था, वहां भी जनसंख्या वृद्धि में कमी देखने को मिली है। खासकर बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में आबादी की रफ्तार कम हुई है। बिहार में यह कमी 3 फीसद के आसपास हुई है तो उत्तर प्रदेश में यह 5 फीसद के आसपास है।
आबादी की दर में गिरावट सकारात्मक
यह ट्रेंड साल-साल दर साल दशक-दर-दशक चलते रहना चाहिए क्योंकि भारी आबादी देश के लिए फायदेमंद होने की बात कोरी बकवास है। पश्चिमी मीडिया और विशेषज्ञों का पहले यह भरोसा था कि भारत की बढ़ती जनसंख्या निराशाजनक है। वहीं उन्होंने अब सुर बदल कर विशाल जनसंख्या वाले भारत को जनसांख्यिकी दृष्टि से लाभप्रद बता रहे हैंं। मैं इस बात से इत्तफाक नहीं रखता। मेरा पक्का भरोसा है कि 'जनसांख्यिकी लाभ' वस्तुत: 'जनसांख्यिकी' घाटा है। भारत में करोड़ों लोग निरक्षर, निम्न उत्पादकता वाले अकुशल और हाशिये के काम-धंधे में लगे हुए हैं। हम किस प्रकार उन्हें मानव संसाधन मान सकते हैं। '
साक्षरता बढ़ी पर पर्याप्त नहीं
वैसे हमारी इस जनगणना का एक दूसरा अहम सकारात्मक संदेश यह है कि देश में साक्षरता का स्तर बढ़ा है। पहले 2001 में देश में साक्षरता की दर 64 फीसद से ज्यादा थी लेकिन अब यह बढ़कर 74 फीसद हो गई है। बहुतेरे लोग इस बात से आह्लादित हैं लेकिन आप किसी गांव में जाकर किसी लड़के से स्कूल के बारे में पूछें तो आपको पता लगेगा कि वह वहां जाना नहीं चाहता और पढ़ने में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं है। सरकार को भी साक्षरता की दर पर इसलिए भी नहीं इतराना चाहिए कि क्योंकि यह आईआईटी और आईआईएम जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चकाचौंध करने वाली सफलता नहीं हैं। हमें इस पर शर्मिदा होना चाहिए कि हम अब भी विश्व के सबसे निरक्षर देश बने हुए हैं। मेरे लिए मानव संसाधन के शिक्षित होने के सूचकांक में लड़कियों की साक्षरता दर में बढ़ोतरी महत्त्वपूर्ण है। हालांकि लड़कियों की साक्षरता दर में लड़कों के अनुपात में बढ़ोतरी पर प्रसन्नता जताने के बावजूद मुझे कहना है कि यह दर पर्याप्त नहीं है। अगर आज 65.46 प्रतिशत लड़कियां साक्षर हैं तो बाकी 35.54 प्रतिशत तो अपढ़ ही हैं। हमें सौ की सौ प्रतिशत लड़कियों को साक्षर बनाने का लक्ष्य हासिल करना है। इसलिए कि पढ़ी-लिखी लड़कियों की संख्या बढ़ने से एक बेहतर परिवार के निर्माण की सम्भावना ज्यादा होती है, जिससे निश्चित तौर पर आगे चलकर समाज को भी मजबूती मिलती है। इस लक्ष्य को पाने के लिए शिक्षा नीति में एक व्यावहारिक बदलाव लाने की आवश्यकता है। सरकार को शिक्षा में ज्यादा धन लगाने की आवश्यकता है। खासकर प्राथमिक स्कूल से लेकर हायर सेकेंडरी तक। निश्चित रूप से इस काम में आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को वेतन बढ़ाने और शिक्षकों के वेतन को दोगुना करने से अपेक्षित लाभ मिलेगा। वस्तुत: 10वीं और 12वीं कक्षा को पढ़ाने वाले शिक्षकों का वेतन विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों के बराबर किया जाना चाहिए। इसके साथ ही युनिर्वसिटी में शिक्षकों को प्रशिक्षित करने के काम में भी निवेश करना चाहिए।
साक्षर-शिक्षित सुरक्षा के लिए अहम
श्री कपिल सिब्बल एक कुशल विधिवेत्ता हो सकते हैं लेकिन एक अच्छे केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री नहीं। मेरी राय है कि मानव संसाधन मंत्रालय को भी रक्षा मंत्रालय जैसा ही महत्त्व दिया जाना चाहिए। आखिर एक साक्षर और शिक्षित आबादी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से अहम है। हमारी चिंता यह नहीं होनी चाहिए कि आबादी चीन से बढ़ जाएगी,बल्कि हमारी चिंता यह होनी चाहिए कि हमारी आबादी कैसे कुशल मानव संसाधन के तौर पर विकसित हो। सरकार को इस दिशा में ठोस प्रयास करने चाहिए। मुझे लगता है कि हम बढ़ती आबादी उपयोगी मानव संसाधन में तब्दील नहीं कर पा रहे हैं। यह सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।
लिंगानुपात में अंतर से चिंता
लेकिन इस जनगणना में एक बड़ा ही निराशाजनक संकेत सामने आया है, कि देश में लड़कियों का लिंगानुपात कम हो गया है। वैसे अभी प्रति एक हजार लड़कों पर लड़कियों की संख्या 940 है, जो 2001 में 933 थी। लेकिन इसमें खुश होने की कोई बात नहीं है क्योंकि 0-6 साल की उम्र के बीच में प्रति हजार लड़कों के मुकाबले लड़कियों की संख्या महज 914 ही है जबकि 2001 में यह 927 थी और 1991 में यह 945 थी। लड़कियों की संख्या में सबसे ज्यादा कमी हरियाणा और पंजाब में ही है लेकिन देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लड़कियों का अनुपात कम हुआ है।
कन्या भ्रूण हत्या पर सख्ती
यह नतीजा बताता है कि देश में कन्या भ्रूण हत्या पर अब तक रोक नहीं लगाई जा सकी है जबकि इस पर पाबंदी के कानून मौजूद हैं। साफ है कि इस कानून को कहीं ज्यादा सख्ती से लागू किए जाने की जरूरत है। इस दिशा में सरकार को भी जागरूकता अभियान बढ़ाना होगा। आम लोगों को इस समस्या की गम्भीरता को समझना होगा तभी जाकर समाज में उपयुक्त लिंगानुपात कायम हो पाएगा। दरअसल कन्या भ्रूण हत्या की सबसे बड़ी वजह दहेज प्रथा का हमारे समाज में बने रहना है। मिडिल क्लास परिवारों के लिए तमाम आधुनिकताओं के बावजूद लड़कियों की शादी करना आज भी बहुत बड़ी चुनौती है।
ठिकाना बदला, पलायन नहीं रुका
जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक शहरों की तरफ होने वाले पलायन में कमी देखने को मिली है लेकिन यह महज दिल्ली के मामले में सटीक जान पड़ता है। ऐसा नहीं है कि शहरों की तरफ पलायन कम हो गया है। इस मामले को समझना होगा कि लोग दिल्ली की ओर कम आ रहे हैं और क्यों नहीं आ रहे हैं। आज दिल्ली में आम लोगों के लिए गुजर-बसर करना खासा मुश्किल साबित हो रहा है। न ही दिहाड़ी मजदूरी करके वे अपना और अपने परिवार के रहने की व्यवस्था और गुजर-बसर कर सकते हैं और न ही उन्हें ढंग का काम मिल पा रहा है। वे अपने गांवों से यहां आकर नोएडा, गाजियाबाद और गुड़गांव में गुजर-बसर कर रहे हैं। उन इलाके में उन्हें काम मिल रहा है। इसलिए दिल्ली में पलायन के कम होने की बात आंकड़ों में भले सही हो लेकिन पलायन की मुश्किल अब भी बनी हुई है। आबादी की वृद्धि दर पर अंकुश लगने से तय है कि समाज में सबको विकास में भागीदार बनाने में मदद मिलेगी। अगर हम अपनी आबादी को बढ़ने से रोक नहीं सकते हैं तो निश्चित तौर पर सबको शिक्षा और रोजगार देना सम्भव नहीं हो पाएगा। वैसे भी, देश के करोड़ों लोगों तक आज भी शिक्षा और रोजगार का जरिया नहीं पहुंच पाया है। (आशीष बोस से प्रदीप कुमार की बातचीत पर आधारित)

लड़कियों में केंद्रित करने होंगे आर्थिक सत्ता के सूत्र


लड़कियों को मारोगे तो बहू कहां से लाओगे
इस देश की लड़कियों को बचाना प्रशासनिक से कहीं ज्यादा सामाजिक-सां स्कृतिक कार्य है। अगर इसका कोई सरल-सीधा उपाय होता तो किसी न किसी स्तर पर कामयाबी की कोई कहानी सामने होती। लड़कियों को शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण देना इसका एक उपाय हो सकता है। तमाम सामाजिक समूहों की संख्या के हिसाब से लड़कियों को क्षैतिज (हॉरिजेंटल) आरक्षण देने से हर समूह के अंदर लड़कियों के हाथ में आर्थिक सत्ता के सूत्र होंगे। लड़कियों को नौकरियां मिलने से परिवार में उनकी हैसियत भी बढ़ेगी और फैसलों में हिस्सेदारी भी। ऐसे और ऐसे कई प्रयोग करने की जरूरत है
यह एक सरकारी विज्ञापन की बहुचर्चित लाइन है, जो 2011 की जनगणना के बाद और ज्यादा प्रासंगिक हो गई है। यह तय है कि इस देश में हर पुरु ष की शादी नहीं हो सकती। एकल विवाह को अगर सामान्य चलन मान लें तो भी ऐसे पुरु षों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जिन्हें दुल्हन नहीं मिलेगी। जनगणना-दर-जनगणना भारत में स्त्री-पुरु ष अनुपात चिंताजनक बना हुआ है और छह साल से कम उम्र के बच्चों में तो यह अनुपात खतरनाक स्तर पर पहुंचता जा रहा है। 2011 की जनगणना के हाल में जारी कच्चे आंकड़ों के मुताबिक, देश में छह साल से कम उम्र के 1000 लड़कों पर सिर्फ 914 लड़कियां हैं। 2001 के आंकड़ों में यह संख्या 927 थी। जाहिर है, तेज आर्थिक विकास के इस दौर में भारत में लड़की बनकर पैदा होना खतरनाक है। भारत में अगर कोई लड़की पैदा हो रही है या होने वाली है, तो इस बात की लगभग 09 प्रतिशत आशंका है कि उसे या तो गर्भ में ही या पैदा होने के बाद जीने नहीं दिया जाएगा।
देश की राजधानी का हाल
अगर जागृति, शिक्षा, विज्ञापन, प्रचार आदि से लिंग अनुपात में सुधार मुमकिन होता तो इस मामले में दिल्ली में स्थिति बेहतर होती है। यहां सरकार का प्रचार तंत्र काफी प्रभावी है और साक्षरता दर भी देश के बाकी हिस्सों से बेहतर है। इसके बावजूद दिल्ली में 1000 लड़कों पर सिर्फ 866 लड़कियां हैं। 2001 की जनगणना के मुकाबले शिशु लिंग अनुपात में मामूली (868) गिरावट आई है। दिल्ली शहर में इससे पहले किए गए सर्वे से भी यही पता चला है कि समृद्ध इलाकों में लिंग अनुपात बुरा होता है। समृद्धि का लिंग अनुपात से रिश्ता इस बात से भी जाहिर होता है कि देश में सबसे बुरा हाल हरियाणा का है जहां का आंकड़ा 830 है जबकि पंजाब का आंकड़ा 846 है।
शिशुंिलंगानुपात में गिरावट
हालांकि पूरी आबादी के लिंग अनुपात की बात करें तो देश में प्रति 1000 पुरु षों पर अब 940 महिलाएं हैं जो 2001 में 932 के आंकड़ों से बेहतर है। हरियाणा और पंजाब जैसे निचले पायदान के राज्यों में भी यह आंकड़ा बेहतर हुआ है। इसका कारण यह है कि मेडिकल तथ्यों के मुताबिक, स्त्रियों का औसत जीवन काल पुरु षों से बेहतर होता है। लेकिन शिशु लिंगानुपात (सेक्स रेशियो) में गिरावट का मतलब है कि आने वाले दिनों में हालात बदतर होने वाले हैं।
निष्प्रभावी ही रहे हैं कानून
शिशु लिंग अनुपात में लगातार आ रही गिरावट इस सम्बंध में बनाए गए कानूनों के बावजूद है। प्रसव पूर्व लिंग परीक्षण को अपराध घोषित किए जाने के बावजूद स्थिति में सुधार नहीं हो रहा है। अगर किसी को ऐसा लगता है कि जागरूकता अभियान तथा शिक्षा और साक्षरता में प्रसार से अपने आप यह समस्या सुलझ जाएगी तो, वह भी नहीं हो पाया। कुल मिलाकर यह एक जटिल स्थिति है, जिससे निबटने के अब तक के कोई भी उपाय कारगर साबित नहीं हुए हैं।
गहरी हैं समस्या की जडें़
जनगणना ने जिस समस्या की ओर फिर से ध्यान दिलाया है, वह एक बड़ी समस्या का हिस्सा है। भारत में लैंगिक असमानता एक व्यापक समस्या है। लैंगिक समानता सूचकांक (जेंडर इक्वैलिटी इंडेक्स) पर भारत दुनिया के सबसे पिछड़े देशों में है। राजकाज से लेकर, ज्ञान और आर्थिक- सहित तमाम क्षेत्रों में महिलाओं की उपस्थिति कम है या कमजोर है। दरअसल इस समस्या की जड़ें भारतीय समाज में गहराई से धंसी हुई हैं। समाज में महिलाओं की दोयम दर्जे की स्थिति रही है। उत्पादन के साधनों पर परम्परागत रूप से महिलाओं का अधिकार नहीं रहा है और वे परिवारों में फैसला करने की हैसियत नहीं रखतीं। आधुनिकता की वजह से कुछ कॉस्मेटिक किस्म के दिखावटी बदलाव हुए हैं लेकिन अंतर्वस्तु में भारतीय समाज अपनी पुरानी जकड़न से छूटा नहीं है। इसे इस रूप में भी देखा जा सकता है कि जो तबके भारतीय समाज की मुख्यधारा से जितने दूर हैं वहां लिंग अनुपात उतना ही बेहतर है।
बेहतर लिंगानुपात आदिवासियों में
भारतीय समाज में सबसे बेहतर लिंग अनुपात आदिवासियों में है। देश के जिन तीन जिलों में सबसे बेहतर लिंग अनुपात है वे आदिवासी बहुल हैं। लाहौल-स्पीति में तो लड़कियों की संख्या लड़कों से ज्यादा है। इसी तरह दलितों में भी लिंग अनुपात अन्य समुदायों से बेहतर है। हालांकि भारत में ओबीसी की अलग से गणना नहीं होती, इसलिए अन्य की श्रेणी में विभिन्न जाति समुदायों में लिंग अनुपात की स्थिति क्या है, इसका आकलन मुमकिन नहीं है। उत्तर भारत के किसी भी राज्य में अब शिशु लिंग अनुपात 900 से ऊपर नहीं है। यानी इस समस्या का एक भौगोलिक पक्ष भी है। पूर्वोत्तर भारत के राज्य मिजोरम, मेघालय और अरु णाचल प्रदेश में लिंग अनुपात देश में सबसे अच्छा है। इसके बाद छत्तीसगढ़ और केरल आते हैं।
समृद्ध तबके में असमानता अधिक
तमाम राज्यों और शहरों तथा गांवों के आंकड़ों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि लिंग अनुपात में गिरावट की समस्या शहरों में, समृद्ध और पढ़े-लिखे लोगों में तथा सामाजिक व्यवस्था के क्रम में ऊपर के पायदान पर मौजूद समूहों में ज्यादा है। इसलिए जो लोग शिक्षा के साथ इस समस्या को जोड़कर देख रहे हैं और शिक्षा के प्रसार को समाधान के तौर पर पेश कर रहे हैं वे सचाई से दूर हैं।
लड़कियों को दें क्षैतिज आरक्षण
इस देश की लड़कियों को बचाना प्रशासनिक से कहीं ज्यादा सामाजिक-सांस्कृतिक कार्य है। अगर इसका कोई सरल-सीधा उपाय होता तो किसी न किसी स्तर पर कामयाबी की कोई कहानी सामने होती। लड़कियों को शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण देना इसका एक उपाय हो सकता है। तमाम सामाजिक समूहों की संख्या के हिसाब से लड़कियों को क्षैतिज (हॉरिजेंटल) आरक्षण देने से हर समूह के अंदर लड़कियों के हाथ में आर्थिक सत्ता के सूत्र होंगे। लड़कियों को नौकरियां मिलने से परिवार में उनकी हैसियत भी बढ़ेगी और फैसलों में हिस्सेदारी भी। ऐसे और ऐसे कई प्रयोग करने की जरूरत है। जिन शहरों में लिंग अनुपात बुरा है, वहां के लोगों पर अलग से टैक्स लगाकर उन्हें सामूहिक रूप से दंडित करने जैसे उपायों को लेकर विवाद तो बहुत होगा, लेकिन इन पर विचार किए जाने की जरूरत है। जिन परिवारों में दो लड़कियां हैं उन्हें अलग से आर्थिक प्रोत्साहन और शिक्षा से लेकर नौकरियों तक में विशेष अवसर भी दिए जा सकते हैं। लेकिन यह सब या और भी बहुत कुछ, जल्द करना होगा। बहुत जल्द, क्योंकि हालात बहुत बुरे हैं और तेजी से बिगड़ रहे हैं।