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Saturday, July 14, 2012

उम्मीद से कम क्यों रह गये मनमोहन


विगत जून माह में अंतरराष्ट्रीय पत्रिका द इकोनॉमिस्ट ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बारे में कुछ टिप्पणी की थी। अब टाइम पत्रिका ने जुलाई अंक की अपनी कवर स्टोरी में कहा है कि भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अंडर अचीवर यानी उम्मीद से कम साबित हुए हैं। वैसे तो बतौर अर्थशास्त्री और आर्थिक नीति-निर्माता खासी प्रसिद्धि है, लेकिन हाल के घटनाक्रमों खासतौर से आर्थिक हालात प्रधानमंत्री की क्षमताओं पर एक प्रश्न चिह्न जरूर लगाया है। टाइम पत्रिका का कहना है कि प्रधानमंत्री में आगे बढ़कर देश को पुन: आर्थिक वृद्धि के रास्ते पर लाने के लिए इच्छाशक्ति नहीं है। आर्थिक वृद्धि में धीमापन, भारी-भरकम राजकोषीय घाटा और डॉलर के मुकाबले रुपये में गिरावट जैसी भयंकर चुनौतियों के सामने संप्रग सरकार दिशाहीनता का प्रदर्शन कर रही है। घरेलू-विदेशी निवेशक ठंडे पड़ गए हैं। पिछले तीन सालों की अपनी दूसरी पारी में प्रधानमंत्री का आत्मविश्वास डगमगाता हुआ दिखाई दे रहा है। अपने मंत्रियों पर भी उनका कोई नियंत्रण नहीं रहा। टाइम पत्रिका का यह भी कहना है कि लोक लुभावने कार्यक्रमों के प्रति रुझान के कारण सरकार देश को आगे बढ़ाने वाले विधेयकों को पारित करवाने की दिशा में आगे नहीं बढ़ रही। द इकोनॉमिस्ट और टाइम जैसी विदेशी पत्रिकाएं संप्रग सरकार को आर्थिक मोर्चे पर इसलिए लिए भी अक्षम बता रही हैं कि वह लंबित विधेयकों को पारित नहीं करवा पा रही है। खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश तय नहीं कर पा रही है। इन पत्रिकाओं का कहना है कि इन्हीं सब कारणों से आर्थिक शिथिलता आ रही है। लेकिन वास्तव में इसका कारण अकुशल प्रबंधन और संप्रग सरकार की गलत आर्थिक नीतियां हैं। प्रधानमंत्री खुद भी मानते हैं कि अर्थव्यवस्था की सेहत बिगड़ रही है। केंद्रीय सांख्यिकी संगठन द्वारा हाल ही में प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2011-12 में जीडीपी की वृद्धि दर मात्र 6.5 प्रतिशत ही रह गई है, जो पिछले दो सालों में 8.4 प्रतिशत रही थी। अगर औद्योगिक उत्पादन की बात करें तो इस वर्ष औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर घटकर मात्र 2.9 प्रतिशत ही रह गई है। हाल की तिमाहियों में तो यह नकारात्मक तक पहुंच गई थी। राजकोषीय घाटा जीडीपी के छह प्रतिशत तक पहुंच रहा है। पिछले 4-5 महीनों में रुपये में लगभग 20 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। खाद्यान्नों और अन्य खाद्य पदार्थो के संतोषजनक उत्पादन के कारण और खाद्य मुद्रास्फीति थमने के बावजूद अन्य पदार्थो की कीमतें थमने का नाम नहीं ले रही। डॉलर के मुकाबले रुपये की गिरावट और कच्चे तेल की कीमतों की वृद्धि के चलते मुद्रास्फीति ने आम आदमी का जीना मुहाल कर दिया है। विकास का गलत पैमाना प्रधानमंत्री हों या अन्य नीति-निर्माता, लगातार विकास का आधार जीडीपी ग्रोथ को मानते हैं। उनका मानना है कि अगर जीडीपी नौ प्रतिशत तक बढ़ जाए तो देश की सारी समस्याओं का समाधान हो जाएगा। इसलिए जीडीपी को विकास का पैमाना मान लिया जाता है। हम देखते हैं कि ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना (2007-12) के दौरान आर्थिक वृद्धि की दर लगभग आठ प्रतिशत रही, लेकिन इसके बावजूद देश में लगभग 30 प्रतिशत लोग अब भी गरीबी रेखा से नीचे हैं। वर्ष 2004-05 और 2009-10 के बीच 20 लाख से भी कम अतिरिक्त रोजगार का सृजन हो पाया। स्वास्थ्य संबंधी आंकड़ों के अनुसार कुपोषण की स्थिति यथावत है यानी जीडीपी ग्रोथ के बावजूद मानव विकास में स्थितियां बेहतर नहीं हो रही हैं। इसका कारण यह है कि एक ओर तो असमानताएं बढ़ रही हैं तो दूसरी ओर अर्थव्यवस्था का वह क्षेत्र जो देशवासियों के लिए खाद्य सुरक्षा दिला सकता है, उपेक्षित पड़ा हुआ है। कृषि क्षेत्र जो अर्थव्यवस्था में 60 प्रतिशत हिस्सा रखता है, विकास की इस तथाकथित प्रक्रिया से पूर्णतया अछूता पड़ा है। 1980-81 में जो क्षेत्र जीडीपी में 38 प्रतिशत योगदान देता था, अब मात्र 13.9 प्रतिशत ही योगदान दे रहा है। द इकॉनोमिस्ट के अनुसार ऐसा लगता है कि भारत की ग्रोथ की कहानी का अंत होने जा रहा है। बता दें कि दुनिया के अर्थशास्त्री भारत की नीची विकास दर को अपमानबोधक हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ का नाम दिया करते थे। दुनिया में देश की आर्थिक ताकत का डंका बजाने के लिए जरूरी है कि हमारे नीति निर्माता विकास के पैमाने को सही करें। सिर्फ जीडीपी ग्रोथ नहीं, सभी क्षेत्रों में एक-सा विकास, खाद्य सुरक्षा की गारंटी, गरीबी व बेरोजगारी का निराकरण ही हमारे विकास को स्थाई बना सकते हैं। हमारे रुपये की दुर्गति आर्थिक कुप्रबंधन का जीता जागता उदाहरण है। पिछले कुछ समय से भारतीय रुपया विदेशी मुद्राओं की तुलना में लगातार कमजोर होता जा रहा है। फरवरी 2012 यानी 4-5 महीने पहले एक डॉलर की विनियमय दर 48.7 रुपये थी, वह अब 57-58 रुपये प्रति डॉलर के आस-पास है। माना जाता है कि बढ़ता व्यापार घाटा इसका कारण है और इसके लिए जिम्मेदार है सोने-चांदी का बढ़ता आयात, अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती तेल की कीमतें और चीन से लगातार बढ़ता आयात। रुपये की कमजोरी के लिए विदेशी संस्थागत निवेशकों द्वारा बड़े पैमाने पर विदेशी मुद्रा का अंतरण भी काफी हद तक जिम्मेदार माना जा रहा है। नीतियों में बदलाव की दरकार यह सही है कि अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों पर हमारा ज्यादा नियंत्रण नहीं है, लेकिन हम निश्चित रूप से निर्णय कर सकते हैं कि आयात का स्त्रोत क्या हो। यदि हम ईरान से कच्चे तेल का आयात करें तो हम डॉलर की बजाय 45 प्रतिशत भुगतान रुपये में कर सकते हैं। सोने का आयात 2011-12 में 50 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया, जो 2010-11 में 25 बिलियन डॉलर था। सोने का बढ़ता आयात रुपये के लिए मुश्किलें खड़ा कर रहा है। यह बताना ठीक होगा कि 2जी घोटाला और सोने का आयात, दोनों जुड़े हुए हैं। घोटालों के बाद काले धन को सोने के रूप में परिवर्तित किया जा रहा है। सोने के आयात पर प्रभावी नियंत्रण लगाने की जरूरत थी, लेकिन सरकार ने पूरे साल कुछ नहीं किया और देश भयंकर भुगतान संकट में पड़ गया। चीन से आयात पर अंकुश लगाने की जरूरत है, लेकिन सरकार इस दिशा में कोई कदम नहीं उठा रही। यही नहीं, विदेशी निवेशकों की कारगुजारियों के कारण देश को करों के रूप में हर वर्ष कम से कम एक लाख करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है, लेकिन सरकार उन पर अंकुश लगाने के बजाय उन्हें तरह-तरह की रियायतें दे रही है। इस वर्ष के बजट में प्रस्तावित गार कानून में भी ढिलाई के संकेत दिए जा रहे हैं। यदि सरकार इच्छाशक्ति नहीं दिखाती है तो हमारा भुगतान संकट और ज्यादा बढ़ सकता है। अर्थव्यवस्था की इन तमाम बदहालियों के बावजूद सरकार नीतिगत विकल्प सुझाने में असफल दिखाई दे रही है। आर्थिक वृद्धि की दर के घटने का एक बड़ा कारण फैक्ट्री उत्पादन में धीमापन है और यह मुख्यत: दो कारणों से है- एक, कच्चे माल और ईधन की कीमतों में वृद्धि और दूसरा, ब्याज दरों में लगातार वृद्धि। कच्चे माल और ईधन की कीमतों में वृद्धि रुपये की कमजोरी के कारण ज्यादा हुई है और इसके लिए जरूरी है कि रुपये को मजबूत बनाया जाए। ब्याज दरों में वृद्धि मुद्रा स्फीति के कारण है और इसके लिए जरूरी है कि मुद्रास्फीति को काबू में किया जाए। ब्याज दरों में कमी करते हुए ही हम फैक्ट्री उत्पादन, इंफ्रास्ट्रक्चर और अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों में निवेश को प्रोत्साहित करते हुए अर्थव्यवस्था को बचा सकते हैं। (लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं)

Wednesday, February 15, 2012

ब्रिटेन की मदद के मोहताज क्यों


पिछले दिनों ब्रिटेन में सत्तारूढ़ कंजरवेटिव पार्टी के कुछ सांसदों की भारत को आर्थिक सहायता बंद करने की मुहिम शुरू होने से यहां एक नई बहस छिड़ गई है। किसी का कहना है कि इसके लिए खुद भारत जिम्मेदार है तो कहीं कहा जा रहा है कि भारत को उसकी आर्थिक सहायता ठुकरा देनी चाहिए। दूसरी ओर खुद भारत सरकार ने भी कह दिया है कि वह ब्रिटेन से आर्थिक सहायता नहीं चाहता है। बता दें कि ब्रिटेन से भारत को वर्तमान में 26 करोड़ पाउंड की आर्थिक सहायता हर वर्ष मिलती है। हाल ही में ब्रिटेन के विकास सचिव ने भारत के तीन सबसे गरीब राज्यों को केंद्रित करते हुए अगले चार साल में 110 करोड़ पाउंड की सहायता देने का अनुमोदन किया है। हालांकि ब्रिटेन द्विपक्षीय सहायता के संदर्भ में भारत के लिए सबसे ज्यादा सहायता देने वाला देश है, लेकिन इसके बाद भी वह 1 अरब डॉलर का महज एक तिहाई ही भारत को आर्थिक सहायता के रूप में देता है। वास्तव में देखा जाए तो भूमंडलीकरण के बाद विदेशों से मिलने वाली सहायता राशि निरंतर घटती ही जा रही है। अगर भारत को मिलने वाली कुल सहायता की बात करें तो भारत को वर्ष 2010-11 में दुनिया के दूसरे मुल्कों से 7.8 अरब डॉलर की आर्थिक सहायता प्राप्त हुई, जबकि भारत ने अफ्रीका सहित अन्य अल्प विकसित देशों को 2.84 अरब डॉलर की आर्थिक सहायता प्रदान की। ब्रिटेन में भारत को सहायता देने के मसले पर आलोचना करने वालों का कहना है कि जब भारत में 7 प्रतिशत से भी अधिक गति से आर्थिक विकास हो रहा है, क्रय शक्ति समता के आधार पर भारत आर्थिक रूप से दुनिया का तीसरा सबसे ज्यादा शक्तिशाली देश बन चुका है, अपने बलबूते पर अंतरिक्ष कार्यक्रम संचालित कर रहा है, हजारों किलोमीटर दूर मारक क्षमता वाले प्रक्षेपास्त्र बना रहा है, स्वयं का परमाणु कार्यक्रम करने में सक्षम है तो ऐसे राष्ट्र को सहायता लेने की क्या जरूरत है। यही नहीं, भारत में अरबपतियों की संख्या भी अच्छी खासी है और खुद भारत अफ्रीका सरीखे देशों को विकास के लिए भारी आर्थिक सहायता दे रहा है। ऐसे में भारत को आर्थिक देने का कोई औचित्य नहीं है। दूसरी ओर ब्रिटेन सरकार ने इस विवाद को विराम देने का प्रयास करते हुए यह कहा है कि वह भारत को दी जाने वाली आर्थिक सहायता वहां की केंद्र सरकार को न देते हुए, उन राज्यों को सीधा प्रदान करेगी, जो सबसे ज्यादा गरीब और पिछड़े हैं। ब्रिटिश सरकार का कहना है कि भारत के तीन ऐसे सबसे गरीब राज्यों को चिह्नित करते हुए वहां के गरीबों खासतौर पर महिलाओं और बच्चों के आर्थिक उत्थान पर यह आर्थिक सहायता केंद्रित रहेगी। ब्रिटेन के विकास सचिव द्वारा अनुमोदित 1.1 अरब पाउंड की अगले चार वर्षो के लिए सहायता का आवंटन भी इसी तर्ज पर होगा। तर्क कुछ भी दिए जाएं, वास्तविकता यह है कि ब्रिटेन द्वारा भारत को दी जाने वाली आर्थिक सहायता के बारे में यह विवाद भारत और ब्रिटेन के बीच रिश्तों में आई कड़वाहट के कारण पैदा हुआ है। दरअसल, पिछले दिनों भारत ने ब्रिटेन में बने लड़ाकू विमान टाइफून की जगह फ्रांस में बने रफेल जेट के साथ रक्षा सौदा करने को ज्यादा तवज्जो दी। इस बहस में नया मोड़ तब आया, जब ब्रिटेन के अखबार संडे टेलीग्राफ ने भारतीय विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी के एक बयान का जिक्र किया, जिसमें उन्होंने राज्यसभा में यह कहा था कि भारत को ब्रिटेन द्वारा दी जाने वाली सहायता राशि की जरूरत नहीं है, क्योंकि यह राशि भारत के लिहाज से बहुत ही कम है। इस पूरे प्रकरण के कारण ब्रिटेन के कुछ सांसद भड़के हुए हैं। ऐसा लगता है कि ब्रिटेन भारत में लगभग 180 साल शासन करने के कारण अपनी औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर नहीं आ पा रहा है। ब्रिटेन को यह नहीं भूलना चाहिए कि आज परिस्थितियां अलग हैं। भारत का पहले जहां दुनिया के विदेशी व्यापार में भारत का हिस्सा मात्र आधा प्रतिशत होता था, वह अब बढ़कर 1.5 तक पहुंच चुका है। आज भारत से लगभग 250 अरब डॉलर से भी अधिक की वस्तुओं और सेवाओं का निर्यात होता है। इसी तरह भारत 370 अरब डॉलर की वस्तुओं का आयात भी करता है। आज से करीब 10 साल पहले राजग के शासन काल में वित्तमंत्री जसवंत सिंह ने पहली बार सरकार के बजट में गरीब मुल्कों को भारत से आर्थिक सहायता देने के लिए प्रावधान रखा था। वर्ष 2003 में भारत सरकार ने यह निर्णय लिया कि अब वह केवल छह देशों अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, जापान, यूरोपीय समुदाय और रूस से ही आर्थिक सहायता लेगी और उस समय सरकार ने 7,491 करोड़ रुपये के द्विपक्षीय ऋणों को वापस भी कर दिया। हालांकि यह सही है कि आज भारत में शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य सामाजिक सेवाओं के लिए अधिक से अधिक धन राशि की जरूरत है ताकि देश की गरीब जनता के लिए अधिकाधिक सुविधाएं जुटाई जा सकें। यहां यह ध्यान देने योग्य है कि यह आर्थिक सहायता अधिकतर ऋणों के रूप में होती है और उसके साथ ब्याज सहित देनदारी भी जुड़ी होती है। यही नहीं, विदेशों से मिलने वाली सहायता में बहुत-सी शर्ते भी साथ में जुड़ी होती हैं, जिसका असर देश की संप्रभुता और आर्थिक विकास की दिशा पर पड़ता है। आज हमारा देश सॉफ्टवेयर प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में पूरी दुनिया में अपना एक मुकाम बना चुका है। भारत की अकेली एक कंपनी टीसीएस द्वारा अकेले ही 7.5 अरब डॉलर के सॉफ्टवेयर का निर्यात किया जाता है। अपार व्यावसायिक अवसरों के कारण भारत को अप्रैल 2000 से लेकर नवंबर 2011 तक 390 अरब डॉलर का विदेशी निवेश (प्रत्यक्ष एवं संस्थागत) प्राप्त हो चुका है। दुनिया भर में फैले भारतीयों द्वारा वर्ष 2010 में 5.4 अरब डॉलर से भी अधिक भारत को भेजे गए। भारत अपने प्रवासियों द्वारा दुनिया से राशि प्राप्त करने वाला सबसे बड़ा देश है। चीन को भी अपने प्रवासियों से भारत से कम राशि प्राप्त होती है। ऐसे में ब्रिटेन की 26 करोड़ पाउंड यानी कोई दो हजार करोड़ रुपये की सहायता राशि कोई ऐसा बड़ा मुद्दा नहीं है, जिसके कारण भारत के आर्थिक विकास या गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों में कोई विशेष अंतर आएगा। भारत में चार बड़े फ्लाई ओवर बनाने में ही इतनी धन राशि खप जाती है। केंद्रीय सरकार का वर्ष 2011-12 का बजट ही 12 लाख 57 हजार करोड़ रुपये का था। ऐसे में देश के सम्मान के साथ समझौता करते हुए मात्र 26 करोड़ पाउंड की वार्षिक सहायता (जो अधिकतर ऋण के रूप में ही है) लेने की कोई जरूरत देश को नहीं है। आज भारत को आर्थिक सहायता (ऋण) देने वाले देश भारत में ऐसे कानूनी, प्रशासनिक और वैधानिक परिवर्तन कराने का प्रयास कर रहे हैं, जिससे देश अपनी प्राथमिकताओं से अलग उनके हित साधने वाली आर्थिक नीतियां बनाने को बाध्य हो जाए। विश्व बैंक द्वारा सामाजिक सेवाओं में विदेशी कंपनियों की दावेदारी बढ़ाते हुए विविध प्रकार के दबाव बनाने के कई मामले सामने आए हैं। ऐसे में भारत को विदेशों पर अपनी निर्भरता को समाप्त करते हुए आत्मनिर्भरता के आधार पर देश के विकास को आगे बढ़ाने का काम करना होगा। ब्रिटेन से आने वाली सहायता को वापस भेजते हुए इसकी शुरुआत की जा सकती है। (लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं)

Friday, November 25, 2011

समाप्त होता हड़ताल का अधिकार


भूमंडलीकरण के दौर में हड़तालें सुनने में नहीं आ रही हैं। एक समय था जब निजी क्षेत्र हो अथवा सार्वजनिक क्षेत्र, हड़ताल होना अथवा तालाबंदी एक सामान्य सी बात थी। 1989 में कुल 1397 हड़तालें हुई और 389 तालाबंदियां हुई इनमें कुल 1364 हजार मजदूर शामिल थे। वर्ष 2008 तक आते-आते मात्र 250 हड़ताल और 182 तालाबंदी की घटनाएं हुई। हड़ताल और तालाबंदी दोनों श्रम विवाद के सूचक हैं। इस तरह क्या यह समझा जा सकता है कि पहले से श्रम विवाद अब कम हो गए हैं अथवा मजदूरों और प्रबंधन के बीच संबंध बहुत मधुर हो गया है। शायद ऐसा कुछ नहीं हुआ है, बल्कि भूमंडलीकरण के वर्तमान दौर में ठेके पर मजदूर रखने की परंपरा शुरू हो गई है। नियमित मजदूर और कामगार अब लगभग नहीं रखे जा रहे। सफाई कर्मचारी हों, गार्ड हों, ड्राईवर अथवा क्लर्क ज्यादातर अब ठेके पर ही रखे जा रहे हैं। विनिर्माण क्षेत्र में अब अधिकतर काम सहायक इकाईयों द्वारा करवा लिया जाता है। लघु उद्यमी ठेके के मजदूरों से ही सब काम करवा लेते हैं। नियमित कर्मचारी जैसे-जैसे रिटायर होते जाते हैं नई भर्तियां ठेके के कामगारों की ही हो रही हैं। ये कामगार सामान्यत: किसी भी प्रकार के श्रम कानूनों के अंतर्गत नहीं आते और इस कारण उनका हड़ताल करते हुए कोई लाभ लेना संभव ही नहीं है। प्रबंधन के साथ किसी भी प्रकार का विवाद उनकी नौकरी ही खत्म कर देता है। हालांकि देश में श्रमिकों के हित की रक्षा के लिए कड़े श्रम कानूनों का प्रावधान है, जिनके अनुसार मजदूरों को भविष्य निधि, ईएसआई और अन्य प्रकार की सुविधाएं देने के नियम हैं, लेकिन यह सभी नियम उन्हीं कामगारों पर लागू होते हैं जो किसी फर्म के नियमित कर्मचारी होते हैं। ठेकेदारों के माध्यम से भाड़े पर लिए कामगारों पर यह नियम लागू नहीं होते। ऐसे में जब देश में विनिर्माण, सेवा क्षेत्र इत्यादि में ठेके पर लिए गए कामगारों का अनुपात लगातार बढ़ता जा रहा है तो कामगारों में असुरक्षा बढ़नी स्वाभाविक है। इसका एक और नुकसान उन्हें विभिन्न प्रकार के शोषण का शिकार होना है। हाल ही में देश की सबसे बड़ी कार कंपनी मारुति में श्रमिकों की हड़ताल खासी चर्चा में रही है। हरियाणा स्थित मारुति के मनेसर संयंत्र में श्रमिकों और प्रबंधन के बीच खासा संघर्ष रहा है। इसके अतिरिक्त मारुति की अन्य इकाईयों में भी श्रमिकों की हड़ताल विशेष रूप से चर्चा में रही। इस हड़ताल के चलते मारुति का उत्पादन और आमदनी तो प्रभावित हो ही रही है, साथ ही साथ मारुति पर बाजार छिनने का भी खतरा मंडरा रहा है। इस हड़ताल की विशेषता यह है कि श्रमिक अधिक मजदूरी के लिए नहीं, बल्कि बर्खास्त श्रमिकों की बहाली और स्वतंत्र श्रमिक संघ को मान्यता देने की मांग को लेकर हड़ताल पर हैं। प्रबंधन और श्रमिकों के बीच में हुआ तथाकथित समझौता भी विवाद का विषय बना हुआ है, क्योंकि इसके माध्यम से प्रबंधन द्वारा श्रमिकों से सही आचरण की शर्त मनवाई गई है। अब श्रमिकों पर यह आरोप लगाया जा रहा है कि वे समझौते का उल्लंघन कर रहे हैं। मारूति प्रबंधन हड़ताली कर्मचारियों के साथ समझौते की बजाय मनेसर संयंत्र को ही कहीं और स्थानांतरित करने की फिराक में हैं। पूर्व में एयर इंडिया के पायलटों की हड़ताल भी काफी चर्चा में रही। उसकी खास बात यह थी कि उनकी मांगों में से एक मांग यह थी कि एयर इंडिया का प्रबंधन ठीक किया जाए और उसमें व्याप्त भ्रष्टाचार समाप्त हो। कुछ समय पहले कैग द्वारा दी गई रिपोर्ट के आधार पर पायलटों का तर्क सही सिद्ध होता है। एयर इंडिया के द्वारा निजी क्षेत्र की विमानन कंपनियों को लाभ पहुंचाने हेतु जानबूझकर लाभकारी मार्गो से अपनी सेवाएं समाप्त करने, बिना आवश्यकता के जानबूझकर विमानों को लीज पर लेने और 44 हजार करोड़ रुपये के नए विमानों की खरीद आदि के निर्णय वास्तव में एयर इंडिया को डुबोने के लिए पर्याप्त कारण रहे हैं। आनन-फानन में पायलटों की हड़ताल तो समाप्त हो गई, लेकिन ये प्रश्न अभी भी बरकरार हैं। एयर इंडिया के पायलटों की अधिकतर मांगों को दरकिनार करते हुए बर्खास्तगी का डर दिखाकर पायलटों की हड़ताल समाप्त करवा दी गई। मारूति के हड़ताल के संदर्भ में हरियाणा सरकार श्रमिक हड़ताल को एक राजनीतिक षड्यंत्र बता रही है। यदि मामले की तह तक जाएं तो पाते हैं कि निजी क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिक शोषण और प्रतिकूल कार्य दशाओं के कारण निरंतर कुंठा का शिकार बन रहे हैं। नए प्रकार के क्षेत्रों जैसे बीपीओ, कॉल सेंटर और आईटी के क्षेत्र में कर्मचारियों को यूनियन बनाने का अधिकार भी नहीं है। उसी प्रकार खुदरा क्षेत्र में उतर रही बड़ी कंपनियों वॉलमार्ट आदि में काम करने वाले कर्मचारी यूनियन नहीं बना सकते। देश में किसी भी प्रकार से प्रवेश पाने की इच्छुक दुनिया की सबसे बड़ी खुदरा कंपनी, श्रमिकों के शोषण और यूनियन बनाने का प्रयास करने वालों की प्रताड़ना के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है। देश की बड़ी-बड़ी कंपनियों द्वारा अपने अधिकतम कार्यो की आउटसोर्सिग करवाने के कारण वहां कार्यरत श्रमिकों पर नौकरी छूटने का डर उन्हें अपने हितों के लिए लड़ने से रोकता है। इन सब कारणों से देश में हड़तालें और तालाबंदियां लगभग समाप्ति की ओर है। इस सबसे हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि वास्तव में देश में हड़तालों और तालाबंदियों के कम होने का कारण यह नहीं है कि श्रमिकों का शोषण नहीं हो रहा है अथवा प्रबंधन श्रमिकों का पूरा ख्याल रख रहा है या नहीं। यह भी कि कार्य दशाएं पहले से कहीं बेहतर हो गई हैं कि नहीं। सच्चाई तो यह है कि केंद्र और राज्य सरकारों तथा उनके द्वारा संचालित संस्थानों में जहां केंद्रीय वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होती हैं के अतिरिक्त अर्थव्यवस्था के तमाम दूसरे क्षेत्रों में श्रमिकों को मंहगाई भत्ता तक नसीब नहीं होता है। समय-समय पर की जाने वाली वेतन वृद्धि तथाकथित रूप से कंपनी के नतीजों पर निर्भर करती है। ऐसे में अधिकतर श्रमिक जो ठेकेदारी प्रथा के अंतर्गत काम करते हैं न्यूनतम वेतन भी नहीं पाते हैं। कुछ विशेष प्रकार के कार्यो को छोड़कर शेष श्रमिक नितांत कम वेतन पर काम करने के लिए बाध्य हैं। ऐसे में कंपनियों की जेबें मोटी होती जा रही है और श्रमिकों को जीवन यापन के लिए संघर्ष करना पड़ता है। निजी क्षेत्र की कंपनियां मोटा लाभ कमा रही हैं। वर्ष 1990-91 में जहां केंद्र सरकार के सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठानों का कर लाभ मात्र 3820 करोड़ रुपये था वर्ष 2009-10 में वह बढ़कर लगभग 1,24,126 करोड़ रुपये पहुंच गया। ऐसे में श्रमिकों के हितों की रक्षा के लिए श्रम कानूनों में बदलाव करते हुए ठेकेदारी प्रथा के माध्यम से काम करवाने को भी कंपनी का कर्मचारी माना जाना चाहिए। यदि ऐसा होता है तो न सिर्फ श्रमिकों का कंपनी के प्रति नजरिया बदलेगा, बल्कि वह अपने काम और कंपनी के उत्पादन में अधिक वफादारी सेकाम करेगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

Wednesday, June 1, 2011

बेमानी होती गरीबी रेखा


पिछले दिनों एक जनहित याचिका के संबंध में सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात पर चिंता व्यक्त की है कि दुनिया की महाशक्ति बन रहे भारत जैसे देश में यह एक विडंबना है कि अब भी देश के कई हिस्सों में भुखमरी से मौतें हो रही हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने यह सवाल खड़ा किया है कि देश में दो भारत कैसे हो सकते हैं- एक भुखमरी से त्रस्त और दूसरा अमीरी में मस्त। देश में गरीबी के आंकड़ों के बारे में लगातार भिन्न-भिन्न आंकड़े सरकार द्वारा प्रस्तुत किए जाते हैं। ऐसे में समझ ही नहीं आता कि भारत में कितने लोग गरीब हैं। समय-समय पर गरीबी की रेखा की बदलती परिभाषाएं इस विषय को और अधिक उलझा देती हैं। स्वाभाविक है कि सर्वमान्य आंकड़ों के अभाव में गरीबी उन्मूलन के उपाय सार्थक नहीं हो सकते। पूर्व में सरकार द्वारा गरीबी उन्मूलन के विभिन्न उपाय अपनाए जाते रहे हैं। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए सस्ता अनाज एवं अन्य खाद्य पदार्थ व केरोसिन उपलब्ध कराया जाना, ग्रामीण और शहरी रोजगार कार्यक्रम, मुफ्त स्वास्थ्य सुविधाएं आदि इस दिशा में कुछ प्रमुख सरकारी कार्यक्रम रहे हैं। सरकार द्वारा खाद्य सुरक्षा कानून बनाने की बात भी की जा रही है, जिसके अनुसार गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले सभी लोगों को आवश्यक खाद्यान्न उपलब्ध कराने का प्रावधान होगा। सर्वोच्च न्यायालय ने योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया से यह प्रश्न पूछा है कि योजना आयोग किस प्रकार से आज गरीबी की रेखा से नीचे रहने वाले लोगों को कुल जनसंख्या का मात्र 36 प्रतिशत ही मानता है। ध्यान देने वाली बात है कि कुछ समय पहले योजना आयोग द्वारा प्रो. सुरेश तेंदुलकर की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समिति का गठन भी किया गया था, जिसने गरीबी के मापन हेतु एक अलग परिभाषा सुझाई थी, जिसके आधार पर गरीबी की रेखा को पुन: परिभाषित भी किया गया। तेंदुलकर रिपोर्ट से पहले तो सरकार यह कह रही थी कि देश में 2004-05 में केवल 28 प्रतिशत लोग ही गरीब थे और उनका यह प्रतिशत 2007 तक घटकर मात्र 20 प्रतिशत ही रह गया। प्रो. तेंदुलकर ने गरीबी की जो नई परिभाषा सुझाई (जिसे भारत सरकार ने स्वीकार भी किया), उसमें उन्होंने गरीबी का आकलन करते हुए शिक्षा और स्वास्थ्य पर आवश्यक खर्च को शामिल किया है, लेकिन प्रो. तेंदुलकर की परिभाषा के अनुसार भी गरीबी की रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की जांच करने का जो तरीका बनाया गया, उसके अनुसार भी जिस व्यक्ति की मासिक आय ग्रामीण क्षेत्र में 446.68 रुपये और शहरी क्षेत्र में 578.8 रुपये से अधिक है, वह गरीबी की रेखा से ऊपर माना गया। सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष योजना आयोग ने ये आंकड़े प्रस्तुत किए हैं। यदि इसके इतिहास में जाएं तो देखते हैं कि सैद्धांतिक रूप में ग्रामीण क्षेत्र में उन लोगों को गरीबी की रेखा से नीचे माना जाता था, जिनका कैलोरी उपभोग 2400 कैलोरी से कम और शहरी क्षेत्र में 2100 कैलोरी से कम होता था। उसके अनुसार आवश्यक उपभोग को आधार बनाकर गरीबी की रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या का आकलन होता था। इसके आधार पर योजना आयोग के आंकड़ों के अनुसार, 1973-74 में 56 प्रतिशत लोग गरीबी की रेखा से नीचे रहते थे। 1973-74 तक आवश्यक खर्च के आंकड़े सही रूप से लागू किए गए और इस प्रकार गरीबी का आकलन भी ठीक होता था, लेकिन 1993-94 और 1990-2000 में इस संबंध में सरकार द्वारा प्रयुक्त उपभोक्ता खर्च के आंकड़े काफी कम दिखाए गए। आलोचकों का कहना है कि सरकार द्वारा प्रयुक्त आंकड़ों के कारण गरीबी रातोंरात कम होती दिखाई दी। यदि सही आंकड़े प्रयुक्त किए जाएं तो 2400 कैलोरी से कम उपभोग करने वाले ग्रामीण क्षेत्र के लोगों की संख्या 80 प्रतिशत और शहरी क्षेत्र में 2100 से कम कैलोरी प्राप्त करने वालों की संख्या 50 प्रतिशत बैठती है यानी कहा जा सकता है कि सरकार द्वारा आंकड़ों की बाजीगरी के माध्यम से गरीबी की रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या जान-बूझकर कम दिखाई जाती रही है। योजना आयोग की परिभाषा के अनुसार गरीबी का आकलन करें तो देखते हैं कि शहरी क्षेत्रों में प्रतिदिन 20 रुपये पाने वाले को भी सरकारी मापदंडों के अनुसार गरीब नहीं माना जाएगा। यहां सवाल यह उठता है कि जब दुनिया भर में गरीबी की जो परिभाषा इस्तेमाल की जाती हैं, उसके अनुसार न्यूनतम 1.25 अमेरिकी डॉलर से कम आमदनी वाले को गरीब माना जाएगा। रुपयों में यह राशि 58 रुपये बनती है। हालांकि यह राशि भी न्यूनतम गुजारे के लिए आवश्यक आमदनी से कहीं कम है, फिर भी इससे एक तिहाई आमदनी की परिभाषा वास्तव में हास्यास्पद ही मानी जाएगी। योजना आयोग की स्वयं की परिभाषा, जिसके अनुसार शहरी क्षेत्रों में जो 2100 कैलोरी का उपभोग न्यूनतम है, मात्र 19 रुपये में और ग्रामीण क्षेत्रों में 2400 कैलोरी मात्र 15 रुपये प्रतिदिन, यह कैसे संभव है? वास्तव में यह सरकार की संवेदनहीनता का भी परिचायक कहा जा सकता है, जिसके अनुसार गरीबी की रेखा की परिभाषा न्यूनतम जीवन लागत का भी प्रावधान नहीं कर पाती। कुछ समय पहले असंगठित क्षेत्र के लिए गठित अर्जुन सेन गुप्ता समिति द्वारा यह खुलासा किया गया था कि देश में 77 प्रतिशत से भी अधिक लोग प्रतिदिन 20 रुपये या उससे कम पर गुजर करते हैं। एक आदमी की न्यूनतम आवश्यकता भोजन, आवास और कपड़े की होती है। आसानी से समझ में आता है कि इतने कम में इन सभी जरूरतों की पूर्ति करना संभव नहीं होता यानी कह सकते हैं कि देश में 77 प्रतिशत से भी अधिक लोग अपनी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति भी नहीं कर पाते हैं। यदि हम अर्जुन सेन गुप्ता समिति की रपट मानें तो देश के तीन-चौथाई से भी अधिक लोग गरीब हैं। अगर सरकार द्वारा अंक गणितीय तरीके से मापी गई गरीबी देखें तो मात्र 36 प्रतिशत लोग ही देश में गरीब हैं। अब प्रश्न उठता है कि एक ही सरकार द्वारा गरीबी की रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की संख्या में इतना भारी अंतर कैसे हो जाता है? एक ब्रिटिश शोध संस्था ने यह पाया है कि भारत में तीन वर्ष की आयु वर्ग के 3,000 बच्चे प्रतिदिन पोषक आहार की कमी के कारण दम तोड़ देते हैं। ये आंकड़े संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार ही हैं, जिसके अनुसार भारत में 22 करोड़ लोग भुखमरी के शिकार हैं। चूंकि केवल कैलोरी के आधार पर गरीबी की रेखा का आकलन किया जाता रहा है, वह भी पूरा सही नहीं है, इसलिए यह वास्तव में गरीबी की रेखा नहीं, बल्कि भुखमरी की रेखा है। वास्तव में एक व्यक्ति के जीवन में केवल भोजन ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास सहित विविध प्रकार के खर्च करने पड़ते हैं। यदि इन सबका हिसाब जोड़ा जाए तो गरीबी की रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या कहीं ज्यादा बैठेगी। यदि सरकार नेक-नीयत से खाद्य सुरक्षा अधिनियम लाना और लागू करना चाहती है तो उसे गरीबी की रेखा की अवधारणा को न्यायोचित बनाना होगा। (लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं)

Sunday, May 15, 2011

भुखमरी के बीच खाद्यान्न निर्यात की तैयारी


वर्ष 2010-11 में अनाज का उत्पादन 232 मिलियन टन होने की उम्मीद में देश के कृषि मंत्री देश से गेहूं निर्यात करने की तैयारी करने लगे हैं। ध्यान देने वाली बात है कि वर्ष 2009-10 में यह उत्पादन महज 218 मिलियन टन ही था। देश में भंडारण की कमी के कारण अनाज के सड़ने की घटनाएं देशवासियों को व्यथित करती ही रहती हैं। ऐसे में कृषि मंत्री देशवासियों के लिए पर्याप्त अनाज की उपलब्धता सुनिश्चित करने की बजाय गेहूं निर्यात को वरीयता दे रहे हैं। हालांकि आज हमारी राष्ट्रीय आय का 85.4 प्रतिशत गैर कृषि कार्यो से प्राप्त होता है और लगभग 50 प्रतिशत लोग गैर कृषि कार्यो में संलग्न हैं, फिर भी भारत को अब भी यदि कृषि प्रधान देश कहें तो गलत नहीं होगा। आज भी देश की अधिकाधिक जनसंख्या कृषि कार्यो में संलग्न है। चाहे राष्ट्रीय आय में कृषि का योगदान 14.6 प्रतिशत ही रह गया हो, लेकिन अब भी देश के लोगों का पेट भरने के लिए खाद्य पदार्थो की उपलब्धता देश की कृषि से ही होती है। भले ही चंद अमीरों के लिए विदेशी चॉकलेट बाजारों में उपलब्ध है, लेकिन जीवन के लिए आवश्यक सामग्री मसलन गेहूं, चावल, दालें, चीनी, खाद्य तेल, मछली, अंडे, दूध आदि कृषि, पशुपालन से ही प्राप्त होते हैं। देश में प्रति व्यक्ति खाद्यान्न उपलब्धता पिछले 20 वर्षो में काफी घट गई है और देश में प्रतिव्यक्ति खाद्यान्न उपलब्धता 185 किलो प्रतिव्यक्ति प्रतिवर्ष से घटकर मात्र 162 किलोग्राम ही रह गई है। देश खाद्यान्नों के निर्यातक से अब खाद्यान्नों का आयातक बन चुका है, अभी भी देश की अधिकांश खाद्य पदार्थो की आपूर्ति देश की कृषि एवं सहायक गतिविधियों से ही प्राप्त होती है। कृषि की हो रही अनदेखी आज भारत 121 करोड़ लोगों का देश बन चुका है। देश की खाद्यान्नों एवं अन्य खाद्य पदार्थो की आवश्यकता भी बढ़ी है। जरूरत है खाद्य पदार्थो के अधिक उत्पादन, बेहतर रखरखाव और बेहतर वितरण प्रणाली की। देश का किसान कड़ी मेहनत से अधिक पैदावार तो दे सकता है, लेकिन उसके लिए जरूरी है कि देश की सरकार कृषि विकास के लिए आवश्यक नीतियां बनाकर उन्हें लागू करे। दुर्भाग्य का विषय है कि सरकार कृषि की बदहाली के बावजूद उसकी लगातार अनदेखी करती रही है। 90 के दशक में सरकारी बजट का लगभग 27 प्रतिशत कृषि और ग्रामीण विकास पर खर्च होता था, वह अब घटकर लगभग 5 प्रतिशत रह गया है। गेहूं और चावल जैसे जिंसों की खरीद तो सरकारी एजेंसियां करती हैं, लेकिन अधिकतर कृषि उत्पादों के संदर्भ में किसान को बाजारी शक्तियों के हाथों छोड़ दिया जाता है। आर्थिक क्षमता के अभाव और उचित भंडारण की व्यवस्था के अभाव के चलते किसान को उसकी उपज का सही मूल्य नहीं मिल पाता। ऐसे में बड़ी बड़ी कंपनियां और बड़े बिचौलिए किसान से कृषि उत्पाद खरीदकर बाद में उसे ऊंची कीमत पर बेचते हैं। ऐसे में उपभोक्ता को तो खाद्य पदार्थो की ऊंची कीमत देनी पड़ती है, लेकिन किसान की गरीबी बदस्तूर जारी रहती है। इस वर्ष भी गेहूं की रिकॉर्ड फसल होने के बाद भी किसान की बदहाली जारी है। अभी किसान भारी मात्रा में अपनी फसल मंडियों में ला रहे हैं और सरकारी एजेंसियों ने खरीद बंद कर दी है। इसके चलते किसान मजबूरी में अपनी फसल को 1000 से 1050 रुपये प्रति क्विंटल के बीच में बेच रहा है, जबकि सरकार का समर्थन मूल्य ही 1170 रुपये प्रति क्विंटल है। जमीन की बर्बादी यही नहीं, 1991 के बाद नई आर्थिक नीति के नाम पर कृषि की अनदेखी हो रही है। सरकारों ने जमीन की बरबादी में भी कोई कसर नहीं छोड़ी है। यह सही है कि उद्योगों, सॉफ्टवेयर विकास के लिए परिसरों, खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों और अन्य आवश्यक गैर कृषि कार्यो के लिए आवश्यक भूमि उपलब्ध होनी चाहिए, लेकिन खेद का विषय यह है कि औद्योगिक और व्यावसायिक विकास के नाम पर कृषियुक्त एवं अत्यंत उपजाऊ भूमि को कृषि कार्यो से हटाकर गैर कृषि कार्यो में लगाया जा रहा है। अभी हाल ही में एक मामला प्रकाश में आया कि उड़ीसा के पुरी क्षेत्र में लगभग 8,000 एकड़ भूमि को एक विश्वविद्यालय के नाम पर आवंटित कर दिया गया। यही नहीं, लाखों एकड़ भूमि देश भर में सात सौ से भी अधिक विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाने के नाम पर किसानों से प्रत्यक्ष रूप से सरकार द्वारा अधिग्रहित करते हुए या कंपनियों द्वारा खरीदकर किसानों के हाथ से खींची जा चुकी है। ऐसे में देश में मोटे तौर पर कृषि उत्पादन बढ़े भी तो कैसे? लेकिन कभी वर्षा की कमी के कारण कृषि उत्पादन घट जरूर जाता है। राह में रोड़ा भंडारण की समस्या देश में 2010-11 में खाद्यान्न उत्पादन 232 मिलियन टन होने की उम्मीद है। इससे पहले 2009-10 में यह मात्र 218 मिलियन टन ही रह गया था। 2008-09 में यह 235 मिलियन टन था। घटते-बढ़ते खाद्यान्न उत्पादन के बावजूद अगर हमारी कृषि पदार्थो का रखरखाव यानी भंडारण एवं कोल्ड स्टोरेज की व्यवस्था ठीक हो तो भी हम खाद्यान्नों के उत्पादन में कमी होने पर उसकी आपूर्ति देश से ही कर सकते हैं। लेकिन हाल ही में बड़े पैमाने पर अनाज के सड़ने की घटनाओं के प्रकाश में आने से भारतीय खाद्य निगम के भंडारण की खस्ता हालत की पोल खुल चुकी है। योजना आयोग का कहना है कि देश में भंडारण की सही व्यवस्था कायम करने के लिए 7,689 करोड़ रुपये के निवेश की जरूरत है, लेकिन खेद का विषय यह है कि योजना आयोग इस बाबत राशि जुटाने की बजाय यह सुझाव दे रहा है कि देश में खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश को अनुमति दे दी जाए। योजना आयोग का कहना है कि खुदरा क्षेत्र में विदेशी कंपनियां आकर भंडारण की व्यवस्था कराएंगी और कृषि पदार्थो की बर्बादी पर लगाम लगेगा। योजना आयोग शायद यह भूल जाता है कि देश में एक दशक से भी अधिक समय से भंडारण इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए विदेशी निवेश को अनुमति है, लेकिन इसके बावजूद विदेशी निवेशकों द्वारा इस क्षेत्र में कोई निवेश नहीं किया गया है। ऐसे में देश के इस महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर को विदेशी कंपनियों के रहमो-करम पर नहीं छोड़ा जा सकता। आवश्यकता इस बात की है कि केंद्र और राज्य सरकारें इस बाबत आवश्यक धनराशि जुटाकर देश में पर्याप्त भंडारण एवं कोल्ड स्टोरेज की सुविधाएं उपलब्ध कराने में सहयोगी बनें। देश में कृषि उत्पादों की भारी कमी के चलते उनका निर्यात कोई समझदारी का कदम नहीं है। देश में हमेशा ही उत्पादन बढ़ने पर उसे सरकार खरीदकर उसका भंडारण करती रही है। तीन वर्ष पहले सरकार ने गेहूं का निर्यात किया था, लेकिन उसके कुछ ही माह के बाद हमें बड़ी मात्रा में घटिया गेहूं का आयात ऊंची कीमतों पर करना पड़ा था। पिछले कुछ समय से भंडारण सुविधाओं की कमी के चलते खाद्यान्नों के सड़ने की बात सामने आ रही है। ऐसे में देश में भंडारण की कमी को दूर करना ही समझदारी है। अनाज का निर्यात करके उसे बाद में ऊंची कीमतों पर विदेशों से आयात करना कोई समझदारी नहीं कही जा सकती। (लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं)