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Friday, June 17, 2011
Wednesday, June 15, 2011
59 साल से लड़ रहे मुआवजे की जंग
उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के बहेड़ी स्थित केसर चीनी मिल को 59 साल अपनी जमीन देने वाले हाजी अमीर अहमद और उनके जैसे 35 अन्य किसान जवानी से बुढ़ापे की दहलीज पर पहुंच गए। कुछ तो दुनिया से ही कूच कर गए, लेकिन किसी को भी न तो जमीन का मुआवजा मिला और न जमीन। किसान इस बेहद लंबे संघर्ष में थक चुके हैं,लेकिन हार नहीं मानी है। अपनी मांग के लिए वे आज भी सरकार से लड़ रहे हैं। किसानों के मुआवजे का यह मामला जिले की सबसे पुरानी चीनी मिल से जुड़ा है। 1931 के आसपास स्थापित केसर चीनी मिल का 1952 में विस्तार हुआ। किसानों की 52 बीघे जमीन का अधिग्रहण हुआ। तब अमीर अहमद के वालिद अब्दुल मजीद के समझाने पर किसानों ने जमीन दे दी, क्योंकि उन्हें यहां मिल लगने से कस्बे का हित दिखा। चीनी मिल प्रशासन ने आश्वस्त किया था किसानों से ली गई जमीन पर अस्पताल और स्कूल बनाएंगे। उस समय जमीन का मुआवजा आने के हिसाब मिलता था। 52 बीघा जमीन का एक हजार कुछ रु. का था। तब कलेक्ट्रेट में विशेष भूमि अध्याप्ति अधिकारी का काम एडीएम देखा करते थे। अमीर अहमद बताते हैं कि मिल ने जमीन लेने के बाद शर्तो का पालन नहीं किया। शोर मचाने पर 10 साल बाद स्कूल और 30 साल बाद अस्पताल बना। दोनों भवन बनने के बाद भी जमीन बची रह गई। शर्त यह थी कि अगर दो साल में दोनों काम नहीं किये गए तो किसानों को जमीन वापस करना पड़ेगी। बाकी सभी किसानों का कहना है कि शर्तो के उल्लंघन पर हमें हमारी जमीन वापस मिले, क्योंकि हमें मुआवजा भी नहीं मिला है। एग्रीमेंट में यह भी कहा गया था कि स्कूल और अस्पताल के बनने पर अगर जमीन बची तो उसे किसानों को वापस कर दिया जाएगा। अपनी मांग लेकर किसान राजभवन पहुंचे तो राज्यपाल ने मामला शासन को भेज दिया। मुख्य सचिव ने डीएम को कार्रवाई के निर्देश दिए। इसे भी 6-7 माह हो गए। अब यह मामला एसडीएम बहेड़ी के पास लंबित है। उनसे पैमाईश कराकर रिपोर्ट भेजने को कहा गया है। किसान बताते हैं कि एसडीएम के पास जाओ तो वह आज या कल पैमाईश कराने की बात कहकर टरका देते हैं.
Thursday, May 19, 2011
आखिर कैसे परवान चढ़ती विकास की बेल
बुंदेलखंड को लेकर केंद्र और प्रदेश सरकारों के बीच वादों और दावों की खेती होती रही है। वर्ष 2007 में बसपा ने जब सत्ता संभाली थी तो पाठा की धरती भुखमरी से मौतों की वजह से चर्चा में थी। बांदा के पड़ुवी गांव में कर्ज के शिकार कई लोग मौत को गले लगा चुके थे। यही वजह थी कि मुख्यमंत्री के रूप में अधिकारियों संग पहली बैठक में मायावती ने कहा था, यदि कहीं भूख से मौत हुई तो वहां के डीएम जिम्मेदार होंगे। उसके बाद से अब तक भुखमरी से मौत की कोई घटना नहीं हुई लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद दिन प्रतिदिन बंजर होती जा रही बुंदेलों-हरबोलों की धरती पर विकास की बेल परवान न चढ़ सकी। अधिकारियों के साथ पहली बैठक में मुख्यमंत्री ने कहा था, अधिकारी बुंदेलखंड के लिए केंद्र सरकार से अधिक से अधिक राशि पाने की कोशिश करें। लेकिन केंद्र और राज्य के बीच टकराव के चलते यह मुमकिन नहीं हो पाया। केंद्र सरकार के 7266 करोड़ के विशेष पैकेज में 3506 करोड़ रुपये यूपी के बुंदेली क्षेत्र के लिए थे। इसमें से जो भी राशि मिली, उसे ही पूरा नहीं खर्च किया जा सका। राज्य सरकार का तर्क है कि वित्तीय वर्ष के अंतिम माह में केंद्र ने राशि अवमुक्त की जिससे रुपये खर्च कर पाना संभव ही नहीं था। यहां तक लघु सिंचाई और सिंचाई की योजनाओं की राशि भी बची रह गई। इन्हीं आरोपों-प्रत्यारोपों के बीच पाठा में जलस्तर 2010 में तीन मीटर नीचे चला गया। बांदा, चित्रकूट और महोबा में इसकी वजह से आज लोगों को बूंद-बूंद पानी के लिए तरसना पड़ रहा है। बांदा के पड़मई गांव जहां पिछले महीने कर्ज से परेशान एक किसान ने आत्महत्या कर ली, वहां के लोगों की मानें तो पिछले 7 वर्र्षो से फसल की लागत तक नहीं निकल पा रही है। इसका प्रमुख कारण सिंचाई के इंतजाम न हो पाना है। बांधों में पानी घट रहा है, तालाब सूखे हैं और पाठा क्षेत्र में एक तिहाई से अधिक हैंडपंपों में पानी नहीं आ रहा है। यहां के लिए केंद्र सरकार से अधिक रुपये हासिल करने का मुख्यमंत्री का इरादा पूरा न हो सका। उन्होंने प्रधानमंत्री से मिलकर 80 हजार करोड़ रुपये के पैकेज की मांग की थी जिसमें 11 हजार करोड़ बुंदेलखंड पर खर्च होने थे लेकिन यह अनसुनी ही रह गई। राज्य सरकार इसके लिए केंद्र को जिम्मेदार ठहराती है। उसके अनुसार केंद्र द्वारा जिस पैकेज की बात की जा रही है, उसमें 3500 करोड़ रुपये की धनराशि 3 वर्र्षो में बताई गई है, पर वास्तव में 1600 करोड़ रुपये की ही धनराशि उपलब्ध कराई जा रही है। शेष धनराशि केंद्र की पूर्व से चालू योजनाओं के माध्यम से उपलब्ध होनी है। इसके बावजूद राज्य सरकार बुंदेलखंड क्षेत्र के समग्र विकास के लिए 2008 में घोषित 1514 करोड़ रुपये से विभिन्न योजनाओं पर काम करा रही है।
Friday, May 6, 2011
पंजाब में 60 हजार अवैध हथियार
आतंकवाद से जूझ चुके पंजाब के लोग हथियारों का लाइसेंस रिन्यू कराने में पीछे हैं। यहां तीन लाख से अधिक लाइसेंसी हथियार हैं और इनमें 60 हजार ने पांच साल से लाइसेंस रिन्यू नहीं कराए। नियमानुसार लाइसेंसों को तीन साल के बाद रिन्यू करवाना होता है। इन डिफाल्टरों के खिलाफ न तो किसी अधिकारी ने कोई कार्रवाई की और न ही उनके हथियारों को जब्त करने के लिए कोई नोटिस ही जारी किया। यह खुलासा पटियाला निवासी एक आरटीआई आवेदक द्वारा मांगी गई जानकारी में हुआ है। जुलाई 2010 में पटियाला के अश्विनी कुमार ने पंजाब के प्रत्येक जिले के डिप्टी कमिश्नर से सूचना के अधिकार के तहत लाइसेंसी हथियारों के संबंध में जानकारी मांगी। पूछा गया कि हरेक जिले में कितने हथियार हैं? कितने लाइसेंस पिछले पांच साल से रिन्यू नहीं हुए? जो लाइसेंस रिन्यू नहीं हुए, उनके खिलाफ क्या कार्रवाई की गई? शुरू में सभी डिप्टी कमिश्नरों ने जानकारी देने में आपत्ति जताई, लेकिन अश्विनी कुमार ने इस संबंध में चंडीगढ़ स्थित सूचना आयुक्त को शिकायत दे दी। शिकायत को गंभीरता से लेते हुए सूचना आयुक्त ने राज्य के प्रत्येक डीसी को आदेश जारी कर उक्त जानकारी देने का निर्देश दिया। जो जानकारी दी गई उसके मुताबिक करीब तीन लाख लाइसेंसी हथियारों में से 20 फीसदी हथियारों के लाइसेंस पांच साल से रिन्यू नहीं हुए हैं। इस जानकारी ने चौंकाने के साथ-साथ संबंधित अधिकारियों की ढिलाई को भी उजागर कर दिया है।
Wednesday, April 20, 2011
यमुना बचाने को अनशन पर बैठे लोगों की हालत बिगड़ी
यमुना बचाओ आंदोलन के तहत कई दिनों से जंतर मंतर पर छह दिनों से आमरण अनशन पर बैठे कई लोगों की हालत बिगड़ने लगी है और उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा है। इस आंदोलन में अब दिल्ली का संत समाज भी उतर आया है। अखिल भारतीय संत समिति इसे धार देने में जुट गई है। जंतर मंतर पर आमरण अनशन पर बैठे संतों व किसानों में कई लोगों की हालत अब बिगड़ती जा रही है। सोमवार को भी कम से कम तीन लोगों को अस्पताल में भर्ती कराया गया था। इतना होने के बावजूद सरकार की तरफ से इस ओर कोई ठोस पहल न करने से कई बार किसान उग्र हो जा रहे हैं और रेल मार्ग व सड़क जाम करने को तत्पर दिख रहे हैं। हालांकि संत समाज इसके लिए अभी राजी नहीं दिख रहा है। संतों का मानना है कि सरकार को सदबुद्धि अवश्य आएगी और उनकी मांगें अहिंसक ढंग से ही पूरी होंगी। जागरण से बातचीत में कई किसानों ने कहा कि वे कई दिनों से अपना घरबार छोड़ कर यहां धरना दे रहे हैं, लेकिन सरकार उनके वाजिब मांगों को मानने में भी आनाकानी कर रही है। यदि हम रेल मार्ग जाम कर दें तो सरकार की तरफ से तुरंत मांगें मान ली जाएंगी। किसानों का कहना है कि संत समाज के कहने पर ही वे अब तक शांति पूर्वक अपना अनशन जारी रखे हुए है। किसान यूनियन के नेताओं का भी कहना है कि रेल मार्ग जाम करने का आह्वान केवल संत समाज की सलाह पर ही आगे की ओर टाला जा रहा है। उधर,अखिल भारतीय संत समिति, दिल्ली के अध्यक्ष व कालकाजी पीठ के महंत सुरेंद्र नाथ अवधूत ने कहा कि यदि संतों की मांगे नहीं मानी जाती है तो दिल्ली सहित पूरे देश के संत अब इस मुहिम में इस क्रम में प्रदर्शनकारियों का एक प्रतिनिधि मंडल बुधवार को प्रधानमंत्री से मिल अपनी मांगों को जल्द से जल्द पूरा करने की अपील करेगा।
Sunday, April 3, 2011
हरियाणा में आबादी वृद्धि दर घटी, लड़कियां बढ़ीं
हरियाणा ने जिस दर से विकास वृद्धि हासिल की है, लगभग उतनी ही दर की गिरावट के साथ आबादी पर नियंत्रण पाने में सफलता हासिल की है। गत दस सालों में प्रदेश की आबादी में करीब 42 लाख की बढ़ोतरी हुई है। इसी के साथ राज्य की जनसंख्या दो करोड़ 53 लाख हो गई है। राज्य में सालाना औसतन चार लाख लोग बढ़े हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि लिंगानुपात सुधरा है। यानी लड़कियों की संख्या में वृद्धि हुई है। 2011 की जनगणना के मुताबिक, आबादी की वृद्धि दर में 8.5 प्रतिशत की गिरावट आई है। 2001 की जनगणना के अनुसार प्रदेश में जनसंख्या में वृद्धि दर 28.4 फीसदी थी, लेकिन 2011 में दर 19.9 प्रतिशत हो गई है। सबसे बड़ी बात यह है कि प्रदेश में इस बार लिंगानुपात में सुधार हुआ है। हरियाणा में 2001 में एक हजार पुरुषों के मुकाबले 861 महिलाएं थीं। 2011 में यह आंकड़ा 1000-877 हो गयाहै। यह अलग बात है कि यह राष्ट्रीय औसत के मुकाबले बहुत पीछे है। राष्ट्रीय स्तर पर जारी आंकड़ों के मुताबिक, राज्य के महेंद्रगढ़ और झज्जर जिले लिंगानुपात के लिहाज से राष्ट्रीय सूची में सबसे निचले पायदान पर हैं। झज्जर में प्रति एक हजार पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की संख्या 774 और महेंद्रगढ़ में 778 बताई जा रही है। प्रदेश में महिलाओं की शिक्षा का स्तर राष्ट्रीय औसत के आसपास 66.8 फीसदी है, जबकि पुरुषों का 76.6 फीसदी है, जो राष्ट्रीय औसत 82.14 फीसदी से पीछे है।
आबादी दर घटी चुनौती बढ़ी
जनगणना के ताजा आंकड़ों के मुताबिक यूपी में जनसंख्या वृद्धि दर में कमी भले सुकून देने वाली हो लेकिन आबादी में 3.34 करोड़ की बढ़ोत्तरी का सच भी बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने के दावों को आईना दिखाता है। संसाधनों की तंगी और इच्छाशक्ति के अभाव में 19.95 करोड़ों लोगों की आम जरूरतें पूरी कर पाना भी एक जटिल चुनौती है। बात, स्वास्थ्य सुविधाओं से ही शुरू करें तो आबादी के लिहाज से विश्व के चार बड़े देशों के बाद पांचवें पायदान पर शुमार होने वाले राज्य में मानकों की पूर्ति दूर की कौड़ी हैं। हेल्थ फॉर आल योजना के तहत एक लाख 2 हजार की आबादी पर एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) और 30,000 पर एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) स्थापित किये गए। यानि प्रदेश में कुल 1097 सीएचसी व करीब 3150 पीएचसी स्वीकृत हैं लेकिन जनगणना के ताजा आंकड़ों का सच बताता है कि प्रदेश को अब 1666 सीएचसी व 6667 पीएचसी जरूर की दरकार होगी। सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञों, चिकित्सकों, पैरामेडिकल स्टाफ व संसाधनों का अभी भी भारी टोटा है। जनसंख्या का सच किल्लत को और अधिक बढ़ाता दिखता है। प्रादेशिक चिकित्सा सेवा संघ के डा.अशोक यादव का कहना है कि ऐसे में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) के मानक पूरे करना नामुमकिन है क्योंकि नए आंकड़ों के अनुसार 28 हजार विशेषज्ञ चिकित्सक व दस हजार एमबीबीएसधारक डाक्टर कहां से आयेंगे? छह से 14 आयु वर्ग के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था पूरा करने में सरकार की बेबसी किसी से छिपी नहीं। हालिया गणना में 0 से छह वर्ष के बच्चों की संख्या 2.97 करोड़ है जो कुल जनसंख्या का 15 फीसदी होगा। आबादी की नयी तस्वीर के अनुसार सूबे में चार लाख बेसिक शिक्षकों की जरूरत होगी। ऐसे में गली मुहल्लों में निजी स्कूलों की भरमार न हो तो साक्षरता की दर 69.72 प्रतिशत को कायम रखना भी मुश्किल होगा। वित्तविहीन स्कूलों और अंशकालिक शिक्षकों के सहारे चल रही माध्यमिक शिक्षा के लिए भी जनगणना के ताजा आंकड़ें सुखद नहीं है। सरकारी मदद प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों की संख्या 45 सौ है। 1986 के आंकलन से कुल एक लाख 27 हजार सृजित पदों के सापेक्ष वर्तमान में लगभग 60 हजार शिक्षक ही है। माध्यमिक शिक्षक संघ ठकुराई गुट के प्रांतीय उपाध्यक्ष डा. उमेश चंद कहते है कि नयी जनसंख्या के अनुरूप मानक तब ही पूरे होंगे जब दो लाख नए पद सृजित हों। निजी क्षेत्र के भरोसे उच्च, तकनीकी व व्यवसायिक शिक्षा में भी नयी चुनौती जाहिर होंगी। शिक्षा-स्वास्थ्य की बात तो दीगर प्रदेश की जनता को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराना भी आसान नहीं। नीर फाउंडेशन की मानें तो आने वाले दिनों में स्वच्छ पेयजल की समस्या अधिक विकट होंगी क्योंकि प्रदेश में 20 से 30 फीसदी भूगर्भीय जल प्रदूषित हो चुका है। नदियों में बढ़ते प्रदूषण को रोक नहीं लग पा रही है। कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग व औद्योगिक इकाइयों पर लगाम न लग पाने से जल संकट बढ़ता जा रहा है। खासकर ग्रामीण इलाकों की स्थिति दयनीय होंगी। आबादी बढ़ती रही और पानी की समस्या पर ध्यान नहीं दिया तो आने मुश्किलें पैदा होना स्वाभाविक ही है। बढ़ती जनसंख्या के साथ आवास, परिवहन व रोजगार के साधन मुहैया कराने की चुनौती को अनदेखा कर पाना भी संभव नहीं होगा। वरिष्ठ अर्थशास्त्री प्रो.एके सिंह का कहना है कि जनसंख्या के ताजा सरकारी आंकड़ें सुखद भी और चुनौती भरे भी। यूपी में आबादी की दर नियंत्रित हो कम होना अपने आप में एतिहासिक है। सरकार को चाहिए आबादी के नए आंकड़ों के अनुसार ही कल्याणकारी व विकास योजनाओं की फिर से समीक्षा हो ताकि उनसे सही मायनों में लाभ मिल सकें।
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