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Sunday, April 3, 2011

शासकों पर घटता विश्वास


जीवन के हर पक्ष में नैतिकता को सर्वोपरि माना जाता रहा है। देश आज एक अप्रत्याशित स्थिति से गुजर रहा है। नैतिकता काOास और मानव मूल्यों के प्रति उदासीनता लगभग हर तरफ दिखाई देती है। पिछले कुछ महीनों में घटी घटनाओं ने लोगों की आंखें खोली हैं। कॉमनवेल्थ खेल, आदर्श सोसाइटी, 2जी तथा इसरो स्पेक्ट्रम, पीजी थॉमस जैसे प्रकरण पर चर्चा अब गांवों की चौपाल तक पहुंच चुकी है। न्यायपालिका तथा सेना के उच्च स्तरों तक आरोपों के छींटे पहुंचे हैं। इन दोनों पर तो हर नागरिक गर्व करना चाहता है। जिस भारत ने अपरिग्रह की संकल्पना को न केवल साकार स्वरूप दिया, वरन उसे व्यवहार में उतारा वहीं आज थोड़े से संपन्न लोग आंख मूंदकर संग्रह में लगे हैं। भारत की सांस्कृतिक, सामाजिक तथा नैतिक पहचान कुछ गिने-चुने लोगों के कारण पश्चिम की भोंडी नकल करने वाले देशके रूप में परिवर्तित हो रही है। जहां करोड़ों लोग भूखे सोते हों वहां कुछ भारतीयों के नाम धनी लोगों में आ जाने पर हम गद्गद हो रहे हैं। भारत की संस्कृति धनार्जन पर प्रतिबंध नहीं लगाती है, परंतु यह धनार्जन दूसरों के शोषण के आधार पर अमान्य है। मध्यपूर्व के अरब देशों में जो कुछ हुआ उससे सत्तासीनों को सबसे बड़ा सबक यही लेना होगा कि अब वे जनता को मूर्ख नहीं बना सकते हैं। वहां की घटनाए यह भी बताती हैं कि शासकों को पदच्युत करने में पुत्र-पुत्री मोह भी बड़ा योगदान करता है। भारत में भी वंशवाद का विरोध बढ़ रहा है। कुल मिलाकर भारत की जनता तथा उसकी सरकार और राजनेताओं के बीच अलगाव की दीवार खड़ी हो गई है। प्रबुद्ध समाज से इस समय जिस पहल की आशा की जाती है उसके पूरे होने के आसार नहीं हैं। जो सत्ता के निकट हैं उनके वह कृपापात्र हैं और बाकी लोग संगठित नहीं हैं। वामपंथ तथा पंथनिरेपक्षता का राजनीतिक उपयोग करने वाले भविष्यदृष्टि से विश्लेषण करने की तकलीफ नहीं उठाना चाहते। यह वर्ग आज भी सत्ता पक्ष को उसके उत्तरदायित्व का भान कराने की स्थिति में है। वह स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व करने वाले दल से लोगों के नैतिक पक्ष पर बची-खुची अपेक्षाओं को स्पष्ट कर सकता है। कोई भी देश तथा उसके नागरिक तभी प्रगति तथा विकास की राह पर चल सकते है जब नेतृत्व सिद्धांतों तथा नैतिकता को आधार बनाकर अपने उत्तरदायित्वों का निर्वाह कर रहा हो। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत के पास ऐसा नेतृत्व था। जो पंडित जवाहरलाल नेहरू की नीतियों की आज आलोचना करते हैं वे भी मानते हैं कि केशवदेव मालवीय, टीटी कृष्णामाचारी, लालबहादुर शास्त्री तथा ऐसे ही अन्य लोगों के इस्तीफे नैतिक उत्तरदायित्व स्वीकार करने की परंपरा स्थापित करने के प्रयास का हिस्सा थे। आज उनकी विरासत का दम भरने वाले उन्हीं के प्रयासों को धूल-धूसरित कर रहे हैं। पूर्व दूरसंचार मंत्री सभी जनतांत्रिक मान्यताओं की धच्जियां वर्षो तक उड़ाते रहे। जो इसे रोक सकते थे वह भी सारे तथ्य जनता तक पहुंचनेके बाद भी उनका भरपूर समर्थन करते रहे। मुख्य सतर्कता आयुक्त की नियुक्ति प्रकरण पर भी ठीक ऐसा ही हुआ। इस समय जन-जन तक यह पहुंचाया गया कि यह सब इसलिए हुआ, क्योंकि सरकार बाहरी समर्थन की बैसाखी पर चल रही है। क्या सत्ता में बने रहना इतना आवश्यक है कि उसके लिए सारे सिद्धांतों की बलि दे दी जाए? भारत की आर्थिक विकास दर 10 प्रतिशत तक पहुंच रही है और सरकार चाहती है कि सारा देश प्रसन्न होकर उसे शाबासी दे। लोग महंगाई से आक्रांत हैं, ऐसे में उत्तरदायी लोगों को न केवल उसके अधिकार प्रदान करने का हरसंभव प्रयास प्राथमिकता से करना चाहिए, वरन उन्हें प्राप्त करने के लिए अतिरिक्तसहायता भी देनी चाहिए। नोबेल पुरस्कार विजेता रूसी लेखक रोलेक्जेंडर सोलमहेनित्सिन ने लिखा था कि लोगों पर सत्ता का प्रभाव तभी तक रहता है जब तक वह उनका सब कुछ नहीं ले लेती है, लेकिन जब व्यक्ति का सब कुछ लूट लिया जाता है तब सत्ता का उस पर कोई प्रभाव नहीं रह जाता है। यदि आदिवासियों का हर तरफ से शोषण तथा लूटखसोट न की गई होती तथा उन्हें उनके मूल अधिकारों से वंचित न किया गया होता तो भारत में आज नक्सलवाद तथा माओवाद उन्हें आकर्षित नहीं करते। निरंकुश सत्ता ऐसे लोगों पर बल प्रयोग कर कभी उन्हें बदल नहीं सकती है। उन्हें वहीं सत्ता बदल सकती है जिसकी अपनी साख पर कोई दाग न हो और जिसे आम जनता का पूर्ण विश्वास भी प्राप्त हो। पिछले चार-पांच महीनों में देश एक संत्रास से गुजरा है। उसका सकारात्मक पक्ष यह है इन घटनाओं से देश का सम्मान घटा है। भारत के नागरिकों का मनोबल भी गिरा है। इस बात के कोई आसार नहीं है कि सरकार नागरिकों की भावनाओं को ठीक से समझ सकेगी। (लेखक एनसीइआरटी के पूर्व निदेशक हैं)


Friday, March 25, 2011

स्वार्थ से जुड़े आंदोलन


लेखक जनांदोलन की आड़ में समाज को बंधक बनाने की प्रवृत्ति पर चिंता जता रहे हैं…
जनांदोलन जनतंत्र का राष्ट्रधर्म होते हैं। मध्यकाल का भक्ति आंदोलन ऐसा ही था। इसने उत्तर से दक्षिण तक राष्ट्र की भावात्मक एकता को मजबूती दी। 1857 का गदर भी पहले जनांदोलन बना और बाद में दमन के कारण स्वाधीनता संग्राम हो गया। अमेरिकी समाज ने अंग्रेजी गुलामी से मुक्ति के लिए जनांदोलन चलाया, बाद में नस्लभेद से मुक्ति के लिए भी सफल आंदोलन हुआ। अफ्रीका में नेल्सन मंडेला ने गांधीवादी तरीके से लंबा जनांदोलन चलाया। गांधी के स्वदेशी आंदोलन से राष्ट्रीय जागरण हुआ, इसी जागरण से बहुआयामी आंदोलन निकले, 1920, 1930 व 1942 के आंदोलनों की आत्मा स्वदेशी थी। गांधी के नेतृत्व में हजारों आंदोलन हुए। उनसे बड़ा आंदोलनकारी दुनिया में दूसरा नहीं हुआ। उन्होंने आंदोलन की एक आदर्श संस्कृति विकसित की। सत्याग्रह को हृदय परिवर्तन का अस्त्र बताया, हिंसा, तोड़फोड़ और उपद्रवों को गलत बताया और इसके लिए अपने पक्ष की भी सार्वजनिक निंदा की। स्वाधीनता संग्राम ने राजनीति, आंदोलन और सार्वजनिक जीवन को अनेक उदात्त मूल्य दिए, लेकिन हाल के दो दशकों से आंदोलनों की दशा, दिशा, नीति और नीयत पर तमाम सवाल उठे हैं। ताजा जाट आरक्षण आंदोलन के रेलजाम और राजधानी की नाकेबंदी जैसे प्रयासों से जनांदोलन के ही मूल सरोकारों पर राष्ट्रीय बहस की जरूरत महसूस की जा रही है। भारत अनेक आंदोलनों की चपेट में है। उत्तर प्रदेश के किसान आंदोलित हैं। टप्पल-मथुरा, आगरा, करछना बारा आदि के किसानों ने जमीन छीने जाने के विरोध में लाठी-गोली खाई है। दादरी, घोड़ी-बछेड़ा, बादलपुर आदि के किसान प्रतिरोध 5-6 बरस के भीतर की घटनाएं हैं। गंगा एक्सप्रेस वे और यमुना एक्सप्रेस वे में लाखों किसानों की जमीन जा रही है। झारखंड के आदिवासी 15 बरस से लड़ रहे हैं। सारे देश में आदिवासियों की उपेक्षा है। एकता परिषद के नेतृत्व में हजारों आदिवासियों ने 300 किलोमीटर लंबी यात्रा की थी। महंगाई और भ्रष्टाचार राष्ट्रीय समस्या हैं। दोनों मुद्दों को लेकर तमाम आंदोलन हुए, लेकिन केंद्र ने किसी भी आंदोलन को महत्व नहीं दिया। बिजली, पानी, जनस्वास्थ्य और पुलिस अत्याचारों के विरुद्ध होने वाले आंदोलन स्थानीय जिला प्रशासन द्वारा दबाए जा रहे हैं। जनतांत्रिक सत्ता द्वारा ही जनरोष की जनतांत्रिक अभिव्यक्ति की उपेक्षा खतरनाक है। सरकार हिंसा की भाषा जल्दी सुनती है, लेकिन गांधीवादी आंदोलनों की उपेक्षा करती है। परिणाम सामने हैं। आंदोलनों की प्रवृत्ति हिंसक हो रही है। कुछेक अपवाद छोड़ राजनीतिक दलों के आंदोलन प्राय: कर्मकांड साबित होते हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य, रोटी और रोजी जैसी बुनियादी समस्याओं पर आंदोलन नहीं होते। तात्कालिक राजनीतिक लाभ-हानि से जुड़े आंदोलन रस्म अदायगी सिद्ध होते हैं। आंदोलन लोकतंत्र का जीवन प्रवाह हैं, लेकिन आरक्षण वाले आंदोलन समूह स्वार्थ से जुड़े होते हैं। शेष समाज उनकी चपेट में आता है। जाट आरक्षण का औचित्य-अनौचित्य अलग विषय है, लेकिन होली जैसे पर्व पर लाखों लोगों की यात्राएं बाधित होना और बीते 21 दिन में सैकड़ों रेलसेवाओं का निरस्त होना असाधारण मसला है? गुर्जर आरक्षण आंदोलन में भी व्यापक अराजकता थी? आरक्षण से जुड़े अन्य तमाम आंदोलनों में भी व्यापक क्षति हुई थी। आरक्षण आंदोलनों में राजनीतिक दल वोट बैंक के हिसाब से मौन या मुखर होते हैं। बाकी जनमानस लाचार रहता है। कश्मीरी अलगाववादी आंदोलनकारी सुरक्षा बलों पर पत्थर चला रहे थे। क्या इसे भी जनांदोलन की श्रेणी में गिना जाना चाहिए? जनांदोलन का उद्देश्य लोकमत का निर्माण और सरकार का ध्यानाकर्षण होता है। जनता को बंधक बनाकर या सुरक्षाबलों को पीटकर जनसहानुभूति नहीं मिलती। जनतंत्र संवाद से चलता है, सतत संवाद से कामयाब होता है। जन और सत्ता का संवाद जरूरी है। 1930 के आंदोलन के पहले उन्होंने कहा कि अपनी प्रगति के लिए पूरा अवसर पाने की दृष्टि से अन्य देशवासियों की तरह हिंदुस्तान के लोगों को स्वाधीनता पाने, अपनी मेहनत का सुख भोगने और जीवन के लिए आवश्यक वस्तुओं को पाने का पूर्ण अधिकार है। गांधीजी की यह बात 80 बरस पुरानी है, लेकिन स्वतंत्र भारत के सत्ताधीशों पर आज भी लागू होती है। आमजन आखिरकार क्या करें? क्या अगले चुनाव का इंतजार करें? कोरे संविधानवाद की दृष्टि से यह एक आदर्श विचार होगा, लेकिन डॉ. लोहिया ने कहा था कि जिंदा कौमें 5 साल तक इंतजार नहीं करतीं। जन दुखी होते हैं, आहत होते हैं, उनकी सुनवाई नहीं होती तो वे आंदोलित होते हैं। प्राणवान जनतंत्र के लिए विचारनिष्ठ जनांदोलन जरूरी हैं, लेकिन सरकारों का चरित्र लगातार संवेदनहीन हो रहा है। वे आंदोलनों को कुचल रही है। बड़े वर्ग में आंदोलनों के प्रति घृणा का भाव बढ़ा है। इसका मूल कारण निहित स्वार्थी आंदोलन हैं। न्यायालयों ने बंद पर रोक लगाई थी। इस पर तमाम सवाल उठे, लेकिन जाट आरक्षण आंदोलन पर कोर्ट का फैसला आमजनों को अच्छा लगा। दरअसल पीछे दो दशकों के बीच आंदोलनों की प्रवृत्ति में काफी बदलाव आए हैं। स्थानीय स्तर के आंदोलन बढ़े हैं, यह शुभ लक्षण है, लेकिन व्यापक राष्ट्रीय हित वाले आंदोलन घटे हैं। जेपी का संपूर्ण क्रांति आंदोलन व्यापक राष्ट्रीय हितों से जुड़ा हुआ था। वीपी सिंह का बोफोर्स भ्रष्टाचार आंदोलन समूचे उत्तर भारत में था। श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन ने अखिल भारतीय सांस्कृतिक जागरण किया था। गंगा, यमुना, जल, जमीन, जंगल से जुड़े पर्यावरण संबंधी आंदोलन बेशक प्रशंसनीय हैं, लेकिन विदेशी पूंजी के भारी हस्तक्षेप को लेकर आंदोलन न होना निराशाजनक है। रोजी-रोजगार, नि:शुल्क स्वास्थ्य सुविधाएं, भ्रष्टाचार मुक्त शासन, अत्याचार मुक्त पुलिस बल के बुनियादी प्रश्न आंदोलन का विषय नहीं बने हैं। निहित स्वार्थी आंदोलन हिंसक उपायों से सरकारों को दबा लेते हैं, लेकिन शांतिपूर्ण आंदोलनकारियों की कोई सुनवाई नहीं होती। जाट और गुर्जर आरक्षण समर्थकों सहित सभी आंदोलनकारियों से फौरन वार्ता न करने का क्या तुक है? पिछले महीने उत्तर प्रदेश में प्रोन्नति में आरक्षण को लेकर जाति युद्ध जैसी स्थिति बनी, सरकार ने फौरन बातचीत क्यों नहीं की? राज्य सरकार ने आंदोलन का स्थान विधानसभा मार्ग से हटाकर ज्योतिबाफुले मार्ग कर दिया है? कई अन्य राज्यों ने भी प्रदर्शन के स्थान बदले हैं। जरूरी है कि आंदोलन के आचारशास्त्र पर राष्ट्रीय बहस हो, असहमति और सविनय अवज्ञा का अधिकार हमारे जनतंत्र की पूंजी है। (लेखक उप्र विधानपरिषद के सदस्य हैं)