Showing posts with label १ अप्रैल २०११. Show all posts
Showing posts with label १ अप्रैल २०११. Show all posts

Friday, April 1, 2011

कैसे बचेंगी बेटियां


कन्या भ्रूण हत्या के कारणों की पड़ताल कर रही हैं लेखिका
धर्म के क्षेत्र में विशेषकर हिंदू धर्म में शंकराचार्य का महत्वपूर्ण स्थान है। उनका एक-एक शब्द हिंदू समाज के लिए ग्राह्य है और हमारा यह विश्र्वास है कि लोक ही नहीं, बल्कि परलोक का मार्ग भी इनके द्वारा बताए रास्ते पर चलने से सहज हो जाता है। मैं बहुत दिनों से यह प्रतीक्षा कर रही थी कि हमारे यह धर्म गुरु कन्याओं की हत्या, भू्रण हत्या और महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों के विरुद्ध मुखर होंगे, क्योंकि बहुत सी महिला शोषक सामाजिक कुरीतियां तो धर्म के नाम पर ही प्रचलित हैं। लंबी प्रतीक्षा के पश्चात जालंधर में कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य कन्या भू्रण हत्या पर एक विचार गोष्ठी में भाग लेने आए। यह प्रशंसनीय है कि उन्होंने इसके लिए पीड़ा व्यक्त की और कुछ घोषणाएं भी। पर उन घोषणाओं को सुनकर हर जागरूक और संवेदनशील हृदय पीडि़त हो गया। समाचार पत्रों के अनुसार शंकराचार्य ने कहा कि जिस परिवार में तीसरी बेटी होगी, उन्हें वह शादी के लिए तीन लाख रुपया देंगे, इससे समाज और परिवार लड़की को बोझ नहीं मानेगा। मुझे आश्चर्य है कि इतना बड़ा महापुरुष यह सब कैसे कह गया? क्या यह सच है कि लड़कियों की हत्या या भ्रूण हत्या केवल वही लोग करते हैं, जिनके पास बेटी की शादी के लिए पर्याप्त धनराशि नहीं। वास्तविकता तो यह है कि जिन परिवारों के लिए एक लाख रुपया बहुत बड़ी रकम है वे तो लड़कियां मारते ही नहीं। भारत सरकार और पंजाब द्वारा करवाए गए सर्वेक्षणों में यह बार-बार स्पष्ट हो चुका है कि अधिकतर कन्या भू्रण हत्या संपन्न एवं शिक्षित परिवार ही करते हैं। वास्तव में छोटा परिवार रखने की चाह में सभी यह चाहते हैं कि एक बेटा तो अवश्य हो जाए, दो मिल जाएं तो ज्यादा अच्छा है। और यही परिवार लिंग निर्धारण करवाते और लड़कियों को मां के गर्भ में ही मारते हैं। निश्चित ही डॉक्टर का सहयोग और मशीन का सहारा यही लोग लेते हैं। पुरुष प्रधान समाज तो महिला को बराबर खड़ा करने को भी तैयार नहीं। आज जो लड़कियां कर्म क्षेत्र में सफलता से आगे बढ़ रही हैं वे किसी की दया से नहीं और न ही आरक्षण के सहारे सफल हैं। शंकराचार्य जी निश्चित ही जानते होंगे कि अपने देश में बहुत से ऐसे मंदिर हैं जहां महिला देवी की मूर्ति की पूजा तो होती है, पर महिलाओं को मंदिर में प्रवेश अथवा पूजा का अधिकार ही नहीं। वे यह भी जानते होंगे कि धर्म के नाम पर बेटी को अपने माता-पिता और पूर्वजों को मरणोपरांत न तो जल देने का अधिकार है और न ही उनका अंतिम संस्कार अपने हाथ से करना ही उचित मानते हैं। धर्म ग्रंथों का पाठ करने वाले तो यहां तक कह देते हैं कि केवल वही व्यक्ति देहावसान के पश्चात स्वर्ग में जाएगा, जिसका अंतिम क्रियाकर्म पुत्र करेगा। जिस देश में मंडन मिश्र की पत्नी ने अपनी विद्वता के बल पर शंकराचार्य और मंडन मिश्र के मध्य शास्त्रार्थ में निर्णायक का कार्य किया और आदि शंकराचार्य को शास्त्रार्थ में परास्त किया, उस देश की बेटी को यह कहा जा रहा है कि धार्मिक कार्याे में अपने दाहिने हाथ पर वह मौली भी नहीं बंधवा सकती, क्योंकि यह हाथ उसका नहीं है। आप निश्चित ही जानते होंगे कि भारत के पूर्व एवं उत्तर-पूर्वी प्रांतों में हर वर्ष कुछ ऐसी घटनाएं होती हैं जहां महिला को ही डायन कहकर पीटा, मारा और जलाया जाता है। मैंने आज तक नहीं सुना कि उसका विरोध किसी धार्मिक मंच से हुआ। कितना अच्छा हो अगर आपके आदेश-निर्देश द्वारा कम से कम सभी हिंदू धर्मगुरु यह प्रण कर लें कि उस घर का अन्न-जल नहीं लेंगे जहां शादी के नाम पर बेटों को मार्केट में सरेआम बेचा जाता है और वधु पक्ष को शराफत से लूटा भी जाता है। जहां बेटी का विवाह उसकी योग्यता को नकारकर माता-पिता की धन-संपत्ति के आधार पर तय होता है, उस समाज में यह तीन लाख रुपये बेटियों का कोई भला नहीं कर सकता। (लेखिका पंजाब सरकार में मंत्री हैं)

ब्राजील से बड़ा हो गया उत्तर प्रदेश


देश की बढ़ती आबादी की रफ्तार घटाने में बीते दस वर्षो में उत्तर प्रदेश की भूमिका भले ही अहम रही हो, फिर भी वह अकेले ही जनसंख्या के मामले में ब्राजील जैसे देश से भी आगे निकल गया है। राज्य के लिए एक और खतरनाक संकेत यह है कि लड़कों के मुकाबले लड़कियों की संख्या में बेहद तेजी से गिरावट आ रही है। वैसे तो देश की आबादी बढ़ाने में अक्सर सवालों के घेरे में रहने वाले उत्तर प्रदेश के लिए जनगणना 2011 की ताजी रिपोर्ट राहत लेकर आई है। गुरुवार को जनगणना पर जारी अंतरिम रिपोर्ट बताती है कि आबादी की बढ़ती रफ्तार को कम करने में देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की भी खास भूमिका रही। जाना जा सकता है कि आबादी बढ़ने की रफ्तार को कम करने का राष्ट्रीय औसत महज 3.9 प्रतिशत रहा है, जबकि उत्तर प्रदेश में यह औसत उससे भी अच्छा 5.7 प्रतिशत रहा है। 2001 की जनगणना में उत्तर प्रदेश में जनसंख्या गिरावट की जो दर 25.85 प्रतिशत थी, 2011 की जनगणना में वह घटकर 20.09 प्रतिशत हो गई है। हालांकि इस बेहतर प्रदर्शन के बावजूद उप्र की जनसंख्या 16.62 करोड़ (2001 में) से बढ़कर 2011 में 19 करोड़ 95 लाख (लगभग 20 करोड़) तक पहंुच गई है। उनमें भी लगभग साढ़े दस करोड़ पुरुष व लगभग साढे़ नौ करोड़ महिलाएं हैं। सुधार के बावजूद जनसंख्या वृद्धि की इस रफ्तार के चलते प्रदेश की अकेले ब्राजील जैसे देश से भी आगे निकल गयी है, जिसकी जनसंख्या अभी 19 करोड़ है। यह देश दुनिया में आबादी के लिहाज से पांचवें स्थान पर है। जनगणना की ताजी रिपोर्ट लड़के-लड़कियों के अनुपात को लेकर भी खतरनाक संकेत देती है। राज्य में 2001 में छह वर्ष तक के बच्चों में जहां प्रति एक हजार लड़कों के मुकाबले 916 लड़कियां थीं, वहीं 2011 में लड़कियों की संख्या घटकर 899 पर आ गई है। पढ़ाई-लिखाई में राज्य ने मामूली सुधार किया है। 2001 में राज्य की जो साक्षरता दर 56.3 प्रतिशत थी, वह 2011 में 69.72 प्रतिशत हो तो गई, लेकिन यह राष्ट्रीय औसत 74 प्रतिशत से कम है। साक्षरता की जो स्थिति सुधरी है, उसकी बड़ी वजह महिलाओं की पढ़ाई-लिखाई में भागीदारी बढ़ना है। मसलन् बीते दस वर्षों में पुरुषों की साक्षरता दर लगभग 69 प्रतिशत से बढ़कर 79 प्रतिशत हुई, जबकि इसी अवधि में महिलाओं की यह दर 47.7 प्रतिशत से बढ़कर 59 प्रतिशत से भी आगे निकल गई|

121 करोड़ हुए हिंदुस्तानी, पढ़े-लिखे बढ़े


 भारत की आबादी बढ़कर 121 करोड़ हो गई है। दस साल पहले हुई गणना के मुकाबले यह 17.64 फीसदी ज्यादा है, लेकिन आबादी बढ़ने की रफ्तार कम हुई है और आजादी के बाद यह सबसे निचले स्तर पर है। पिछली जनगणना के मुकाबले जनसंख्या वृद्धि दर 3.9 फीसदी कम दर्ज की गई है। इसी तरह महिलाओं की तत्परता के कारण अब हमारी कुल 74 फीसदी आबादी साक्षर हो चुकी है, लेकिन चिंता की बात है कि इस दौरान गर्भ में बच्चियों की हत्या के मामले में हमने सारे रिकार्ड तोड़ दिए। छह साल तक की आबादी में इस समय एक हजार लड़कों के मुकाबले सिर्फ 914 लड़कियां ही हैं। पिछली जनगणना में यह संख्या 927 थी। जनगणना 2011 (प्रोविजनल) के मुताबिक पिछले दस साल के दौरान हमने दुनिया के पांचवें सबसे ज्यादा आबादी वाले देश ब्राजील जितनी आबादी पैदा कर दी। कुल संख्या के हिसाब से देखें तो 2001 से 2011 के दौरान जितनी आबादी बढ़ी वह उससे एक दशक पहले हुई बढ़ोतरी से कम ही है। उत्तर प्रदेश 20 करोड़ आबादी के साथ पहले स्थान पर है। इस राज्य की आबादी ब्राजील से ज्यादा है। 11.23 करोड़ के साथ महाराष्ट्र दूसरे और 10.38 करोड़ के साथ बिहार तीसरे नंबर पर है। सबसे कम आबादी लक्ष्यद्वीप की है। यहां कुल 64,429 लोग हैं। ताजा जनगणना के मुताबिक प्रति हजार पुरुषों के मुकाबले महिलाओं का औसत पहले के 933 के मुकाबले बढ़ कर 940 हो गया है। सिर्फ बिहार, गुजरात और जम्मू-कश्मीर ही ऐसे तीन राज्य रहे, जिनमें महिलाओं का औसत कम हुआ है, लेकिन ताजा आंकड़े साबित करते हैं कि लड़कियों को गर्भ में ही या पैदा होते ही मार देने की घटनाएं बढ़ी हैं। छह साल तक की लड़कियों के मामले में हरियाणा और पंजाब 830 और 846 के औसत के साथ सबसे निचले पायदान पर हैं। देश में सात साल से ऊपर की आबादी में 74 फीसदी लोग साक्षर हो चुके हैं। 2001 की जनगणना में सिर्फ 64.83 फीसदी लोग साक्षर थे। साक्षरता में बिहार और अरुणाचल 63.82 और 66.95 फीसदी साक्षरता के साथ सबसे निचले पायदान पर हैं। जबकि 93.91 फीसदी के साथ केरल अव्वल है। तेजी से साक्षर बनने के मामले में महिलाओं ने पुरुषों से बाजी मारी है। जहां पुरुषों में साक्षरता दर 6.88 फीसदी ही बढ़ी, वहीं महिलाओं में यह 11.79 फीसदी की दर से बढ़ी। (पेज-3 भी देखें)

देश में साक्षर महिलाएं बढ़ीं


विश्व में कुल आबादी


देश के पांच राज्य बने चुनौती


हम हो गए १२१ करोड़


सवा अरब की आबादी


दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाले देश के लिए अपने नागरिकों की गिनती करना यकीनन कठिन कार्य है। भारत के भौगौलिक विस्तार और बनावट को देखते हुए यह काम और भारी हो जाता है। लेकिन, अपने देश में हर दस साल पर इस श्रमसाध्य कार्य को सफलतापूर्वक संपन्न किया जा रहा है। इस बार भी जनगणना के प्रारंभिक आंकड़े आ गए हैं जो कहीं आश्वस्त करते हैं तो कई जगहों पर चुनौतियों को पार करने की चिंता भी जगाते हैं। पहली बात तो यह कि देश की आबादी सवा अरब के पास पहुंचने वाली है जो दुनिया के छह बड़े देशों अमेरिका, इंडोनेशिया, जापान, ब्राजील, पाकिस्तान और बांग्लादेश की कुल आबादी की बराबरी कर रही है और दुनिया की कुल आबादी का साढ़े सत्रह फीसद बनाती है। शुक्र है कि सबसे बड़ी जनसंख्या वाले देश चीन से अभी भी हम दो फीसद पीछे हैं। एक बड़ी बात यह देखने को मिली है कि आबादी विस्तार की दर में नब्बे साल बाद पहली बार कमी देखने को मिली है। यह कमी देश के सबसे अधिक आबादी वाले छह राज्यों में भी दिखी है। लेकिन चिंता बढ़ाने वाली बात यह है कि बेटे की चाह में आज भी बेटियों की बेकद्री हो रही है। जनगणना बताती है कि हर हजार बालकों की तुलना में बालिकाओं की संख्या केवल 914 है। देश के स्वतंत्र होने के बाद से बेटे- बेटी अनुपात की यह विषमता सबसे अधिक है जिसमें पंजाब और हरियाणा में हालात सबसे बदतर हैं। हालांकि राष्ट्रीय स्तर पर पुरुष-महिला अनुपात में वृद्धि दर्ज की गई है जो संतोष की बात है। राष्ट्रीय स्तर पर यह अनुपात हजार पुरुषों के लिए 940 महिला का है। लेकिन, बिहार, गुजरात और जम्मू-कश्मीर में महिलाओं का अनुपात घटता दिखा है जो चिंता जगाता है। खुशी की बात है कि साक्षरता दर में वृद्धि देखी गई है लेकिन अब भी आबादी के चौथाई भाग का निरक्षर रहना गंभीर मामला है। पुरुषों में साक्षरता दर की वृद्धि महिलाओं की तुलना में आज भी अधिक है लेकिन जनगणना बताती है कि देश की आधी आबादी शिक्षा की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है। केरल आज भी साक्षरता दर में पहले नंबर पर बना हुआ है जबकि बिहार सबसे पिछले पायदान पर है। देश में छह वर्ष तक की आयु के बच्चों की संख्या करीब सोलह करोड़ है और पिछली गणना की तुलना में इसमें करीब पचास लाख की कमी आई है। जनगणना के ये आंकड़े हांलाकि प्रारंभिक हैं लेकिन इनसे आबादी की संख्या के साथ-साथ उसकी गुणवत्ता का भी मोटा अंदाज मिल जाता है। आर्थिक सुधारों के बाद यह तीसरी जनगणना है जो बताएगा कि सरकारी नियंतण्रघटाने और निजीकरण को बढ़ावा देने के नीतिगत बदलावों का कैसा असर समाज और लोगों पर हो रहा है। आंकड़े बताते हैं कि इन तीन दशकों में ग्रामीण इलाकों से शहरों की ओर पलायन की दर तेजी से बढ़ी है जिसके मिश्रित नतीजे दिख रहे हैं। शहरों में विकास दर ने तेजी पकड़ी है लेकिन इनके इंफ्रास्ट्रक्चर पर बोझ काफी बढ़ गया है। नतीजे में शहरों में झुग्गी-झोपड़ियों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि देखी जा रही है। जाहिर है देश के गरीबों की बड़ी आबादी अवसरों की तलाश में आज भी शहर की ओर भाग रही है।