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Monday, April 11, 2011
लोकतंत्र की आवाज
शुक्र है कि सरकार सही समय पर चेत गई और लोकपाल कानून की तैयारी पर अन्ना हजारे की बातें मानकर एक अनर्थ होने से बचा लिया। अफसोस इस बात का है कि सरकार ने यह कदम दबाव और अपनी राजनीतिक मजबूरियों में उठाया। अगर अन्ना के पक्ष में पूरा देश एकसाथ नहीं उठ खड़ा होता और पांच राज्यों में चुनाव का वक्त नहीं होता तो क्या सरकार इतनी आसानी से जनमत की आवाज सुनने को तैयार हुई होती! शायद नहीं। करीब आधी सदी से देश को लोकपाल का झुनझुना सुनाया जा रहा है। केंद्र में बनने वाली हर सरकार, चाहे उसका मुखिया कांग्रेस हो, बीजेपी या अन्य कोई दल, भ्रष्टाचार के मुद्दे पर अब तक एक ही रास्ते जाती दिखी है। भाषणों में भ्रष्टाचार मिटाने के आसमानी वादे लेकिन व्यवहार में ठीक उल्टा। यही कारण है कि भ्रष्टाचार आज हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया है। जिस देश से जनता की गाढ़ी कमाई के हजारों, लाखों करोड़ रुपये बैखौफी से डकार कर विदेशी बैंकों के हवाले कर दिए जाते हों, जहां राजनेता, अफसर और व्यापारिक घराने अपनी काली कमाई का हिसाब-किताब बेहिचक माफिया और देश के दुश्मनों के हाथ सौंप देते हों, वहां लोकतंत्र की विश्वसनीयता कब तक बनी रहेगी! देश की नजर में लोकपाल कानून का रास्ता रोकने में तमाम राजनीतिक दलों की समान भागीदारी रही है और यही गुस्सा अन्ना हजारे के आंदोलन में रह-रह कर फूटता दिखा। यह आंदोलन भ्रष्टाचार से अधिक, देश चलाने की भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ था। उम्मीद है कि व्यवस्था से जुड़ा वर्ग देश के इस तेवर की अनदेखी करने की हिम्मत नहीं करेगा और जल्दी ही भ्रष्टाचार के राक्षस को मिटाने का अचूक हथियार हमारे हाथ होगा। लेकिन हराम की कमाई पर पलने के आदी आसानी से इस कानून के लिए रास्ता छोड़ देंगे, यह नहीं लगता। इसीलिए अन्ना ने न केवल इसके लिए एक डेडलाइन की घोषणा कर दी है बल्कि भविष्य के उन अभियानों की घोषणा भी कर दी है जिनसे लोकतंत्र को आम आदमी के लिए मुफीद बनाया जा सके। चुने गये प्रतिनिधियों के अक्षम साबित होने पर उन्हें हटाने का अधिकार भी एक ऐसा ही कदम है जिसके लिए भविष्य में आंदोलन छिड़ सकता है। आज की लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोगों की भागीदारी बस चुनाव तक सीमित रह गयी है और चुने जाने के बाद जनप्रतिनिधि अमूमन अपनी जिम्मेदारियां भूल कर सत्ता के खेल में मग्न हो जाते हैं। अगर यह भय हो कि नाराज मतदाता उन्हें बीच में भी हटा सकते हैं तो निश्चित रूप से जिम्मेदारियों को लेकर वे अधिक सतर्क रहेंगे। बहरहाल, लोकपाल कानून का स्वरूप तय करेगा कि सत्तावर्ग ने इस जनांदोलन को कितनी गम्भीरता से लिया है। इतना तो तय है कि अब लोकपाल कानून को न तो बनने से रोका जा सकता है और न इसकी धार कुंद की जा सकती है। संसद इसे एकस्वर से पारित करे और स्वतंत्रता दिवस पर देश को यह उपहार दे, यही हमारी कामना है।
खुश हो पर सपनों में न खोना
जनलोकपाल विधेयक तो पहली सीढ़ी है। इसके बन जाने से ही भ्रष्टाचार खत्म नहीं हो जाएगा। इसे एक शुरुआत के तौर पर ही देखना होगा। लड़ाई अभी लम्बी है। इस विधेयक के क्रियान्वयन तक ऐसा ही जोश, आंदोलनात्मक भावनाएं, सबकुछ बने रहना चाहिए..रिजवान चंचलरे देश में अन्ना हजारे के पक्ष में जनसमर्थन की चली आंधी ने न केवल सरकार की आंखें ही चकाचौंध की, बल्कि गांधीवादी तरीका अपनाते हुए जेल भरने की चेतावनी देकर सरकार को नतमस्तक होने को विवश कर दिया और परिणाम देश के आम अवाम के पक्ष में रहा। यूं कहें कि लोकतंत्र की जीत हुई। देश में फैले भ्रष्टाचार की जड़ों को काटने के लिए सरकार की ओर से मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल द्वारा जन लोकपाल विधेयक को संसद के मानसून सत्र में अनुमोदन के लिए रखे जाने का एलान हुआ। विधेयक का प्रारूप 30 जून तक तैयार कर दिए जाने की बात भी कपिल सिब्बल ने कही। इस सिलसिले में अधिसूचना जारी होने के बाद जन लोकपाल की मांग करने वालों की तरफ से दस सदस्यों की संयुक्त ड्राफ्ट कमेटी के लिए पांच सदस्यों के नाम भी तय हो गए- शांतिभूषण (सह अध्यक्ष), अन्ना हजारे, प्रशांत भूषण, अरविंद केजरीवाल और जस्टिस संतोष हेगड़े समिति में हैं, जबकि सरकार की ओर से प्रणब मुखर्जी (अध्यक्ष), कपिल सिब्बल, वीरप्पा मोइली और सलमान खुर्शीद के नाम हैं।
कुल मिलाकर भ्रष्टाचार के खिलाफ जन लोकपाल विधेयक को लेकर सरकार की ओर से सभी मांगें मान लेने के बाद अन्ना हजारे ने आमरण अनशन तोड़ दिया। मगर उन्होंने यह भी कहा कि लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। अगर 15 अगस्त तक सरकार ने बिल पारित नहीं किया तो वह तिरंगा लेकर लाल किले पर पहुंचेंगे और फिर से आंदोलन शुरू कर देंगे। जबकि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि सरकार इस ऐतिहासिक विधेयक को मानसून सत्र में पेश करना चाहती है। उन्होंने इस विधेयक पर नागिरक समाज और सरकार का हाथ मिलाना लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत माना और संभावना जताई कि इस विधेयक को तैयार करने की प्रक्रिया रचनात्मक रूप से आगे बढ़ेगी। इधर जगह-जगह आंदोलन से जुड़े लोगों ने खुशियां भी मनाई और भविष्य के कार्यक्रमों के लिए संकल्प भी दोहराए। हालांकि संभव है कि एक-दो दिन में लोग आईपीएल के आनंद में खो जाएं। आजादी के बाद से लेकर अबतक यही तो होता आया है। तमाम संघर्षो-कुर्बानियों के बाद जब देश को आजादी मिली तो हम सोचने लगे कि अब सबकुछ हमने पा लिया। अब सारे दुख-दर्द मिट जाएंगे। सबकुछ अपने आप ठीक हो जाएगा। लेकिन हुआ क्या? अंग्रेजों की दासता से इस देश को मुक्त हुए 63 साल बीत गए। हम कितना आगे बढ़े, यह छिपा नहीं है। हमने परमाणु बम बना लिया, हम चांद पर अपना यान भेजने में कामयाब हो गए, हम विश्व की बड़ी आर्थिक ताकत बनने के दावेदार हैं, लेकिन हकीकत यह है कि अब भी देश में लोग भूख से मर रहे हैं, किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं, बेरोजगारों की विशाल फौज काम-धंधे की तलाश में दफ्तरों की खाक छान रही है, लड़कियां गर्भ में ही मारी जा रही हैं। भ्रष्टाचार तो चरम पर है ही, अपराधियों ने कानून-व्यवस्था का अपहरण कर रखा है, किसी की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है । बेशक अच्छे इरादों के साथ आजाद भारत अपने कदमों पर आगे बढ़ा, लेकिन थोड़ा रुककर देखें तो लगता है कि हम कहीं भटक गए- रास्ता भूल गए और क्रांतिकारियों के त्याग को भुला बैठे। जाति-पांति के विभाजन को और गहरा किया गया। भ्रष्टाचार को शिष्टाचार की तरह मान्यता दे दी गई। स्वार्थचिंतन को वरीयता दी गई। गरीबों की प्रवंचना का मजाक उड़ाने में गर्व अनुभव किया गया। राष्ट्रीय जीवन के लिए जरूरी मर्यादाओं को ताक पर रख दिया गया। सत्तानायकों और उनके सहयोगी नौकरशाहों ने धीरे-धीरे स्वार्थपूर्ति के लिए वही तौर-तरीके अपनाने शुरू कर दिए, जो कभी गोरे अपनाते थे।
याद कीजिए कि जब आजादी की लड़ाई लड़ी जा रही थी तो क्रांतिकारी केवल अंग्रेजों को भगाने की रणनीति बनाने और उसे क्रियान्वित करने में ही समय नहीं लगाते थे, वे आजाद भारत हो कैसा- इसके लिए भी अपनी ऊर्जा खपाते थे। चाहे महात्मा गांधी और उनके अहिंसावादी दल के लोग रहे हों या फिर सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह, अशफाक उल्ला, चंद्रशेखर आजाद जैसे लोग- सभी इस बात पर भी चिंतन करते रहते थे कि आजाद भारत का स्वरूप कैसा होना चाहिए। उनके सपनों में एक ऐसा देश था, जो अपने पांवों पर मजबूती से खड़ा होगा, जहां सबको प्रगति और विकास के समान अवसर होंगे, जहां सबका जीवन सुरक्षित और खुशहाल होगा, जहां ऊंच-नीच का, जाति-पांति का कोई भेदभाव नहीं होगा और हर नागरिक को भारतीय होने के नाते समान सामाजिक अधिकार होंगे। जहां आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से कमजोर लोगों को सबके बराबर लाने के लिए सरकारें विशेष प्रयास करेंगी। लेकिन दुर्भाग्य है कि आज भी चारों ओर हाय महंगाई-हाय महंगाई का शोर है, भ्रष्टाचारी सत्ता के करीब हैं, जिसके हाथ में लाठी है, उसी की भैंस है। असल में कहने मात्र से लोकतंत्र नहीं आ जाता। देखने में तो जनता की-जनता के लिए-जनता द्वारा चुनी हुई सरकारें ही अबतक आई हैं, किंतु क्या सही मायने में लोकतंत्र भी आया है। आज देश-प्रदेश की सरकारें आम आदमी के लिए सारी योजनाएं बनाने के दावे करती हैं, पर आम आदमी अपनी नियति के कठिन चक्र में और उलझता चला जा रहा है। महंगाई आसमान पर है और भोजन, कपड़ा व छत की न्यूनतम जरूरतें पूरी कर पाना टेढ़ी खीर हो गया है। जनता की मदद करने, जीवन को आसान बनाने और संरचनागत विस्तार को अंजाम देने की जिम्मेदारियां जिन सरकारी अफसरों पर हैं, वे अपराधियों और ठेकेदारों के गुलामों की तरह काम कर रहे हैं। रिश्वत गोया उनका अफसरी-सिद्ध अधिकार बन गया है।
कुल मिलाकर भ्रष्टाचार के खिलाफ जन लोकपाल विधेयक को लेकर सरकार की ओर से सभी मांगें मान लेने के बाद अन्ना हजारे ने आमरण अनशन तोड़ दिया। मगर उन्होंने यह भी कहा कि लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। अगर 15 अगस्त तक सरकार ने बिल पारित नहीं किया तो वह तिरंगा लेकर लाल किले पर पहुंचेंगे और फिर से आंदोलन शुरू कर देंगे। जबकि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि सरकार इस ऐतिहासिक विधेयक को मानसून सत्र में पेश करना चाहती है। उन्होंने इस विधेयक पर नागिरक समाज और सरकार का हाथ मिलाना लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत माना और संभावना जताई कि इस विधेयक को तैयार करने की प्रक्रिया रचनात्मक रूप से आगे बढ़ेगी। इधर जगह-जगह आंदोलन से जुड़े लोगों ने खुशियां भी मनाई और भविष्य के कार्यक्रमों के लिए संकल्प भी दोहराए। हालांकि संभव है कि एक-दो दिन में लोग आईपीएल के आनंद में खो जाएं। आजादी के बाद से लेकर अबतक यही तो होता आया है। तमाम संघर्षो-कुर्बानियों के बाद जब देश को आजादी मिली तो हम सोचने लगे कि अब सबकुछ हमने पा लिया। अब सारे दुख-दर्द मिट जाएंगे। सबकुछ अपने आप ठीक हो जाएगा। लेकिन हुआ क्या? अंग्रेजों की दासता से इस देश को मुक्त हुए 63 साल बीत गए। हम कितना आगे बढ़े, यह छिपा नहीं है। हमने परमाणु बम बना लिया, हम चांद पर अपना यान भेजने में कामयाब हो गए, हम विश्व की बड़ी आर्थिक ताकत बनने के दावेदार हैं, लेकिन हकीकत यह है कि अब भी देश में लोग भूख से मर रहे हैं, किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं, बेरोजगारों की विशाल फौज काम-धंधे की तलाश में दफ्तरों की खाक छान रही है, लड़कियां गर्भ में ही मारी जा रही हैं। भ्रष्टाचार तो चरम पर है ही, अपराधियों ने कानून-व्यवस्था का अपहरण कर रखा है, किसी की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है । बेशक अच्छे इरादों के साथ आजाद भारत अपने कदमों पर आगे बढ़ा, लेकिन थोड़ा रुककर देखें तो लगता है कि हम कहीं भटक गए- रास्ता भूल गए और क्रांतिकारियों के त्याग को भुला बैठे। जाति-पांति के विभाजन को और गहरा किया गया। भ्रष्टाचार को शिष्टाचार की तरह मान्यता दे दी गई। स्वार्थचिंतन को वरीयता दी गई। गरीबों की प्रवंचना का मजाक उड़ाने में गर्व अनुभव किया गया। राष्ट्रीय जीवन के लिए जरूरी मर्यादाओं को ताक पर रख दिया गया। सत्तानायकों और उनके सहयोगी नौकरशाहों ने धीरे-धीरे स्वार्थपूर्ति के लिए वही तौर-तरीके अपनाने शुरू कर दिए, जो कभी गोरे अपनाते थे।
याद कीजिए कि जब आजादी की लड़ाई लड़ी जा रही थी तो क्रांतिकारी केवल अंग्रेजों को भगाने की रणनीति बनाने और उसे क्रियान्वित करने में ही समय नहीं लगाते थे, वे आजाद भारत हो कैसा- इसके लिए भी अपनी ऊर्जा खपाते थे। चाहे महात्मा गांधी और उनके अहिंसावादी दल के लोग रहे हों या फिर सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह, अशफाक उल्ला, चंद्रशेखर आजाद जैसे लोग- सभी इस बात पर भी चिंतन करते रहते थे कि आजाद भारत का स्वरूप कैसा होना चाहिए। उनके सपनों में एक ऐसा देश था, जो अपने पांवों पर मजबूती से खड़ा होगा, जहां सबको प्रगति और विकास के समान अवसर होंगे, जहां सबका जीवन सुरक्षित और खुशहाल होगा, जहां ऊंच-नीच का, जाति-पांति का कोई भेदभाव नहीं होगा और हर नागरिक को भारतीय होने के नाते समान सामाजिक अधिकार होंगे। जहां आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से कमजोर लोगों को सबके बराबर लाने के लिए सरकारें विशेष प्रयास करेंगी। लेकिन दुर्भाग्य है कि आज भी चारों ओर हाय महंगाई-हाय महंगाई का शोर है, भ्रष्टाचारी सत्ता के करीब हैं, जिसके हाथ में लाठी है, उसी की भैंस है। असल में कहने मात्र से लोकतंत्र नहीं आ जाता। देखने में तो जनता की-जनता के लिए-जनता द्वारा चुनी हुई सरकारें ही अबतक आई हैं, किंतु क्या सही मायने में लोकतंत्र भी आया है। आज देश-प्रदेश की सरकारें आम आदमी के लिए सारी योजनाएं बनाने के दावे करती हैं, पर आम आदमी अपनी नियति के कठिन चक्र में और उलझता चला जा रहा है। महंगाई आसमान पर है और भोजन, कपड़ा व छत की न्यूनतम जरूरतें पूरी कर पाना टेढ़ी खीर हो गया है। जनता की मदद करने, जीवन को आसान बनाने और संरचनागत विस्तार को अंजाम देने की जिम्मेदारियां जिन सरकारी अफसरों पर हैं, वे अपराधियों और ठेकेदारों के गुलामों की तरह काम कर रहे हैं। रिश्वत गोया उनका अफसरी-सिद्ध अधिकार बन गया है।
जीत के जोखिम
मोटी खालों में जुंबिश मुबारक! कानों पर जूं रेंगना मुबारक! सन्नाटे का टूटना मुबारक! सबसे ज्यादा मुबारक हो वह मौका जो बड़ी मुश्किल से बना है। भ्रष्टाचार के खिलाफ बनते माहौल और घुटनों के बल सरकार को देखना अनोखा है। मगर ठहरिए, इस जीत में एक बड़ा जोखिम है!!! व्यवस्था बदलने की यह बहस व्यक्तियों को चुनने की बहस में सिमट सकती है। हमें किसी छोटे से बदलाव से भरमाया भी जा सकता है, क्योंकि भ्रष्टाचार हद दर्जे का चालाक, पेचीदा और पैंतरेबाज दुश्मन है। भ्रष्टाचार से लड़ाई का शास्त्र ही उलटा है। यहां व्यवस्था के खिलाफ खड़े कुछ लोग नहीं, बल्कि कुछ भ्रष्ट व्यक्तियों से निरंतर लड़ने वाली एक व्यवस्था की दरकार है। इसलिए लोकपाल बस छोटी सी एक कड़ी मात्र है। लोहा गरम है.. भ्रष्टाचार के खिलाफ रणनीति की बहस राजनीति, सरकार, उद्योग, कंपनी, स्वयंसेवियों सभी में पारदर्शिता को समेटती हुए होनी चाहिए ताकि मजबूत व्यवस्था बना सकें। इस लड़ाई में हम दुनिया में अकेले नहीं हैं। विश्व के देश जतन के साथ सिस्टम गढ़कर भ्रष्टाचार से जूझ रहे हैं, क्योंकि भ्रष्टाचार एक दिन का आंदोलन या एकमुश्त आजादी नहीं, बल्कि रोजाना की लड़ाई है। मोर्चे और रणनीतियां आइए भ्रष्टाचार के खिलाफ रणनीति की बहस को दूर तक ले चलें। भ्रष्टाचार से लड़ती दुनिया लगातार नई तैयारियों के साथ इस दुश्मन को घेर रही है। तजुर्बे बताते हैं कि जीत की गारंटी के लिए राजनीति, कानून, अदालत, जन पहरुए, तरह-तरह की आजादी, खुलापन सबका सक्रिय होना जरूरी है। मगर भारत तो इस लड़ाई में नीतिगत और रणनीतिक तौर पर सिरे से दरिद्र है। लिथुआनिया, रोमानिया जैसों के पास भी भ्रष्टाचार के खिलाफ एक राष्ट्रीय कार्ययोजना है, जो भ्रष्टाचार पर संयुक्त राष्ट्र के अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम जैसे मॉडल पर बनी है। यह सुलझी हुई रणनीतियां, संसद, न्यायपालिका, प्रशासन, सार्वजनिक सेवाएं, कारोबार, स्वयंसेवी संगठन और मीडिया सभी को नियमों में बांधकर भ्रष्टाचार पर रोक को राष्ट्रीय कार्यसंस्कृति का हिस्सा बना देती हैं और देश एक राष्ट्रीय शुचिता (इंटीग्रिटी) सिस्टम से संचालित होता है। ऑस्ट्रेलिया का क्वींसलैंड दुनिया को इस सिस्टम की रोशनी दिखा रहा है। इस जंग की सबसे कमजोर कड़ी है सांसद-विधायक, न्यायाधीश और जनसेवक (पब्लिक ऑफिस) का कई मामलों में कानून से ऊपर होना। भारत में नेता होना अभियोजन से बचाव का आसान रास्ता है, मगर गैलप इंटरेनशनल जैसे सर्वे के नतीजे नेताओं को मिली इस छूट को भ्रष्टाचार की जड़ मानते हैं। अतिविशिष्टों को कानून की निगाह में आम आदमी बनाने का सवाल पूरे यूरोप को वर्षो से मथ रहा है। वैसे इसकी एक आदर्श व्यवस्था करीब सवा सौ साल से नीदरलैंड में मौजूद है। वहां सांसद विधायकों द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि के तौर पर किया गया काम ही केवल कानून के दायरे से बाहर है और उन्हें कोई विशेषाधिकार नहीं हैं। भारत की ताजा बहस भी अगर जनप्रतिनिधियों के विशेषाधिकार, राजनीतिक चंदे, चुनाव के खर्च, प्रत्याशियों का चयन आदि को भी समेटे, तभी कुछ उम्मीद जग सकती है। भ्रष्टाचार के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय पेशबंदी का अगला स्तर जांच का है, यहां भी हम बदहाल हैं। हमारा इकलौता इलाज सीबीआइ है, जो सरकारों के सामने ठुमके लगाती है। हांगकांग ने एक स्वतंत्र भ्रष्टाचार विरोधी आयोग (आइसीएसी) दुनिया के सामने मॉडल के तौर पर रखा है। हांगकांग के 99 फीसदी लोग इस आयोग में भरोसा रखते हैं। इस मॉडल को लेकर मलावी व बोत्सवाना जैसे देशों ने भी अच्छी शुरुआत की है। ऑस्ट्रेलिया के न्यू साउथवेल्स के ऐसे ही आयोग की वेबसाइट भ्रष्टाचार के पहरुओं के बीच बहुत लोकप्रिय है। पहरुए और पेशबंदी हांगकांग के बेहद ताकतवर और ऊंची साख वाले भ्रष्टाचार निरोधक आयोग पर कई मॉनीटरिंग समितियों के अलावा 40 नागरिकों का एक दल लगातार निगाह रखता है। इसी तरह चेक रिपब्लिक की सरकार ने भ्रष्टाचार के खिलाफ हॉटलाइन की जिम्मेदारी स्वयंसेवी संगठनों को दी है। यानी भ्रष्टाचार से लड़ाई में जनपहरुओं की जरूरत असंदिग्ध है, लेकिन जन पहरुओं की भूमिका को लेकर दुनिया अभी बहस कर रही है। बड़े स्वयंसेवी संगठन भी पहरेदारी तक सीमित हैं, क्योंकि पारदर्शिता के सवाल इन संस्थाओं में भी हैं। रही बात भ्रष्टाचार से लड़ाई की, तो दुनिया अधिकार संपन्न स्वायत्त संस्थाओं यानी लोकपाल या ओम्बुड्समैन को अभी आजमा ही रही है। ओम्बुड्समैन की व्यवस्था चीन ने 2000 साल पहले दी थी। पहले नार्वे और फिर न्यूजीलैंड ने इसे पकड़ा, लेकिन पोलैंड का मॉडल काफी चर्चित रहा है। जहां ओम्बुड्समैन संसद से नियुक्त होता है, मगर लोकपालों की भूमिका जनता की शिकायतें सुनने और प्रशासनिक खामियों को दूर कराने तक सीमित है। भ्रष्टाचार से लड़ाई में लोकपाल को सीधी भूमिका कम ही देशों में मिली है, क्योंकि अंतत: भ्रष्टाचारी को सजा देने के लिए कानून जरूरी है और जो अदालतों के जरिये ही मुमकिन है। इंसाफ और इलाज भ्रष्टाचार एक अपराध है, जिसका कानूनी इलाज चाहिए। और मजबूत कानून व पारदर्शी अदालतें इस लड़ाई में जीत की गारंटी हैं। भारत सहित शेष विश्व में यह जंग अदालतों के सहारे ही जीती गई है। इसलिए अमेरिका में जजों के सीधे चुनाव की व्यवस्था 19वीं सदी से भली प्रकार लागू है ताकि नेता न्यायाधीशों की नियुक्ति से दूर रहें। मगर भारत में न्यायाधीशों की नियुक्ति का पूरा तंत्र सिरे से अपारदर्शी है। वजह यह है कि पारदर्शिता के पक्ष में और भ्रष्टाचार के खिलाफ कानूनों में हम गरीब हैं। 1947 में बने भ्रष्टाचार निरोधक कानून और 1964 में सीवीसी के बाद भ्रष्टाचार के खिलाफ फौज में कोई बड़ी नई भर्ती ही नहीं हुई। व्हिसलब्लोअर (सिस्टम में रहकर जूझने वालों की हिफाजत) कानून, वित्तीय भ्रष्टाचार की जांच का तंत्र आदि बनाने पर अब निगाह गई है। भ्रष्टाचार के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय सहमतियों से हम अभी भी बाहर हैं और नए तरह के भ्रष्टाचार से लड़ने वाले कानूनों और संस्थाओं की नई पीढ़ी नदारद है। भ्रष्टाचार से लड़ने की कवायद में हमें इन पहलुओं को समेटना होगा, अकेला लोकपाल जीत की गारंटी कतई नहीं है। एक बड़ा समूह एक साथ सोच सके, ऐसा हमेशा नहीं होता। जिद्दी सरकारें बमुश्किल झुकती हैं और सियासत बिरले ही अपनी जात छोड़ती है। हम एक मुबारक मौके के बीच में हैं, मगर पेंच भी भरपूर हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन का झंडा उठाए पहरुओं के किरदार में जरा सी खोट (खतरा पूरा है) उम्मीद को तोड़ देगी। इसलिए बेहतर है कि भ्रष्टाचार से जूझने की पूरी बहस को फैलाते हुए राजनीतिक दल, चुनाव, संसद, कानून, जनप्रतिनिधि, प्रशासन, कंपनी, जांच, संहिता और अदालत सभी को समेट लिया जाए। बात हर हाल में दूर तक जानी चाहिए, नहीं तो हम एक लोकपाल के खिलौने से बहका दिए जाएंगे और भ्रष्टाचारियों की चतुर जमात, नए जनपहरुओं को पटाकर अपने काम में लग जाएगी।
आंदोलन के बाद की आशंकाएं
चार दिनों से दिल्ली के जंतर मंतर पर जारी बुजुर्ग समाजसेवी अन्ना हजारे का जन लोकपाल बिल को लेकर जारी आमरण अनशन खत्म हो गया। अन्ना के अनशन और देशभर में उसे मिल रहे अपार जनसमर्थन को देखकर सरकार के हाथ-पांव फूल गए। भारत सरकार के कर्ता-धर्ता और वरिष्ठ मंत्रियों के बीच कई दौर की बातचीत के बाद अन्ना की सभी मांगें मान ली गई। चार दिन तक चले एक व्यक्ति के आंदोलन ने भारत सरकार को जनता की भावनाओं को समझने और अन्ना की मांग मानने के लिए मजबूर कर दिया। दो दिन पहले जिस सरकार की एक वरिष्ठ मंत्री अंबिका सोनी दहाड़ते हुए बयान दे रही थीं कि चंद मुट्ठीभर लोगों के दबाव में सरकार झुकने वाली नहीं है, उन्हीं चंद मुट्ठीभर लोगों ने सरकार से अपनी सभी मांगे मनवा ली। अन्ना के आह्वान पर देशभर में जिस तरह से हर वर्ग के लोग स्वत:स्फूर्त घर से बाहर आंदोलन के लिए निकले, वह इस अनशन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। वैश्वीकरण के इस दौर में कई विद्वानों की राय थी कि जिस तरह से देश का नया मध्यवर्ग बाजार के प्रभाव में है, उसमें वह सिर्फ अपने बारे में सोचता है और उसके सामाजिक सरोकार खत्म हो गए हैं। आम जनता से जनआंदोलन की अपेक्षा करने की तो वह सोच भी नहीं सकते थे। नतीजा यह हुआ कि देश के नेताओं के मन में जनादेश को लेकर जो आदर होना चाहिए था, वह खत्म होने लगा था। जनता का डर कम होने के इस भाव से नेताओं के मन में यह बैठ गया कि वह कुछ भी करके बेदाग निकल सकते हैं। जनता की गाढ़ी कमाई के लाखों-करोड़ों रुपये डकार कर भी वह मजे में रह सकते हैं। उनके मन से जनता का डर और आमजन के प्रति आदर का भाव खत्म होने लगा था, जो लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत था। लेकिन अन्ना के अनशन ने एक बार फिर से यह साबित कर दिया कि अगर कोई विश्वसनीय व्यक्ति जनता से जुड़े मुद्दे को लेकर खड़ा होता है तो देश की जनता का न केवल उसे समर्थन मिलता है, बल्कि देश के हर तबके का आदमी उसकी एक आवाज पर घर से निकल कर उसके कदम से कदम मिलाकर सरकार से लोहा लेने तो भी तैयार हो जाते हैं। अन्ना के अनशन ने एक बार फिर से देश के नेताओं में जनता के लिए आदर और जनता का डर कायम कर दिया। अन्ना का अनशन खत्म हो गया। देशभर में अभी जीत का जश्न मनाया जा रहा है। लोगों को लग रहा है कि उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ एक बड़ी जंग जीत ली है। दरअसल, पूरा भारतीय मानस जो है, वह बेहद इमोशनल है। एक छोटी-सी उपलब्धि में भी वह मानस जश्न में डूब जाता है, लेकिन जीत के इस जश्न के बीच कई सवाल भी मुंह बाए खड़े हो गए हैं। सबसे पहला और बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि अन्ना के इस अनशन से हासिल क्या हुआ। अगर हम ऊपरी तौर पर देखें तो लगता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ देश की जनता को बड़ी जीत और कामयाबी हासिल हुई है। देश में इस तरह का एक वातावरण बन गया है, जिसमें आम जनता को लगने लगा है कि लोकपाल बिल भ्रष्टाचार के खिलाफ एक बड़ा हथियार बनने जा रहा है, जिससे भ्रष्टाचार रूपी राक्षस का वध संभव हो सकेगा। लेकिन क्या सचमुच ऐसा संभव हो पाएगा। अगर कुछ देर के लिए यह मान लिया जाए कि जन-दबाव में प्रधानमंत्री, मंत्री और देश के आला अफसर लोकपाल के दायरे में आ जाते हैं और लोकपाल को किसी को मुजरिम करार देकर सजा देने का अधिकार भी दे दिया जाता है तो क्या इससे भ्रष्टाचार पर काबू पाया जा सकेगा? अगर यह मान भी लिया जाए कि माथापच्ची के बाद बिल को कानूनी जामा पहनाकर लागू कर दिया जाता है तो क्या सिर्फ कानून बना देने भर से भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा, लेकिन सिर्फ कानून बना देने भर से जुर्म कम नहीं होता। जरूरत होती है कानून को सही तरीके से लागू करने की और ऐसा वातावरण तैयार करने की, जिसमें मुजरिमों के मन में कानून का भय पैदा हो जाए। भ्रष्टाचार से निबटने के लिए हमारे देश में पहले से प्रीवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट है। उसमें भी भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए कई सख्त प्रावधान हैं तो कई खामियां भी हैं। जरूरत इस बात की है कि भ्रष्टाचार पर काबू पाने के लिए एक नया कानून बनाने के बजाए वर्तमान में लागू कानून की कमियों को दूर किया जाए। जैसे अफसरों या मंत्रियों को आरोपी बनाने के पहले जो इजाजत लेने का प्रावधान है, उसे खत्म किया जाना चाहिए। वर्तमान कानून में स्पेशल जज से सुनवाई का प्रावधान है, लेकिन बहुधा ऐसा हो नहीं पाता है। जरूरत इस बात की है कि भ्रष्टाचार के मामले में न्यायिक प्रक्रिया को तेज किया जाए और दोषी को जल्द से जल्द सजा दिलवाई जाए। एक और अहम सवाल उठता है कि क्या इतनी आसानी से लोकपाल को इतने तरह के अधिकार दिए जा सकते हैं? देश के मौजूदा कानून और संवैधानिक संस्थाओं को संविधान से मिले अधिकारों के मद्देनजर यह इतना आसान नहीं है। इसमें कई संवैधानिक अड़चनें आएंगी। ड्राफ्ट कमेटी का गठन जितनी आसानी से नोटिफाई हो गया है, प्रस्तावित बिल का मसौदा बनाने में उतनी ही दिक्कते आएंगी। लोकपाल बिल के कानून बनने के बाद भी हर आरोपी के पास राइट टू अपील तो होगा ही। किसी भी तरह के कानून से अपील के इस अधिकार को न तो खत्म किया जा सकता है और न ही ऐसा किया जाना चाहिए, क्योंकि अगर ऐसा होता है तो यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक बात होगा। राइट टू अपील आरोपी के हाथ एक ऐसा अधिकार है, जिसका इस्तेमाल करके वह लंबे समय तक खुला घूम सकता है। संसद और विधानसभा का सदस्य बन सकता है। देश का कोई भी कानून आरोपी को चुनाव लड़ने से नहीं रोकता है। एक अजीब विडंबना और भी है कि अगर कोई संसद सदस्य या मंत्री या विधानसभा का सदस्य किसी जुर्म में दोषी भी करार दे दिया जाता है तो उसकी सदस्यता खत्म नहीं होती है और सिर्फ आरोपी है तो वह ठाठ से लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर का सम्मानित सदस्य बना रह सकता है। जरूरत इस बात की है कि इस तरह के कानूनों में संशोधन किया जाए। अगर भ्रष्टाचार पर लगाम लगानी है तो न्यायिक प्रक्ति्रया में तेजी लाने और मुकदमों के जल्द से जल्द निबटारे की आवश्यकता है, जिसकी ओर अन्ना को ध्यान देना चाहिए था। इस मामले में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बेहद अनुकरणीय उदाहरण पेश किया है। वहां के अपराधियों के खिलाफ फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुनवाई करवाकर जल्द से जल्द मुकदमे का निबटारा करवाया और मुजरिमों को सजा मिली। नतीजा यह हुआ कि सूबे में लोगों के मन में कानून के प्रति एक विश्वास जगा और अपराधियों के मन में कानून का भय। अंत में एक बात और कि अन्ना को इस अनशन के दौरान कई उत्साही लोगों ने छोटे गांधी कह डाला, लेकिन गांधी और अन्ना में बुनियादी अंतर है। गांधी हमेशा व्यक्ति में बदलाव की बात करते थे और अन्ना संस्थागत बदलाव की बात करते हैं। गांधी हमेशा आदर्श स्थिति और रामराज्य की कल्पना करते थे। उनका मानना था कि लोगों का मन इतना साफ हो कि वे भ्रष्टाचारी बनें ही नहीं। जबकि अन्ना हजारे कानून बनाकर उसे रोकने की बात करते हैं। गांधी का लक्ष्य और आदर्श दोनों बेहद बडे़ थे। इसलिए गांधी से अन्ना की तुलना बेमानी है, लेकिन उत्साह में बहुधा तुलना में गलती हो जाती है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं).
लोकपाल बिल पर सभी दलों से चर्चा हो
लोकपाल बिल और अन्ना हजारे के अनशन के संदर्भ में जागरण के सवालों के जवाब दे रहे हैं भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी
भ्रष्टाचार के मुद्दे पर बहस संसद के बाद अब जनता के बीच है। अन्ना हजारे ने गैर राजनीतिक मंच से जन लोकपाल विधेयक के मसौदे के साथ सरकार को लोकपाल विधेयक लाने के लिए बाध्य किया है। भाजपा भी संसद से सड़क तक भ्रष्टाचार के खिलाफ अलख जगाए हुए है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी भी भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने की हजारे की भावनाओं से सहमत हैं। उनका मानना है कि लोकपाल विधेयक संसद में लाने के पहले सरकार सभी दलों के साथ विचार-विमर्श करे। हालांकि वह अपनी कुछ सरकारों पर लग रहे जमीन आवंटन के घोटालों में भ्रष्टाचार के आरोपों से सहमत नहीं है। उनसे इस मुद्दे समेत अन्य कई विषयों पर रामनारायण श्रीवास्तव ने लंबी चर्चा की। प्रस्तुत हैं उनसे चर्चा के प्रमुख अंश : अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन कर सरकार को लोकपाल विधेयक लाने के लिए बाध्य किया। क्या भाजपा पूरी तरह से उनके साथ है? अन्ना हजारे का अनशन लोगों के भीतर के असंतोष का दिखाता है। पिछले दिनों में राष्ट्रमंडल खेल, 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला व काले धन का जो मामला आया है उसे देखते हुए उन्होंने लोकपाल की नियुक्ति का विषय देश के सामने रखा है। आज की स्थिति में आम लोगों का भी मानना है कि इस बारे में विधेयक मंजूर होना चाहिए। इसलिए इसके बारे में कोई कानून व नियम बनाने की बात आती है तो भाजपा केंद्र सरकार का सहयोग करने पर जरूर विचार करेगी। क्या आप जन लोकपाल विधेयक के मसौदे से सहमत हैं? मोटे तौर पर इस तरह के विधेयक की भावना से सहमत हैं, लेकिन केंद्र सरकार को इस तरह का विधेयक लाने से पहले सभी विपक्षी व सत्ता पक्ष के दलों के साथ विचार विमर्श जरूर करना चाहिए। भ्रष्टाचार के आरोपों से भाजपा की राज्य सरकारें भी घिरी हैं। मध्य प्रदेश में कुशाभाऊ ठाकरे ट्रस्ट को जमीन आवंटन सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया है? देखिए, आपके विचारों से मैं थोड़ा सहमत नहीं हूं। कुशाभाऊ ठाकरे ट्रस्ट एक चैरिटेबल ट्रस्ट है। ठाकरे जी ने अपना जीवन देश को भाजपा के कार्यकर्ता के रूप में दिया है। वह अविवाहित थे। उनकी कोई अपनी संपत्ति नहीं थी, कोई परिवार नहीं था। उनके नाम पर एक चैरिटेबल ट्रस्ट है, कोई पब्लिक लिमिटेड या प्राइवेट लिमिटेड कंपनी नहीं है। उसका उद्देश्य यह है कि हम लोग राजनीति में काम करने वाले कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षण करें। जनसुविधा व शैक्षिक संस्था जैसा इसका उद्देश्य है। कांग्रेस ने तो नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी के नाम से हजारों जगहें दी है। एक अच्छे चैरिटेबल काम के लिए जगह देना भ्रष्टाचार की बात नहीं कही जा सकती है। कर्नाटक व उत्तराखंड में भी जमीन आवंटन घोटाले के मामले सामने आए हैं। जहां तक कर्नाटक की बात है तो जिस तरह से राष्ट्रमंडल खेल घोटाले पर सीबीआइ व प्रवर्तन निदेशालय की रिपोर्ट आई व 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले में कैग की रिपोर्ट आई, उस तरह की कोई रिपोर्ट कर्नाटक में तो आई ही नहीं है। जिस एक्ट के तहत उन्होंने जमीन आवंटित की थी, उसके तहत तो पूर्व में धर्म सिंह, एसएम कृष्णा व कुमारस्वामी ने कई निर्णय किए हुए हैं। उत्तराखंड के बारे में भी अभी तक ऐसी कोई रिपोर्ट नहीं आई है। इसलिए इन मामलों की राष्ट्रमंडल व 2 जी घोटालों से तुलना करना उचित नहीं है। आपने कहा कि भाजपा में जो लोग आए वे राजनीति को कमाई का धंधा समझ कर नहीं आए, इसके पीछे क्या आशय है? सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन का प्रभावी उपकरण राजनीति है। हमको समाज व देश की उन्नति के लिए काम करना है। इसके लिए राष्ट्रवाद हमारा विचार, देशभक्ति हमारी प्रेरणा और सुशासन व विकास हमारा लक्ष्य है। जो शैक्षिक, सामाजिक व आर्थिक रूप से पिछड़े हुए हैं, जिनके पास रहने के लिए मकान नहीं है, जिनके शरीर पर कपड़ा नहीं है, ऐसे लोगों को हम भगवान मानेंगे। यह अंत्योदय है और इसमें सारे वाद व सभी तरह के न्याय हैं। कुछ लोगों को लगता है कि सत्ता हासिल करना कमाने का धंधा है, वे ऐसा न समझें। हां राजनेता अपना उद्योग धंधा जो भी है, उसे ठीक तरह से चलाएं। कानूनी मार्ग से पैसा कमाना कोई गुनाह नहीं है, लेकिन विधायक, सांसद व मंत्री बनने के बाद उस माध्यम से पैसा कमाना, यह नहीं होना चाहिए। हाल में सरकार बनाने व चलाने में जिस तरह की कारपोरेट लाबिंग की बातें सामने आई हैं, उसे कैसे देखते हैं? मुझे लगता है कि जो कुछ हुआ वह अच्छा नहीं हुआ है। जो बातें कहीं गई हैं और जो गलतियां हुई हैं उनको सुधार करके आगे बढ़ना चाहिए। इस तरह से अगर हम सभी को दोष दें तो इस देश में काम करने के लिए लोग नहीं मिलेंगे। जेपीसी व पीएसी में फिर से विवाद खड़ा हो गया है? देखिए, पीएसी हमारी संसद की स्थायी समिति है। कैग की रिपोर्ट पर काम करना उसका अधिकार है। पीेएसी को जिसे बुलाना है, बात करनी है तो वह कर रही है। जेपीसी भी हमारी संसद की बनी समिति है। पीएसी को किसी मंत्री या प्रधानमंत्री को बुलाने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी है। जेपीसी के लिए इसकी जरूरत नहीं है। मुझे लगता है कि दोनों समिति अपना काम ठीक से कर रही है। इसमें कोई भ्रम नहीं है। दोनों की रिपोर्ट देश के लिए महत्वपूर्ण है। अगर कोई कानूनी दिक्कत आती है तो उसे देखना स्पीकर की जिम्मेदारी है। जेपीसी की मांग भाजपा ने की थी। अब कांग्रेस के लोग कह रहे हैं कि जेपीसी बनने के बाद पीएसी की जरूरत नहीं है और भाजपा डॉ. जोशी पर अंकुश लगाए? पीएसी को बंद करना व शुरू करना भाजपा का सवाल नहीं है। डॉ. जोशी को अध्यक्ष पद पर मनोनीत स्पीकर ने किया है और स्पीकर के मार्गदर्शन में पीएसी काम कर रही है। कांग्रेस को कुछ लगता है तो स्पीकर को कहें। राजग सरकार के समय मंत्री रहे लोगों के जेपीसी सदस्य बनने पर सवाल उठ रहे हैं? मुझे लगता है कि इस तरह से किसी की साख व प्रतिबद्धता पर सवाल उठाना अन्यायपूर्ण होगा। ऐसे लोगों की प्रतिबद्धता असंदिग्ध है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के बारे में पार्टी का क्या आकलन है? असम में भाजपा और बाकी दलों के सहयोग से हम गैर-कांग्रेस सरकार बना सकेंगे। बाकी चार राज्यों में तो हमारी अभी विधानसभा में उपस्थिति नहीं है। इस बार हम वहां तक अपनी पहुंच बना सकेंगे। साथ ही अपना वोट प्रतिशत पिछली बार से तीन गुना बढ़ा सकते हैं|
चुनाव सुधार पर लड़ेंगे अन्ना अगली लड़ाई
लोकपाल विधेयक मसौदे को बनाने में पहली बार गैर सरकारी सदस्यों की भी भागीदारी सुनिश्चित कराने में सरकार को झुका चुके अन्ना हजारे अब इस लड़ाई को विस्तार देने में जुट गए हैं। अब उनका अगला एजेंडा चुनाव सुधार और सत्ता का विकेंद्रीकरण है। अब मतदाताओं को चुनाव में लड़ने वाले सभी प्रत्याशियों को नापसंद (रिजेक्ट) करने या फिर चुने हुए प्रतिनिधियों को वापस बुलाने (रिकॉल) का अधिकार दिलाना उनका मकसद है। साथ ही उन्होंने हर कानून बनाने में जन भागीदारी की पैरवी की है। लोकपाल विधेयक के मसौदे के लिए सरकारी और गैर सरकारी दस सदस्यों की संयुक्त समिति गठन के साथ ही उठे तमाम सवालों के बाद रविवार को अन्ना फिर मीडिया से रुबरू हुए। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा वोटर जागरूक नहीं है। वह अपने वोट की कीमत नहीं जानता। मैं चुनाव लड़ा तो मेरी जमानत जब्त हो जाएगी, लेकिन अब हम चाहते हैं कि मतपत्र में प्रत्याशियों के नाम के बाद अंत में नापसंद का चिन्ह होना चाहिए। मतदाता सभी प्रत्याशियों को खारिज कर दें तो फिर से चुनाव होना चाहिए। इसी तरह मतदाताओं को चुने हुए प्रत्याशियों को वापस बुलाने का भी अधिकार मिलना चाहिए। यह हमारे एजेंडे पर है। लोकपाल के बाद इस पर काम शुरू करेंगे। अन्ना यह भी चाहते हैं चुनाव में मतदान न करने वाले मतदाताओं की सारी सुविधाएं पांच साल तक बंद कर देनी चाहिए। यह पूछे जाने पर कि क्या वे अब चाहते हैं कि सभी कानूनों के विधेयकों का मसौदा सामाजिक सहभागिता से ही बनें? उन्होंने कहा कि हर कानून में जन भागीदारी होनी ही चाहिए। अन्ना के आंदोलन से जुड़े आरटीआइ कार्यकर्ता अरविंद केजरीवाल ने कहा, अगला एजेंडा राजनीतिक शक्ति के विकेंद्रीकरण का है, जिसमें मोहल्ला व ग्रामसभाओं को स्थानीय स्तर पर कानून बनाने को अधिकार मिल सके। अन्ना सिर्फ भ्रष्टाचार को रोकने लिए जनलोकपाल जैसा कानून बनाने तक ही सीमित नहीं रहना चाहते। वे भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए एक संगठन भी बनाएंगे, लेकिन अभी उसमें समय लगेगा। जबकि इस बीच वे सभी राज्यों में जाकर अभियान को गति देंगे। राजनीतिक दलों के युवा संगठनों का समर्थन मिलने के सवाल पर अन्ना ने कहा किसी से उन्हें समर्थन नहीं मिला और उनके इस आंदोलन का किसी राजनीतिक दल से कोई लेना-देना नहीं है|
भ्रष्टाचार पर अंकुश के लिए राज्यों में भी मंथन तेज
केंद्र में मजबूत लोकपाल विधेयक का मार्ग प्रशस्त होने के साथ ही राज्यों में लोकायुक्त संस्था को भी ताकतवर बनाने की मुहिम तेज होने लगी है। दंतविहीन लोकायुक्त के बजाय भ्रष्टाचार पर अंकुश के लिए उसे ज्यादा ताकतवर बनाने की नीयत कितनी है, कहना मुश्किल है, लेकिन राज्य सरकारों ने इस विषय पर मंथन तेज कर दिया है। दिल्ली में लोकायुक्त ने खुद ही यह पहल की है तो भ्रष्टाचार के मुद्दे पर पिछले दिनों विवाद के केंद्र में रही कर्नाटक सरकार भी लोकायुक्त को और ज्यादा अधिकार देने की घोषणा कर रही है। हालांकि, लोकायुक्त के चयन की प्रक्रिया और उसके अधिकारों के दायरे का काफी कुछ भविष्य केंद्र के लोकपाल कानून के प्रारूप पर तय करेगा। सूत्रों के मुताबिक, दो प्रमुख दलों कांग्रेस और भाजपा ने अपनी-अपनी राज्य सरकारों को इस मुद्दे की संवेदनशीलता समझते हुए अपने प्रदेश तंत्र को लोकायुक्त संस्था के बारे में सजग कर दिया है। बस सबकी नजरें, इस बात पर लगी हैं कि प्रधानमंत्री लोकपाल कानून के दायरे में आएंगे या नहीं और किसी भी नेता या नौकरशाह के खिलाफ उसे सीधे प्राथमिकी दर्ज करने का अधिकार मिलेगा या नहीं। कर्नाटक के पूर्व लोकायुक्त और लोकपाल विधेयक को तैयार करने की साझा कमेटी में सदस्य बनाए गए संतोष हेगड़े साफ कहते हैं कि केंद्र का कानून अगर जरा भी कमजोर हुआ तो राज्य सरकारों को रास्ता मिल जाएगा। वास्तव में आम आदमी को सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाला भ्रष्टाचार राज्य प्रशासन में ही होता है। इसलिए, केंद्र को मजबूत लोकपाल कानून बना कर राज्यों के सामने बड़ी लाइन खींचनी होगी। जिन राज्यों में लोकायुक्त को थोड़ा प्रभावी बनाया गया है, उनमें कर्नाटक प्रमुख है। अन्ना हजारे की तरफ से अभी सुझाए गए जनलोकपाल विधेयक के कई प्रावधान पहले ही वहां थे। हालांकि, इसका श्रेय वहां की राज्य सरकारों के बजाय हेगड़े को है जिन्होंने लोकायुक्त रहते संस्था को दांत और नाखून दिलाए। मसलन मंत्री और बड़े नौकरशाहों के खिलाफ सीधे एफआइआर दर्ज कराने के लिए लोकायुक्त पुलिस तक कर्नाटक में थी। इसका ही नतीजा था कि हेगड़े ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कर्नाटक के मुख्यमंत्री को कानून की ताकत का अहसास कराया। हालांकि पूरी तरह से प्रभावी और स्पष्ट कानून के अभाव में लोकायुक्त संस्था को ही अंतत: नीचा देखना पड़ा। ऐसे में अगर केंद्र में लोकपाल को असीमित अधिकार मिले तो जाहिर तौर पर राज्यों को उसका अनुकरण करना होगा। वरना तय तो यह है कि लोकायुक्त संस्था को राजनीतिक दल ज्यादा ताकतवर तो दूर बहुत ज्यादा सक्रिय तक नहीं देखना चाहते। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है राजस्थान। यहां पर लोकायुक्त ने तीन साल तक सरकार के कामकाज की रिपोर्ट राज्यपाल को पेश की, लेकिन उसे विधानसभा में कभी पेश नहीं किया गया। मजे की बात तो है कि कभी विपक्ष ने भी इसको लेकर सवाल नहीं उठाए। इसी तरह कर्नाटक, दिल्ली और मध्य प्रदेश में लोकायुक्त का वहां की राज्य सरकारों के साथ टकराव जगजाहिर ही है। खासतौर से कांग्रेस शासित राज्यों की तुलना में लोकायुक्त को अधिकार देने में अभी भाजपा शासित राज्य ज्यादा आगे हैं। हालांकि उनकी सक्रियता भाजपा को भी रास नहीं आई। दिल्ली के लोकायुक्त जस्टिस मनमोहन सरीन ने भी इन राज्यों के समान आर्थिक व प्रशासनिक स्वायत्तता देने की जरूरत बतायी है। अब चूंकि, केंद्र में अन्ना हजारे के नेतृत्व में भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता ने बिगुल बज गया है तो राज्यों में भी नए सिरे से सोच बन रही है। भाजपा महासचिव रविशंकर प्रसाद तो साफ कहते हैं कि बिहार में हम जैसा कानून बना रहे हैं, वह केंद्र के लिए नजीर हो सकता है। मौजूदा घटनाक्रम बताता है कि जनता भ्रष्टाचार से ऊब चुकी है, लिहाजा इसमें देरी नहीं होनी चाहिए। वहीं कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी कहते हैं कि राज्यों में लोकायुक्त संस्था मजबूत करना वक्त की जरूरत है। इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए|
लोकपाल पर पर्दे में नहीं होगा काम
लोकपाल विधेयक मसौदा कमेटी के गठन पर उठे विवाद को अन्ना ने 24 घंटे में ही शांत कर दिया। बाबा रामदेव से किसी भी प्रकार के विरोध से इंकार करते हुए अन्ना ने कहा, कमेटी में उन्हें ही जगह दी गई है जो विधेयक बनाने के मसौदे से जुड़े रहे हैं। इससे समिति की बैठकों में सरकार के समक्ष लोकपाल के समर्थन में तर्क रखने में मदद मिलेगी। कानून का मसौदा बनाने के रास्ते में किंचित मात्र का संदेह रोकने को पूर्ण पारदर्शिता बरती जाएगी। सरकार के साथ छुपकर कोई वार्ता नहीं होगी। बिल के मसौदे पर होने वाली बैठक में जो कुछ भी होगा, वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए उसे पूरा देश देखेगा। अन्ना ने कृषि मंत्री शरद पवार पर फिर दबाब बनाते हुए कहा,अगर जनता चाहती है कि तो उन्हें केंद्रीय मंत्रीमंडल से इस्तीफा दे देना चाहिए। अन्ना ने रविवार को यहां संवाददाता सम्मेलन में लोकपाल बिल मसौदा कमेटी के गठन पर उठे सवालों का एक-एक कर जवाब दिया। उन्होंने कहा, मसौदा समिति में किसी बदलाव की जरूरत नहीं है। किरन बेदी ने खुद को कमेटी में शामिल न करने का आग्रह पहले ही किया था। रामदेव ने ही समिति में जनता के नुमाइंदों को लेकर शनिवार को सवाल खड़े किये थे। अरविंद केजरीवाल ने मीडिया से आग्रह किया कि इसमें अब कोई साजिश न ढूंढे। अन्ना ने आंदोलन पर सवाल उठाने वालों को आड़े हाथों लेते हुए कहा, मैं जनहित में प्राण रहने तक आंदोलन करता रहूंगा। अगर ऐसे लोगों को लगता है कि यह ब्लैकमेल है तो मैं उसे करता रहूंगा। उन्होंने कहा, लोकपाल बिल का मसौदा बनाने वाली कमेटी अपना काम 16 अप्रैल से शुरु कर देगी। पारदर्शिता के लिए कमेटी के सदस्यों के बीच विचार-विमर्श का ब्योरा वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए पूरा देश देखेगा ताकि किसी को पूरी प्रक्रिया पर संदेह न हो। अन्ना ने कहा, लोकपाल कानून से 90 फीसदी भ्रष्टाचार खत्म होगा। बाकी 10 फीसदी के लिए और प्रयास करने होंगे। उन्होंने कहा, लोकपाल बिल का मसौदा तैयार वाली समिति में शामिल सभी दस सदस्य अपनी संपत्तियों का ब्यौरा सार्वजनिक करें। संयुक्त समिति के मसौदे पर सरकारी मंजूरी के बाद भी संसद में विधेयक पारित नहीं हुआ तो क्या करेंगे? उन्होंने कहा कि उसे पारित कराने को फिर आंदोलन करेंगे। वैसे हमें संसद पर पूरा विश्वास है। इतना ही नहीं, लोकपाल बिल का मसौदा संयुक्त समिति में तैयार हो जाने के बाद उसे गांव स्तर तक ले जाना चाहेंगे। क्या आमरण अनशन पर बैठने से पहले कृषि मंत्री शरद पवार से साथ के लिए संपर्क साधा था? उन्होंने कहा, उनके आंदोलनों के दबाव में छह कैबिनेट मंत्री और 400 से अधिक अफसर हट चुके हैं। उनकी लड़ाई किसी व्यक्ति से नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार की प्रवृत्ति से है।
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