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Wednesday, June 1, 2011

उद्योगों के लिए जमीन


किसानों, खेतिहर मजदूरों और आदिवासियों का विस्थापन इस समय देश की एक प्रमुख समस्या के रूप में उभर रहा है। विस्थापन के दो प्रमुख कारण हैं, शहरीकरण और नए उद्योगों की स्थापना। अगर भारत को तरक्की करनी है तो इनमें से किसी का भी विरोध नहीं किया जा सकता। जो बुद्धिजीवी विस्थापन का विरोध कर रहे हैं, वे बुनियादी रूप से विकास-विरोधी नहीं हैं। उनकी मांग सिर्फ इतनी है कि औद्योगीकरण किसानों के हितों की कीमत पर न हो। औद्योगीकरण का फायदा तो सभी को मिलेगा, पर मारे जाएंगे किसान। जब किसानों को अपनी जमीन से जुदा होने के लिए मजबूर कर दिया जाता है, तब स्वाभाविक है कि वे ज्यादा से ज्यादा मुआवजे की मांग करें। जमीन का छिनना उनके लिए सिर्फ जमीन से महरूम होना नहीं है, जीविका एक एकमात्र साधन से वंचित होना भी है। इसीलिए भूमि के प्रति ममता बढ़ी है और लोग नए उद्योगों की स्थापना का विरोध कर रहे हैं। समस्या यह है कि समस्या की जड़ में जाने की कोशिश नहीं हो रही है। औद्योगीकरण का विरोध कहीं-कहीं इस तरह हो रहा है मानो औद्योगिक विकास ही अवांछित हो। कृषि भूमि के औद्योगिक उपयोग की पहलों के विरोध का आधार यह प्रतीत होता है कि किसानों का किसान बने रहना ही श्रेयस्कर है। इससे एक अजीब अंतद्र्वद्व की सृष्टि हो रही है। यह भ्रम पैदा हो रहा है कि सरकार विकास चाहती है और उसके विरोधी यथास्थिति के समर्थक हैं। इस भ्रम को दूर किया जाना चाहिए और सिर्फ विस्थापन का विरोध कर ऐसे तरीकों का प्रचार करना चाहिए, जिनसे औद्योगीकरण भी हो और इसके लिए व्यापक जन संहार भी न करना पड़े। आजादी के बाद से ही औद्योगीकरण का हल्ला शुरू हो गया था, पर वास्तविक औद्योगीकरण बहुत कम हुआ। इसी का नतीजा है कि कृषि पर इतनी बड़ी आबादी की निर्भरता बनी हुई है। किसी देश के लगभग 70 प्रतिशत लोग अपनी जीविका के लिए किसी न किसी रूप में अगर कृषि क्षेत्र पर निर्भर हों तो वह देश खेतिहर ही कहलाएगा। उसे औद्योगिक दृष्टि से विकसित देश नहीं कहा जा सकता। यही वह मूल गड़बड़ी है, जिसके कारण खेती और उद्योग ही नहीं बिगड़े हुए हैं, बल्कि बेरोजगारी की समस्या भी उग्रतर होती जा रही है। विकास का कोई निश्चित पैमाना नहीं है, क्योंकि हर देश की अपनी परिस्थितियां होती हैं और इन परिस्थितियों के फ्रेम में ही विकास की कार्यनीति बनाई जाती है। हमारे देश के लिए ऐसे उद्योग, जिनमें पूंजी ज्यादा लगती हो और रोजगार कम पैदा होता हो, खतरनाक हैं। इससे आर्थिक शक्ति का भयावह केंद्रीकरण होता है और ऐसे लोगों की तादाद बढ़ती जाती है, जिनकी जेब में पैसा नहीं होता। पैसा न होने से वे उपभोक्ता बाजार में प्रवेश नहीं कर पाते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि खेती और कारखानों से पैदा होने वाली चीजों का बाजार तेजी से नहीं बढ़ता। जनसाधारण की क्रय शक्ति सीमित रहने से किसान को खेती की पैदावार का उचित मूल्य नहीं मिल पाता, क्योंकि सरकार कृषि उपज के मूल्यों को, खासतौर से अन्न के मूल्यों को, अनुचित तरीके से दबाकर रखती है। इसका दूसरा नतीजा यह होता है कि सरकार कृषि क्षेत्र को सब्सिडी देने को बाध्य हो जाती है। न दे तो किसानों में और ज्यादा हाहाकार मच जाए। लोगों की क्रय शक्ति न बढ़ने का एक और नतीजा यह होता है कि औद्योगिक उत्पादन की खपत न बढ़ने से उद्योग-धंधों का विकास अपेक्षित गति से नहीं हो पाता। कई दशकों से हमारी अर्थव्यवस्था इसी संकट में गिरफ्तार है। फिर भी हममें से कुछ लोग खुश होकर दांत निपोरते रहते हैं कि भारत एक बहुत बड़ा बाजार बन चुका है। अगर उपभोक्ता समुदाय की संख्या बीस या तीस करोड़ मान ली जाए तो भी सत्तर-अस्सी करोड़ से ज्यादा लोग अभी भी बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति के संघर्ष तक ही सीमित है। इसलिए भारत का औद्योगीकरण जरूरी ही नहीं, अनिवार्य है। लेकिन उस ढंग का औद्योगीकरण नहीं, जैसा हो रहा है। हमें तो ऐसे कल-कारखाने चाहिए, जिनमें पूंजी कम लगे और रोजगार ज्यादा पैदा हो। इसके लिए उत्पादकता के स्तर से समझौता किया जा सकता है। जो नई से नई मशीनों का समर्थन कर रहे हैं, वे देश के दुश्मन हैं। उन्हें एक खास वर्ग की चिंता है, देश के सभी वर्गो की नहीं। अपनी परिस्थितियों के अनुसार टेक्नोलॉजी अगर हम विदेशी बाजार से आयात नहीं कर सकते, क्योंकि सारी दुनिया ही नवीनतम टेक्नोलॉजी के पीछे दीवानी है, तो हमें यह टेक्नोलॉजी खुद पैदा करनी होगी। यह तभी संभव है, जब इस मिशन को राष्ट्रीय अभियान बनाया जाए। इस टेक्नोलॉजी पर आधारित कारखाने स्थापित करने के लिए ज्यादा जमीन की जरूरत नहीं होगी। पूंजी कम लगने से गांव के लोग या ग्राम और जिला पंचायतें भी ऐसी औद्योगिक इकाइयां खड़ी कर सकेंगी। टेक्नोलॉजी सरल होने से गांव के लोग भी उसका संचालन कर सकेंगे। इस औद्योगिक नीति का नतीजा यह होगा कि खेती पर आधारित आबादी धीरे-धीरे उद्योगों की तरफ मुड़ने लगेगी। दुख इस बात का है कि समस्या पर समग्रता से विचार न कर जमीन के मुवावजे के विभिन्न फार्मूलों पर विचार हो रहा है, मानो खेती और उद्योग एक-दूसरे से जुड़े हुए न हों, बल्कि उनकी नियति अलग-अलग हो। कोई भी गंभीर समस्या इस संकुचित दृष्टि से नहीं सुलझाई जा सकती। दोनों ही बुनियादी समस्याएं हैं। अगर हम सिर्फ उनके रोजगार की बात सोचेंगे, जिनकी जमीन हड़पी जा रही है तो उनके लिए कौन सोचेगा, जिनके पास जमीन तो है, पर जो फिर भी गरीबी से घिरे हुए हैं?

Sunday, May 15, 2011

दलित दिखाएं आत्मनिरीक्षण का जज्बा


डॉ. अंबेडकर ने दलित होने की एक ही कसौटी बनाई थी और वह है-अछूत होना। हिन्दू समाज में जिन जातियों को अछूत माना जाता है, वे ही दलित माने जाते हैं। इस परिभाषा के अनुसार सफाई कामगार सबसे ज्यादा दलित हैं। ऐतिहासिक रूप से उनका काम मल को शौचालय से निकाल कर दूसरी जगह ले जाना रहा है। जहां-जहां पानी बहाने वाले शौचालय नहीं हैं। वहां-वहां अब भी सफाई का यह काम सफाई कामगार ही करते हैं। नगरपालिकाओं में भी सफाई का काम इन्हीं के जिम्मे हैं। अस्पतालों तथा बड़ी-बड़ी बिल्डिंगों में शौचालयों को साफ रखने की जिम्मेदारी इन्हीं पर है। इस वर्ग की स्थिति इतनी दयनीय रही है कि दलितों के दूसरे वर्गों को, जो अपेक्षाकृत कम बुरी स्थिति में हैं, सबसे पहले इन्हीं के लिए लड़ना चाहिए था। दलित नेतृत्व ने सफाई कामगारों को अपने साथ जोड़ा ही नहीं। अत: इन्हें अपना संगठन अलग से बनाना पड़ा। सफाई कामगार समुदाय के तेजस्वी नेता दर्शन ‘रत्न’ रावण आम दलित नेताओं से अलग हैं। रावण जी का काम मुख्य रूप से पंजाब के जालंधर जिले में है पर देश के अधिकांश भागों में उनका नेटवर्क है। रावण जी को कई साल पहले दिल्ली में आयोजित सफाई कामगार सम्मेलन में सिर्फ एक बार सुना है। तब मैंने सोचा था कि नाम रावण है तो विचार भी उतने ही उग्र होंगे लेकिन उनका व्याख्यान एकदम अलग तरह का था। वे न किसी नेता की तरह बोल रहे थे, न किसी लेखक की तरह। पेशेवर वक्ता की तर्ज पर तो कतई नहीं थी। जो कुछ सुनाई पड़ रहा था, वह सीधे उनके हृदय से आ रहा था। इस हृदय में दर्द था, अकुलाहट थी। लेकिन वैसे ही जैसे किसी संत की वाणी में होती है। दर्द सख्त हो कर चट्टान बन गया था। तब भी हृदय करु णा से ओतप्रोत था। दिनों के बाद मुझे सच्ची धार्मिंकता के दर्शन हुए। रावण जी जैसे-जैसे बोलते गए, मेरा सिर उनके चरणों में झुकता गया। नाम रावण है पर बोल वे राम की तरह रहे थे। हाल में मेरे मित्र योगेद्र यादव ने मुझे रावण जी की किताब दी ‘अंबेडकर से विमुख सफाई कामगार समाज : उपेक्षित, कारण और मुक्ति’। सफाई कामगार समुदाय की पीड़ा को समझने के लिए हर एक को यह पुस्तक पढ़नी चाहिए। यह पुस्तक रावण जी ने ‘उन तमाम मांओं को’ समर्पित की है ‘जिन्होंने अपने सिरों पर मल-मूत्र ढोया।’ वे अपनी मां के बारे में लिखते हैं,‘मेरी मां ! नाम कान्ता। शब्दकोश में अर्थ देखा। लिखा है, सुंदर औरत। मां..हर किसी को अपनी मां ही सबसे सुंदर लगती है। मगर कैसे बयान करूं, उस मां की सुंदरता ? उसके रंग-रूप, नयन-नक्श के बारे में लिखूं या सुबह चार बजे उठती उस मां के बारे में कहूं जो पहले जानवरों (गाय-भैंस) का गंद (गोबर) उठा कर घर लाती और उसके बाद इनसानों का मल-मूत्र अपने सिर पर ढोने चल पड़ती, उसके किस रूप को उतारूं इन बेजान कागजों पर? किन आंखों के आगे रखूं? जिन्हें न तो मां का जबरी मुस्कराता चेहरा दिखाई देता है, न मां के सिर पर रखी टोकरी तिरस्कार लगती है।
रावण जी के विवेचन की सबसे बड़ी ताकत यह है कि सफाई कामगार समुदाय की दुर्दशा के लिए वे जहां कांग्रेस नेतृत्व और सफाई कामगारों के स्वयंभू नेताओं को जिम्मेदार ठहराते हैं, वहीं सफाई कामगार समुदाय की कमियों और बुराइयों को भी नहीं बख्शते। कोई भी सच्चा शुभचिंतक सबसे पहले हमारा चरित्र निर्माण करना चाहता है, ताकि हम अपनी लड़ाई पूरी सामथ्र्य से लड़ सकें। इसीलिए सफाई कामगारों की मुक्ति के लिए रावण जी उन्हें अपनी रूढ़ियों, व्यसनों तथा फिजूलखर्चियों से मुक्त होने की प्रेरणा बराबर देते रहते हैं। उनके प्रयत्नों से सैकड़ों लोगों के जीवन में परिवर्तन भी आया है। कुछ उदाहरण विचार करने लायक हैं। रावण जी बताते हैं, ‘कश्मीर में आतंकियों की गोली से इतने जवान शहीद नहीं होते जितने सीवर में घुट कर या उसकी बीमारियों को ले कर सफाईकर्मी मर जाते हैं। 22,327 सीवरमेन हर साल सीवर में दम घुटने से मर जाते हैं। अकेले मुंबई में हर साल 350 लोग सीवर में दम घुटने से मर जाते हैं।’ इसके बाद करवा चौथ जैसी रूढ़ियों पर फटकार ‘इसके बावजूद ब्राह्मण के फैलाए ढोंग में फंस कर सफाई कामगार समाज की औरतें निरंतर करवा चौथ व आहोई का व्रत रख रही हैं ताकि उनके पतियों की उम्र लंबी हो जाए जबकि इन बेचारों के कदम लगातार मृत्युपर्यंत (गंदा नाला) की तरफ बढ़ते हैं। कोई देवी-देवता या पीर इनके नरक को नहीं रोक पाया।
दलितों के अन्य समूहों में शिक्षा के प्रति लगन बढ़ी है। फलस्वरूप उनके बच्चे अच्छी नौकरियों में जगह पा रहे हैं। लेकिन सफाई कामगार समुदाय ने अभी तक शिक्षा के महत्त्व के नहीं समझा है। रावण लिखते हैं, ‘दूसरा हिस्सा जिसने गांवों से उठ कर शहरों में सफाई कर्मचारी की पक्की नौकरी पा ली। उसका खाना-पीना, पहनावा, रहन- सहन शहरों जैसा हो गया। इसी ने पूरे सफाई कामगार समाज की सूरते- ए-हाल बदलनी थी मगर वह सुविधाओं का गुलाम हो गया। पैसा मिला, तो नए शौक पाल लिए।’ सफाई कामगारों की नई पीढ़ी की आलोचना करते हुए रावण जी ने चार ‘एम’ का जिक्र किया है-मोटरसाइकिल, मोबाइल, मसल और मस्टंडा, जो उन्हें बिगाड़ रहे हैं। जो भी समाज आगे बढ़ना चाहता है तो सबसे पहले वह अपना शुद्धिकरण करता है। इससे उसमें आंतरिक ताकत आती है। यह ताकत लाना उसके बौद्धिक नेतृत्व का काम है। रावण जी यह काम बड़ी तड़प के साथ कर रहे हैं लेकिन दलित नेतृत्व में इसका अभाव दिखाई देता है। दूसरों को कोसते रहने से अच्छा है, अपनी ओर नजर दौड़ाई जाए। इससे दलित समुदाय कमजोर नहीं होगा, मजबूत ही होगा।


Sunday, April 10, 2011

जनसंख्या का सवाल


2011 की जनगणना का जो विवरण अभी जारी किया गया है उसके कई निष्कर्ष आश्चर्यजनक हैं। इसमें कई नुक्तों की पूरी तरह उपेक्षा कर दी गई है। ऐसा लगता है कि अखबार भी उन्हीं चीजों को चुनते हैं जो उन्हें आकर्षक लगते हैं। इस सिलसिले में मैं दो बातों की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं। पहली बात 2001 और 2011 के बीच जनसंख्या वृद्धि का प्रतिशत कम होने पर है, जिसे लेकर काफी खुशी व्यक्त की गई है। मेरी समझ में नहीं आया कि इसमें खुश होने की बात क्या है? 2001 में भारत की जनसंख्या एक अरब 2 करोड़ थी और 2011 में यह बढ़कर एक अरब 21 करोड़ हो गई। जनगणना अधिकारियों के अनुसार इन दस वर्षो में भारत की आबादी में कुल 18 करोड़ 14 लाख की वृद्धि हुई, लेकिन इसके पिछले दशक में भी तो लगभग यही हुआ था। उस दशक में देश की आबादी में 18 करोड़ 23 लाख की वृद्धि हुई थी। 2001 और 2011 के बीच वृद्धि में फर्क सिर्फ नौ लाख का है। क्या ऐसी ही स्थितियों का बयान करने के लिए ऊंट के मुंह में जीरा का मुहावरा नहीं बना है। जिस बात पर खुशी जाहिर की जा रही है, वह है दशकीय वृद्धि दर में कमी आना। 1991 और 2001 के दशक में यह वृद्धि दर 21.54 प्रतिशत थी। 2001 और 2011 के दशक में वृद्धि दर गिर कर 17.64 हो गई है। देखने की बात यह है कि आधार वषरें में जनसंख्या का स्तर क्या था। 1991 में देश की जनसंख्या थी 84 करोड़ 24 लाख। इसमें 21.54 प्रतिशत वृद्धि का मतलब हुआ 18 करोड़ 23 लाख लोगों की वृद्धि। 2001 और 2011 के बीच के दशक में 17.64 प्रतिशत की वृद्धि हुई। यानी वृद्धि का औसत गिरा, लेकिन नागरिकों की वृद्धि संख्या में कोई फर्क नहीं आया। इस दशक में भी भारतीयों की संख्या 18 करोड़ 23 लाख बढ़ गई। आप देख सकते हैं कि प्रतिशत का खेल कैसे धोखा देता है। 1991 के आधार वर्ष में आबादी कम थी। इसलिए उसमें अधिक प्रतिशत की वृद्धि होने पर भी आबादी उतनी ही बढ़ी जितनी इस दशक में यह प्रतिशत कम होने से। अगले दशक में वृद्धि प्रतिशत और कम हो जाएगी, पर हो सकता है वास्तविक आबादी वृद्धि में कुछ खास फर्क न आए। खैर, यह कोई बड़ी आंकड़ेबाजी नहीं है। अंकगणित का कक्षा दस का विद्यार्थी भी इस पेंच को समझ और समझा जा सकता है। असली बात जनगणना आयुक्त की यह टिप्पणी है कि जनसंख्या में वृद्धि का प्रमुख कारण गरीबी है। अखबारी विद्वानों ने इस पहलू की चर्चा ही नहीं की है। जाहिर है, उच्च या मध्य वर्ग के लोग आबादी नहीं बढ़ा रहे हैं। उनके लिए अब यह संभव ही नहीं है, क्योंकि एक बच्चे के लालन-पालन और पढ़ाई-लिखाई में इतना खर्च हो जाता है कि बहुत से लोग तो दूसरा बच्चा पैदा करने का साहस ही नहीं दिखा पाते। इसलिए मध्य वर्ग में आमतौर पर दो बच्चों का चलन हो गया है। एक पुरुष और एक स्त्री यानी दो व्यक्तियों के दो बच्चे होने से आबादी स्थिर रहती है। यही आदर्श भी है। आदर्श यह भी है कि पूरा देश मध्य वर्ग की श्रेणी में आ जाए। पश्चिमी देशों में आबादी इसलिए नहीं बढ़ रही है, क्योंकि वहां संपूर्ण आबादी का मध्यवर्गीकरण हो चुका है। जो थोड़े-बहुत गरीब लोग हैं, वे ही आबादी बढ़ा रहे हैं या फिर दूसरे देशों से आने वाले लोग। फिर भी इन देशों की जनसंख्या कितनी है। चीन में जनसंख्या वृद्धि पर अंकुश इसलिए लगा कि वहां तानाशाही है और सरकार ने जोर-जुल्म के बल पर एक संतान का नियम लागू करा लिया। दुनिया के किसी भी देश में यह चमत्कार नहीं हो सका है, क्योंकि दुनिया के किसी भी देश में इतना दमन नहीं रहा है जितना चीन में रहा है। आश्चर्य की बात यह है कि तिस पर भी भारत के बहुत से लोग जनसंख्या नियंत्रण के लिए चीनी मॉडल का उदाहरण देते हैं। भारत सरकार आबादी रोकने के लिए प्रचार और प्रोत्साहन का सहारा लेती रही है। हम दो हमारे दो जैसे मुहावरे लोकभाषा का अंग बन चुके हैं। बाकी उपाय रहे हैं निरोध का मुफ्त वितरण। नसबंदी कराने पर दो-चार सौ रुपये दे देना और ऐसी ही कुछ छिटपुट उदारताएं। इनसे भी आबादी वृद्धि को रोकने में कुछ मदद मिली ही होगी, लेकिन आबादी बढ़ने का जो मुख्य कारण है यानी गरीबी उस दिशा में कुछ नहीं किया गया है। विकास के अर्थशास्त्री पता नहीं कब से दोहरा रहे हैं कि सबसे अच्छा गर्भ निरोधक है विकास। डेवलेपमेंट इज द बेस्ट कंट्रासेप्टिव। भारत सरकार इस बात से पूर्णत: अवगत है। फिर भी उसने अभी तक देश की बहुसंख्य आबादी को विकास के दायरे में लाने की कोशिश नहीं की है। इसका तो सीधा मतलब हुआ कि सरकार वास्तव में देश की जनसंख्या कम करना नहीं चाहती। यह कोई रहस्य की बात नहीं है। सरकार के पृष्ठपोषक और उसके समर्थक मध्य वर्गीय शहरों में ही निवास करते हैं। इसके विपरीत अधिकतर गरीब लोग गांवों में रहते हैं। इसलिए गांवों में क्या हो रहा है, इससे शहरों में रह रहे संपन्न और शक्तिशाली लोगों को कोई मतलब नहीं है। बेशक गांवों की आबादी रोजगार की खोज में शहर आती है तो शहर का आधारभूत ढांचा चरमराने लगता है, लेकिन इससे क्या सस्ते नौकर-मजदूर, रिक्शा ड्राइवर, कामवालियां भी तो गांवों से ही आती हैं। यह वर्ग शहर आना छोड़ दे तो शहरी लोगों के हाथ से तोते उड़ जाएंगे|

Wednesday, February 2, 2011

कैसे सुलझेगी कश्मीर की गुत्थी


श्रीनगर के लाल चौक पर भारत का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा फहराने के लिए भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने जो संघर्ष किया, उसकी काफी आलोचना हुई है। मैं भी इस मत का समर्थक हूं कि कश्मीर की मौजूदा स्थिति में भाजपा को यह जिद नहीं करनी चाहिए थी। यह ठीक है कि भारत के किसी भी नागरिक या संगठन को लाल चौक या कश्मीर में कहीं भी तिरंगा फहराने की आजादी है और यह आजादी सिर्फ संविधान या कानून की किताबों में सैद्धांतिक तौर पर नहीं होनी चाहिए, बल्कि इस आजादी का उपयोग व्यावहारिक तौर पर भी करने की आजादी हमारे देश के सभी नागरिकों को होनी चाहिए। भारतीय जनता पार्टी के नेता अपनी इस आजादी का इस्तेमाल करना चाहते थे, इसलिए इसमें कहीं-कोई दोष नहीं है और न ही इसमें ऐसा कुछ खोजा जाना चाहिए। परंतु वास्तविक समस्या यह है कि क्या हमें संविधान से मिले अपने इस अधिकार के बारे में अमल करने के लिए कोई भी कदम उठाने से पहले इस बात पर भी जरूर सोच-विचार नहीं करना चाहिए कि इससे मुल्क अथवा जनता को फायदा होगा अथव नुकसान। तिरंगा झंडा फहराने की आजादी इसलिए हमें नहीं मिली है कि इसके कारण हमारे ही लोगों में विभाजन अथवा इस तरह की कोई भावना पैदा हो। हमारे राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक तिरंगा झंडा तो देश की संप्रभुता और एकता का प्रतीक है। इस संदर्भ में यदि हम देखें तो लाल चौक पर जो श्रीनगर का केंद्रीय स्थल है पर तिरंगा झंडा फहराने से अगर कश्मीर की राजनीतिक और आम जनजीवन की स्थिति बिगड़ती है अथवा भड़कती है तो यह जिद बनाए रखना किसी भी दृष्टि से न्यायसंगत नहीं माना जा सकता है। यहां हमें विचार करना होगा कि राष्ट्रवाद एक गहन और मूल्यवान विचार है और इसके विपरीत उग्र राष्ट्रवाद एक हमारे देश के लिए एक बचकाना मर्ज है। हालांकि इस पूरे प्रकरण का एक दूसरा पक्ष भी है जिसे ईमानदारी से समझने की कोशिश शायद नहीं की गई है। इस पूरे वाकये के दौरान जम्मू और कश्मीर के वर्तमान मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के मुंह से एक बार भी यह शब्द सुनने को नहीं मिला अथवा निकला कि कश्मीर भारत का अविच्छिन्न अंग है। इसलिए अगर कोई जनतांत्रिक संगठन गणतंत्र दिवस के अवसर पर कश्मीर के किसी हिस्से में तिरंगा झंडा फहराने आता है तो उसका स्वागत है, क्योंकि हम सब भारतीय नागरिक हैं और यह हमारे लिए गर्व की बात है। इस तरह मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को स्वागत का प्रस्ताव ही नहीं देना चाहिए था, बल्कि उन्हें कहना चाहिए था कि इस कार्यक्रम में उनके समेत आम कश्मीरी भी भाग लेंगे। वह कह सकते थे कि चूंकि लाल चौक सुरक्षा की दृष्टि से एक संवेदनशील जगह है, इसलिए हम भाजपा को आमंत्रित करते हैं कि वह श्रीनगर में ही किसी और स्थान पर जहां राज्य सरकार द्वारा सुरक्षा की समुचित व्यवस्था की जा सके, तिरंगा झंडा के ध्वजारोहण का कार्यक्रम आयोजित करे। इसके साथ उमर अब्दुल्ला यह भी कह सकते थे कि लाल चौक पर तिरंगा झंडा फहराने की अनुमति देने के लिए यह उचित समय नहीं है, क्योंकि इससे कानून-व्यवस्था के बिगड़ने की आशंका है। इसके बावजूद हम हम अपनी तरफ से पूरा प्रयत्न कर रहे हैं कि जल्द ही वह समय आए जब लाल चौक ही नहीं, बल्कि कश्मीर के किसी भी स्थान पर हमारे राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक तिरंगा झंडा फहराना सहज हो सके तथा ऐसे कार्यक्रमों में शामिल होने के लिए ज्यादा से ज्यादा लोग उत्सुक हों। यदि ऐसा कुछ संभव नहीं हो पा रहा था तो भी जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुला भाजपा नेताओं से यह अनुरोध कर सकते थे कि वह कश्मीर समस्या का समाधान निकालने में उनकी सहायता करे ताकि सभी के लिए सहूलियत और शांति का मार्ग प्रशस्त हो तथा घाटी में अमन-चैन की स्थिति में सुधार हो। सवाल यह है कि यदि भाजपा उग्र राष्ट्रवादी है तो क्या उमर अब्दुल्ला उग्र कश्मीरवादी नहीं हैं? इतने संवेदनशील मामले में वे सिर्फ कश्मीरी अवाम की भावनाओं का खयाल रखते हैं और शेष भारत की भावनाओं की उपेक्षा क्यों कर देते हैं अथवा उन्हें भुला क्यों देते हैंक? अनेक दशकों से जब कभी भी शेष भारत का कोई व्यक्ति कश्मीर जाता है तो उससे आखिर यह सवाल क्यों पूछा जाता है क्या आप इंडिया से आ रहे हैं? यह जुमला कश्मीर और भारत की नहीं, कश्मीर बनाम भारत की भावना पैदा करता है। कश्मीर के अलगाववादी और आतंकवादी चाहे जो कहें, लेकिन भारत के संविधान और चुनाव कानून के तहत चुनाव जीतकर आए हुए उमर अब्दुल्ला तथा उनके समर्थकों का कर्तव्य क्या यह नहीं बनता है कि वह कश्मीर बनाम भारत के इस द्वंद्वात्मक विचार को पूरी तरह खत्म भले ही न कर सकें, लेकिन कम से कम कमजोर करने का प्रयास तो अवश्य ही करें। कश्मीर भारत का अंग है तो कश्मीर के मुख्यमंत्री भी भारत के अंग हैं। आखिर ऐसा क्यों है कि वह हर मौके पर कश्मीर के प्रवक्ता की भूमिका में नजर आते हैं। याद नहीं आता कि उन्होंने आज तक एक बार भी भारत के प्रवक्ता की छवि में लोगों को नजर आए हों। इस बारे में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उनके पिता और पूर्व मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला केंद्रीय सरकार में कैबिनेट मंत्री भी हैं और वह इस तरह के मामलों के लिए काफी सुलझे हुए राजनेता माने जाते हैं। परिवार का एक सदस्य केंद्र की सत्ता में और दूसरा सदस्य राज्य की सत्ता में है, क्या यह महज इत्तेफाक है अथवा और कुछ। पिता और पुत्र के क्या कहने! जम्मू-कश्मीर का श्रीनगर शहर वह संसदीय निर्वाचन क्षेत्र है, जहां से उमर अब्दुल्ला के पिता फारुख अब्दुल्ला चुनाव जीत कर भारत की संसद में पहुंचे हैं। आखिर इतने गंभीर और गुरुत्वपूर्ण मुद्दे पर उनके चुप रहने का क्या कोई औचित्य माना जा सकता है? अपने पुत्र को कश्मीर की राजनीतिक सत्ता सौंपने के बाद कश्मीर और भारत के प्रति फारुख अब्दुल्ला की क्या कोई राजनीतिक या नैतिक जिम्मेदारी नहीं रह गई है? पहले कहा जाता था और अब भी माना जाता है कि कांग्रेस मुलायम सांप्रदायिकता का राजनीतिक खेल खेलती है तो भाजपा उग्र सांप्रदायिकता का। इसी तर्ज पर क्या यह कहा जा सकता है कि कश्मीर में अलगाववादी उग्र अलगाववाद से पीडि़त हैं तो अब्दुल्ला परिवार मुलायम अलगाववाद को पोषण देता आ रहा है। इस मामले में आश्चर्यपूर्ण बात यह है कि कांग्रेस और भाजपा के बीच यह फर्क करने वाले अनेक विचारक और राजनीतिक विश्लेषक कश्मीर में अलगाववाद की इन दो किस्मों अथवा धाराओं के बारे में नोटिस लेना जरूरी नहीं समझते। बेशक कश्मीर की समस्या बेहद नाजुक है और अलगाववाद की भावना कश्मीर के अवाम में भी देखी जा सकती है। परंतु इसका लोकतांत्रिक समाधान कुछ ऐसा भी हो सकता है जिसमें कश्मीरी अवाम की भावनाओं का ध्यान रखा जाए और भारत की संप्रभुता और एकता पर भी आंच न आने पाए। हमारे पूर्वज कश्मीर के लिए अलग संविधान और अलग झंडे को स्वीकृति दे कर पहले ही हिमालयी भूल कर चुके हैं। दुनिया का कोई भी देश ऐसा नहीं होगा और होना भी नहीं चाहिए-जहां एक ही देश के अलग-अलग दो झंडे और दो संविधान हों। यह तो राष्ट्र के भीतर राष्ट्र की बात हुई, लेकिन कश्मीर समस्या का इलाज खोजने वाला कोई भी वैद्य इस पहलू की चर्चा करना जरूरी नहीं समझता। केंद्र सरकार की ओर से बड़ी-बड़ी नादानियां और गड़बडि़यां हुई हैं। पर वर्तमान स्थिति के लिए क्या कश्मीर का स्थानीय लोकतांत्रिक नेतृत्व थोड़ा भी जिम्मेदार नहीं है? कश्मीर समस्या पर जो लोग एकतरफा विचार कर रहे हैं वह कश्मीर को शेष भारत से दूर धकेल रहे हैं। कश्मीर का लोकतांत्रिक नेतृत्व जरूरत से ज्यादा कश्मीरवादी होकर शेष भारत को कश्मीर से दूर ठेल रहा है। हमें याद रखना चाहिए कि ताली तभी बजेगी जब दोनों हथेलियां आपस में मिलेंगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)