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Friday, November 25, 2011

कब बहुरेंगे दिन बुंदेलखंड के


उत्तर प्रदेश विधानसभा में पारित चार राज्यों के प्रस्ताव ने बुंदेलखंड इलाके के लोगों में दशकों पुरानी मांग पूरा होने की उम्मीद जगा दी है। हालांकि महज छह जिलों, 22 विधानसभा सीटों और एक करोड़ से भी कम आबादी के उत्तर प्रदेश के बुदेलखंड का अलग राज्य बनना तब तक संभव नहीं होगा, जब तक मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड को भी इसमें मिलाने की प्रक्रिया प्रारंभ न हो। प्राकृतिक संपदा के मामले में संपन्न बुंदेलखंड क्षेत्र में बारिश बहुत कम होती है और यह सरकारी उपेक्षा का शिकार रहा है। यहां दो साल में एक बार जब भी सूखा पड़ता है, सरकारें राहत का मलहम लगाने लगती हैं, लेकिन बुद्धिजीवियों, राजनीतिज्ञों और आम लोगों का बड़ा वर्ग मान चुका है कि अलग राज्य के अलावा कोई विकल्प नहीं है। दो साल पहले कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी और उसके बाद उप्र की मुख्यमंत्री मायावती सूखाग्रस्त बुंदेलखंड का दर्द जानने गए और दोनों ने ही अलग राज्य की मांग का समर्थन किया था। इससे पहले गंगाचरण राजपूत, राजा बुंदेला, सत्यव्रत चतुव्रेदी सहित कई कांग्रेसी आंदोलन की अगुवाई करते रहे हैं। अटलबिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में बुंदेलखंड की सभी लोकसभा सीटों पर भाजपा काबिज थी। अपने घोषणा पत्र और जन सभाओं में भाजपा नेता पृथक राज्य की मांग उठाते रहे लेकिन सत्ता संभालने के बाद सब भूल गए। बहरहाल इतने व्यापक राजनीतिक समर्थन के बावजूद अलग राज्य की मांग में कोई प्रगति न होना स्पष्ट दर्शाता है कि राजनीतिज्ञों का असल मकसद बुंदेलखंड के नाम पर महज सियासत करना है। अलग राज्य की मांग को लेकर 1942 से चल रहा आंदोलन कुछ साल पहले उग्र हो गया था और बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा के संयोजक शंकरलाल मेहरोत्रा और अन्य चार लोग राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत महीनों जेल में रहे। मेहरोत्रा के असामयिक निधन के बाद अभिनेता व कांग्रेसी नेता राजा बुंदेला आंदोलन की कमान संभाले हैं। मौदहा के विधायक बादशाह सिंह का संगठन भी अलग राज्य की राजनीति करता है। भारत के नक्शे के ठीक मध्य में स्थित बुंदेलखंड का क्षेत्र यमुना, नर्मदा, चंबल और टौंस नदियों के बीच लगभग 400 किलोमीटर पूर्व से पश्चिम और इतना ही उत्तर से दक्षिण वर्गाकार फैला है । लगभग 1.60 लाख वर्ग किमी क्षेत्रफल वाले इस भू-भाग की भाषा, संस्कृति, आचार-विचार में एकरूपता के बावजूद यह दो राज्यों (उप्र और मप्र) में विभाजित हैं। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार सन 200-500 ईस्वी में इस क्षेत्र की पहचान अलग राज्य के रूप में रही है और यह स्वरूप चंदेलों (सन 831- 1203 ई) और उसके बाद बुंदेलों, व अंग्रेजों के शासनकाल तक बरकरार रहा। बुंदेला शासकों के दौरान यह बुंदेलखंड कहलाया। स्वतंत्रता से पहले बुंदेलखंड राज्य बनाया गया और उसकी राजधानी नौगांव बनी लेकिन दो महीने बाद ही इसका विभाजन विंध्यप्रदेश के रूप में हो गया था । 1942 में प्रसिद्ध साहित्कार व संपादक पं. बनारसीदास चतुव्रेदी ने टीकमगढ़ रियासत के महाराज वीर सिंह देव के सहयोग से पृथक राज्य का आंदोलन शुरू किया था। देश के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने अनेक रियासतें मिला अलग बुंदेलखंड राज्य की परिकल्पना प्रस्तुत की थी, लेकिन तत्कालीन केंद्र सरकार नहीं मानी। 1948 में जवाहरलाल नेहरू, विट्ठल भाई पटेल व पट्टाभि सीतारामैय्या की अगुआई में गठित जेवीपी आयोग ने बुंदेलखंड का पृथक अस्तित्व नहीं स्वीकारा लेकिन 1955 में राज्य पुनर्गठन आयोग के प्रमुख केएम पणिक्कर ने इसके औचित्य का समर्थन किया। बुंदेलखंड के पन्ना में हीरे की खदानें हैं, यहां का ग्रेनाइट जग विख्यात है। यहां गोरा पत्थर, सीमेंट पत्थर, रेत-बजरी के भंडार हैं। तालाबों की मछलियां कोलकाता के बाजार में बिकती हैं। जंगलों में मिलने वाला तेंदू पत्ता हरा सोना कहा जाता है। खजुराहो, झांसी, ओरछा जैसे स्थल सालभर पर्यटकों को आकषिर्त करते हैं। अनुमान है कि दोनों राज्यों के बुंदेलखंड मिला कर कोई एक हजार करोड़ की आय सरकार के खाते में जमा कराते हैं, लेकिन इलाके के विकास पर इसका दस फीसद भी खर्च नहीं होता। सवाल उठ रहा है कि नए राज्यों के गठन का आधार क्या हो? पुरानी मांग या भौगोलिक संरचना या क्षेत्रों का पिछड़ापन या छोटे राज्यों का सिद्धांत। देखा जाए तो इस रूप में बुंदेलखंड राज्य की मांग का आधार सशक्त है। बहरहाल मध्यप्रदेश सरकार की चुप्पी बुंदेलखंड को सुलगा रही है।

     

Monday, November 21, 2011

भिखारियों के भार से दबती दिल्ली


दिल्ली में भिखारी और बढ़ गए हैं। सरकारी आंकड़ों पर यदि भरोसा करें तो इस समय दिल्ली में साठ हजार से अधिक भिखारी सक्रिय हैं। इनमें से कोई 30 फीसद 18 साल से कम आयु के हैं। इनमें 69.94 प्रतिशत पुरुष और 30.06 फीसद महिलाएं हैं। वैसे एक स्वयंसेवी संस्था के मुताबिक इन दिनों दिल्ली में एक लाख से अधिक लोगों का ‘पेशा’ भीख मांगना है जिसे अक्तूबर आते-आते दुगना होने की आशंका है। संबद्ध विभागों की निष्क्रियता, संसाधनों के अभाव और भीख मांगने के काम को संगठित व माफिया के हाथों जाने के कारण दिल्ली में यह अभिशाप दिन-दुगनी, रात-चौगुनी प्रगति कर रहा है। यह खतरे की घंटी भी है और विडंबना भी कि दिल्ली में मजबूरी या अपनी मर्जी से भीख मांगने वाले बहुत कम ही हैं। अधिकांश भिखारी अपने आकाओं के इशारे पर यह काम करते हैं। मंगलवार को हनुमान मंदिर या जुम्मे के दिन जामा मस्जिद या फिर रविवार को गोल डाकखाने के गिरजाघर के सामने भिखारियों को छोड़ने और लेने के लिए बाकायदा बड़े वाहन आते हैं। सीलमपुर, त्रिलोकपुरी, सीमापुरी, कल्याणपुरी जैसी कई अनाधिकृत बस्तियों में बच्चों को भीख मांगने का बाकायदा प्रशिक्षण दिया जाता है। विकलांग, दुधमुंहे बच्चे, कुष्ठरोगी आदि विशेष मांग पर ‘सप्लाई’ किए जाते हैं। वैसे तो भीख मांगने को सरकार ने कानूनन गुनाह घोषित कर रखा है, लेकिन अभी तक माना जाता रहा था कि यह एक सामाजिक समस्या है और इसे कानून के डंडे से ठीक नहीं किया जा सकता। बीते कुछ सालों में दिल्ली में जिस तरह से रोजगार के अवसर पैदा हुए, उसके बावजूद लोगों द्वारा सरेआम हाथ फैलाने को समाजशास्त्री बहुत हद तक नजरअंदाज करते रहे और अब हालात यह है कि भिखारी कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती बन गए हैं। दिल्ली के धार्मिक स्थलों के अलावा दक्षिणी दिल्ली की लगभग सभी लाल बत्तियों पर भिखारियों का कब्जा है। कुछ विकलांग हैं, कुछ औरतें है- जो खुद को गर्भवती या बच्चे के लिए दूध या फिर किसी अस्पताल का पर्चा दिखा कर पैसे मांगती हैं। नट के करतब या फिर गाना गा कर भीख मांगने के काम में बच्चों की बड़ी संख्या शामिल हैं। हाथ में भगवान के फोटो ले कर रिरियाने से धर्मप्राण जनता न चाहते हुए भी मना नहीं कर पाती। प्रशासन की बेबसी की बानगी है कि संसद भवन से कुछ ही दूरी पर गुरुद्वारा बंगला साहिब के पीछे तो पूरे फुटपाथ पर भिखारियों का कब्जा है। ये भिखारी स्मैक बेचते भी पकड़े जाते रहे हैं। जबकि ठीक सामने कनाट प्लेस थाना है और पुलिस वाले वहां से मुंह फेर कर निकल जाते हैं। दिल्ली का समाज कल्याण विभाग भी इन भिखारियों के सामने अपनी मजबूरी का रोना रोता है। अगस्त 2009 में दिल्ली में 1518 भिखारी पकड़े गए। इनमें से 1099 दूसरे राज्यों के थे। दिल्ली सरकार ने लाख लिखा-पढ़ी की, लेकिन कोई भी राज्य इन भिखारियों को वापस लेने को राजी नहीं हुआ। भिखारियों से निबटने के लिए दिल्ली के पास अपना कोई कानून नहीं है और यहां पर ‘द बांबे प्रिवेंशन आफ बेगर्स एक्ट-1969’ के तहत ही कार्रवाई की जाती है। राज्य के समाज कल्याण महकमे के पास महज 12 मोबाइल कोर्ट हैं। इनमें समाज कल्याण विभाग के अलावा पुलिस वाले होते हैं। उम्मीद की जाती है कि ये दस्ते हर रोज भीड़-भाड़ वाली जगहों, धार्मिक स्थलों आदि पर छापामारी कर भिखारियों को पकड़ें। पकड़े गए भिखारियों को किंग्सवे कैंप स्थित अदालत में पेश किया जाता है। अपराध साबित होने पर एक से तीन साल की सजा हो जाती है। गौर करने लायक बात है कि पकड़े गए भिखारियों को रखने के लिए दिल्ली में 11 आश्रय स्थल हैं, जिनकी क्षमता महज 2018 है। एक तरफ भिखारियों की इतनी बड़ी संख्या और दूसरी ओर उन्हें रखने के लिए इतनी कम जगह। तभी ये आश्रय स्थल भिखारियों को शातिर अपराधी और ढीठ बना रहे हैं। कहा जाता है कि इन आश्रय गृहों में भिखारियों को कई काम सिखाए जाते हैं, जिससे वे बाहर जा कर अपना जीवनयापन सम्मानजनक तरीके से कर पाएं। लेकिन हकीकत में सभी ट्रेनिंग सेंटर महज कागजों पर हैं और आश्रय गृहों की गंदगी, काहिली और अराजकता उन्हें एक ‘अच्छे भिखारी’ से ज्यादा कुछ नहीं बना पाती है। सरकार को देश की आर्थिक प्रगति के मद्देनजर इस समस्या को गंभीरता से देखना होगा। ये अकर्मण्य लोग राष्ट्र की मुख्य धारा व विकास की गति से अलग-थलग हैं और इनके कारण गरीबी उन्मूलन की कई योजनाएं भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती हैं। असल में भिखारीपन की वजह को तलाशना जरूरी है। हम अभी भी सन् 1969 के कानून के बदौलत इस सामाजिक अपराध से जूझने के असफल प्रयास कर रहे हैं, जबकि इन चालीस सालों में देश की आर्थिक्-सामाजिक तस्वीर बहुत बदल गई है। भिखारी की परिभाषा अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग हैं। कहीं पर नट, मदारी आदि को पारंपरिक कला का संरक्षक कहा जाता है तो कोई राज्य इन्हें भिखारी मानता है। भूमंडलीकरण के दौर में भारत के आर्थिक सशक्तीकरण का मूल आधार यहां का सशक्त मानव संसाधन है और ऐसे में लाखों हाथों का बगैर काम किए दूसरों के सामने फैलना देश की छवि को धूमिल कर रहा हैं।

Friday, April 22, 2011

चाय बागानों में गुम उरांव परंपरा


इस पर आम सहमति रही है कि सामाजिक पर्यावरण बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी है कि आदिवासियों को उनके पारंपरिक परिवेश में ही जीवनयापन के भरपूर अवसर प्रदान किए जाएं लेकिन मध्य भारत की एक प्रमुख जनजाति 'उरांव' इन दिनों अपनी पहचान बनाए रखने के लिए जूझ रही है। साम्यवादी सामाजिक संरचना के लिए चिर परिचित रहे उरांवों का संकट चाय बागानों से उपजा है। उनकी भाषा, संस्कार, त्योहार सभी लुप्त होने के कगार पर हैं। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार और उड़ीसा के लगभग एक दर्जन जिलों में उरांवों का वास है। यह दुर्भाग्य ही था कि उनके पुश्तैनी गांवों के आसपास दुर्लभ खनिजों का अकूत भंडार था। देश के विकास के नाम पर उनका खनन शुरू हुआ और इस अंधी दौड़ ने उनकी पीढ़ियों पुरानी जमीन निगल ली। मजबूर वनपुत्र पेट भरने के लिए या तो खदानों में काम करने लगे या दूर चले गये। और धीरे-धीरे उनका अपनी जमीन से नाता टूटता गया। आज उरांवों की जनजातीय अस्मिता बाहरी प्रभाव की चपेट में आकर खंडित हो रही है। पश्चिम बंगाल और असम के कोई दो हजार चाय बागानों में लगभग दस लाख आदिवासी पत्ती तोड़ने के काम में लगे हैं। इनमें अधिकांश महिलाएं हैं जो उरांव जनजाति से हैं। इनकी सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान पूरी तरह धूमिल हो चुकी है। आर्थिक और शारीरिक शोषण को उन्होंने अपनी नियति मान लिया है । लगभग डेढ़ सौ साल पहले जब अंग्रेजों ने आदिवासी अंचल में खनन शुरू किया तो उनकी निगाह मुंडा, खड़िया, संथाल, उरांव आदि आदिवासी औरतों की पत्ती चुनने की विशिष्ट शैली पर पड़ी । सन 1881 से 1891 के दौरान हर साल लगातार कोई 19 हजार श्रमिक दक्षिण बिहार से असम के चाय बागानों में गये । बीते कुछ सालों के दौरान 27000 आदिवासी दार्जिलिंग और जलपाईगुड़ी के चाय बागानों में गये। आज इन लोगों की तीसरी या चौथी पीढ़ी वहां काम कर रही है। अब वे यह भूलते जा रहे हैं कि उनकी जनजाति की कोई अनूठी सांस्कृतिक या सामाजिक पहचान भी हुआ करती थी । बागान की आधुनिकता में उरांवों की सांस्कृतिक गतिविधियां भी गुम हो गई हैं । इनका मुख्य नृत्य 'करमा' है। चूंकि पहाड़ी इलाकों में करमा गाछ (पेड़) मिलता ही नहीं है, जाहिर है वहां करमा का आयोजन संभव नहीं है। पीढ़ियों से चली आ रहीं लोक कथाओं को अपनी अगली पीढ़ी तक पहुचाने का तारतम्य टूट गया है। क्योंकि बागानों में काम करने वाली औरतों के पास इतना समय नहीं होता है कि वे अपने बच्चों को कहानियां सुना सकें। ठेठ उरांव महिला की पहचान 'तीन गोदना' (त्रिशूल) से होती है, जो यहां देखने को नहीं मिलता है। चाय बागानों में पुरुषों को नौकरी बहुत कम दी जाती है। इसके चलते यहां के पुरुष निकम्मे होते जा रहे हैं। सीमा पार से चोरी का सामान लाना, नशीली दवाएं बेचना इनका धंधा हो गया है। उधर औरतें भी शोषण की शिकार हैं। उन्हें दिन भर में 25 पाउंड पत्ती तोड़ना जरूरी होता है। अतिरिक्त पत्ती पर मात्र 25 पैसे प्रति किलोग्राम ही दिया जाता है। इस प्रकार सारे दिन खटने के बाद एक महिला को महीने भर में मुश्किल से चार-पांच सौ रुपए मिल पाते हैं। उरांवों के हरेक गांव में अलग से रात्रि घर हुआ करता है जिसे धुमकुरिया कहते हैं। शाम होने पर उरांव युवक-युवतियां नाचते-गाते हैं। बागानों में रहने वाले युवाओं को अलबत्ता तो शाम को नाचने-गाने की सुध ही नहीं रहती है, फिर उन्हें ऐसे किसी सामाजिक क्लब के बारे में जानकारी ही नहीं है। इस जनजाति में लड़की की शादी की उम्र 21से 25 साल हुआ करती है, लेकिन यहां शादी 14 साल में ही की जा रही है। लड़कियों को शारीरिक शोषण से बचाने के लिए उनकी जल्दी शादियां की जा रहीं हैं। यही कारण है कि बागानों की आदिवासी बालाओं में पारंपरिक चमक और फुर्ती देखने को नहीं मिलती है। जनजातियों में हाथ से बनी मदिरा (हंडिया) पीने का चलन है। पर बागानों में इसकी जगह चिलैया या दारू ने ले ली है। बागान के दरवाजों पर ही दारू का ठेका मिल जाएगा। एक बगीचे में एक दिन दस हजार रुपए का बोनस बंटा। उस दिन वहां की चिलैया की दुकान की बिक्री सात हजार की थी। यहां के दूषित माहौल से बच्चे भी अछूते नहीं है। जब पत्ती तोड़ने का चरम सीजन होता है तब ठेकेदार (स्थानीय बोली में सरदार) स्कूल से बच्चों को भी खदेड़ लाता है। चूंकि वहां चप्पे-चप्पे पर वीडियो हाल और ड्रग्स के अड्डे खुले हैं, सो बच्चों को इनकी लत लग गई है। इसके लिए पैसे की पूर्ति की खातिर वे बागानों में काम करना सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं। विडंबना है कि बागान में काम करने वालों को आदिवासी नहीं माना जाता। यानी जनजातियों को मिली आरक्षण व अन्य सुविधाओं से ये महरूम हैं। चाय बागानों में होम हो रही देश की बेशकीमती मौलिक संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण हेतु सरकार और स्वयंसेवी संस्थाओं को जल्दी गंभीरता से सोचना होगा। क्योंकि पृथकतावादी ताकतों को फलने-फूलने का मौका ऐसे ही स्थानों पर मिलता है जहां सामाजिक और आर्थिक शोषण को नजरअंदाज किया जाता है।