Tuesday, March 29, 2011

लोकतंत्र में तानाशाही क्यों


उत्पाद शुल्क के दायरे में लाए जाने के खिलाफ दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे व्यापारियों पर जो लाठीचार्ज किया गया, वह संवेदनहीनता की एक वीभत्स मिसाल है। इस बात पर तो बहस की गुंजाइश हो सकती है कि व्यापारियों की मांग सही है या गलत। इस बात पर भी मतभेद की पूरी गुंजाइश है कि अपनी मांगें मनवाने के लिए रास्ता जाम करना कितना सही है। कोई यह सवाल उठा सकता है कि सरकार शांतिपूर्ण ढंग से बात उठाए जाने पर कोई मांग मानती ही नहीं, फिर करें क्या? और कोई यह भी कह सकता है कि मांगें मनवाने का यह कौन-सा तरीका है? सरकार भी कह सकती है कि अगर ऐसे दबावों के सामने सरकार झुकती रहे तो व्यवस्था कितने दिन चलेगी? लेकिन तब सवाल यह भी उठता है कि सरकार आसानी से कोई मांग मानती ही कहां है? यह भी कि क्या सरकारें जो काम करती हैं, वे सब सिर्फ जनता के हित के लिए ही होते हैं? आखिर इस बात का ठीक-ठीक आकलन कैसे किया जा सकता है कि कौन से काम जनहित के हैं और कौन से सिर्फ निजी हित के? अगर यह तय करने का कोई ठोस आधार नहीं है तो सरकार को इस बात का क्या अधिकार है कि वह शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे किसी भी वर्ग पर लाठीचार्ज करा दे? क्या यह हमारे लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप है? इस बात पर खासतौर से गौर किया जाना चाहिए कि गारमेंट्स उद्योग को उत्पाद शुल्क के दायरे में लाए जाने के विरोध में आंदोलन केवल दिल्ली के व्यापारी ही नहीं कर रहे हैं। दिल्ली के साथ-साथ लुधियाना के उद्यमियों ने भी इसके खिलाफ अपने-अपने उद्योगों पर ताले लगाकर काम बंद रखा और रैली निकाल कर केंद्र सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया। यह बात भी नजरअंदाज नहीं की जानी चाहिए कि इसके पहले भी उद्यमी इस पर अपना विरोध दर्ज करा चुके हैं। यह विरोध दर्ज कराने वालों में केवल दिल्ली और पंजाब के व्यापारी ही शामिल नहीं हैं, देश के दूसरे भागों के व्यापारी और उद्यमी भी उनके साथ हैं। इनमें खासतौर से कर्नाटक और महाराष्ट्र के व्यवसायी शामिल हैं। अपने देश में रेडीमेड गारमेंट्स के व्यवसाय की स्थिति अगर देखी जाए तो इनके बाद किसी और राज्य की कोई खास स्थिति नजर नहीं आती है। सच पूछिए तो गारमेंट व्यवसाय का कुल अर्थ केवल पंजाब, दिल्ली, कर्नाटक और महाराष्ट्र ही है और इन सभी राज्यों के व्यापारी सरकार के फैसले के खिलाफ अपना विरोध दर्ज करा चुके हैं। अभी दिल्ली और पंजाब के अलावा अन्य किन प्रदेशों के उद्यमियों तथा व्यापारियों ने दोबारा अपना विरोध दर्ज कराया, इस बारे में कोई सूचना नहीं है, लेकिन दिल्ली में व्यापारियों के साथ जो दु‌र्व्यवहार हुआ है, क्या उसे किसी भी कीमत पर सही कहा जा सकता है? वास्तविक प्रश्न अब व्यापारियों की मांग के सही या गलत होने तथा सरकार के फैसले के भी सही या गलत होने का उतना नहीं रह गया है, जितना कि इस पर नियंत्रण के सरकारी तरीके की शुचिता का है। फिलहाल केंद्र और दिल्ली प्रदेश में भी कांगे्रस के नेतृत्व वाली सरकार है और कांग्रेस की परंपरा में ही गांधीवाद है। गांधीवाद के बगैर कांग्रेस की कोई पहचान होने के बारे में सोचना भी गलत होगा। हैरत होती है कि क्या कांग्रेस के पढ़े-लिखे मंत्रियों को अब यह बताना जरूरी है कि आज के संदर्भ में भारत में गांधीवाद का वास्तविक अर्थ ग्राम स्वराज्य है? यह बताने की जरूरत दुनिया भर में किसी को भी नहीं होनी चाहिए कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी समाज की अंतिम पंक्ति में अंतिम व्यक्ति तक के विवेक पर पूरा भरोसा करते थे और न केवल शासन, बल्कि संपूर्ण व्यवस्था के संचालन में उसकी राय की अहमियत में पूरा विश्र्वास करते थे। क्या देश के नागरिकों में विश्वास जताने का नया कांग्रेसी तरीका यही है कि उनकी जुबान काट ली जाए? यह गौर किया जाना चाहिए कि यह तरीका देश के उस वर्ग के खिलाफ इस्तेमाल किया गया है, जिसे सबसे ज्यादा शांतिपूर्ण समझा जाता है। यही नहीं, इसमें कोई दो राय नहीं है कि आज हमारे देश की सबसे बड़ी समस्या बेरोजगारी है। देश की जीडीपी और ग्रोथ रेट चाहे कहीं से कहीं पहुंच जाएं, पर यह सच है कि रोजगार सृजन और गरीबी उन्मूलन के मामले में सरकार और उसकी एजेंसियों की गति वही नहीं है। इस समस्या के समाधान में अगर कोई वर्ग सबसे बड़ा योगदान कर रहा है तो वह उद्यमी ही है। क्या सरकार ऐसा मानने लगी है कि इस वर्ग की अपनी कोई समस्या नहीं है और अगर है भी तो उसके समाधान की कोई जरूरत तक नहीं है? अगर ऐसा नहीं है तो यह कैसे हुआ कि उनकी बात सुनने से पहले ही उन पर लाठीचार्ज कर दिया गया? सरकार का यह कदम उसके तानाशाही रवैये की ओर इशारा करता है। क्या यह रवैया दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए सही ठहराया जा सकता है? सरकार की यह कार्रवाई केवल व्यापारियों और आम जनता के प्रति उसकी संवेदनहीनता को ही बयान नहीं करती है, बल्कि देश में बढ़ती अराजकता का रहस्य भी खोलती है। सरकार व पुलिस की ऐसी ही कार्रवाइयों से अहिंसा और अपनी वाजिब मांगें मनवाने के लिए शांतिपूर्ण तरीकों से आम जनता अपना विश्वास खोती चली जाती है। नतीजा एक न एक दिन अराजकता और कई बार तो हिंसक कार्रवाइयों तक के रूप में सामने आता है। क्या तब केवल उन लोगों को पूरी तरह जिम्मेदार ठहराना सही होगा, जो अपनी मांगें मनवाने के लिए हिंसक प्रदर्शनों या माध्यमों का सहारा लेते हैं? अगर जनता को अपनी पीड़ा को स्वर देने का अधिकार भी न रह जाए तो फिर लोकतंत्र का अर्थ क्या रह जाएगा? समझ में नहीं आता कि सरकार यह क्यों भूल जाती है कि लोकतंत्र में उसकी हैसियत शासक की नहीं, बल्कि जनता के प्रतिनिधि और इस रूप में वस्तुत: सेवक की होती है? सच तो यह भी है कि किसी भी उद्योग को किसी भी नए या पुराने कर के दायरे में लाए जाने के सरकार के किसी फैसले को पूरी तरह गलत किसी भी तरह नहीं ठहराया जा सकता है। क्योंकि सरकार देश की व्यवस्था चलाने के लिए अंतिम रूप से जिम्मेदार होती है और उसके लिए व्यवस्था पर कुल खर्च का मुख्य आधार कर एवं शुल्क ही होते हैं। अगर सरकार को कर और शुल्क ही नहीं मिलेंगे तो फिर देश के तमाम विकास कार्य कैसे होंगे? लेकिन बात केवल यहीं तक नहीं सीमित नहीं है। भारत की सरकारें यह बात बार-बार क्यों भूल जाती हैं कि जनता की मुश्किलों के प्रति भी वे जवाबदेह हैं। चाहे कुछ भी हो, पर उन्हें उद्यमियों और व्यापारियों की बात सुननी तो चाहिए ही। वह मांग न माने, इसके मूल में तो उसकी मजबूरियां समझी जा सकती हैं, लेकिन सुने ही नहीं इस बात का क्या मतलब है? बेहतर होगा कि सरकार अबसे गारमेंट उद्यमियों और व्यवसायियों से वार्ता करे, उनकी बातें सुने और समस्याएं सुलझाने के प्रयास करे। तानाशाही रवैया किसी भी व्यवस्था के लिए लोकतंत्र में सही नहीं कहा जा सकता है। (लेखक दैनिक जागरण हरियाणा, पंजाब व हिमाचल प्रदेश के स्थानीय संपादक हैं)

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