Thursday, January 13, 2011

नए जिलों की मांग का औचित्य

राज्यों और राज्यों के भीतर जिलों के छोटे होने से विकास तेज गति और प्रभावी ढंग से होता है। यह बात सभी मानते हैं। भारतीय संविधान में इसीलिए राज्यों और जिलों के पुनर्गठन का प्रावधान है और इसके लिए प्रक्रियाएं भी निर्धारित की गई हैं। इसके बावजूद सरकारें इस पर ध्यान नहीं देतीं और न विकास की प्रक्रिया में क्षेत्रीय संतुलन के मसले पर ही गौर करती हैं। नतीजा यह होता है कि हर स्तर पर अपने विकास की प्रक्रिया को गति देने के लिए आम जनता को ही मांग करनी पड़ती है। अगर मांग करने से भी बात बन जाए तो अच्छा है। दुखद स्थिति यह है कि मांगें भी आसानी से मानी नहीं जाती हैं। छोटी से छोटी बात मनवाने के लिए धरना-प्रदर्शन से लेकर हिंसक रास्ते तक आम जनता को अपनाने पड़ जाते हैं। यही स्थिति इन दिनों अलग तेलंगाना राज्य की मांग को लेकर आंध्र प्रदेश में चल रही है तो कुछ जिलों की मांग के लिए पंजाब में। पंजाब में नए जिलों की मांग काफी लंबे समय से चल रही है और इसके पक्ष में तार्किक वजहें भी हैं। इसके बावजूद सरकार ने इस मांग को महत्व नहीं दिया और नतीजा यहां तक पहुंच गया कि एक व्यक्ति आत्मदाह की कोशिश तक कर गुजरा। आत्मदाह या हिंसक प्रदर्शन जैसे तरीकों का समर्थन कभी नहीं किया जा सकता है। ऐसे उपायों का समर्थन किया जाना भी नहीं चाहिए, लेकिन उन कारणों की पड़ताल जरूर की जानी चाहिए, जिसके चलते लोग ऐसे उपाय अपनाने को विवश होते हैं। ऐसी ही स्थितियों में भगत सिंह की वह बात याद आती है, जो उन्होंने ब्रिटिश असेंबली में बम फेंकने के बाद कही थी। उन्होंने कहा था कि अगर बहरों को अपनी बात सुनानी हो तो आवाज बहुत ऊंची होनी चाहिए। हमारे लोकतांत्रिक जनप्रतिनिधि भी सत्ता का अधिकार हाथ में आते ही शासकों जैसा रवैया अपनाने लग जाते हैं। वे यह बात बिलकुल भूल ही जाते हैं कि यह अधिकार उन्हें जनता ने ही दिया है। वे खुद को जनता का सेवक मानने के बजाय जनता का शासक मानने लग जाते हैं। यह शायद उस शासन पद्धति का खुमार है, जो अभी तक छूट नहीं सका है। खुद को जनता का सेवक दिखाने का वे सिर्फ छद्म भर करते हैं। वह भी केवल लोकतंत्र में चुनाव की मजबूरी के कारण। अगर यह मजबूरी न हो तो शायद वे ऐसा दिखाने की कोशिश भी नहीं करेंगे। पंजाब में इन दिनों दो जिलों के पुनर्गठन के लिए मांग चल रही है। इनमें एक तो फिरोजपुर जिला है और दूसरा गुरदासपुर। संयोग से ये दोनों ही जिले सीमावर्ती हैं। इनकी सीमाएं पड़ोसी देश पाकिस्तान से मिलती हैं। पंजाब के भूगोल को जानने वाला हर व्यक्ति यह बात जानता है कि आकार के लिहाज से फिरोजपुर जिला बहुत ही बड़ा है। लगभग यही स्थिति गुरदासपुर जिले की भी है। इसके कारण दूरस्थ गांवों में मौजूद ग्रामीणों के लिए जिला मुख्यालय तक पहुंचना बहुत ही मुश्किल होता है। जाहिर है, इसका असर न केवल उनके कामकाज, बल्कि पूरी जीवनशैली पर पड़ता है। जिला मुख्यालय से अगर मामूली-सा काम भी हो तो उन्हें पूरा दिन खर्च करना पड़ता है। बहुत ज्यादा समय तो जिला मुख्यालय तक आने-जाने में ही खर्च हो जाता है। कई बार बेचारे गरीब ग्रामीणों को एक ही काम के लिए दो-तीन दिन तक ठहरना पड़ जाता है और इसके लिए उनके पास कोई जगह भी नहीं होती है। नतीजा यह होता है कि उन्हें ठंडी, गर्मी या बरसात झेलते हुए कहीं इधर-उधर ठहरना पड़ता है। क्या हमारे राजनेताओं को उन मजबूर ग्रामीणों की स्थिति का कोई अंदाजा हो पाता है? आखिर क्यों यह बात वे नहीं समझ पाते हैं? फिरोजपुर में लोग दो जिले और चाहते हैं। एक तो फाजिल्का और एक अबोहर। इन दोनों ही जगहों से फिरोजपुर जिला मुख्यालय की दूरी बहुत ज्यादा है और आने-जाने के साधन कम। ठीक इसी तरह गुरदासपुर में भी दो और जिलों की मांग की जा रही है। एक तो पठानकोट और दूसरा बटाला। फाजिल्का और अबोहर जैसी ही समस्या पठानकोट और बटाला की भी है। गुरदासपुर जिला मुख्यालय पहुंचना इन जगहों के लोगों के लिए बड़ी समस्या है। आजादी के 60 साल बीत जाने के बाद भी इन सीमावर्ती इलाकों को इनके जिला मुख्यालयों से जोड़ने के लिए पर्याप्त इंतजाम नहीं किए जा सके हैं। ऐसी स्थिति में संबंधित क्षेत्रों की आम जनता की ओर से ऐसी मांग उठना स्वाभाविक है। ऐसा भी नहीं है कि सरकार ने इस पर ध्यान नहीं दिया है। पंजाब सरकार ने इस पर ध्यान दिया है और यही वजह है कि इस मसले पर विचार के लिए उसने सुखबीर-कालिया कमेटी गठित की है। मुश्किल यह है कि पठानकोट जिला बचाओ संघर्ष समिति ने इस कमेटी की प्रासंगिकता को ही खारिज कर दिया है। लोगों का यह मानना है कि सरकार ने इस कमेटी का गठन ही केवल उनके मामले को लटकाने के लिए किया है। इसकी वजह शायद यही है कि सरकारी आयोगों और कमेटियों के संदर्भ में भारत की आम जनता का अनुभव यही रहा है। आमतौर पर कमेटी या आयोग बनाए ही इसीलिए जाते हैं कि फौरी तौर पर जनता के गुस्से को शांत कर दिया जाए। बाद में जनता पाती यह है कि उसका मुद्दा तो ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। तब वह खुद को ठगा हुआ महसूस करती है। सरकारों की इस प्रवृत्ति ने इन प्रावधानों और व्यवस्थाओं के प्रति आम जनता का भरोसा खत्म कर दिया है। भरोसे के इस संकट का फायदा कभी छुटभैये राजनेता उठाते हैं, तो कभी अराजक तत्व भी उठा लेते हैं। कई बार जनता भावुकता में गलत निर्णय भी ले बैठती है। ऐसी स्थिति में सरकारों के सामने सबसे पहली चुनौती भरोसे की बहाली की है। यहां भी नए जिलों की मांग कर रहे लोग शायद सरकार के प्रति भरोसे के संकट से जूझ रहे हैं। इसलिए सरकार को सबसे पहले तो खुद के प्रति आम जनता का भरोसा बहाल करने की कोशिश करनी चाहिए। सच तो यह है कि एक साथ कई जिले बना पाना किसी भी सरकार के लिए संभव नहीं है, क्योंकि जिले बनाने का मामला सिर्फ नक्शे में हेरफेर जैसा नहीं होता है। हर जिले के लिए पूरा इन्फ्रास्ट्रक्चर भी खड़ा करना होता है और उसके लिए बड़े बजट की जरूरत होती है। सरकार को इस संबंध में एक व्यावहारिक कार्ययोजना बनाकर आम जनता को सही बात समझानी चाहिए। जो लोग जिला बनाने की मांग का सिर्फ विरोध कर रहे हैं, उन्हें इस बात के लिए समझाना चाहिए कि वे आम जनता को इस बात के लिए सहमत करें। फिर जनता को यह विश्वास दिलाना चाहिए कि उसकी मांग चरणबद्ध तरीके से पूरी की जाएगी। सबकी बात पर पूरा विचार किया जाएगा और उसमें जो कुछ किए जाने लायक होगा, वह किया जाएगा। लेकिन यह बात सिर्फ आंदोलन शांत करने के लिए नहीं, समस्या के समाधान के लिए होनी चाहिए। अगर सरकार जनता का विश्वास हासिल करने में सफल रही तो इसका समाधान बहुत मुश्किल नहीं होगा। (लेखक दैनिक जागरण हरियाणा, पंजाब व हिमाचल प्रदेश के स्थानीय संपादक हैं)

No comments:

Post a Comment