Thursday, January 13, 2011

सिर्फ ठंड से नहीं हो रही हैं ये मौतें

कोई दो दशक पहले तत्कालीन राष्ट्रपति के.आर. नारायणन ने राष्ट्र के नाम अपने एक संदेश में कहा था कि अगर आज देश में कोई भूखा सोता है तो इसका अर्थ यह नहीं कि देश में अनाज की कमी है। इसका अर्थ यह है कि उसके पास इतनी क्रयशक्ति नहीं है कि अपनी क्षुधा शांत करने भर को अनाज खरीद सके। उनके कथन को इन दिनों उत्तर भारत के नाना हिस्सों से आ रही ठंड से मौतों के संदर्भ में याद करें तो ठंड से मरने वाले सिर्फ इसलिए नहीं मर रहे कि ठंड ने पिछले सौ या कि पचास बरस का रिकॉर्ड तोड़ दिया है, जैसा कि बताया जा रहा है। दुनिया में हमसे भी ज्यादा ठंडे मुल्क हैं, जहां लोग ठंड का इससे भी बड़ा कहर झेलकर न सिर्फ जिंदा रहते हैं, बल्कि अपनी जिंदगी को भी थमने नहीं देते। वास्तव में हमारे देश में ठंड ही क्यों, लू, बाढ़ या दूसरी किसी भी तरह की प्राकृतिक आपदा से मौतों का सबसे बड़ा सच यह है कि इस देश में अब भी बड़ी संख्या में ऐसे लोग रहते हैं जो आपदाओं के रिकॉर्ड तोड़ते वक्त उनके सामने होते हैं तो उनकी अपनी लाचारी भी रिकॉर्ड तोडऩे लगती है। वैसे ही, जैसे रोटी पकाते वक्त किसी का तवा गायब हो जाए!
सोचने की बात है कि जिन करोड़ों लोगों के बारे में अर्जुन सेन गुप्ता समिति कहती है कि वे 12 से 20 रुपए रोज पर गुजर-बसर करते हैं, वे महंगे गरम ऊनी कपड़ों या कि कंबलों और रजाइयों पर कितना खर्च कर सकते हैं। सिर छुपाने की जगह और अलाव की आग ही ठंड से बचाव का उनका सबसे बड़ा सहारा होती है और बहुतेरे उससे भी महरूम होते हैं। तिस पर जिंदगी को चलाने के लिए ठंड की आपदा से सीधे दो-दो हाथ का सबसे बड़ादुस्साहसइन्हीं वंचितों को प्रदर्शित करना पड़ता है। ऐसे में क्या आश्चर्य कि जैसे दंगों की सबसे ज्यादा मार गरीब व कमजोर झेलते हैं, ठंड के तथाकथित कहर से होने वाली मौतें भी सबसे ज्यादा उन्हीं के हिस्से में आती हैं। कोढ़ में खाज यह कि हर साल होने के बावजूद ये मौतें कुल मिलाकर एक संख्या बनने से आगे नहीं बढ़ पातीं।
अफसोस की बात है कि जिन सत्ताधीशों के लिए यह स्थिति चिंता का विषय होनी चाहिए, वे मौतों के सुर्खियां बनने से पहले इस बाबत सोचते ही नहीं हैं और सुर्खियां आना थमने के साथ ही सब कुछ भूल जाते हैं। वे रोज कुआं खोदने व पानी पीने वालों में शामिल नहीं हैं, इसलिए उन्हें आग लगने पर ही कुआं खोदने की आदत है और देश में जब से भूमंडलीकरण व्यापा है, उन्होंने अपनी यह आदत भी सुधारली है। अब वे कहते हैं कि जिसके घर में आग लगी है, वह खुद कुआं खोद ले। फिर ठंड है, तो बचाने को तमाम कंपनियां भी तो हैं जो बचाव के एक से बढ़कर एक उपकरण और कपड़े वगैरह बनाती हैं। जिसे ठंड लगे, वह उनमें से कोई उपयुक्त विकल्प चुन ले।
जान लीजिए कि उत्तर प्रदेश में, जहां अब तक पौने दो सौ से ज्यादा लोगों ने ठंड के चलते जान गंवाई है, सर्वोच्च न्यायालय के कड़े निर्देश के बावजूद रैनबसेरों का माकूल इंतजाम नहीं है। इलाहाबाद में रैनबसेरे संगम के मेला क्षेत्र में बनाए गए हैं, जिनमें बेघरों के नाम पर साधु रह रहे हैं, जबकि वाराणसी, मेरठ, लखनऊ, कानपुर व आगरा आदि में रैनबसेरे या तो बने नहीं हैं या फिर दूसरे कामों के लिए प्रयोग किए जा रहे हैं। इस बाबत पूछने पर एक सरकारी अधिकारी की टिप्पणी थी कि कुछ निर्देश पालन करने के लिए होते ही नहीं। दिल्ली में ठंड से कितनी भी मौतें क्यों न हो जाएं, आश्रयहीनों को राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान बने महंगे फ्लैटों में नहीं टिकाया जा सकता, निर्देश होने के बावजूद!
यह हाल इसलिए है कि निवेशकों को सिर आंखों पर बैठाने वाली सरकारें नागरिकों, खासकर शरणार्थी नागरिकों की परवाह करने में ज्यादा रुचि नहीं लेतीं। ऐसा नहीं होता तो उत्तर प्रदेश में फैजाबाद जिले के रूदौली स्थित धान खरीद केंद्र पर चार दिन से पड़े किसान को ठंड से दम न तोडऩा पड़ता। सरकार या तो उसे ठंड से बचाने के इंतजाम कर देती या उसका धान जल्दी से खरीदवा देती। लेकिन ऐसा वह तब करती जब समझती कि ठंड का कहर धनी तबके पर ही नहीं टूटता, किसानों-मजदूरों पर भी टूटता है। यों, भूमंडलीकरण से पहले भी ऐसा ही होता था कि कागजी घोड़ों पर लदे सरकारी कंबल तब बंटने को आते थे, जब जाड़ा अंतिम प्रणामकर चुका होता था और गरमी दस्तक दे रही होती थी, लेकिन तब वह कर्मकांड भी आज के मुकाबले थोड़ा अच्छा लगता था, क्योंकि सरकारों व सत्ताधीशों में थोड़ी हया बाकी थी। इससे वंचितों की निराशा इस अर्थ में थोड़ी घटती थी कि उनका आज न सही, कल अच्छा होने की उम्मीद बाकी है।
अब सरकारें कंबल बंटवाने या अलाव जलवाने की रहमदिली पर उतरती हैं तो लगता है कि कंबल ओढऩे वालों के सुनहरे कल के सपनों के अंत की मुनादी करना चाहती हैं। रिकॉर्डतोड़ठंड को लोगों की मौत का जिम्मेदार ठहरा कर इस तथ्य को झुठलाना चाहती हैं कि हत्यारी यह ऋतु नहीं, बल्कि उनकी व्यवस्था है।

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