अंशु न्यूक्लियर पॉवर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड और फ्रांस की कंपनी अरेवा के बीच हुए समझौते से भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी के चेहरे पर जो खुशी आई, उसकी कीमत भारत के नागरिकों और भारतीय अर्थव्यवस्था को जैतापुर में चुकाने के लिए मजबूर किया जा रहा है। डॉ सिंह इस समय फ्रेंच न्यूक्लियर उद्योग को उबारने वाले तारणहार की भूमिका में हैं। हम यहां यदि होने वाले खर्च के मुद्दे पर चुप भी हो जाएं तो भी सुरक्षा का प्रश्न एक बड़ी चिंता का विषय है। जैतापुर में प्रस्तावित 9900 मेगावाट परमाणु ऊर्जा संयंत्र के लिए कुल 938 हेक्टेयर जमीन ली जानी है, जिसमें 669 हेक्टेयर जमीन माड़वन की है। मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चह्वाण कहते हैं कि स्थानीय लोग जमीन देने के लिए राजी हैं। जब उन्होंने खुद मुंबई में इस मुद्दे पर बातचीत के लिए माड़वन के लोगों को बुलाया तो उन्होंने इस बात से साफ इनकार किया। अब इसका क्या अर्थ निकाल जाए? गांव वालों का पक्ष साफ है कि बातचीत तो उस समय की जाए जब हमें भी अपनी बात कहने का मौका मिले और मुख्यमंत्रीजी उनकी बात सुनते हैं तो परियोजना कार्य रुक जाएगा यानी माड़वन में संयत्र लगाने का फैसला पहले से सुरक्षित है। जैतापुर परमाणु ऊर्जा संयत्र को लेकर कोंकण क्षेत्र में राजनीति तेज हो गई है। परमाणु ऊर्जा संयंत्र के पक्षकार जहां इसे विकास से जोड़कर देख रहे हैं। वहीं इस परियोजना के खिलाफ खड़े लोगों का मानना है कि यह परियोजना कोंकण के विनाश की कहानी का पहला अध्याय होगी। इस मसले पर पर्यावरणविदों का मानना है कि कोंकण की जमीन पर्यावरण के लिहाज से अति संवेदनशील है। यहां 275 किलोमीटर के क्षेत्रफल में जिस तरह परियोजनाओं पर एक साथ काम हो रहा है। उससे साफ है कि कोंकण पर किसी की बुरी नजर है। बेशक माड़वन का मुद्दा हम सभी के लिए गंभीर मुद्दा है। भिड़ कहते हैं, प्रत्यक्ष तौर पर प्रभावित होने वालों की संख्या भले ही दस हजार के आसपास नजर आ रही हो, लेकिन इससे वास्तव में प्रभावित होने वालों की संख्या लाखों में होगी। जैतापुर परियोजना से पूरा कोंकण प्रभावित होगा जो काफी दुर्भाग्यपूर्ण है। जैतापुर परमाणु ऊर्जा संयत्र के काम को छह चरणों में पूरा किया जाना है। योजना के अनुसार पहले चरण में 1650 मेगावाट की ईकाई का काम पूरा होगा। यह दोनों ईकाइयां रत्नागिरी जिले के माड़वन में होंगी। योजना के अनुसार इस परियोजना के पहले चरण को 2013-14 तक पूरा होना है और बचे चार ईकाइयों का काम भी 2018 तक पूरा कर लिया जाना है। वर्तमान में हमारे कुल बिजली उत्पादन मे परमाणु ऊर्जा की भागीदारी 2.90 प्रतिशत की है। देश में इसे 2020 तक बढ़ाकर छह प्रतिशत तक ले जाने की योजना है और 2030 तक इसे तेरह प्रतिशत की भागीदारी में बदल दिया जाएगा। इसके लिए माड़वन जैतापुर की तरह कई परियोजनाओं की देश को जरूरत होगी। बहरहाल बात जैतापुर की करते हैं। जिसमें पांच गांव माड़वन, मीठागवाने, करेल, वारिलवाडा और निवेली की 938 हेक्टेयर जमीन जानी है, लेकिन चर्चा में माड़वन गांव का नाम ही बार-बार आ रहा है। माड़वन को रत्नागिरी जिले में स्वतंत्रता सेनानियों के गांव के रूप में जाना जाता है। इस गांव में आधे दर्जन से अधिक स्वतंत्रता सेनानियों का परिवार रहता है। अंग्रेजों से लड़ने वालों के परिवारों को अब अपनी सरकार से लड़ना पड़ रहा है। वैसे उनके लिए अपनी सरकार अंग्रेज से भी अधिक क्रूर साबित हो रही है। कम से कम अंग्रेजों ने इन्हें अपने घरों से तो बेदखल नहीं किया था। परमाणु ऊर्जा संयत्र के लिए चुनी गई यह जमीन पर्यावरण के लिहाल से अति संवेदनशील है, क्योंकि यहां समुद्र का किनारा होने के साथ-साथ 150 किस्म के पक्षी और 300 किस्म की वनस्पतियां पाई जाती हैं। खास बात यह है कि इनमें कई वनस्पतियां और पक्षियां दुर्लभ श्रेणी में शुमार है। समुद्र के इस मनोरम तटीय क्षेत्र में एक दर्जन से अधिक परमाणु ऊर्जा संयत्र प्रस्तावित हैं, जबकि रत्नागिरी को राज्य सरकार ने हार्टीकल्चर जिला घोषित किया है और इसका पड़ोसी जिला सिंध दुर्ग गोवा से भी लगा हुआ होने के कारण पर्यटकों की खास पसंद रहा है। बड़ी संख्या में गोवा देखने के लिए आने वाले पर्यटक सिंध दुर्ग का रूख करते हैं। पर्यावरणविद इस बात से अचंभित है कि जिस रत्नागिरी को दुनिया भर मे जैव विविधता के हॉट स्पॉट के तौर पर देखा जाता है, उस जिले के लिए परमाणु ऊर्जा करार पर तब हस्ताक्षर होता है जबकि पूरी दुनिया अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता वर्ष का उत्सव मना रही है। साखरी नाटे मछुआरों की बस्ती है। वहां मिले मच्छीमार कृति समिति के उपाध्यक्ष अमजद बोरकर बताते हैं कि समुद्र के साथ हमारा रिश्ता पीढि़यों का है। हमारे पूर्वजों के समय से यह हमें रोटी दे रहा है। सरकार भले ही इस परियोजना को कोंकण और महाराष्ट्र के हित में बता रही है, लेकिन यह विकास का नहीं कोंकण की बर्बादी का समझौता है। टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साईस की एक रिपोर्ट के अनुसार परमाणु ऊर्जा संयत्र के लिए सरकार ने जो स्थान तय किया है वह बिल्कुल उपयुक्त नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक परियोजना का स्थानीय और पर्यावरणीय परिवेश पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ेगा। सरकार तथ्यों को तोड़-मरोड़ रही है और माड़वन के उपजाऊ जमीन को बंजर बनाकर कर पेश कर रही है। जैतापुर के जिस 626.52 हेक्टेयर जमीन को बंजर बताया जा रहा है। उस पर किसान धान, फल, सब्जी आदि उगा रहे हैं। वर्ष 2007 में बाढ़ के कारण बर्बाद हुई फसल का सरकार ने एक करोड़ सैंतीस लाख सात हजार रुपये का मुआवजा दिया था, यदि जमीन बंजर थी तो मुआवजा की जरूरत ही क्या थी? भूकंप के लिहाज से भी यह क्षेत्र जोन तीन में आता है, जिसमें परमाणु संयत्र को शुरू करना कम खतरे की बात नहीं है। स्थानीय लोगों के लिए रेडिएशन का मामला एक बड़ा मुद्दा है। इस बन रहे परमाणु ऊर्जा संयत्र के आसपास जो लोग रह रहे होंगे, उनके स्वास्थ पर इसका पड़ने वाला दुष्प्रभाव एक बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है। गांव वाले पूछते हैं, यदि यह परियोजना इतनी ही सुरक्षित है तो यहां काम करने वाले अधिकारियों के लिए आवास की व्यवस्था संयत्र से पांच-सात किलोमीटर दूर क्यों प्रस्तावित किया गया है? आखिर इस संयत्र में काम करने वाले अधिकारियों व कर्मचारियों के आवास की व्यवस्था परमाणु ऊर्जा संयत्र के परिसर में ही क्यों नहीं किया जा रहा। साफ है कि दाल में कुछ काला है और पूरे तथ्यों को छिपाया जा रहा है, जो जनहित के लिए ठीक नहीं। माड़वन (जैतापुर) में रहने वाले जानना चाहते हैं, यदि फ्रांसीसी कंपनी अरेवा उनके गांव आ रही तो यहां वह कोई समाज सेवा करने तो नहीं आ रही है। वह एक निजी कंपनी है, जो यहां कमाई के इरादे से आएगी और कोंकण की जमीन पर पहली बार वह अपने यूरोपियन प्रेसराइज्ड रिएक्टर तकनीक की जांच भी करेगी। इसे अभी तक कहीं जांचा-परखा नहीं गया है। क्या अरेवा भारत को परमाणु ऊर्जा संयत्र के नाम पर अपनी प्रयोगशाला के तौर पर इस्तेमाल करना चाहती है? (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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Friday, March 25, 2011
Monday, March 7, 2011
सीखना होगा विरोध का मर्यादित तरीका
पिछले दिनों मिर्चपुर में जातीय हिंसा के बाद पुलिस ने कुछ युवाओं को गिरफ्तार किया था, जिनका संबंध जाट समुदाय से था। इसके विरोध में जाटों की एक खाप पंचायत ने इस साल जनवरी में 11 दिन तक हरियाणा के जींद जिले में आंदोलन किया था। रेल व सड़क यातायात को रोका गया, रेल पटरियां उखाड़ी गई और बसों में आग लगाई गई। इसके अलावा आंदोलनकारियों ने रेलवे व सड़क पर जाम लगाने के लिए 3,130 पेड़ काट डाले, जिससे पर्यावरण को गहरा नुकसान हुआ और राज्य सरकार को कटे हुए पेड़ हटाने के लिए 90 हजार रुपये खर्च करने पड़े। साथ ही बसों को रिपेयर कराने में ढाई लाख रुपये का खर्च आया। इस आंदोलन से आम जनता को जो नुकसान हुआ, वह अपनी जगह है। अब लगता यह है कि बतौर हर्जाना खाप पंचायतों को 33.95 करोड़ रुपये भरना पड़ेगा। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र व हरियाणा राज्य सरकार से कहा है कि वह इन खाप पंचायतों से जुर्माना वसूल करने के रास्ते बतलाए। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर उत्तर रेलवे और हरियाणा सरकार ने आंदोलन के कारण हुए नुकसान का अनुमान लगाया था। विरोध का यह अराजक और गैरकानूनी उदाहरण इकलौता नहीं है। यहां आए दिन विरोध और अपनी मांगे मनवाने के नाम पर देश की संपत्ति को नुकसान पहुंचाया जाता रहा है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि अपनी उचित या अनुचित मांगे मनवाने के लिए राजनीतिक या गैर राजनीतिक संगठन आंदोलन करते हैं। ये आंदोलन अक्सर हिंसा का रूप धरण कर लेते हैं, जिनमें सरकारी-निजी संपत्ति को गहरा नुकसान पहंुचता है और आम जनता को भी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इसके मद्देनजर रखते हुए देश की विभिन्न अदालतें बंद, आंदोलनों व प्रदर्शनों के खिलाफ फैसले सुनाती रही हैं और इन्हें प्रायोजित करने वाली पार्टियों पर जुर्माने भी लगाती रही हैं। मसलन, केरल में वामपंथियों द्वारा आयोजित बंद को उच्च न्यायलय ने गैर कानूनी घोषित किया था और माकपा पर जुर्माना किया था। इसी तरह मुंबई में शिवसेना पर जनसंपत्ति नष्ट करने के लिए 20 लाख रुपये का जुर्माना किया गया था। अदालतों द्वारा इस किस्म के जुर्माने लगाने का उद्देश्य यह प्रतीत होता है कि सरकारी व गैर सरकारी संपत्ति को नुकसान से बचाया जाए और जनता को असुविधा से दूर रखा जाए। संभवत: इसी तथ्य को मद्देनजर रखते हुए सुप्रीमकोर्ट के न्यायाधीश जीएस संघवी और न्यायाधीश एके गांगुली की खंडपीठ ने राजस्थान के गूर्जर आंदोलन, हरियाणा के खाप आंदोलन आदि का जायजा लेते हुए कहा था, दुर्भाग्य से आज की सरकारें खामोश हैं। हर कोई खामोश है। हम इसे जारी नहीं रहने दे सकते। अदालतें सभी समस्याओं का समाधन नहीं कर सकतीं, लेकिन कानून के शासन को बरकरार रखने के लिए उन्हें हस्तक्षेप करना पड़ेगा और इनमें सबसे बुनियादी सवाल है सभ्य समाज। दूसरे शब्दों में इसका अर्थ यह है कि सुप्रीम कोर्ट यह नहीं चाहता कि कोई व्यक्ति या संगठन अपनी मांगें मनवाने के लिए इस किस्म का आंदोलन करे, जिसमें संपत्ति नष्ट हो या जनता को असुविधा हो। सुनने में यह बात बहुत अच्छी और आदर्शवादी लगती है, लेकिन सवाल यह है कि वह कौन-सा तरीका है, जिसके जरिये गूंगी-बहरी सरकार से अपनी मांगें मनवाई जाएं? खामोशी और सभ्य तरीके से की गई इलतिजा तो कोई सुनता नहीं। इस बात पर बहस हो सकती है कि जींद जिले में खाप पंचायत का आंदोलन सही था या नहीं, लेकिन इस आंदोलन की आड़ में सभी आंदोलनों को शामिल करके सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी नजीर पेश की है, जो चिंता का विषय है। इस पर आगे विचार करने से पहले यह जरूरी लगता है कि जींद आंदोलन को संक्षेप में दोहरा दिया जाए। हुआ यह था कि हरियाणा के मिर्चपुर गांव में एक जातीय संघर्ष के दौरान दलितों के मकानों में आग लगा दी गई थी, जिसमें एक 70 वर्षीय व्यक्ति और उसकी अपाहिज बेटी जलकर राख हो गए थे। इस आगजनी व हत्या के आरोप में पुलिस ने सवर्ण जाति के कुछ युवकों को गिरफ्तार किया। उनकी गिरफ्तारी के विरोध में 11 खाप पंचायतों ने जींद में 11 दिन तक रेल व सड़क यातायात बंद रखा। इस चक्काजाम के लिए हजारों पेड़ काटे गए, राज्य परिवहर की बसों में आग लगाई गई और रेल पटरियां उखाड़ी गई। इसे मद्देनजर रखते हुए सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय खंडपीठ ने 31 जनवरी को गंभीर रुख अपनाते हुए कहा, सरकार किस तरह मुट्ठीभर लोगों को यह अनुमति दे सकती है कि वह दूसरों को जनयातायात इस्तेमाल न करने दे? क्या सरकार पूरी तरह असहाय थी? यह कहते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर रेलवे और हरियाणा सरकार को आदेश दिया कि वह खापों द्वारा प्रायोजित आंदोलन से हुए नुकसान का अनुमान लगाएं। यह नुकसान 33.95 करोड़ रुपये आंका गया है और पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र व राज्य सरकारों को आदेश दिया कि वह शपथपत्रों द्वारा बताएं कि जिन खाप पंचायतों को मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने समाजिक संगठन कहा है, उनसे यह जुर्माना किस तरह से वसूल किया जाए। लेकिन इस जुर्माने को लागू करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान के गूर्जर व अन्य आंदोलनों की ओर भी इशारा किया है। इससे यह चिंता बढ़ गई है कि क्या सुप्रीम कोर्ट सभी आंदोलनों पर प्रतिबंध लगाना चाहता है? अगर ऐसा है तो फिर राज्य सरकारों या केंद्र से जायज मांगें मनवाने का कौन-सा रास्ता होगा? यह सही है कि लोकतंत्र में कोई भी आंदोलन हिंसक नहीं होना चाहिए, लेकिन यह भी देखने को मिलता है कि जब तक आंदोलन में थोड़ी उग्रता शामिल न हो, सरकारों की कान पर जूं तक नहीं रेंगती। यह अफसोस की बात है कि लोकतंत्र के 63 वर्ष बाद भी हम जन विरोध व्यक्त करने का ऐसा कोई तरीका विकसित नहीं कर पाए हैं, जो शांतिपूर्ण हो और जिस पर राज्यों व केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया तेजी से आए और सकारात्मक हो। जापान में किसी बात का विरोध करने या मांगे पेश करने के लिए कर्मचारी काली पट्टी बांधकर काम पर जाते हैं और उत्पादन को तेज कर देते हैं। जापान सरकार के लिए मांजरा समझने को इतना ही इशारा काफी होता है, लेकिन जापान के इस मॉडल को कहीं और नहीं अपनाया गया है और अब अपने देश में संभव है कि सुप्रीम कोर्ट ऐसी ही भावनाएं रखता हो कि विरोध के तरीके सभ्य और किसी को परेशानी में न डालने वाले हों। मगर सवाल है कि क्या जापान की तरह हमारे देश की सरकार भी इस तरह के विरोध प्रदर्शन के प्रति उतनी ही संवेदनशीलता दिखाएगी, जितना जापान की सरकार या वहां का जनमानस दिखाता है? (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
Friday, February 11, 2011
एक बहस विनायक के बहाने
यह कोई अपमानजनक शब्द नहीं, बल्कि विश्व-विख्यात मुहावरा है। यूजफुल इडियट्स नाम से बीबीसी ने गत वर्ष एक ज्ञानवर्द्धक डॉक्यूमेंट्री भी बनाई है। इस कवित्वमय मुहावरे के जन्मदाता रूसी कम्युनिज्म के संस्थापक लेनिन थे। अर्थ था: वे बुद्धिजीवी, जो अपनी किसी हल्की या भावुक समझ से कम्युनिस्टों की मदद करते थे। ऐसे बुद्धिजीवियों को उपयोगी मूर्ख कहने में लेनिन की कोई चालबाजी नहीं थी। जड़-सिद्धांतवादी लेनिन को अपने विचारों के मामूली नुक्ते पर भी मतभेद नामंजूर था, इसलिए वह निकटतम सहयोगियों को भी नहीं बख्शते थे। तब स्वाभाविक था कि बाहरी बुद्धिजीवियों को लेनिन सचमुच बकवादी/मूर्ख समझते। पर उनमें जो कम्युनिस्टों की मदद करता, उसकी तात्कालिक उपयोगिता मानकर उपयोगी मूर्ख कहा गया। इतिहास गवाह है कि शोषित-पीडि़त पक्षधरता के नाम पर दुनिया में असंख्य लेखकों, कवियों, प्रोफेसरों ने कम्युनिस्टों को सहयोग दिया और बाद में उन्हीं के हाथों लांछित-प्रताडि़त हुए या मारे गए। समय के साथ इस मुहावरे का अर्थ हो गया है: किसी भी कट्टर, उग्रवादी राजनीति या तानाशाही शासक को मदद पहुंचाने वाले नासमझ बुद्धिजीवी। ऐसे बुद्धिजीवी दूसरे देश के भी हो सकते हैं, जो किसी उग्रपंथी संगठन या नेता को प्रगतिशील, साम्राज्यविरोधी आदि मानकर उसके प्रति सहानुभूति रखते हैं। सोवियत संघ और लाल चीन के प्रति पश्चिमी लेखकों, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों को इसी श्रेणी में रखा जाता था। क्योंकि सोवियत कम्युनिस्ट उनके प्रति सच्ची मैत्री नहीं, बल्कि उपयोगिता वाले दृष्टिकोण से ही उन्हें सीमित, रंगीन या झूठी जानकारियां दिया करते थे ताकि वे अपने विश्वास में टिकें और कम्युनिस्ट शासन के प्रचारक बने रहें। इस प्रकार वे बुद्धिजीवी सचेत और व्यवस्थित रूप से भी मूर्ख बनाए जाते थे। भारत में नक्सलियों और इस्लामी आतंकवादियों के लिए सहानुभूति रखने वाले बुद्धिजीवियों के लिए यह मुहावरा बिल्कुल सटीक है। कुछ अरसा पहले एक हिंदी कवि ने संसद पर हमला करने वाले आतंकी मोहम्मद अफजल की तुलना भगत सिंह से की। अभी गत दिनों दिल्ली में कुछ बड़े बुद्धिजीवियों ने माओवादी विनायक सेन की तुलना नेल्सन मंडेला से की। ऐसे बुद्धिजीवियों को आतंकियों, नक्सलियों के लिए उपयोगी मूर्ख के सिवा और क्या कहा जा सकता है? जो यह भी नहीं जानते कि जिहादियों की मंजिल निजामे-मुस्तफा या माओवादियों के पीपुल्स रिपब्लिक कायम होते ही उन्हें या तो जान बचा भागना पड़ेगा, नहीं तो ऐसी गुलामी की जिंदगी मिलेगी, जिसकी विभीषिका का उन्हें अनुमान तक नहीं। सारी दुनिया के जिहादी, तालिबानी अपने इलाकों में या यहीं जंगलों में माओवादी अपने नियंत्रण क्षेत्र में जो लोमहर्षक न्याय करते हैं, उससे सभी परिचित है। इसके बावजूद कुछ बुद्धिजीवी जिस उत्साह से उन्हें मदद पहुंचाने में लगे हुए हैं, वह आश्चर्यजनक है। ऐसे बुद्धिजीवियों का इस्लामी या माओवादी राज्य में क्या होगा, इसमें अनुमान की कोई बात नहीं। वह एक घोषित सत्य है। 1999 में पोप के वेटिकन में एक अंतरराष्ट्रीय ईसाई-इस्लामी संवाद आयोजित हुआ था। उसमें एक बड़े इस्लामी आलिम ने साफ कहा, तुम्हारे लोकतंत्र के सहारे हम तुम पर हमला करेंगे और अपने मजहब के सहारे तुम पर अधिकार करेंगे। यह घटना संवाद में भागीदार एक ईसाई महामहिम गिसेप बर्नार्डीनी ने बताई थी। ऐसी बेधड़क घोषणाओं के पीछे लेनिन वाला जड़ विश्वास ही है, जो दूसरों का इस्तेमाल करते हुए भी उन्हें हीन समझने में संकोच नहीं करता। किंतु दूसरों को तो सोचना चाहिए कि ऐसे क्रांतिवादी, जिहादी अगर सफल हुए तो क्या होगा? मुहम्मद अफजल या विनायक सेन को भगत सिंह और नेल्सन मंडेला बताने वाले बुद्धिजीवी किसी के हितैषी नहीं। वे नादान या धूर्त हैं, जो लोकतंत्र की स्वतंत्रता का दुरुपयोग कर लोकतंत्र को ही खत्म करने की तैयारी में लगे गिरोहों की मदद कर रहे हैं। यह छिपी बात भी नहीं। जिहादी और माओवादी बयानों, दस्तावेजों में जगह-जगह डंके की चोट पर लिखा है कि उन्हें वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था का अंत कर अपनी मजहबी या माओवादी तानाशाही स्थापित करनी है। जिसके बाद यह स्वतंत्र प्रेस, स्वतंत्र न्यायालय, स्वतंत्र चुनाव आदि का पूर्ण खात्मा हो जाएगा। जंतर-मंतर या मंडी हाउस की खुशनुमा धूप में प्रसिद्धि का सुख लेते हुए वक्तव्य देने की आजादी खत्म हो जाएगी। सरकारी संस्थानों के निदेशक, चेयरमैन रहते हुए सरकारी, न्यायिक निर्णयों का खुला विरोध करने की दुर्लभ छूट तो अकल्पनीय ही होगी! ऐसी अतिशय उदार छूट का लाभ उठाने वाले बुद्धिजीवी भारत को नकली लोकतंत्र कहते हैं और माओवादियों को गांधावादी बताते हैं। लेनिन ने इन्हें गलत नाम नहीं दिया था। ऐसे बुद्धिजीवी यह सब अनजाने कर रहे हों या जान-बूझकर, हर हाल में वे समाज के लिए घातक कार्य कर रहे हैं। यदि वे माओवादियों का सिद्धांत-व्यवहार जानते हुए उनका बचाव करते हैं, जैसा अरुंधति राय करती हैं तो उनकी स्वतंत्रता की समझ दूषित है। स्वतंत्रता की धारणा सबकी समानता और न्याय भावना के साथ ही कोई अर्थ रखती है। जो स्वतंत्रता किसी माओवादी को मिलनी चाहिए, वही उस आदिवासी या शिक्षक या सरकारी कर्मचारी को भी है, जो माओवादियों की दादागिरी पसंद नहीं करता। उनकी स्वतंत्रता का क्या हो रहा है? विनायक सेन के समर्थक उन सैकड़ों नागरिकों की कभी चिंता नहीं करते, जिनकी मुखबिर कहकर माओवादी नृशंस हत्या करते हैं। जो माओवादी स्वयं कानून नहीं मानते, उन्हें न्यायालय से कानूनी छूट दिलाने के आंदोलन का क्या अर्थ है? दूसरी ओर, जो बुद्धिजीवी माओवादियों, जिहादियों का सिद्धांत-व्यवहार जाने बिना उन्हें मंडेला या भगत सिंह कहते फिरते हैं, वे और भी घातक हैं। ऐसे बुद्धिजीवी बुद्धि शब्द को लज्जित कर रहे हैं। बिना जाने वे मंच पर वही कुछ बोलने लगते हैं, जो उन्हें किसी ने बताया है। जैसे, पिछले दिनों एक अभिनेत्री ने कहा, कोर्ट ने विनायक सेन पर एक-तरफा फैसला दिया है। उस अभिनेत्री को इतना भी पता नहीं कि पिछले तीन वर्ष से हर अदालत में सेन के लिए अच्छे से अच्छे वकीलों ने पैरवी की है। सुप्रीम कोर्ट समेत सभी अदालतों ने उसे अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर दिया। वहां सेन और सरकार, दोनों पक्ष की खुली सुनवाई हुई, जहां मीडिया ही नहीं, दूसरे नागरिक भी सब कुछ देख सुन सकते थे। अभी तक किसी ने (सेन के वकीलों ने भी) कहीं यह आरोप नहीं लगाया कि किसी कोर्ट ने एकतरफा काम किया। तब यह अभिनेत्री ऐसा निपट मूढ़ बयान दे रही हैं! मानो पृष्ठभूमि में खड़े किसी निर्देशक ने उन्हें बना-बनाया संवाद बोलने के लिए कहा हो, जिसे पूरी अदा से उन्होंने दोहरा दिया! उनकी प्रसिद्धि के नाम पर यह झूठी बात दुनिया भर में प्रसारित हो गई और हमारी स्वतंत्र, निष्पक्ष न्यायपालिका तथा देश की छवि पर कालिख पोती गई। ऐसे लेखक, अभिनेता, पत्रकार, समाजसेवी आदि को ओरियाना फलासी ने अभिजात फाहशाओं की संज्ञा ठीक ही दी थी, जो किसी भाड़े, पुरस्कार या प्रसिद्धि की चाह में उनके लिए भी खड़े होने को तैयार बैठे रहते हैं, जिन्हें वे जानते तक नहीं। भारत के निष्पक्ष, खुले न्यायालय जहां अभियुक्त का अच्छे वकीलों द्वारा बचाव किया गया, उस पर लांछन लगाना, कानून की रक्षा करने वाले सुरक्षा-बलों को निंदित करना और घोषित रूप से विध्वंस को अपना सिद्धांत बताने वाले नक्सली या आतंकवादी का बचाव करने की नियमित प्रवृत्ति को और क्या कहा जाए! ऐसे बुद्धिजीवियों से समाज को बचना जरूरी है। वे उस अंधे जैसे हैं, जिसके हाथ में आग है। वे अपने उच्च पदों और प्रसिद्धि का वजन देश का नाश करने में तुले जिहादियों, नक्सलियों के पक्ष में लगा रहे हैं। यह कड़वा सत्य समझने की आवश्यकता है कि ऐसे पैरोकार बुद्धिजीवियों से जिहादियों, माओवादियों को अतिरिक्त प्रोत्साहन मिलता है। वस्तुत:, इसीलिए विनायक सेन जैसे लोगों को और कड़ी सजा मिलनी चाहिए ताकि देशद्रोह के लिए लोकतंत्र की स्वतंत्रता का दुरुपयोग करने वाले सभी लोगों को कठोर संदेश मिले। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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