जब 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी को बड़ी सफलता मिली तो अनेक लोगों को लगा कि यह सब कांग्रेसी नेता राहुल गांधी के प्रयासों से सम्भव हुआ है। कहा गया कि युवा मतदाताओं ने काफी बड़ी संख्या में कांग्रेस को वोट दिया। उस चुनाव के बाद मीडिया में ‘यंग वोटर’ की धूम मच गई और अनेक लोगों ने नतीजा निकाल लिया कि भारत के युवा ‘एक बेहद अहम पॉलिटिकल कांस्टीट्यूएंसी’ बन गए हैं। मुझे लगता है कि यह नतीजा निकालना एक बड़ी हड़बड़ी होगी कि देश के युवा पहले की तुलना में अब ज्यादा राजनीतिक हो गए हैं। दरअसल हुआ यह है कि युवाओं की मनोवृत्तियों, जीवन शैलियों और खान-पान आदि में जो अनेक बदलाव आए हैं, उनकी वजह से बहुत सारे लोग यह यकीन करने लगे हैं कि वैीकरण ने युवाओं में भारी बदलाव ला दिया है। यह बात बड़े महानगरों में रहने वाले युवाओं के संदर्भ में कुछ हद तक सही हो सकती है, मगर इसे छोटे-छोटे कस्बों, नगरों व शहरों में रहने वाले युवाओं पर चस्पां कर देना जायज नहीं है। हमारे द्वारा कराए गए शोध अध्ययन के नतीजे संकेत करते हैं कि मनोवृत्ति, अभिरुचि और राजनीति में भागीदारी जैसे मामलों में युवाओं में काफी कम बदलाव आया है। भारतीय युवा उतने आधुनिक नहीं हैं जितना कि हम सोच लेते हैं.. वे उतने राजनीतिक भी नहीं हैं जितना हम यकीन कर लेते हैं। आज भी बहुसंख्यक युवाओं पर पारिवारिक मूल्यों का गहरा असर है और वे अपनी सोच में पुरातनवादी हैं। इस बात का भी कोई प्रमाण नहीं है कि 2009 के लोकसभा चुनाव में युवाओं ने भारी संख्या में मतदान किया। पिछले चुनावों की तरह 2009 के लोकसभा चुनाव में भी राष्ट्रीय स्तर पर युवा मतदान समग्र औसत मतदान से करीब चार फीसद कम रहा। राज्य के स्तरों पर देखें, तो केवल कर्नाटक और केरल ही ऐसे राज्य रहे जहां युवाओं द्वारा मतदान आम औसत मतदान से कुछ ज्यादा रहा। कहने का अभिप्राय यह है कि देश के चुनावों में भागीदारी करने के मुद्दे पर युवाओं के रुझान में न तो कोई खास ढलान है और न ही कोई खास इजाफा। मेरी समझ में राजनीति ही नहीं बल्कि सामाजिक मूल्यों व विासों के प्रति भी युवाओं में निरंतरता और समनुरूपता का ही रुझान है।
हमने अपने सव्रेक्षण में पाया था कि 40 फीसद युवा पुरातनवादी, 36 फीसद प्रगतिशील और 24 फीसद उलझाव भरी मानसिकता रखने वाले हैं। पुरातनवादी सोच ग्रामीण युवाओं में ज्यादा है, वहीं प्रगतिशील रुझान दिल्ली, मुम्बई, बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणो और कोलकाता जैसे शहरों में मिलता है। हम इस तथ्य से भी अवगत हुए कि महज एक तिहाई युवा ही अपनी पसंद से शादी करना चाहते हैं। अभी भी दो तिहाई मानते हैं कि उनकी शादी का फैसला करने का हक उनके माता-पिताओं को है। लगभग यही आंकड़े मुहब्बत, मेलजोल व इश्कखोरी के मामले में भी हैं। शहरी जगहों पर काफी लोग अपनी जाति पहचान का विसर्जन करते दीखते हैं, लेकिन जब बात शादी की आती है, तब जाति पहचान सर उठाकर खड़ी हो जाती है। 67 फीसद युवा अपनी ही जाति में शादी करने के विचार का समर्थन करते हैं। अब भी विवाह को एक बेहद महत्वपूर्ण संस्था के रूप में स्वीकार किया जाता है। 53 फीसद युवा महसूस करते हैं कि शादीशुदा होना बहुत महत्वपूर्ण है, 27 फीसद इसे महत्वपूर्ण मानते हैं, 7 फीसद कुछ खास महत्वपूर्ण नहीं और महज 5 फीसद इसे बेकार व बेदाम की चीज मानते हैं। आमतौर पर हम यह भी कहते हैं कि विवाह विच्छेद यानी तलाक की घटनाएं पहले से ही कहीं ज्यादा बढ़ गई हैं, लेकिन यह भी सच है कि 74 फीसद युवाओं के लिए तलाक जैसी चीजें कबूल करने वाली नहीं हैं। हम अमूमन यह भी कहते हैं कि संयुक्त परिवार व्यवस्था तेजी से चरमरा रही है, मगर अब भी युवाओं पर एक संस्था के रूप में परिवार का खासा मजबूत असर है। हमने सव्रेक्षण के दौरान जिन युवाओं का इंटरव्यू लिया, उनमें 20 फीसद काफी मजबूत अभिभावकीय प्राधिकार के तहत है, 32 फीसदी मजबूत प्राधिकार के मातहत, 25 फीसद सामान्य प्राधिकार के अधीन और 23 फीसद सीमित प्राधिकार के साये में। बेटा और बेटी के प्रति मौजूद सोच में भी कोई खास बदलाव नहीं आया है। अब भी परिवार में लड़कों की तुलना में लड़कियों को ज्यादा मजबूत प्राधिकार के मातहत रहना होता है। इस तथ्य के बावजूद कि प्रवृत्तियों व सामाजिक मूल्यों के मामलों में बहुत कुछ नहीं बदला है, फिर भी शहरों में रहने वाले युवाओं की जीवन शैली में जरूर ही बदलाव आए हैं। गांवों में बदलाव की गति काफी धीमी है।
आज यह भी सच है कि युवा टी.वी. देखने, संगीत सुनने और दोस्तों के साथ घूमने पर कहीं ज्यादा वक्त देता है और किताबों को पढ़ने तथा खेलकूद पर कम। 28 फीसद युवा खूबसूरत कपड़े पहनने व सजने-संवरने को काफी जरूरी मानते हैं, वहीं 32 फीसद इसे जरूरी बताते हैं। दिलचस्प यह है कि इस मामले में लड़कियों की तुलना में लड़के ज्यादा सक्रिय है। भारतीय युवा चिंताओं और आकांक्षाओं की मिश्रित भावनाओं को भी अभिव्यक्त करते हैं।
करीब 50 फीसद युवा तीव्र व गम्भीर चिंता की चपेट में है। महज व फीसद युवा ही कम चिंता की गिरफ्त में हैं। उनकी तीव्र चिंता रोजगार की असुरक्षा, दंगे, सामूहिक हिंसा के खतरे, निजी स्वास्थ्य सम्बंधी समस्याओं, पारिवारिक तनाव, सड़क हादसे व आतंकवादी वारदातों की आशंकाओं तथा विवाह सम्बंधी उद्विग्नताओं की वजहों से है। लगभग 27 फीसद युवा बेरोजगारी व गरीबी को सबसे बड़ी समस्या बताते हैं। 12 फीसद युवा जनसंख्या वृद्धि को सबसे बड़ी समस्या बताते हैं, वहीं भ्रष्टाचार, निरक्षरता और आतंकवाद को सबसे बड़ी समस्या के रूप में देखने वाले युवा क्रमश: 6 फीसद, 4 फीसद और 3 फीसद हैं। भारतीय युवाओं की यही मानस कथा है। इस कथा का सकारात्मक पहल यह है कि युवा प्रतिकूलताओं से आकुल-व्याकुल नहीं होते.. हालांकि उनमें अपने भविष्य की खातिर खासी चिंताएं हैं। उनकी आकांक्षाएं बढ़ रही हैं.. हर जगह.. गांव, कस्बों, छोटे शहरों व बड़े शहरों में.. हां, जगह-जगह की चिंताओं की डिग्री में थोड़ा- बहुत अंतर है। आज 84 फीसद युवा आशावादी हैं। महज 3 फीसद ही निराशा की चपेट में हैं। 13 फीसद आशा व निराशा के नैरंतर्य पर जीते हैं। समग्र तौर पर कहें तो तस्वीर जटिल तो है, मगर कुहासे और कोहरों से भरी हुई नहीं हैं। देश में युवा एक प्रबल ताकत हैं। वे परिवर्तन और निरंतरता, आधुनिकता और परम्परा तथा चिंताओं व आकांक्षाओं की समवेत चेतना के वाहक हैं। आज जरूरत इस युवा ऊर्जा को थामने और उसे रचनात्मक व विकासपरक कायरे की दिशा में परिचालित करने की है।
देश की सबसे बड़ी पंचायत में युवाओं की दिलचस्पी का आईना
लोकसभा चुनाव-2009
राज्य कुल मतदान युवाओं की भागीदारी प्रतिशत (18 से 25 वषर्) सम्पूर्ण भारत 58.42 54 आंध्र प्रदेश 72.61 71 असम 69.50 67 बिहार 44.45 36 छत्तीसगढ़ 55.29 53 दिल्ली 51.84 52 गुजरात 47.84 44 हरियाणा 67.41 58 झारखंड 51.16 50 कर्नाटक 63.32 73 केरल 73.33 75 मध्य प्रदेश 51.16 53 महाराष्ट्र 50.72 47 उड़ीसा 65.29 51 पंजाब 69.75 59 राजस्थान 48.49 45 तमिलनाडु 72.99 67 उत्तर प्रदेश 47.75 45 उत्तरांचल 53.21 44 पश्चिम बंगाल 81.74 76 (स्रेत : राष्ट्रीय चुनाव अध्ययन(एनईएस) 2009/सभी आंकड़े प्रतिशत में
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