Wednesday, January 26, 2011

गरीबों के जले पर नमक है महंगाई


कभी गरीब दाल-रोटी या प्याज-रोटी खाकर गुजारा कर लेता था, लेकिन अब उसे वो भी नसीब नहीं। कृषि मंत्री शरद पवार का कहना है जब लोग 11 रुपये का कोल्ड ड्रिंक खरीद सकते हैं तो सब्जियां क्यों नहीं? चीनी के दाम बढ़ने पर शरद पवार ने कहा चीनी नहीं खाएंगे तो क्या मर जाएंगे? गेहूं की बात आई तो चावल उत्पादक राज्यों में रोटी खाने वाली जनता को जिम्मेदार ठहराया गया। योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया का ये आकलन तो और भी ज्यादा चौंकाने वाला है कि ग्रामीण इलाकों में आर्थिक संपन्नता बढ़ने से देश में खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़ रहे हैं। कुछ दिनों पहले भी मोंटेक ने खाद्य पदाथरें की बढ़ती कीमतों के लिए भूखे लोगों को जिम्मेदार ठहरा दिया था। उनके मुताबिक गरीब लोग भी अब पौष्टिक आहार लेने लगे हैं। फल, सब्जियां और दूध खरीदने लगे हैं जिस वजह से खाद्य पदाथरें की कीमतों में इजाफा हो रहा है। मोंटेक जैसे लोगों को गांवों में आर्थिक संपन्नता नजर आ रही है, जबकि देश के ग्रामीण इलाकों में तकरीबन 40 फीसदी जनता अब भी गरीबी रेखा के नीचे जीवन गुजर-बसर कर रही है। महंगाई में आम आदमी पिस रहा है और यूपीए सरकार के नेता आहत जनता को मरहम लगाने की बजाय उनके घाव पर नमक छिड़कने का काम कर रहे हैं। प्रधानमंत्री के खास सिपहसालारों की ये बातें अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के उस बयान से मिलती हैं जब उन्होंने वैश्विक महंगाई के लिए भारत और चीन के भूखे लोगों को जिम्मेदार ठहराया था। गांव से लेकर शहर तक आम आदमी दो जून की रोटी के लिए परेशान हैं और एयरकंडीशन कमरों में बैठकर मोंटेक सिंह अहलूवालिया, शरद पवार जैसे नेताओं को खोट गरीबों में नजर आ रही है। शरद पवार को आइपीएल, की चमक-दमक और बीपीएल के अंधेरे का फर्क शायद समझ नहीं आ रहा, अन्यथा वह ऐसे बचकाने तर्क शायद ही देते जैसा वह आजकल बोल रहे हैं। कभी ट्विटर जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट पर अक्सर चहकने वाले ऐसे ही एक नेता शशि थरूर ने विमान के इकॉनमी क्लास को कैटल क्लास बता डाला था। दरअसल, देश में ऐसे लोगों की लंबी-चौड़ी जमात है जिन्हें पांच सितारा सुविधाओं में रहकर और आंखों में रंगबिरंगा चश्मा पहनने के बाद गांवों और गरीबों की बदहाली नजर ही नहीं आती। गांवों में एक कहावत है कि सावन के अंधे को हरी-हरी ही नजर आती है। कुछ ऐसा ही हाल इन लोगों का भी है। सरकारी बाबुओं से लेकर सांसदों तक के वेतन-भत्तों में होने वाली बढ़ोतरी के चलते महंगाई की मार शायद उन्हें महसूस न हो, लेकिन दिन भर मेहनत कर अपना घर-परिवार चलाने वाला आम आदमी की कमर किस कदर टूट चुकी है इसे देखना हो उन्हें अपने एसी से बाहर आना होगा। प्रधानमंत्री कहने को तो अर्थशास्त्री है, लेकिन महंगाई को काबू करने के मसले पर वह ज्योतिष की भाषा बोलने लगते हैं। गरीब के घर का चूल्हा नहीं जल पा रहा, लेकिन यूपीए सरकार विकास और संपन्नता के आंकड़े गिनाने में जुटी हुई है। इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के मुताबिक गरीबी, भुखमरी और कुपोषण से प्रभावित दुनिया के 84 देशों में भारत का स्थान 67वां है। इस ग्लोबल हंगर इंडेक्स के आंकड़ों में कुछ खामियां हो सकती है परंतु इन्हें झुठलाया नहीं जा सकता। ये हमारे सरकारी तंत्र की नाकामी ही है कि आबादी का एक तबका भूख से बेहाल है और हजारों टन अनाज गोदामों में सड़ जाता है। दाल हो या चावल अथवा सब्जियां, खाने-पीने की चीजों के दाम आसमान छू रहे हैं और सरकार ठोस कदम उठाने की बजाय महंगाई पर बैठकों का सिलसिला चला रही है। लाल किले से दिए भाषण में प्रधानमंत्री ने स्वीकार किया था कि महंगाई का सबसे ज्यादा असर गरीबों पर प़ड़ा है, लेकिन योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अब महंगाई के लिए गरीबों को ही जिम्मेदार बता रहे हैं। मोंटेक सिंह अहलूवालिया पर कोलकाता में छात्रों के टमाटर और अंडे फेंके जाने की घटना को ठीक नहीं कहा जा सकता, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि महंगाई को लेकर जनता में गुस्सा है और मोंटेक सिंह और शरद पवार जैसे लोगों के बयान आग में घी डालने का काम कर रहे हैं। महंगाई कम करने के उपायों की बात करें तो सरकार में बैठे लोगों में ही मतभेद साफ दिख रहा है। ऐसा लगता है कि सरकार में मौजूद कुछ लोगों की चिंता आम आदमी की बजाय मुनाफाखोरी में जुटे लोगों को फायदा पहुंचाने की ज्यादा है।



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