मैं यह नहीं कहता कि पूरा चुनाव सुधार हो गया है। अब भी अपराधीकरण, भ्रष्टाचार, धर्मवाद और जातिवाद जैसी बीमारियां हमारे चुनावों पर हावी हैं। पर चुनाव आयोग ने सुधार के लिए काफी काम किए हैं। फर्जी वोटिंग पर काफी हद तक अंकुश लग गया है
लोकतंत्र सफल रहेगा तो विकास अपने आप होगा। यह तभी सफल रह सकता है, जब अधिक से अधिक मतदाता वोट देने जाएं। अगर 80 प्रतिशत मतदाता भी वोट देते हैं तो लोकतंत्र को कामयाब बनाने से कोई नहीं रोक सकता। हमारे 30 प्रतिशत वोटर अनपढ़ जरूर हैं लेकिन अविवेकी नहीं हैं। वे जानते हैं कि कौन प्रत्याशी और कौन दल उनके लिए अच्छा है और कौन बुरा। यही वह वोटर है जो न तो राजनीति दलों के घोषणा पत्रों से प्रभावित होता है और न टेलीविजन से। मीडिया के सव्रे लाख कोशिशों के बावजूद उसके मन की बात नहीं जान पाते। कई चुनावों में जब सव्रे गड़बड़ा जाते हैं तो उसकी मूल वजह यही रहती है कि असल वोटर ने किसको वोट दिया इसका पता चुनाव पूर्व नहीं चल पाया। प्रत्येक चुनाव में 50 प्रतिशत मौजूदा सांसदों और विधायकों को पराजय के ट्रेंड से भी इसका पता चल जाता है कि वोटर अपने उम्मीदवार को खूब समझता है। पाकिस्तान, नेपाल, भूटान को जोड़कर दुनिया के 123 लोकतांत्रिक देशों में भारत सबसे बड़ा लोकतंत्र है। सब उसे ‘रोल मॉडल’ की तरह से देख रहे हैं। हमारे देश में 71 करोड़ 40 लाख वोटर हैं। इतनी बड़ी संख्या में वोटरों को निष्पक्ष वोट डालने की व्यवस्था करनी किसी चुनौती से कम नहीं है। सारी दुनिया देख रही है कि भारत में गठबंधन लोकतंत्र भी शुरू हो गया है। चीन अब तक लोकतांत्रिक देश नहीं बन सका है। सारी दुनिया लोकतंत्र की मुरीद है और चीन पर भी इसे अपनाने का दबाव साफ दिखाई पड़ रहा है। लोकतंत्र में वोट का महत्व है इसीलिए तो एक वोटर होने पर भी जूनागढ़ में मतदान केन्द्र बनाया गया। दो वोटर पर छत्तीसगढ़ में मतदान केन्द्र बना। अरुणाचल प्रदेश में एक जगह सिर्फ तीन वोटर हैं लेकिन वहां भी मतदान केन्द्र दिया गया। इसके मायने यही हैं कि प्रत्येक वोटर और उसके वोट की बड़ी अहमियत है। एक मतदान केन्द्र पर पांच कर्मचारी रखने पड़ते हैं, फिर चाहे वहां एक वोटर हो या फिर पांच सौ वोटर। रूस, अमेरिका, यूरोप, कनाडा, श्रीलंका, थाईलैंड के वोटरों जोड़ने के बाद भारत के वोटर बनते हैं। कई देशों में इतने वोटर नहीं हैं जितने पिछली बार हमारे यहां पहली बार वोट डाले। संख्या में बात करें तो ये वोटर चार करोड़ 20 लाख होते हैं। 18 से 45 वर्ष के वोटर निर्णायक हैं। वैसे भी उत्पादकता के लिहाज से उनका योगदान ज्यादा रहता है। यही उम्र ऐसी होती है जब लोकतंत्र निर्माण के सपने उसके जेहन में रहते हैं। 18 से 35 वर्ष के वोटरों की बात करें तो वे संख्या 24 प्रतिशत के करीब है। मैंने आजादी से ठीक पहले सेंट्रल लेजिसलेटि असेम्बली के लिए हुए वर्ष 1946 के चुनाव में भी बतौर कार्यकर्ता काम किया है और बाद में चुनाव आयुक्त के तौर पर भी। इसीलिए कह सकता हूं कि चुनाव आयोग ने सुधार के लिए काफी काम किए हैं। फर्जी वोटिंग के बड़े आरोप लगते थे। 82 प्रतिशत मतदाताओं के पहचान पत्र बन चुके हैं। इसलिए फर्जी वोटिंग पर काफी हद तक अंकुश लग गया है। मैं यह नहीं कहता कि पूरा चुनाव सुधार हो गया है। अब भी अपराधीकरण, भ्रष्टाचार, धर्मवाद और जातिवाद जैसी बीमारियां हमारे चुनावों पर हावी हैं। बावजूद इसके यह भी तो देखना चाहिए कि लोकसभा की 543 सीटों के लिए आठ लाख से ज्यादा मतदाता केन्द्रों, 11 इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन, 40 लाख कर्मचारियों और 21 लाख पुलिसकर्मियों का प्रबंधन देखना कोई मामूली बात है। वह भी तब जब भारत राज्यों की माला है, क्षेत्रों की माला है, विभिन्न धर्मो, जातियों, भाषाओं और संस्कृतियों की माला है। अब तक हुए 15 चुनावों ने साबित किया है। लोकतंत्र से भारत का विकास हो सकता है। काफी विकास हुआ भी है। बस जरूरत इस बात की है कि वोट जरूर दीजिये। फर्क इससे नहीं पड़ता कि आप जिसको वोट देते हैं, वह जीतता है अथवा नहीं।
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