हाईकोर्ट में बाल संरक्षण आयोग ने बाल मजदूरों को छुड़ाने व उनके पुनर्वास में कोताही बरतने का दिल्ली सरकार पर लगाया आरोप
राजधानी में बाल मजदूरों को मुक्त कराने और उनका पुनर्वास करने के मामले में राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग (एनपीसीसीआर) ने हाईकोर्ट में अपना जवाब देते हुए मांग की है कि इस मामले में सरकार को ठोस कदम उठाने के निर्देश दिए जाएं। एनपीसीसीआर ने इस मामले में दायर जनहित याचिका में अपना जवाब देते हुए कहा कि श्रम विभाग व अन्य संबंधित विभाग अपने कार्य को ठीक से नहीं निभा रहे हैं और उनके पुनर्वास के लिए भी ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं। पीठ को बताया गया कि सरकार के पास इस तरह की जानकारी का अभाव है कि मुक्त कराए गए बाल मजदूरों का क्या हुआ। कहा गया कि सरकार के पास इस बाबत फीड बैक भी नहीं है। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली खंडपीठ के समक्ष एनपीसीसीआर द्वारा दाखिल अपने हलफनामे में कहा गया कि सरकार इस बाबत कोताही बरत रही है और बाल मजदूरों के पुनर्वास के लिए भी कुछ खास नहीं किया गया है। पीठ को बताया गया कि उसने इस मामले में बाल मजदूरी करते छुड़ाए गए 22 लोगों की बाबत स्टडी की। इसमें पाया गया कि उनके पुनर्वास की बात कही गयी लेकिन तीन बाल मजदूरों का कोई अता- पता नहीं है और चार के नाम-पते गलत हैं। हलफनामे में कहा गया कि इससे साफ है कि छुड़ाए गए बाल मजदूर अपने परिजनों के पास पंहुचे भी या नहीं, इस बाबत कोई ठोस जानकारी विभाग के पास नहीं है। यह भी आरोप लगाया गया कि इस मामले में बनाए गयी टास्क फोर्स और इस काम में लगे एनजीओ भी ठीक प्रकार से कार्य नहीं कर रहे हैं। जानकारी हो कि इस मामले में हाईकोर्ट ने निर्देश दिया था कि बाल मजदूरी कराने वाले आरोपित के खिलाफ ठोस कार्रवाई की जाए और उन पर दंड के रूप में बीस हजार रुपए जुर्माना भी लगाया जाए। इस मामले में पुलिस व श्रम विभाग को मिल कर ठोस कदम उठाने की भी बात कही गयी थी। पीठ ने इस मामले में अब पक्षकारों से अपना जवाब मांगा है।
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