Sunday, January 30, 2011

भारतीय निर्वाचन आयोग एक समग्र परिचय


भारतीय लोकतंत्र को दुनिया के अन्य देशों में बेहद विस्मय, विलक्षण और कई बार ईष्र्या की दृष्टि से देखा जाता है। इसका कारण यह है कि अपनी तमाम विविधता, भाषाई-सामाजिक अनेकता और पड़ोसी राष्ट्रों में अधिनायकवाद, तानाशाही के हावी रहने के बावजूद हमने लोकतंत्र को केवल अंगीकार किया है बल्कि बखूबी उसका निर्वहन भी किया है। कहते हैं भारत पवरे का देश है। हमारा प्रजातंत्र भी ऋतुओं पर आधारित पवरे से तदाकार हो गया है। जिस तरह अपने यहां पर्व साल भर मनाए जाते हैं उसी तरह हमारे यहां पूरे वर्ष कोई कोई चुनाव हो रहा होता है या कोई तैयारी चल रही होती है या वह आने वाला होता है। चाहे आम चुनाव हो, मध्यावधि या फिर उपचुनाव। एक निश्चित मियाद के लिए जनता द्वारा राजनीतिक दलों को देश-राज्य चलाने का हक देने की इस रायशुमारी को निष्पक्ष और निर्विघ्न रूप से संपन्न कराने की महती जिम्मेदारी है भारत निर्वाचन आयोग पर।
स्थापना
भारत के संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत 25 जनवरी 1950 को भारत निर्वाचन आयोग का गठन किया गया। यह एक स्थाई स्वायत्त संवैधानिक निकाय है।
कार्य और अधिकार
भारत के संविधान ने संसद, प्रत्येक राज्य विधानमंडल तथा भारत के राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पदों के लिए निर्वाचनों के संचालन की समस्त प्रक्रिया का अधीक्षण, निदेशन और नियंतण्रभारत निर्वाचन आयोग में निहित किया है। यह कार्यपालिका के हस्तक्षेप से पूर्णतया रहित निकाय है। इसे निर्वाचन संबंधित विवादों तथा निर्वाचन प्रक्रिया के नियंतण्रके संदर्भ में अर्ध-न्यायिक अधिकार प्राप्त हैं। निर्वाचन आयोग पर चुनाव प्रक्रिया की योजना बनाने तथा उसे अमल में लाने का जिम्मा होता है। आचार संहिता लागू होने से लेकर नतीजे आने तक आयोग को यह अधिकार होता है कि वह केंद्र और राज्य की मशीनरी सुरक्षाबलों का विवेकानुसार इस्तेमाल करे। इसके अतिरिक्त आयोग पर चुनाव क्षेत्रों के सीमांकन, मतदाता सूची तैयार कराने, राजनीतिक दलों और उनके चुनाव चिह्नों को मान्यता देने, नामांकन पत्रों की जांच करने और उम्मीदवारों के खर्चो पर नजर रखने का जिम्मा भी होता है। मतदान केंद्रों तथा मतगणना केद्रों की स्थापना तथा उनके बाहरी और आंतरिक प्रबंधों का जिम्मा भी आयोग पर होता है। आयोग दलों में आंतरिक लोकतंत्र कायम रखने के लिए उनकी संगठनात्मक चुनाव प्रक्रिया पर भी नजर रखता है। आयोग प्राप्त मतप्रतिशत के आधार पर राजनीतिक दलों के राष्ट्रीय या क्षेत्रीय होने का अधिकार भी रखता है।
संरचना
निर्वाचन आयोग के संचालन का जिम्मा राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त मुख्य चुनाव आयुक्त/आयुक्तों पर होता है। स्थापना के बाद से वर्ष 1989 तक इसमें केवल एक निर्वाचन आयुक्त का ही प्रावधान था। तत्पश्चात अक्टूबर 1989 से 1 जनवरी 1990 के दरम्यान दो और निर्वाचन आयुक्तों को नियुक्त किया गया। बाद में भारतीय संसद ने 1993 में कानून पारित कर इसे स्थाई तौर पर तीन सदस्यीय निकाय में तब्दील कर दिया। इसके अन्तर्गत आयोग में एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त और दो आयुक्तों की नियुक्ति का प्रावधान किया गया है। फैसले लेने की प्रक्रिया में सभी तीनों आयुक्तों को समान अधिकार प्राप्त हैं। साथ ही किसी विषय-बिंदु पर अनिर्णय की स्थिति में इन तीनों के मध्य बहुमत के आधार पर निर्णय की व्यवस्था भी की गई है। हालांकि प्रारंभ में इसे चर्चित निर्वाचन आयुक्त टीएन शेषन के पर कतरने के प्रयास के तौर पर देखा गया लेकिन सकारात्मक तौर पर इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया के संचालन के लिए जिम्मेदार निकाय के आंतरिक लोकतंत्रीकरण के तौर पर भी देखा जा सकता है।
मुख्य निर्वाचन आयुक्त/आयुक्त गण
मुख्य निर्वाचन आयुक्त और दो आयुक्त राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किए जाते हैं। इनके वेतन और भत्ते सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों के समान ही होते हैं। इनका कार्यकाल अधिकतम 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक होता है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त को जहां केवल महाभियोग द्वारा ही पदच्युत किया जा सकता है वहीं शेष निवार्चन आयुक्तों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता है।
बजट
आयोग के बजट को वित्त मंत्रालय के साथ परामर्श के बाद अंतिम रूप दिया जाता है। वित्त मंत्रालय आमतौर पर आयोग की सिफारिशों के अनुरूप उसके बजट को स्वीकार कर लेता है। चुनाव के संचालन पर हुआ व्यय केंद्र-राज्यों के बजट में दर्शाया जाता है। यदि चुनाव संसद के हों तो उनका व्यय केंद्र सरकार द्वारा वहन किया जाता है यदि निर्वाचन विधानमंडल का हो तो इसका खर्च संबंधित राज्य द्वारा वहन किया जाता है।

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