महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के जैतापुर इलाके में सत्तर स्कूलों के लगभग ढाई हजार छात्रों ने गणतंत्र दिवस के अवसर वहां बन रहे परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के विरोध का निर्णय लिया है। विद्यार्थियों ने स्कूल न जाने का निर्णय तब लिया जब जिला प्रशासन ने शिक्षकों को विद्यार्थियों के समक्ष परमाणु ऊर्जा का गुणगान करने के निर्देश दिए थे। पूरे देश में बड़ा संघर्ष हर तरफ चल रहा है। ऐसा संघषर्, जिसमें लोग अपना लोकतंत्र बचाने के लिए लड़ रहे हैं और सरकार अपने लोकतंत्र की दुहाई दे रही है। जनता और सरकार के लोकतंत्र में एक बुनियादी फर्क है। जनता के लिए लोकतंत्र का मतलब मूल्यों पर आधारित वह सामाजिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक व्यवस्था है, जिसमें बिना भेदभाव के आम लोगों की भलाई निहित होती है। लेकिन, इसके उलट सरकार के लिए लोकतंत्र का मतलब बस अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए चुनावी राजनीति के गुणा-गणित तक सीमित होकर रह गया है। उसके लिए मुख्य मुद्दा है विकास और विकास की अंधी दौड़ ने समाज के तमाम घटकों और खासतौर से शासन- व्यवस्था से लोकतांत्रिक मूल्यों को जबर्दस्त तरीके से गायब किया है। यकीनन यह गंभीर चिंता का विषय बन गया है। इस दौड़ में अब तक किनका विकास हुआ है और किनका विनाश, यह बात किसी से छुपी नहीं है। तथाकथित विकास की राह पर जनिहत के परखच्चे उड़ाती सरकारों को लोकतंत्र की कोई परवाह नहीं है। आज लोग अलग-अलग तरीकों से अपने लोकतंत्र को बचाए रखने के लिए लड़ रहे हैं। जैतापुर के लोगों के गुस्से का कारण है कि सरकार यहां सबसे अधिक परमाणु ऊर्जा का उत्पादन करने वाले संयंत्र लगवाने जा रही है। यहां जहां-जहां ये संयंत्र लगाए गए हैं, लगाए जा रहे हैं या लगाने की योजना है, वहां लोगों में भविष्य को लेकर असुरक्षा का माहौल बना हुआ है। इन इलाकों में परमाणु ऊर्जा संयंत्र लगाने से रोकने का मामला स्थानीय लोगों के लिए जीवन रक्षा के साथ अपने लोकतंत्र की रक्षा का भी है। कौन भूला होगा कि 2007 में देश की बड़ी आबादी भारत-अमेरिका परमाणु समझौते के खिलाफ थी। वामदलों ने सरकार से समर्थन वापस लिया और संसद में लगभग 48 फीसद से अधिक सांसदों की मुखालफत के बाद भी सरकार ने परमाणु-ऊर्जा के लिए अमेरिका से समझौते किए। पर लोग महसूस करते हैं कि संसद में बैठे मुट्ठी भर लोग उनकी जिंदगी के फैसले नहीं ले सकते है। उन्हें पता है कि लोकतंत्र का अस्तित्व केवल संसदीय शासन-व्यवस्था से नहीं, बल्कि अधिकाधिक लोगों के हित में ही जिंदा रह सकता है। लोग इसलिए लड़ रहे हैं क्योंकि उन्होंने देखा है कि कैसे कालापक्कम, तारापुर, बुलंदशहर और कोटा स्थित परमाणु बिजली संयंत्रों में दुर्घटनाएं हुई। जिससे मोटे तौर पर आज तक लगभग 910 मिलियन अमेरिकी डॉलर के नुकसान का बोझ देश के सार्वजनिक खजाने को झेलना पड़ा। इसके अलावा अभी जन-जीवन, पर्यावरण और जन-स्वास्थ्य पर पड़ रहे दूरगामी कुप्रभावों की गणना बाकी है। इससे सबक लेने के बजाए सरकार देश में परमाणु ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने के लिए जी-जान से जुटी है। तमिलनाडु के कुडानकुलम और कालापक्कम, गुजरात के काकरापाड़ व राजस्थान के रनाटभाटा और बांसवारा में कई संयंत्र निर्माणाधीन हैं। कुडानकुलम, कर्नाटक के कैगा और महाराष्ट्र के जैतापुर में 21 और संयंत्रों की योजना स्वीकृत है। कई अन्य योजनाएं प्रस्तावित हैं। अध्ययनों से पता चला है कि इसके लिए गलत तरीके से बंजर बता कर जैतापुर क्षेत्र की लगभग हजार एकड़ उपजाऊ जमीन का अधिग्रहण किया जा रहा है। दूसरा, जैतापुर भूकंप संभावित क्षेत्र है। यानी भूकंप आने पर रेडियोधर्मी रिसाव से जान-माल का नुकसान लंबे समय तक होता रहेगा। दुर्घटना के कारण नाभिकीय अभिक्रियाएं अनियंत्रित हुई तो अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने की तर्ज पर ये संयंत्र परमाणु बम सरीखे साबित हो सकते हैं। डर और बढ़ जाता है, जब पता चलता है कि जिस फ्रांसीसी कंपनी के गठजोड़ से ये संयंत्र स्थापित किए जा रहे हैं, सुरक्षा को लेकर उसका रिकॉर्ड बुरा रहा है। तीसरा, यह पर्यावरण और इससे जुड़े जीव और वनस्पति को भी बुरी तरह प्रभावित करेगा। समुद्र से बड़ी मात्रा में पानी लेना और उपयोग के बाद खौलते पानी को वापस समुद्र में छोड़ने से कोंकण से सटा समुद्री इलाका समुद्री-जीवों के श्मशान में बदल जाएगा। इससे कोंकण का प्राकृतिक स्वरूप नष्ट-भ्रष्ट हो जाएगा। मतलब भविष्य में वहां किसान और समुद्र पर आश्रित लोगों, खासकर मछुआरों का भूखों मरना साफ दिख रहा है। चौथा, सरकार ने संयंत्रों से निकले रेडियोधर्मी कचरे से निबटने का कोई ऐसा सूत्र जनता को नहीं बताया है जिससे लोग सहज महसूस कर सकें। जैतापुर में परमाणु संयंत्रों को असुरक्षित बताने पर टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस को दी जाने वाली सहायता राशि पर एनपीसीआईएल ने रोक लगा दी है। सरकार विरोध के स्वरों को हरसंभव दबाने की कोशिश कर रही है। जो सरकार की राय से सहमत नहीं हैं, उन्हें डरायाध मकाया जा रहा है, उन पर फर्जी मुकदमे थोपे जा रहे हैं। परमाणु ऊर्जा हासिल करने के लिए जनता के लोकतंत्र पर सरकार के हमले के कारणों को समझना जरूरी है। कौन नहीं जानता कि पेट्रोल और कोयला दुनिया से जल्द खत्म हो जाएंगे? पर गौरतलब है कि बिजली और पेट्रोल की खोज से पहले भी मानव-समाज और संस्कृति तो फल-फूल ही रही थी और आज भी दुनिया की एक बड़ी आबादी इन सुविधाओं से महरूम है। भविष्य में भी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए ऊर्जा के नवीकरणीय स्रेतों जैसे पवन ऊर्जा या सौर ऊर्जा से काम लिया जा सकता है। लेकिन, छोटे-बड़े कल-कारखानों को चलाने के लिए ऊर्जा की मांग बिना पेट्रोल और कोयले के पूरी नहीं हो पाएगी और ऊर्जा के बड़े स्रेत के अभाव में मौजूदा व्यवस्था पूरी तरह ढह जायेगी। ऐसे में पूंजीपतियों का दुनिया भर में फैला गोरखधंधा और वि राजनीति में गहरी पैठ को हवा होने से कोई नहीं रोक पाएगा। तो ऊर्जा को लेकर पूंजीवाद की चिंता उनके पूरे वजूद से जुड़ी है। अगर वे ऊर्जा के वैकल्पिक स्रेतों की कामयाब संरचना नहीं खड़ी कर पाए तो उनकी सत्ता बिला जाना तय है। उन्हें परमाणु ऊर्जा एक बेहतर विकल्प दीख रहा है। परमाणु ऊर्जा परियोजना शुरू करने की सरकारी छटपटाहट ऊर्जा के वैकल्पिक स्रेत की संरचना को जैसेतै से जल्दबाजी में खड़ा करने की जद्दोजेहद है और इसके बरक्स बेबस और मेहनतकश आवाम अपना लोकतंत्र बचाने के लिए दिन-रात एक किए हुए है।
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