Saturday, January 1, 2011

साल की सुर्खियों के सरताज

वे जब बोलते हैं तो पूरी दुनिया सुनती है। अमेरिका के राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा ने जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के लिए यह विचार व्यक्त किए तभी तय हो गया कि देश की उठापटक की राजनीति में भले मनमोहन सिंह साल की शीर्ष सुर्खी में न हों, मगर अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में निस्संदेह इस साल उनका कद दुनिया के दूसरे समकालीन शासनाध्यक्षों से ज्यादा बड़ा महसूस किया गया है। चाहे जी-20 देशों की बैठक हो या विभिन्न शासनाध्यक्षों/राष्ट्राध्यक्षों के साथ हमारे प्रधानमंत्री की द्विपक्षीय वार्ता या मुलाकात हो, हर जगह मनमोहन सिंह को खूब तवज्जो मिली है। राष्ट्रीय राजनीति में भी हालांकि उन्हें डायलॉग के चौके छक्के लगाने की आदत नहीं है, लेकिन बीच-बीच में वह विपक्ष को अपने करारे जवाबों से यह भी जता देते हैं कि अब वह भी मंझे हुए नेता हैं। 2010 में हालांकि उनके आभा मंडल को कई बार ठेस पहुंची। राजा जैसों को लगातार साथ बनाए रखने की उनकी अदृश्य मजबूरी ने उनके कद को कमजोर किया, लेकिन मौका पड़ने पर अपने निर्णायक फैसलों से वह फिर अपना उज्जवल आभा मंडल हासिल करते रहे। कई बार सुर्खियां बटोरने के लिए जरूरी नहीं कि आप शीर्ष में हों, जैसा कि कांग्रेस के पूर्व खेल व पंचायती राज्य मंत्री मणिशंकर अय्यर ने साबित किया। इस साल वह ज्यादातर समय इसलिए सुर्खियों में रहे कि वह लगातार कुभाष बोलते रहे। वह मुसल्सल कहते रहे कि नई दिल्ली कॉमनवेल्थ गेम्स असफल होंगे और पूरी दुनिया में भारत की किरकिरी होगी। यही नहीं, उन्होंने कई महीने पहले ही अपना शेड्यूल तय कर लिया था कि जब देश में राष्ट्रकुल खेल हो रहे होंगे, वह विदेश यात्रा पर होंगे ताकि उन्हें देश की बदनामी को अपनी आंखों से देखते हुए शर्मिदा न होना पड़े। मणिशंकर को जरूर धक्का लगा होगा, जब खेल शानदार ढंग से निपट गए। यह अलग बात है कि भ्रष्टाचार के दलदल में देश को फंसा गए। इस साल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की कैबिनेट के कई मंत्री लगातार सुर्खियों में रहे। जैसे, अब पूर्व हो चुके शशि थरूररेलमंत्री ममता बनर्जी, खेल मंत्री एमएस गिल। शशि थरूर पहले अपनी ट्विटिंग के चलते सुर्खियों में रहे। उन्होंने हवाई जहाज के सामान्य वर्ग को गाय-भैंस वाला वर्ग कहकर उसमें सफर करने के लिए खुद को कोसा। फिर अपने बड़बोलेपन के चलते प्रधानमंत्री को सऊदी अरब में तब असहज स्थिति में ला दिया, जब उन्होंने कहा कि भारत और पाकिस्तान के बीच भरोसेमंद मध्यस्थ है। यही नहीं, उनकी किताबों ने भी 10 जनपथ से लेकर कांग्रेस तक को बैकफुट पर ला दिया, क्योंकि उन्होंने अपनी एक किताब में कहा था कि अगर राजीव गांधी की असामयिक मौत न हुई होती तो कांग्रेस की पतन कथा वही लिखते, लेकिन वह असहनीय तब बने, जब अपनी तब तक की प्रेमिका और अब पत्नी सुनंदा पुष्कर के लिए आईपीएल में कोच्चि टीम हेतु लॉबिंग करते हुए उजागर हुए। जिसके चलते अंतत: उन्हें बाहर का दरवाजा दिखाया गया। मगर सुर्खियां वह अब भी यदाकदा बटोर ही लेते हैं। ममता बनर्जी ने भले लालगढ़ में अपना परचम फहराकर कम्युनिस्टों को चुनौती दी हो, लेकिन मनमोहन सरकार के लिए वह साल में बार-बार मुसीबत का सबब बनती रहीं। पहले उन्होंने कहा कि जरूरी नहीं कि वह दिल्ली में बैठकर ही कामकाज करें। फिर उन्होंने एक अ‌र्द्ध राजनीतिक मंच से अपनी ही सरकार के उस दावे पर प्रश्नचिह्न लगा दिया, जिसमें गृह मंत्रालय ने कहा था कि माओवादी आजाद मुठभेड़ में मारा गया है। ममता बनर्जी ने सार्वजनिक मंच से कहा कि आजाद की हत्या की गई है और इसकी न्यायिक जांच होनी चाहिए। इससे वह सुर्खियों में आई और सरकार पिछले कदमों में। राजनीति के गलियारे में हमेशा की तरह राहुल गांधी अगर अपनी उपस्थिति किसी न किसी रूप में दर्ज कराते रहे तो यह कोई बड़ी उपलब्धि नहीं थी। बड़ी उपलब्धि राजनीतिक सुर्खियों के मद्देनजर इस साल बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के खाते में गई, जब उन्होंने लालू और रामविलास पासवान के गठबंधन तथा कांग्रेस के उस उत्साह में पानी फेरकर उसको भोथरा बना दिया, जिसकी बदौलत बिहार में सामाजिक न्याय और 21वीं सदी के युवा जोश का डंका बजना था। नीतीश कुमार ने ऐतिहासिक जीत हासिल करते हुए देश को बिहार का एक नया चेहरा दिखाया, विकास की उम्मीदों की राह देखता चेहरा। लेकिन सियासत में सुर्खियां सिर्फ जीतों से ही नहीं मिलती। सुर्खियां बटोरने के कई तरीके हो सकते हैं। जैसे, भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष नितिन गडकरी ने इस साल बार-बार अपनी फिसलती जुबान के जरिए सुर्खियां बटोरीं। कभी उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बारे में कुछ कहा तो कभी पूरी कांग्रेस को ही यह कहकर धिक्कारने की कोशिश की कि क्या कसाब कांग्रेस का दामाद है? लालू यादव ने बिहार विधानसभा चुनावों के दौरान पानी पी-पीकर मीडिया को गरियाते हुए सुर्खियां बटोरी तो शीला दीक्षित को इसलिए मीडिया की सुर्खियां बार-बार नसीब हुई कि वह जितनी डेडलाइन घोषित करतीं, वह सब गलत साबित होती। कॉमनवेल्थ खेल आयोजन ने अंतिम दिन तक देश और दुनिया की सांसें अटका रखी थीं कि वाकई सब कुछ सही होगा या हमें शर्मसार होना पड़ेगा। खैर, पहले जहां उन्हें इसलिए सुर्खियां मिली कि उनका हर दावा झूठा निकल रहा था, वहीं बाद में उन्होंने शानदार खेल आयोजन कराकर वाह-वाही भी लूटी। खेलमंत्री एमएस गिल को कैबिनेट मीटिंग में प्रधानमंत्री की फटकार सुननी पड़ी, जो कि सुर्खियों में आने के बाद उन्होंने इससे इनकार किया। मगर जो अंदर से खबरें आई थीं, वह यही थीं कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उनके बोलने के लिए खड़ा होने पर यह कहकर उन्हें बैठने का इशारा किया कि अब बहुत हो चुका, अब आप चुप रहिए। यह साल घपले घोटालों के नाम रहा और शायद साल की सबसे बड़ी नकारात्मक चर्चा का सरताज भी प्रधानमंत्री के कैबिनेट के एक पूर्व सदस्य संचार मंत्री ए राजा बने। जब वह बार-बार विपक्ष और मीडिया द्वारा अपने विरुद्ध घोटाले की किस्त दर किस्त उघाड़ने के बाद भी इस्तीफा न देने की जिद पर टिके रहे। अंतत: प्रधानमंत्री को कड़ा कदम उठाते देख करुणानिधि ने उन्हें हथियार डालने की सलाह दी, तब कहीं जाकर राजा ने सरेंडर किया। वैसे, यह साल अमर विचित्र कथा के लिए भी याद रखा जाएगा। अमर-मुलायम की दोस्ती को कभी सियासी गलियारों में कर्ण-दुर्योधन की दोस्ती जैसा माना जाता था। वह दोस्ती इस साल टूट गई और टूटते ही दोनों तरफ से एक-दूसरे के लिए व्यंग्य बाणों की जो धुआंधार बरसात हुई, उसकी शायद ही कोई दूसरी मिसाल हो। राजनीतिक गलियारों में उमर अब्दुल्ला, जगन मोहन रेड्डी, अशोक चव्हाण, शरद पवार और आरएसएस के पूर्व सरसंघ चालक के सुदर्शन भी रहे। उमर अब्दुल्ला ने लाचार मुख्यमंत्री के रूप में जम्मू-कश्मीर का प्रतिनिधित्व किया। इस साल के पहले कभी भी इतने लंबे समय तक हिंसक प्रदर्शन लगातार नहीं हुए थे। उमर अब्दुल्ला हर तरफ से लाचार दिखे तो उन्होंने अपने पिता की तरह ही आजादी और विलय की प्रक्रिया को लेकर वही पुराना राग छेड़ा, जो उसके पहले भी इस परिवार द्वारा छेड़ा जाता रहा है। राजनीति के गलियारे में जिन गैर राजनीतिक शख्सियत ने अपनी उपस्थिति को सुर्खियों के रूप में दर्ज कराया, उनमें मानवाधिकार कार्यकर्ता अरुंधति राय तथा स्वामी अग्निवेश भी रहे। अरुंधति राय कश्मीर और माओवादियों के लिए सहानुभूति व्यक्त करके तथा कश्मीर को आजादी देने की मांग करके देश के एक बड़े राष्ट्रवादी तबके के विरोध निशाने पर आई, वहीं स्वामी अग्निवेश ने केंद्र सरकार पर यह आरोप लगाकर कि सरकार माओवादियों से बातचीत करने को लेकर गंभीर नहीं है और विश्वासघात भी करती है, देश को हिलाकार रख दिया। गैर राजनीतिक व्यक्तियों में बाबा रामदेव ने भी राजनीतिक शैली की सुर्खियां इस साल खूब बटोरीं। वह पूरे साल देश में अपनी पार्टी के गठन को लेकर राजनीतिक अभियान में रहे और काले धन के विरुद्ध अलख लगाते रहे, जिसमें उन्हें देश के कई महत्वपूर्ण गैर राजनीतिक शख्सियतों का भी साथ मिलता रहा। जगन मोहन रेड्डी ने बहुत कोशिशें की, लेकिन अपने स्वर्गीय पिता वाईएसआर की जगह उन्हें आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री का पद नहीं मिला। यह अलग बात है कि उन्होंने 10 जनपथ से नाराजगी मोल ली और के रोसैय्या को मुख्यमंत्री से हटवाकर किरण कुमार रेड्डी के सिर पर यह ताज जाने का अप्रत्यक्ष कारण बन गए। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण बार-बार कहते रहे कि वह पाक-साफ हैं, लेकिन आदर्श सोसाइटी घोटाले में अंतत: उन्हें जाना ही पड़ा। गुजरात में पूर्व मंत्री अमित शाह को जेल की सलाखों के पीछे यह साल ले गया तो सुरेश कलमाड़ी के लिए भी जाते-जाते मुश्किलों का एक चक्रव्यूह छोड़कर जा रहा है। सुरेश कलमाड़ी कॉमनवेल्थ खेल आयोजनों को लेकर अंतिम घड़ी तक यह कहते रहे कि इसमें कोई समस्या नहीं है। एक भी पैसे का घोटाला नहीं हुआ। यह सब मीडिया का प्रपंच है, लेकिन परत दर परत वास्तविकता खुलकर सामने आ रही है कि किस तरह खेल घोटालों की एक कड़ी वह भी थे। राजनीतिक दुनिया से बाहर हटकर देखें तो इस साल कई शख्सियत ने खूब सुर्खियां बटोरी। सचिन तेंदुलकर, अमिताभ बच्चन, सायना नेहवालरजनीकांत तथा अर्जुन अटवाल जैसे खिलाडि़यों, अभिनेताओं ने इस साल भी नायकत्व के मामलों में आम लोगों के दिलों में राज किया। सचिन तेंदुलकर की स्वर्णिम सफलताओं का सिलसिला पूरे साल चलता रहा और वह क्रिकेट का कोहिनूर बन गए हैं। सचिन ने इस साल कई ऐतिहासिक उपलब्धियां हासिल की। एक दिवसीय क्रिकेट में इतिहास का पहला दोहरा शतक बनाया। पूरे साल में टेस्ट शतक लगाए और साल जाते-जाते शतकों का अ‌र्द्ध शतक उनके नाम हो गया। हालांकि क्रिकेट के जादूगर के नाम से मशहूर ललित मोदी भी इस साल सुर्खियों में रहे, लेकिन अच्छी बातों के लिए नहीं, बल्कि क्रिकेट में मौजूद काला बाजारी के भंडाफोड़ के लिए। मगर यह भंडाफोड़ उन्हें कोई फायदा देने की बजाय उल्टे खेल से ही बाहर कर दिया है। अब वह भागे-भागे फिर रहे हैं। भारत आ नहीं रहे, कहते हैं कि जान को खतरा है और यह भी कह रहे हैं कि उन्होंने कुछ भी गलत नहीं किया। खेलों की दुनिया में इस साल कई शख्सियत खूब चमकीं। सबसे अतुलनीय प्रदर्शन बैडमिंटन सितारा सायना नेहवाल का रहा, जिन्होंने इस साल चार बड़े खिताब जीते। सुर्खियां आसानी से नहीं मिलतीं, बशर्ते उनका संदर्भ सकारात्मक हो। इसलिए सुर्खियों का सरताज बनना आसान नहीं है। यह अलग बात है कि नकारात्मक सुर्खियां थोक के भाव मिलती हैं, लेकिन उन्हें कोई भी लेना नहीं चाहता। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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