Saturday, January 29, 2011

बाजार के दबाव में गणतंत्र


देश के पढ़े-लिखे युवाओं को भी अपना कोई भविष्य नजर नहीं आता, क्योंकि रोजगार के अवसर सिमट रहे हैं। आखिर कितने लोग विदेश की तरफ भागेंगे!

गणतंत्र की बात करते हुए मुझे एक अमेरिकी कहानी याद आती है। कहानी का नाम है-संसार का सबसे महान व्यक्ति इस कहानी का नायक एक लंबा-चौड़ा किसान है, जो जैसे-तैसे अपने ढंग से कल-पुरजे जोड़कर एक हवाई जहाज जैसी चीज बना लेता है। उसके इस रोमांचकारी साहस से पूरे देश में तहलका मच जाता है कि एक अनपढ़ किसान ने अपने प्रयासों से हवाई जहाज बनाया ही नहीं, बल्कि उड़ाया भी। सरकार घोषणा करती है कि राष्ट्रपति एक समारोह में उसे सम्मानित करेंगे। समारोह आयोजित होने से पहले राष्ट्रपति के सहायक हफ्तों उसे सिखाते हैं कि उसे किस तरह उठना-बैठना और राष्ट्रपति से हाथ मिलाना है। खचाखच भरे हॉल में सम्मान समारोह शुरू होता है। उस किसान को राष्ट्रपति के दो अंगरक्षक पकड़कर मंच पर लाते हैं। वह सिखाए गए तरीके से राष्ट्रपति से हाथ मिलाता है। उसे जब बोलने का आग्रह किया जाता है, तो वह दो-चार सीखे हुए वाक्य बोलने के बाद उत्तेजना में अपनी गंवारू भाषा में उलजुलूल बकवास शुरू कर देता है। हॉल में उपस्थित सभी लोगों के चेहरे फक्क पड़ जाते हैं। अचानक बीच में ही राष्ट्रपति के अंगरक्षक उसे घसीटते हुए नेपथ्य में ले जाते हैं और लात-घूंसों से पीटने लगते हैं। अब दृश्य यह है कि सामने मंच पर राष्ट्रपति उसकी महानता के गुण गा रहे हैं और पीछे नेपथ्य में उसकी जमकर ठुकाई हो रही है।
आज का भारतीय गणतंत्र लगभग वही दृश्य हमारे सामने रख रहा है, जहां साधारण लोग आसमान छूती महंगाई, घूस, घोटालों, भ्रष्टाचार और अपराधों द्वारा रोज लतियाई जाती है और बाहर लड़ाकूविमानों और सैन्य करतबों के जरिये दुनिया भर को सम्मोहित करने का काम जारी है। गणतंत्र दिवस के मौके पर दिखाई जाने वाली सांस्कृतिक झांकियों में कहीं से भी नहीं झलकता कि किस तरह दो लाख किसानों ने आत्महत्याएं कीं या बाढ़-सूखे के अलावा फायरिंग में कितने लोग मारे गए। जो लोग व्यवस्था (तंत्र) के इन अत्याचारों का विरोध करते हैं, उन्हें नक्सली या माओवादी कहकर झूठी मुठभेड़ों में मार गिराया जाता है। आलम यह है कि बिनायक सेन जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं को उम्रकैद की सजा सुनाई जाती है, तो अरुंधति राय को जेल भेजने की धमकी दी जाती है।
आज हमारा सारा गणतंत्र बड़े कॉरपोरेट या बाजार के वर्चस्व के नीचे कराह रहा है और देश के शासक दोनों हाथ खड़े किए रिरिया रहे हैं कि हम महंगाई पर अंकुश लगा सकते हैं और ही प्रशासनिक घपलों को रोक सकते हैं। करीब पौने दो लाख करोड़ का घोटाला किसी भी बड़े प्रदेश का सामान्य बजट हो सकता है। पूरे देश के बजट से ज्यादा पैसा विदेशी बैंकों में फंसा पड़ा है और सरकार कुछ भी कर सकने में असमर्थ है। देश की राजधानी अपराध की राजधानी में तबदील हो गई है और यहां रोज महिलाओं के साथ बलात्कार और हत्याएं आम हो गई हैं। अपराधी निडर होकर जिसे चाहें, गोलियों से भून देते हैं।
देश के पढ़े-लिखे युवाओं को भी अपना कोई भविष्य नजर नहीं आता, क्योंकि रोजगार के अवसर सिमट रहे हैं। आखिर कितने लोग विदेश की तरफ भागेंगे! उन्हें दिशा देनेवाला कोई दर्शन बचा है और सिद्धांत। लोकतंत्र के सारे स्तंभ घूस, घोटालों और मनमानियों से भरे पड़े हैं। जन सरोकारों के लिए जाना जानेवाला मीडिया भी आज कॉरपोरेट कल्चर से प्रभावित है और स्वयं ही विश्वसनीयता के संकट से गुजर रहा है। ऐसे विकट दौर में किसी बड़े अपराधी को सजा होना असंभव लगता है, चाहे वह आरुषि-हेमराज हत्याकांड हो या चर्चित निठारी कांड या राठौर जैसे दैत्यों के कारनामे हों। देश में खिलाड़ी खुलेआम खरीदे और बेचे जा रहे हैं। अपराधों के माध्यम से वंचित और गरीब रातों-रात धनी होकर बड़ों में शामिल होना चाहते हैं।
आज किसी भी राजनीतिक दल के पास कोई सिद्धांत बचा है और ही कोई दर्शन। युवा वर्ग छोटी-छोटी बातों को लेकर धरने-प्रदर्शन करता है। कभी किसी किताब को लेकर, तो कभी किसी फिल्म या कलाकृति को लेकर देश की संपत्ति फूंकी जाती है। कभी न्यू ईयर्स और वेलेंटाइन डे के खिलाफ गुंडा सेनाएं तैयार की जाती हैं। ऐसे अराजक माहौल में जन-गण-मन गाना फूहड़ मजाक लगता है। ऐसी अराजक स्थितियों में चीजों को सुधारने के विकल्प के रूप में फासीवाद सामने आता है, जो किसी भी लोकतंत्र के लिए भारी खतरा है। अगर समय रहते इन सब बीमारियों का सही ढंग से इलाज नहीं किया गया, तो आश्चर्य नहीं कि हम आने वाले 10-20 वर्षों में ही फासीवादी तंत्र काआनंदउठाने को मजबूर होंगे। इन सब बीमारियों का इलाज दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति और नैतिक साहस से ही किया जा सकता है।



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