एक केंद्रीय कांग्रेसी नेता पिछले हफ्ते टीवी चैनल की बहस में खासे गुस्से में यह कहते दिखे कि महंगाई कृषि उत्पादों को ही नहीं औद्योगिक उत्पादों को भी महंगा कर रही है। शायद वे औद्योगिक उत्पाद खरीदने भी बाहर नहीं निकलते। आटा, गेहूं, चावल, दाल, चीनी तो बड़े नेताओं को खरीदनी ही नहीं पड़ती। आप एक नया फ्रिज खरीदें तो उसके बदले पुराना फ्रिज देकर एक दो हजार की छूट मिल जाती है, कुछ दूसरे बिजली के सामान भी मुफ्त पा सकते हैं। वे नेता बाजार नहीं जाते वरना रेडीमेड कमीज एक के दाम में दो बिकती देख सकते थे। नेता ने अपनी जेब की तरफ इशारा करते हुए कहा कि कलम महंगी हो गई है। नेतागण अब किस दुनिया में रहने लगे हैं कि सच के प्रति पूरी तरह अंधे हो गये हैं। कागज, कलम, कापी और किताबें भी दाल और प्याज की तरह ही महंगे हो चुके हैं क्योंकि उनका भी सीधा संबंध अवाम के बच्चों से है। अवाम को जीवित रखने वाले कृषि उत्पाद महंगे हुए हैं और उतने ही महंगे हो गए हैं पढ़ने-लिखने के साधन। साड़ी अब आधे और चौथाई मूल्य पर मिल जाएगी लेकिन कॉपी पहले से आठ गुना महंगी मिलेगी। मामूली कलम की कीमत पहले से तीन गुनी। नेता कह रहे हैं, अंतरराष्ट्रीय बाजार में दाम बढ़ता है इसलिए पेट्रोल का दाम बढ़ना जरूरी है। दूध के दामों का क्या अंतरराष्ट्रीय संबंध है कि वह दो रुपए लीटर बढ़ गया। दवाएं जो जीवन बचाने के लिए होती हैं उनके दाम बेतहाशा बढ़ गये लेकिन घरेलू बिजली के उपकरण सस्ते हो गये हैं। ये कौन सी सरकारी समझ है जो बड़े इत्मीनान से घोषित कर रही है कि महंगाई सारी दुनिया में है, यूरोप और अमेरिका में भी है। जरूर है लेकिन वहां आधी आबादी या सरकारी आंकड़ों के हिसाब से छत्तीस करोड़ लोग गरीबी की रेखा के नीचे नहीं रहते। सरकार हर साल अधूरे आंकड़े पेश करती है कि इतने लोग ठंड या लू से मर गये। दरअसल वे भूख से मरते हैं। अभी हमारे कुछ मित्रों के बीच एक दिलचस्प र्चचा हो रही थी। वे कह रहे थे कि अब करोड़ या दस- बीस करोड़ का भ्रष्टाचार निरापद हो गया है। उसमें ज्यादा खतरे नहीं रह गये हैं। बस इस घोटाले की रकम में से एक हिस्सा पकड़े जाने पर बंट जाता है और फिर कुछ नहीं होता। एक और तथ्य भी दिलचस्प है। निजी उद्यमों में काम कर रहे अधिकारी बहुत कम ही भ्रष्टाचार करते हैं। इसकी तुलना में सरकार में बैठे लोग भ्रष्टाचार की सीमाएं लांघ जाते हैं, खास तौर से सत्ता से जुड़े नेता जिस कदर भ्रष्ट हुए हैं, यह देखकर हैरानी होती है। नेताओं का यह भ्रष्टाचार उनके चुनाव अभियान से ही शुरू हो जाता है। पंचायत प्रमुख पद जैसे चुनाव में खर्च करोड़ों में होता है, विधान सभा और संसद के चुनाव में यही खर्च अरब तक पहुंचता है। जाहिर है जो अपने चुनाव के लिए करोड़ों और अरबों का खर्च करता है वह जानता है कि उसे जैसे भी हो इससे दस-बीस गुना पैसा घसीटना ही होगा। सांसद होने के बाद वह संसद में सवाल पूछने तक के लिए लंबी चौड़ी घूस लेता है। इस मुद्दे पर कभी खासा हंगामा हुआ था लेकिन आम आदमी आज भी नहीं जानता कि ऐसे सांसदों का हुआ क्या? पिछले कुछ ही महीनों में देश में आतंकवादी विस्फोटों से कहीं ज्यादा बड़े विस्फोट हुए-आर्थिक भ्रष्टाचार के। ये विस्फोट आश्र्चयजनक थे, जिनमें सुप्रीमकोर्ट के पूर्व प्रमुख से लेकर बड़े आईएएस अधिकारी और बड़ी संख्या में मंत्री शामिल हैं। हजारों करोड़ रुपये की रकम खर्च करके जो अंतरराष्ट्रीय खेलों का आयोजन हुआ वह तो भ्रष्टाचार का महाकाव्य था ही। मुंबई में एक बहुमंजिली इमारत का पंचतंत्र भी सामने आया और इन्हीं दिनों वह कथासरित सागर सामने आया जिसमें डी राजा से लेकर नेताओं और अधिकारियों की एक बड़ी जमात शामिल है। ऐसी महागाथा के नायक आने वाले दिनों में हंसते हुए घूमते दिखाई देंगे। सरकार के एक नेता ने मासूमियत से फरमाया कि सारी दुनिया के देशों में भ्रष्टाचार है। वाह ! सारी दुनिया में आतंकवाद है तो भारत क्यों चिंतित होता है? सारी दुनिया में हत्याएं होती हैं, डकैतियां होती हैं तो हत्या और डकैती पर कार्रवाई क्यों?
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