Sunday, January 16, 2011

लाल चौक में तिरंगे पर हंगामा क्यों

आखिर हमने अपने देश को कैसा बना डाला है कि यहां राष्ट्रीय प्रतीकों पर भी बेशर्म बहस चलती है। लोकतंत्र की इस अति और हमारे घुटनाटेक रवैये ने हमारे देश का ऐसा हाल किया है कि यहां देशतोड़कों की एकता तो संभव है, किंतु देश जोड़ने वाली ताकतें नदारद दिखती हैं। देश को तोड़ने के लिए लोकतंत्र का लाभ उठाकर यहां माओवादी, गिलानी, खालिस्तानी सब एक मंच पर आ सकते हैं, लेकिन क्या देश की अखंडता का स्वप्न देखने वाले भी कभी एकजुट हो सकते हैं। सेना और पुलिस से कवच और कुंडल मांगने के लिए आतुर मानवाधिकारवादी हों या आतंकवादी यह तय करना मुश्किल है कि देश के साथ कौन है। राज्य की हिंसा पर विलाप कर रहे तथाकथित मानवाधिकारवादी देश के रक्षकों की पिटाई और उनकी हत्या पर खामोशी की चादर ओढ़ लेते हैं। अब ताजा विवाद तिरंगे को लेकर छिड़ा है कि आखिर किस तरह लालचौक पर तिरंगा फहराने से देश को खतरा है? खेमों में बंटे विचारक सक्ति्रय हो गए हैं जो वैसे भी किसी एक खास राजनीतिक दल को कोसने का कोई मौका नही छोड़ते। क्या तिरंगा भी उनसे पूछकर फहराया जाएगा और वंदेमातरम उनकी अनुमति से गाया जाएगा? जब वे मानेंगे तभी यह तय होगा कि राम एक कपोल कल्पना या मिथक नहीं, बल्कि इस देश के वास्तविक राष्ट्रीय नायक हैं। देश की राजधानी दिल्ली में अरुधंती राय, बरवर राव और गिलानी देश को तोड़ने की बात करते रहेंगे और उन पर तब तक मुकदमा न चलाया जाए, क्योंकि लोकतंत्र का यह सौंदर्य है कि असहमति का अधिकार सबको मिले। किंतु क्या वास्तव में कश्मीर में कुछ नौजवान तिरंगा फहराएंगें तो हालात बिगड़ जाएंगें और कोई वंदेमातरम गाएगा तो देश टूट जाएगा।
क्या देशभक्ति बोझ बन गई है
आजादी के छह दशकों ने आखिर हमें क्या सिखाया है कि हम राष्ट्रीय एकता का व्यवहार भी नहीं सीख पा रहे हैं? लोकतंत्र की अतिवादिता तो हमने सीख ली है किंतु मर्यादापूर्ण व्यवहार और आचरण हमने नहीं सीखा। वाणी संयम की बात तो जाने ही दीजिए। आज लगता है कि देशभक्ति और देश की बात करना और कहना ही एक बोझ बन गया है। देश के हालात तो यही हैं कि कुछ भी कहिए और शान से रहिए। क्या दुनिया का कोई देश इतनी सारी मुश्किलों के साथ सहजता से सांस ले सकता है। शायद नहीं, पर हम ले रहे हैं, क्योंकि हमें अपने गणतंत्र पर भरोसा है। यह भरोसा भी तब टूटता दिखता है जब संवैधानिक पदों पर बैठे लोग ही अलगाववादियों की भाषा बोलने लगते हैं। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर फारुख का कहना है कि गणतंत्र दिवस पर भाजपा श्रीनगर के लालचौक पर तिरंगा न फहराए, क्योंकि इससे हिंसा भड़क सकती है। आखिर एक मुख्यमंत्री के मुंह से क्या ऐसे बयान शोभा देते हैं। अब सवाल यह उठता है कि आखिर लालचौक में तिरंगा फहराने से किसे दर्द होता है। उमर की चेतावनी है कि इस घटना से कश्मीर के हालात बिगड़ते हैं तो इसके लिए भाजपा ही जिम्मेदार होगी। निश्चित ही एक कमजोर शासक ही ऐसे बयान दे सकता है, हालांकि अपने विवादित बयानों को लेकर उमर की काफी आलोचना हो चुकी है, किंतु लगता है कि इससे उन्होंने कोई सबक नहीं सीखा है। वह लगातार जो कह और कर रहे हैं उससे साफ लगता है कि न तो उनमें परिपक्व राजनीतिक समझ है, न ही प्रशासनिक काबिलियत। कश्मीर के शासक को कितना जिम्मेदार होना चाहिए इसका अंदाजा भी उन्हें नहीं है। यदि मुख्यमंत्री ही ऐसे भड़काऊ बयान देगा तो आगे क्या बचता है। सही मायने में उमर अब अलगाववादियों की ही भाषा बोलने लगे हैं। एक आजाद देश में कोई भी नागरिक या संगठन अगर तिरंगा फहराना चाहता है तो उसे रोका नहीं जाना चाहिए। देश के भीतर अगर इस तरह की प्रतिक्रियाएं एक संवैधानिक पद पर बैठे लोग कर रहे हैं तो हालात को समझा जा सकता है। उमर भारत में कश्मीर के विलय को लेकर एक आपत्तिजनक टिप्पणी कर चुके हैं। ऐसे व्यक्ति से क्या उम्मीद की जा सकती है।
सुनियोजित षड्यंत्र
देश के भीतर तिरंगा फहराना आखिर गलत कैसे हो सकता है? देश के राजनीतिक दल यदि भारतीय जनता युवा मोर्चा के इस आयोजन में राजनीति देखते हैं तो यह दुखद ही है। तिरंगा यदि किसी राजनीति का हिस्सा है तो वह देशभक्ति की ही राजनीति है। किंतु इस देश में तमाम लोगों को भारत माता की जय और वंदेमातरम की गूंज से भी दर्द होता है। शायद उन्हीं लोगों को तिरंगे से भी परेशानी है। सवाल उठता है कि क्या हम अपने राष्ट्रीय पर्वो पर ध्वजारोहण भी अलगाववादियों से पूछकर करेंगे। कहीं वे नाराज न हो जाएं इसलिए हम उनसे अनुरोध करेंगे और कहेंगे कि तिरंगा न फहराएं। यह तर्क भी कितना बचकाना है ऐसा इसलिए न करें, क्योंकि बड़ी मुश्किल से घाटी में शांति आई है। चार लाख कश्मीरी पंडितों को अपना घर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा, अनेक उदारवादी मुस्लिम नेताओं की हत्याएं की गई। अभी हाल तक सेना और पुलिस पर पत्थर बरसाए गए और आज भी सेना को वापस भेजने के सुनियोजित षड्यंत्र चल रहे हैं। आप इसे शांति कहते हैं तो कहिए पर इससे चिंताजनक हालात और क्या हो सकते हैं?
लाशों पर राजनीति
पाकिस्तान के झंडे और गो इंडियंस का बैनर लेकर प्रर्दशन करने वालों को खुश करने के लिए हमारी सरकार सेनाध्यक्षों के विरोध के बावजूद सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून में बदलाव करने का विचार करने लगती है। हालंाकि इस गंदी राजनीति से हमारे सुरक्षाबलों के हाथ बंध जाएंगें। हमारी सरकार जो करने जा रही है वह देश की एकता-अखंडता को छिन्न-भिन्न करने की एक गहरी साजिश है। जिस देश की राजनीति के हाथ अफजल गुरु की फांसी की फाइलों को छूते हाथ कांपते हों वह न जाने किस दबाव में देश की सुरक्षा से समझौता करने जा रही है। यह बदलाव होगा हमारे जवानों की लाशों पर। इस बदलाव के तहत सीमा पर अथवा अन्य अशांत क्षेत्रों में डटी फौजें किसी को गिरफ्तार नहीं कर सकेंगीं। दंगों के हालात में उन पर गोली नहीं चलाया जा सकेगा। इस तरह फौजियों को जनता के नाम पर कुछ लोग मारेंगे जैसा कि सोपोर में सबने देखा। घाटी में पाकिस्तानी मुद्रा चलाने की कोशिशें भी इसी देशतोड़क राजनीति का हिस्सा है। अपमान और आतंकवाद का इतना खुला संरक्षण देख कर कोई अगर चुप रह सकता है तो वह भारत की महान सरकार ही हो सकती है। आप कश्मीरी हिंदुओं को लौटाने की बात न करें, हां सेना को वापस बुला लें। क्या हम एक ऐसे देश में रह रहे हैं जिसकी घटिया राजनीति ने हम भारत के लोगों को इतना लाचार और बेचारा बना दिया है कि हम वोट की राजनीति से आगे की नहीं सोच पाते। क्या हमारी सरकारों और वोट के लालची राजनीतिक दलों ने यह तय कर लिया है कि देश और उसकी जनता का कितना भी अपमान होता रहे हमारे सुरक्षा बल रोज आतंकवादियों-नक्सलवादियों की गोलियों का शिकार होकर तिरंगे में लपेटे जाते रहेंगे और हम उनकी लाशों को सलामी देते रहेंगे। और इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ेगा। अफसोस इस बात का है कि गणतंत्र को चलाने और राजधर्म को निभाने की जिम्मेदारी जिन लोगों पर है वे वोट बैंक से आगे की सोच नहीं पाते। वे देशद्रोह को भी जायज मानते हैं और उनके लिए अभिव्यक्ति के नाम पर कोई भी कुछ भी कहने और बकने को आजाद है। कश्मीर में पाकिस्तानी झंडे लेकर घूमने से शांति और तिरंगा फहराने से अशांति होती है। शायद छह दशकों में यही भारत हमने बनाया है। ऐसे में क्या नहीं लगता कि देशभक्ति भी अब एक बोझ बन गई है। संविधान की शपथ लेकर बैठे नेता भी इसे उतार फेंकना चाहते हैं।
द्विराष्ट्रवाद की मानसिकता
कश्मीर का संकट दरअसल उसी देशतोड़क द्विराष्ट्रवाद की मानसिकता से उपजा है जिसके चलते भारत का विभाजन हुआ। पाकिस्तान और द्विराष्ट्रवाद की समर्थक ताकतें यह कैसे सह सकती हैं कि कोई भी मुस्लिम बहुल इलाका हिंदुस्तान के साथ रहे। किंतु भारत को यह मानना होगा कि कश्मीर में उसकी पराजय आखिरी पराजय नहीं होगी। इससे हिंदुस्तान में रहने वाले हिंदू-मुस्लिम रिश्तों की नींव हिल जाएगी और सामाजिक एकता का ताना-बाना खंड-खंड हो जाएगा। इसलिए भारत को किसी भी तरह यह लड़ाई जीतनी है। उन लोगों को जो देश के संविधान को नहीं मानते और देश के कानून को नहीं मानते उनके खिलाफ हमें किसी भी सीमा तक जाना पड़े तो जाना चाहिए। इस गणतंत्र के बहाने हमें अपने मित्रों और शत्रुओं की पहचान तो कर ही लेनी चाहिए। आखिर क्या कारण है कि देश को जोड़ने वाला तिरंगा एक बोझ बन गया है। जिस तिरंगे को लेकर भारत ने अपनी एकता से अंग्रेजी राज के खिलाफ एक जंग लड़ी और जीती वही तिरंगा आज आजादी के छह दशक बीतने के बाद भी क्यों विवादों में है? क्या कारण है कि देश के सेनानी जिस वंदेमातरम का घोष कर फांसी के फंदे पर झूल गए, उस पर विवाद है। क्या कारण है कि देश के राष्ट्रपुरुष राम को कपोल-कल्पना और मिथक साबित करने में कुछ लोगों को मजा आता है। क्या कारण है कि माओवादी और आतंकवादियों को गोद ले चुके बुद्धिजीवी राज्य के आतंक पर रात दिन शोक मनाते हैं। यह भी सोचिए कि लश्करे तैयबा और माओवादियों का आपसी रिश्ता क्या है? क्यों लश्कर के लोग माओवादियों की बैठकों में शामिल हो रहे हैं और क्यों वे उन्हें प्रशिक्षण दे रहे हैं? गिलानी, अरुंधती, बरवर राव, छत्रधर महतो और मणिपुर के मुइवा का रिश्ता क्या है? अलग-अलग विचारों के लोग आखिर एक मंच पर क्यों हैं। कहीं भारत के लोकतंत्र के खिलाफ इनकी साझा लड़ाई तो नहीं है। क्या अपना गणतंत्र हासिल करने के महीने में हमें इन देशविभाजक और लोकतंत्र विरोधी ताकतों के खिलाफ निर्णायक लड़ाई का बिगुल नहीं फूंकना चाहिए।


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