लेखक तेलंगाना आंदोलन के संदर्भ में नए राज्यों की मांगों से संबंधित बहस आगे बढ़ा रहे हैं…..
भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में राज्य दुर्घटना और ब्रिटिश सत्ता का परिणाम हैं। भाषायी आधार पर 1955 में भारत पुन: समूहबद्ध हुआ। राजनीतिक मांगों के अनुकूल विगत कुछ वर्षो में चार और राज्य अस्तित्व में आए। पाकिस्तान ने दबाव का प्रतिरोध किया, क्योंकि नए सूबों का गठन होने से वहां समस्याओं का समाधान होने के बजाए उनमें और वृद्धि हो जाती। बांग्लादेश एकात्मक प्रणाली कायम रखने को संकल्पबद्ध है। फिर भी महत्वपूर्ण सवाल यही है कि राजनीतिक उहापोहों के जन आकांक्षाओं के साथ मिश्रण को कैसे टाला जा सकता है। स्वतंत्रता के बाद से 14 राज्यों के निर्माण के बाद भी नई दिल्ली को अभी भी और नई इकाइयों के निर्माण की बढ़ती मांग को झेलना पड़ रहा है। सर्वाधिक प्रभावी मांग तेलंगाना के गठन की है। इसमें कमोबेश वही क्षेत्र आता है, जो रियासत का आंध्र प्रदेश में विलय होने के पूर्व हैदराबाद के निजाम के तहत था। तेलंगाना में लोग यह महसूस करते हैं कि उन्हें जो मिलना चाहिए था और तेलुगू भाषी लोगों को प्राप्त रहा था, वह नहीं मिला। हैदराबाद में उर्दू विश्वविद्यालय शुरू होने से बात नहीं बनी, मगर मुस्लिम, जो हैदराबाद की आबादी का 41 प्रतिशत हैं, इसलिए संयुक्त आंध्र प्रदेश के पक्षधर हैं। गत वर्ष जब तेलंगाना को एक भीषण आंदोलन ने लील लिया था और तेलंगाना राष्ट्र समिति के नेता के. चंद्रशेखर आमरण अनशन पर बैठे थे तो केंद्र एक बार फिर उसी तरह उद्विग्न और चिंतित हुआ था, जैसा 1954 में राज्यों के पुनर्गठन के लिए आयोग की नियुक्ति के वक्त था। तब श्रीरामुलू तेलुगू भाषियों के लिए अलग राज्य की मांग करते हुए दिवंगत हो गए थे। इस बार सरकार ने तेलंगाना की समस्या का हल सुझाते हुए सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश श्रीकृष्ण की अध्यक्षता में एक समिति गठित की है। न्यायमूर्ति श्रीकृष्ण ने अपनी रिपोर्ट में छह विकल्पों की चर्चा की है, किंतु प्रमुखता आंध्र प्रदेश को संयुक्त रखने को ही दी है। हैदराबाद के भावी स्तर के सवाल ने आयोग के पांच सदस्यीय आयोग को भी प्रभावित किया है। उसने छह विकल्पों में से चार में इसका उल्लेख किया है। राज्य के विभाजन की स्थिति में कोई भी पक्ष हैदराबाद को छोड़ने के लिए राजी नहीं है। इसके पीछे आर्थिक और भावनात्मक, दोनों ही कारण हैं। इसमें संदेह नहीं है कि यदि आंध्र प्रदेश को छेड़ा जाता है तो भारत के पांचवें सबसे बड़े शहर के व्यापारिक भरोसे की स्थिति सभी क्षेत्रों के लिए नुकसानदायक हो सकती है। हैदराबाद आइटी उद्योग का बड़ा केंद्र बन गया है। 2008-09 में भारत के सॉफ्टवेयर निर्यात का 15 प्रतिशत हैदराबाद से हुआ। नई दिल्ली की चिंता का विषय यह है कि यदि वह तेलंगाना की मांग को मान लेती है तो उसे नए राज्यों के गठन की मांग के पुन: उभरने की चुनौती झेलनी होगी। क्षेत्रीय निष्ठा की अपेक्षा स्थानीय भावनाएं अधिक मजबूत हो गई हैं। अल्पसंख्यकों की सोच बन गई है कि उन्हें बहुसंख्यक संकीर्णतावाद ने एक कोने में धकेल दिया है। विकास के लिहाज से अनेक क्षेत्र पीछे रह गए हैं। अधिक संसाधनों वाले राज्य आगे बढ़े हैं। केंद्र मात्र 9 से 10 प्रतिशत जीडीपी के विकास में रुचि रखता है। सभी क्षेत्रों में समानतापरक विकास की कोई परवाह नहीं करता। तेलंगाना में एक बार फिर असंतोष पैदा हो गया है, क्योंकि वह अपना खुद का राज्य चाहता है। नई दिल्ली का तिकड़में जगजाहिर हैं। उसने संसद में घोषित किया था कि तेलंगाना के गठन की प्रक्रिया शीघ्र ही शुरू की जाएगी और फिर वह अपने शब्दों से पलट गया। आंध्र प्रदेश के अन्य भाग भी उठ खड़े हुए। मात्र समिति की नियुक्ति ने ही शांति बहाल की है। नए राज्य के गठन की भयावह परिणति नए राज्यों के गठन की मांगों के उभार के रूप में होंगी। पश्चिम बंगाल के पर्वतीय भागों में गोरखालैंड की मांग को मनवाने के लिए आंदोलन छिड़ गया है। असम में बोडो धमकी दे रहे हैं कि यदि उनके क्षेत्र को केंद्र अधिशासित क्षेत्र नहीं बनाया गया तो वे हिंसा पर उतर आएंगे। महाराष्ट्र में विदर्भ की मांग तो पुरानी है ही, जिसकी 1954 में राज्य पुनर्गठन आयोग ने भी अनुशंसा की थी। भारत किस तरह से तेलंगाना के मामले को सुलझाता है, उससे अन्य राज्यों के गठन संबंधी उसकी सोच की भी झलक मिलेगी। केंद्र यदि तेलंगाना का गठन करता है तब भी और नहीं करता तब भी निंदा ही झेलेगा। प्रतीत होता है कि घटनाक्रम अंततोगत्वा तेलंगाना राज्य के गठन का ही रुख करेगा। अवसरवाद की ऐसी राजनीतिक परिणति राजनेताओं द्वारा युवाओं के शोषण के रूप में हुई, जिसके फलस्वरूप अंतरक्षेत्रीय और अंतरसामुदायिक मतभेद और अंतर बढ़े हैं। यही बात पाकिस्तान और बांग्लादेश पर काफी हद तक लागू होती है। तीनों देश अलग-अलग रास्ता भले ही अपना रहे हों, किंतु सिद्धांतहीन राजनीति के कारण उनकी अपूर्णताएं समान ही हैं। समृद्धि परिदृश्य को बदल सकती है, परंतु तब तक तीनों देशों के समक्ष कानून और व्यवस्था की समस्याएं और अधिक वीभत्स रूप ले सकती हैं। देश को यह अहसास नहीं है कि नई मांगों के आग्रह का आधार बुनियादी नहीं, जातीय हैं। अनुसूचित जातियों-जनजातियों, पिछड़े वगरें और अल्पसंख्यकों की राजनीतिक स्थान के लिए अपनी आकांक्षाएं हैं। आर्थिक विकास और आरक्षण के लाभों को लेकर भी ऐसी ही स्थिति है। तेलंगाना ज्वाइंट एक्शन ग्रुपों के बीच स्पष्ट जातीय विभाजन है। पचास के दशक के शुरू में भाषायी राज्यों के गठन से पूर्व हिंसा उभरी थी। देश में पुन: एक बार वैसी ही स्थिति बन सकती है। सत्ता भ्रष्टाचार और सांप्रदायिकता की समस्या से तो जूझ ही रही है। देश की एकता अथवा एकीकरण मात्र नारे लगाने पर या उन लोगों को कोसने पर निर्भर नहीं करता जिनकी सोच अलगाववादी है। उन्हें शिकायत है कि उनसे दुर्व्यवहार होता है और उन्हें वे अधिकार नहीं मिल पाते जो राज्य में हावी समूह को प्राप्त होते हैं। इसका परिणाम हताशा को बढ़ाता है और उग्रवाद की ओर ले जाता है। कुछ मामलों में जातीय विनाश भी एक रास्ता मान लिया जाता है। मेघालय और असम की सीमा पर इसका एक लघु रूप देखा जा सकता है, जहां दूसरी भाषा बोलने वाले लोग हाशिये पर धकेल दिए गए हैं। यदि समाज शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की आकांक्षा रखता है तो उसमें उदारता और सहनशीलता का भाव होना ही चाहिए। किसी भी राष्ट्र का भविष्य सत्यनिष्ठा पर केंद्रित होता है। अलग-अलग समुदाय और विभिन्न सोच राष्ट्र की प्राण वायु हैं, अपने आप में राष्ट्र नहीं। ये अंग राष्ट्रहित में स्वस्थ और सुदृढ़ होने चाहिए, किंतु राष्ट्र पर हावी नहीं हो सकते। (लेखक प्रख्यात स्तंभकार हैं)
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