Thursday, January 20, 2011

महंगाई पर नतमस्तक सरकार

देश के इतिहास में शायद पहली बार हो रहा है जब महंगााई के सामने सरकार ने घुटने टेके। गृहमंत्री पी. चिदंबरम, कृषि मंत्री शरद पवार के अलावा स्वयं प्रधानमंत्री ने स्पष्ट कह दिया कि महंगााई के सामने वे सभी हार गए। इसे रोकना अब हमारे बस की बात नहीं। यह तो सरकार की लाचारी है जो इस तरह सामने आई। कृषि मंत्री तो इस मामले में सरकारी प्रवक्ता की भूमिका निभाते नजर आए हैं वह पहले ही कह देते हैं कि मूल्य वृद्धि अभी जारी रहेगी। हालांकि महंगाई ने मध्यम वर्गाीय परिवार की कमर ही तोड़ दी है। सरकार को तो डीजल के दाम भी बढ़ाने हैं पर अभी महंगााई का शोर इतना अधिक है कि वह कुछ नहीं कर पा रही है। प्याज व्यापारियों के यहां छापा डालकर सरकार ने एक कोशिश अवश्य की है। सरकार ने व्यापारियों को लूटने की खुली छूट दे रखी दी है आखिर चंदे के रूप में मोटी राशि इन्हीं से मिलती है। सरकार अब भले ही राज्य सरकारों को कोसे पर सच तो यही है कि महंगााई से निबटने में वह बुरी तरह विफल रही है। प्याज के बाद अब चीनी की कीमतें बेलगााम होने वाली हैं। आम आदमी को अब हर तरह की मिठास से तौबा करने का समय आ गया है। अब आम आदमी को जीने का कोई अधिकार नहीं। रसोई में काम आने वाली हर चीज एक वर्ष में काफी महंगी हो गई है। दिसंबर के दूसरे सप्ताह में खाद्य पदार्थो की मुद्रास्फीति की दर में 12.13 प्रतिशत की वृद्धि हुई जो अब बढ़कर 19.95 प्रतिशत हो गई है। साफ है सरकार के सारे प्रयास विफल हैं। इतनी असहाय सरकार कभी नहीं दिखी। महंगााई ने अपना प्रभाव सभी दिशाओं में दिखाया है। केवल अनाज ही नहीं, बल्कि ऑटोमोबाइल्स, सीमेंट, स्टील भी महंगे हुए हैं। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने इस दिशा में छह बार प्रयास किए पर कुछ नहीं हो पाया। भाव घटने की बजाय बढ़ते ही रहे। लोगाों को प्याज की महंगाई दिख रही है पर देखा जाए तो हर चीज की कीमत बढ़ी है। केवल प्याज को ही दोष देना उचित नहीं। सरकार ने महंगााई की लगााम थामने के लिए गेहूं, चावल, खाद्य तेल और मक्खन पर आयात कर रद कर दिए। उधर रिफाइन और हाइड्रोनेट तेल से भी आयात कर घटाया है। इतना करने के बाद सरकार निश्चिंत हो गई कि अब महंगााई पर काबू पाया जा सकता है, लेकिन दूरदर्शिता के अभाव में सरकार इस मोर्चे पर भी विफल साबित हुई। समझ में नहीं आता कि हमारे पास एक कुशल अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री होने के बाद भी यह सब कैसे हो रहा है? क्या सचमुच में वह कुछ नहीं कर रहे हैं या करना नहीं चाहते। एक प्रधानमंत्री इतना अधिक विवश कैसे हो सकता है? पहले शीत ऋतु में सब्जी खाने का मजा ही कुछ और होता था। सब्जियां सस्ती मिलती थीं और लोग इस मौसम में सब्जियों का भरपूर आनंद उठाते थे। पर इस बार सब्जियों की कीमतें आसमान छूने लगीं। आम आदमी हर तरह से मारा गया इसलिए कहा जाने लगा कि कमजोर दिल वाले सब्जी बाजार में प्रवेश न करें तो बेहतर होगा। भारत के अलावा अन्य देशों में भी मौसम के कारण उत्पादन प्रभावित हुआ जिस कारण हमारे देश में भी महंगाई बढ़ गई। सरकार यदि सचमुच महंगाई पर काबू पाना चाहती है तो वह अनाज का बफर स्टॉक खुला छोड़ दे। निर्यात पर प्रतिबंध, आयात पर छूट, कर में राहत जैसे कठोर आर्थिक निर्णय उसे लेने होंगे। यही नहीं बढ़ती मांग को देखते हुए सामान की आपूर्ति भी समय पर की जाए तो कुछ हद तक इसे काबू में किया जा सकता है। यही नहीं सब्जी, अंडे, दूध और डेयरी उत्पादनों को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सके इसके लिए कोल्ड स्टोरेज और आधुनिक टेक्नोलॉजी में वृद्धि की जानी चाहिए। कठोर कदम उठाकर जमाखोरों पर कड़ी कार्रवाई की जाए तो भी इस दिशा में सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं। जैसा कि कुछ दिनों पूर्व ही देश भर के प्याज व्यापारियों के यहां मारे गए छापे के बाद देखने में आया, लेकिन महंगाई को लेकर सरकार की नीयत साफ नहीं है। वह व्यापारियों से पूरी तरह से मिली हुई है। जमाखोरों पर कड़ी कार्रवाई करने मे हिचकती है। इसके अलावा सरकार महंगाई को लेकर अपने ही नेताओं की जुबान पर लगााम नहीं रख पा रही है। कई बार तो इन्हीं नेताओं बयानों के कारण महंगाई को बेकाबू होने में मदद मिली है। सरकार यदि यह सोचे ले कि कुछ ही माह बाद चुनाव होने वाले हैं तो क्या वह महंगाई के खिलाफ कड़े कदम नहीं उठाती? चिंता इसी बात की है कि सामने चुनाव नहीं है, इसलिए सरकार को भी चिंता नहीं है। शायद यही कारण है कि सरकार कड़े कदम उठाने से हिचक रही है, लेकिन जब चुनाव आएगा तो आम आदमी को इसका जवाब देना ही होगा।

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