Saturday, January 29, 2011

इतनी नाउम्मीदी भी नहीं


भारतीय गणतंत्र 60 बरस का हो चुका है। इन 60 वर्षों में कुछ सकारात्मक चीजें हुई हैं, तो नकारात्मकता भी कम नहीं हैं। सकारात्मक बात यह रही कि इस दौरान हमारा संविधान अक्षुण्ण रहा। देश में लोकतंत्र मजबूत हुआ। आम जनता का संविधान में विश्वास बना हुआ है। हमारा देश दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। हालांकि बीच-बीच में हमारी एकता को तोड़ने की कोशिशें हुई, लेकिन पूरा भारत एक है। चाहे वह कश्मीर में जारी अलगाववाद हो, या पूर्वोत्तर में जारी अलगाव की आवाजें, हमारे देश की सीमाएं अक्षुण्ण हैं। इन छह दशकों में देश को बहुतेरी आंतरिक और बाहरी विपत्तियों से जूझना पड़ा। इस दौरान चार-चार युद्ध हुए, जिनका मुकाबला हमने संविधान और लोकतंत्र का पालन करते हुए किया
दूसरी ओर हताशा और विफलताओं की सूची भी लंबी है। आजादी के समय देश में जितने गरीब थे, आज उससे कहीं अधिक लोग गरीबी की हालत में हैं। निरक्षरों की संख्या घटने के बजाय बढ़ती जा रही है। आजादी के 63 वर्षों और गणतंत्र कायम होने के 60 वर्षों के बाद भी हम अशिक्षा नहीं मिटा पाए, विस्थापन दूर नहीं कर पाए और आम जनता के जीवन से गरीबी का अंधियारा दूर नहीं कर पाए। आर्थिक उदारीकरण की नीति अपनाने के बाद गरीबी-अमीरी के बीच खाई भी और चौड़ी हुई है। जिस बढ़ती आर्थिक विकास दर की बात की जाती है, उसका फायदा थोड़े से लोगों को ही हुआ है। अधिकांश लोगों को उदारीकरण की नीतियों से कोई लाभ होता दिखाई नहीं देता। नतीजतन अधिकतर लोगों का जीवन स्तर सुधरने के बजाय गिरता गया है
पिछले कुछ महीनों में भ्रष्टाचार का जैसा भीषण रूप यहां देखने को मिला है, उसकी शायद ही कोई मिसाल हो। इसका कारण यह है कि हमने गणतंत्र को लागू तो कर दिया, मगर लोकतांत्रिक व्यवस्था के तीनों अंगों, विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका, ने अपनी जिम्मेदारी सही ढंग से नहीं निभाई। लोकतंत्र का कोई भी अंग पारदर्शी नहीं है। जवाबदेही के अभाव में मूल्यों का क्षरण हुआ है। मीडिया ने भी पारदर्शिता और जवाबदेही छोड़ दी है। बाजार में सब बिक रहा है। ऐसी सरकारें भी आने लग गई हैं, जो विधायिका को खरीदने तक का उपक्रम कर गुजरती हैं। विधायिका में छोटे-छोटे समूह बन गए हैं, जो मलाईदार मंत्रालय के लिए कैसे-कैसे दबाव डालते हैं, उन पर से भी थोड़ा परदा उठ चुका है। परदा जितना उठा है, वह पूरी व्यवस्था को समझने के लिए काफी है। कानून सबके लिए बराबर होने की बात किताबों में और भाषण देने भर को रह गई है। बड़ा आदमी जुर्म करके भी छूट जाता है। गवाह खरीद लिए जाते हैं और फाइलों से दस्तावेज गायब हो जाते हैं
लोकतंत्र की एक और विफलता यह है कि भारत का जो पैसा बाहर जमा है, उसे देश के भ्रष्ट लोगों ने चुराकर विदेशों में जमा किया है। स्विस बैंकों में भारत का जितना पैसा जमा है, उतना दुनिया के किसी और देश का नहीं। यह हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंता का विषय है। हालांकि उस धन को देश में वापस लाने के प्रयास हो रहे हैं। यह मामला फिलहाल सर्वोच्च न्यायालय में है और केंद्र सरकार पर भरपूर दबाव बढ़ रहा है
आजकल न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच अधिकार और कर्तव्य को लेकर विवाद के कुछ मामले सामने आए हैं। संविधान में स्पष्ट रूप से दोनों के अधिकार क्षेत्रों को परिभाषित और परिसीमित किया गया है। दोनों अपने-अपने क्षेत्र में काम करें, तो कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए। अभी तक जितनी भी स्थितियां आई हैं, उन सबका समाधान संविधान के भीतर ही हुआ है। हालांकि कुछ मामलों में ऐसा लगता है कि इनके बीच के विभाजन की सीमा रेखा स्पष्ट नहीं है, पर यह सामान्य बात है। संविधान के प्रति आस्था ही गणतंत्र को मजबूत करती है। शुक्र है कि अभी तक ऐसी कोई गंभीर परेशानी नहीं आई है कि इनके बीच के टकराव से कोई सांविधानिक संकट पैदा हुआ हो
गणतंत्र के 60 साल पूरे होने की बेला में सबसे महत्वपूर्ण खामी मुझे यह नजर आती है कि बहुत से औपनिवेशिक कानून अब भी चल रहे हैं। विधि आयोग ने भी ऐसे बहुत से कानून रेखांकित किए हैं, जो अब बिलकुल निरर्थक हो चुके हैं। विधि आयोग ने इस बारे में सरकार के पास अपनी सिफारिशें भेजी हैं। उन सिफारिशों के अलावा भी बहुत सारे कानून हैं, जिन्हें निरस्त कर देना चाहिए। उदाहरण के लिए, पुलिस ऐक्ट 1861 का है, जो अभी तक चल रहा है। भारतीय दंड संहिता 19वीं सदी की बनाई हुई है, जो अभी तक चल रही है। ये सारे कानून औपनिवेशिक सत्ता ने इस देश पर राज करने और जनता को बलपूर्वक काबू में रखने के लिए बनाए थे। दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि ये कानून अभी तक कायम हैं। इसे दूर करने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी मीडिया की है कि वह जनता को जागृत करने का काम करे, जिससे तबदीली आए
इन सब खामियों केबावजूद गणतंत्र के प्रति निराश नहीं होना चाहिए। उम्मीद करनी चाहिए कि देश की तमाम समस्याएं सुलझेंगी और हमारा यह मुल्क प्रगति करेगा। हम पूरी दुनिया में गणतंत्र का सिर्फ सबसे बड़ा, बल्कि सबसे बेहतर उदाहरण भी साबित होकर दिखाएंगे। लेकिन इसके लिए जरूरी यह है कि हम मौजूदा विसंगतियों को दूर करने का बीड़ा उठाएं


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