निर्वाचन आयोग की ताजा चिंता दल पण्राली के दुरुपयोग को लेकर है। चुनाव के समय में मेढक की तरह पार्टियां अस्तित्व में आती हैं। कुरैशी जानते हैं कि इन पार्टियों का इस्तेमाल काले धन को सफेद करने के लिए होता है। उन्हें मान्यता नहीं मिलनी चाहिए लेकिन इसका अधिकार आयोग को नहीं है। चुनाव आयोग कहां-कहां लाचार हो जाता है, इसकी लंबी सूची खुद भारत सरकार के कानून मंत्रालय ने बनाई है। इस समय सबसे बड़ी चिंता चुनावों में अपराधियों की उम्मीदवारी है। उनसे विधानसभाएं और संसद भर गई है। पिछले 15 सालों से जारी यह बीमारी अब तक लाइलाज बनी हुई है। चुनाव आयोग ने समय- समय पर भारत सरकार को सुधार के 22 प्रस्ताव भेजे हैं। इन पर सरकारों की कब नींद टूटेगी, यह वक्त बताएगा
चुनाव सुधार पुराना मुद्दा है। यह अचानक पैदा नहीं हुआ है। संसदीय लोकतंत्र की शुरुआत से ही कई तरह के प्रश्न खड़े होते रहे हैं। अंग्रेजों ने अपनी सत्ता और साम्राज्य को बचाने के लिए इसे आखिरी हथियार बनाया। उस समय खासकर लंदन में यह बहस छिड़ी और बहुत दिनों तक चलती रही कि क्या भारत में संसदीय लोकतंत्र के लिए परिस्थितियां अनुकूल हैं? जो भारत के विशेषज्ञ थे और जिन्होंने अपनी लंबी सेवा के दौरान इस देश के समाज का गहरा और सूक्ष्म अध्ययन किया था; वे स्पष्ट रूप से अंग्रेजी शासन के लक्ष्य से असहमत थे। उनका मानना था कि भारत में संसदीय लोकतंत्र अगर लाया गया तो उसके भारी दुष्परिणाम होंगे। इसका कारण सैकड़ों साल की गुलामी से बनी समाज की छोटी-मोटी दीवारें थीं। वे और उंची खड़ी हो जाएंगी। जाति और मजहब में देश बंट जाएगा। संसदीय लोकतंत्र का यह कहर होगा। इस आधार पर वे विरोध में खड़े थे। अंगेजी शासन के अपने तर्क थे। उसके तर्क से कांग्रेस का नेतृत्व भी सहमत था। यहां तक कि ‘हिंद स्वराज’ लिख देने के बावजूद महात्मा गांधी समझते थे और समझाते थे कि यह दौर तो संसदीय राजनीति का है। उससे निकलने के बाद देश में नई व्यवस्था पर लोग सोचेंगे। साफ है कि संसदीय राजनीति पर बहस इसलिए चली और आज भी चल रही है क्योंकि इस व्यवस्था में राजनीतिक दल और दल पण्राली की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसी को अधिक पारदर्शी, तार्किक और जनोन्मुखी बनाने के लिए जिस विधि का उपयोग किया जाता है, उसे चुनाव आयोग लागू करता है। संविधान सभा में इस पर थोड़ी बहस हुई और एक सुझाव आया कि निर्वाचन आयोग कैसे बने।
चुनाव सुधार के दो पहलू : निर्वाचन का स्वरूप
मोटे तौर पर चुनाव सुधार के दो पहलू हैं। पहले का संबंध निर्वाचन आयोग के गठन और उसके अधिकार से है। उसे संवैधानिक स्वायतता प्राप्त है। संविधान निर्माताओं ने निष्पक्ष चुनाव के लिए यह प्रावधान किया। उस समय यह भी सुझाव आया था कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त के चयन को संसद से मंजूरी लेनी होगी। इसे संविधान सभा ने खारिज तो नहीं किया लेकिन माना भी नहीं। इसकी जगह यह व्यवस्था बना दी कि सरकार आयोग के बारे में समय-समय पर कानून बनाएगी। वे कानून ऐसे हैं जिनसे सवाल ज्यादा पैदा होते हैं और जबाव कम मिलते हैं। राजनीतिक परिस्थितियों में बदलाव से निर्वाचन आयोग भी प्रभावित होता रहा है। जब तक देश में एक दलीय शासन था। उसे कांग्रेस चलाती और नियंत्रित करती थी तब वह निर्वाचन आयोग को एक विभाग की तरह मानती थी और उसी तरह उसके साथ सरकारें व्यवहार करती थीं। इसके उदाहरण खोजने के लिए दूर जाने की जरूरत नहीं है। निर्वाचन सदन के नामपट्ट इसे समझा देते हैं। उसी दौर में यह सवाल भी उतनी ही त्कग््रRsकित्कक से उठा जितना अधिकारपूर्वक कांगेस निर्वाचन आयोग का अपनी पार्टी के लिए दुरुपयोग करने लगी थी और उसकी शिकायत लोकनायक जयप्रकाश नारायण तक पहुंची।
चिंतित जेपी ने बनाई तारकुंडे समिति
वे चिंतित हुए इसलिए क्योंकि वे लोकतंत्र में सही मायने में निष्ठा रखते थे। मानते थे कि निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव ही लोकतंत्र के फलने-फूलने की गांरटी है। निर्वाचन आयोग का दुरुपयोग इस पर बहुत बड़ा प्रश्न खड़ा करता है। जेपी ने तब चुनाव सुधार की जरूरत महसूस की। उस समय चुनाव सुधार का बड़ा उद्देश्य निर्वाचन आयोग को अधिक सक्षम बनाना था। जिससे लोकतांत्रिककरण की प्रक्रिया अपनी गति से बिना रुके चले। उन्होंने वी.एम तारकुंडे की कमेटी बनाई। उनकी रिपोर्ट पर उन दिनों खूब र्चचा हुई। यह पिछली सदी के सातवें दशक की बात है। उस समय चुनाव आयोग एक सदस्यीय था। जेपी और उनके साथियों के अभियान का असर यह हुआ कि निर्वाचन आयोग को बहु सदस्यीय बनाने पर देश भर म्ों आम सहमति बन गई। लेकिन इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि जेपी के प्रयासों से जब देश में लोकतंत्र 1977 में दोबारा बहाल हुआ तो जनता पार्टी के शासन ने उसे बहु सदस्यीय बनाने के लिए कोई कोशिश नहीं की।
बहुसदस्यीय हुआ निर्वाचन आयोग
आयोग को बहु सदस्यीय बनाने का निर्णय राजीव गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार ने किया। पहली बार 1989 में चुनाव आयोग को दो सदस्यीय बनाया गया। इसे विश्वनाथ प्रताप सिंह और चंद्रशेखर की सरकार आगे बढ़ा सकती थी। वीपी ने कोशिश भी की पर उन्हें समय नहीं मिला। उनके ही कार्यकाल में दिनेश गोस्वामी कमेटी ने चुनाव सुधार का एक खाका बनाया था, जो सरकार के पास उपलब्ध है। विपक्ष के लोग सोचते थे कि चुनाव आयोग के बहु सदस्यीय हो जाने से कांग्रेस का वर्चस्व उस पर कम हो जाएगा लेकिन विपक्ष की पार्टियां जब सत्ता में आईं तो उन्होंने यथास्थिति को बनाए रखा। पीवी नरसिंह राव की सरकार ने कानून बनाकर चुनाव आयोग को बहुसदस्यीय स्वरूप दिया। उसी समय एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त और दो निर्वाचन आयुक्त की आयोग में व्यवस्था की गई। मुख्य निर्वाचन आयुक्त को कानूनी स्वायत्तता मिली हुई है। वह सरकार की मनमर्जी से हटाया नहीं जा सकता। उसे हटाने के लिए वही प्रक्रिया अपनानी पड़ेगी जो किसी सुप्रीमकोर्ट के जज के लिए अपनायी जाती है। दूसरे निर्वाचन आयुक्त हटाये जा सकते हैं। अगर मुख्य निर्वाचन आयुक्त इसकी सिफारिश करता है। सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश से यह तय हो गया है कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त अपनी टीम में पहला है पर वह सव्रेसर्वा नहीं है। इतना हो जाने पर भी निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठते रहते हैं क्योंकि इनकी चयन की प्रक्रिया संतोषजनक नहीं है। तभी तो नवीन चावला जैसे व्यक्ति निर्वाचन सदन पहुंच गए। ऐसा भी नहीं है कि निर्वाचन आयोग में निष्पक्ष और ईमानदार मुख्य निर्वाचन आयुक्त नहीं हुए हैं। टीएन शेषन, टीएस कृष्णमूर्ति, वीवी लिन्दो, एन गोपालस्वामी और इन दिनों एसवाई कुरैशी पर लोगों का भरोसा बना हुआ है।
चुनाव सुधार का दूसरा पहलू : लोकतंत्र का स्वास्थ्य
यह लोकतंत्र के स्वास्थ्य से संबंधित है। इसकी आवाज जितनी बाहर उठ रही है उतनी ही निर्वाचन आयोग के अंदर से भी उठने लगी है। अभी-अभी एसवाई कुरैशी ने एक बयान में अपनी चिंता जताई है। उनकी चिंता दल पण्राली के दुरुपयोग से संबंधित है। चुनाव के समय में मेढक की तरह पार्टियां अस्तित्व में आती हैं। कुरैशी ने जान लिया है कि इन पार्टियों का इस्तेमाल काले धन को सफेद करने के लिए होता है। उन्हें मान्यता नहीं मिलनी चाहिए। लेकिन इसका अधिकार आयोग को नहीं है। चुनाव आयोग कहां-कहां लाचार हो जाता है, इसकी लंबी सूची खुद भारत सरकार के कानून मंत्रालय ने बनाई है। इस मंत्रालय ने चुनाव सुधार के लिए आए सभी सुझावों को इकट्ठा कर बताया है कि कब, किसने और क्या सुझाव दिए। इस समय सबसे बड़ी चिंता चुनावों में अपराधियों की उम्मीदवारी है। उनसे विधानसभाएं और संसद भर गया है। पिछले 15 सालों से यह बीमारी दिख रही है और अब तक लाइलाज बनी हुई है। चुनाव आयोग की पहली लाचारी एमके सुब्बा बना। वह विदेशी नागरिक है और हत्या के अपराध में नेपाल का भगौड़ा है। उसकी लोकसभा सदस्यता को आयोग रद्द नहीं कर सका। यह बात अलग है कि जनता ने उसे हरा दिया। चुनाव आयोग ने समय-समय पर भारत सरकार को सुधार के 22 प्रस्ताव भेजे हैं। इन पर सरकारों की कब नींद टूटेगी, यह वक्त बताएगा।
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