राज्य के अधिकतर लोग कश्मीर पर संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों को लागू करने के पक्ष में नहीं हैं। वे सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक सशक्तीकरण एवं शक्ति का हस्तांतरण चाहते हैं। यह जानकारी केंद्रीय वार्ताकारों के दल का नेतृत्व कर रहे दिलीप पडगांवकर ने शुक्रवार को चौथे दौरे की समाप्ति पर दिल्ली रवाना होने से पहले संवाददाताओं से बातचीत में दी। उन्होंने कहा कि वार्ताकारों के दल से मिलने वाले लोगों में अधिकतर कश्मीर में जनमत संग्रह के पक्ष में नहीं हैं। हालांकि स्थाई राजनीतिक समाधान के बाबत एक छोटे लेकिन मुखर तबके ने संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव, जनमत संग्रह और आत्म-निर्णय के अधिकार का पक्ष लिया। ज्यादातर लोगों ने लोकतंत्र, मौलिक अधिकारों, बहुलवाद और सहिष्णुता में विश्वास जताया। मुख्य वार्ताकार ने कहा कि उनके समूह ने हुर्रियत के कट्टरपंथी धड़े सैयद अली शाह गिलानी से सीधे तौर पर तो संपर्क नहीं साधा लेकिन उन्होंने अलगाववादी नेताओं को एक पत्र भेजा है ताकि कश्मीर समस्या के समाधान के लिए वह अपने लिखित प्रस्ताव दें। उन्होंने कहा कि वह फरवरी के अंत तक अपनी रिपोर्ट केंद्र को सौंप देंगे। राजनीतिक कैदियों व पत्थरबाजों को रिहा करने के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि इस सिलसिले में पहले सही आंकड़ों की जानकारी प्राप्त की जाएगी। उसके बाद ही आगे की कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू होगी। भाजपा द्वारा 26 जनवरी को लाल चौक पर तिरंगा फहराने के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि भाजपा को अपने फैसले पर एक बार फिर सोचना चाहिए। घाटी के हालात अभी इसकी इजाजत नहीं दे रहे। पूर्व सूचना आयुक्त एमएम अंसारी के साथ आए पडगांवकर गत दिवस हुर्रियत कांफ्रेंस के उदारवादी धड़े के प्रमुख मीरवाइज उमर फारूक से हुई बातचीत से जुड़े सवाल पर कन्नी काटते नजर आए। उन्होंने गत दिवस फोन पर मीरवाइज से संपर्क साधकर राज्य के हालात पर चर्चा की थी और मुलाकात के लिए वक्त मांगा था।
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