Friday, January 14, 2011

बालश्रम और कानून की लाचारी

मील सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत में 6 से 14 साल की उम्र के 17 करोड़ 90 लाख बच्चों में से नौ करोड़ बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं और यह किसी न किसी रूप में काम पर लगे हुए। हालांकि इसमें से ज्यादातर बच्चे कृषि और प्राथमिक क्षेत्र में लगे हुए है। तमाम विकासशील देशों में बाल मजदूरी एक बड़ी समस्या ही नहीं है, बल्कि सभ्य समाज के लिए बहुत बड़ा सवाल भी है। इस सवाल के पीछे के बहुत से कारण है, क्योंकि जब एक बच्चा रोजगार पर जाता है तो उसके पीछे उसके परिवार की आर्थिक व सामाजिक परिस्थितियां बड़े स्तर पर काम करती हैं। कोई भी परिवार खुशी से अपने बच्चों के भविष्य को बरबाद नहीं करना चाहता है, लेकिन मजबूरी में उसे ऐसा करना पड़ता है। भारत में कुल श्रमशक्ति का लगभग 3.6 प्रतिशत संख्या बाल श्रमिकों की है। एक गैर सरकारी संगठन के आंकड़ों के मुताबिक भारत में 10 करोड़ के आसपास बाल श्रमिक है। अगर बाल मजदूरी का गहन से सर्वेक्षण किया जाए तो पता चलता है कि विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था का एक बहुत बड़ा हिस्सा कृषि पर निर्भर है। इस तरह कृषि पर आश्रित लोगों की जीविका पर धीरे-धीरे संकट आने के कारण परिवार का गुजारा चलाना मुश्किल हो जाता है। खेती पर एक ओर प्राकृतिक प्रकोप बढ़ रहे हैं तो दूसरी तरफ सरकार की किसान विरोधी नीतियों के कारण धीरे-धीरे भारतीय किसान बदहाल हो रहे हैं। इस समस्या के कारण लगातार गांवों से शहरों की ओर पलायन बढ़ रहा है। बिहार में बाढ़ के कारण या फिर राजस्थान में अकाल के कारण एक बहुत बड़ा तबका पलायन करने को मजबूर है। बहुत से बच्चे ऐसे भी हैं जो अनाथ हैं और सामाजिक सुरक्षा के अभाव में नारकीय जीवन जीने को विवश हंै। उनके पास प्राथमिक सुविधाएं तक नहीं है। ऐसी परिस्थिति में मजबूर होकर बच्चे बाल मजदूरी के गर्त में जाने के लिए विवश होते हैं। एक तथ्य तो साफ है कि बाल मजदूरी एक बेबस स्थिति के कारण उठाया गया कदम है जिसके लिए माता-पिता के अलावा राज्यसत्ता भी जिम्मेदार है। भारत में राष्ट्रीय बाल श्रम योजना देश के 600 जिलों में चलाई जा रही है, जिसके अच्छे प्रभाव भी सामने आ रहे हैं। जागरूक प्रयासों के चलते बहुत से बच्चों को बाल श्रम से मुक्ति भी मिली है और उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य और रहन-सहन के लिय भी सरकार ने व्यवस्था की है, मगर प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण ऐसी अनेक योजनाओं का लाभ पीडि़त पक्ष तक नहीं पहुंच पाता है। ज्यादातर योजनाओं लोगों को इसकी जानकारी भी नहीं होती है। वह केवल कागजों में चल रही है। उदाहरण के लिए किसी कारखाने या घर में बाल श्रमिकों की सूचना पुलिस या संबंधित विभाग के पास पहुंच भी जाती है तो कुछ ले-देकर मालिक को बरी कर दिया जाता है। अक्सर उन बच्चों को ऐसे ही छोड़ दिया जाता है, क्योंकि पकड़कर नाम दर्ज करने के बाद तो केस बनाना पड़ता है, जिसमें मालिक पर आफत आ जाती है। ऐसे बहुत से मामले प्राथमिक स्तर पर ही रफा-दफा कर दिए जाते हैं, जिसके कारण बाल श्रम करवाने वालों का मनोबल बढ़ता है और उस बच्चे का बचपन भी वापस दलदल में फंस जाता है। इस पर सरकार की नजर तो पड़ी मगर प्रशासन की लापरवाही और मिलीभगत के कारण समस्या घटने की बजाय और बढ़ी है। कारखाने का मालिक या घरों पर काम कराने वाला व्यक्ति सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से इतना प्रभावशाली तो होता है कि प्रशासन के साथ साठगांठ कर सके।बाल श्रमिकों की मजदूरी की तो यह स्थिति है कि केवल उन्हें रोटी और कपड़ा दिया जाता है और काम के घंटों का कोई हिसाब नहीं होता है। जब बाल श्रम को कानूनी मान्यता ही नहीं है तो उनके अधिकारों का तो सवाल ही नहीं उठता। आजादी के बाद से या यों कहें कि बाल श्रम अधिनियम 1986 के बाद देश के बाल श्रमिकों की हालात में कोई बदलाव नहीं हुआ है, जबकि यह समस्या इतनी विकराल है कि कोई भी आसानी से देख सकता है। जब समस्या है और वो हर जगह दिखाई दे रही है तो जब तक उसका निराकरण न हो जाए तब तक क्यूं न उन बाल श्रमिकों को भी अधिकार दिए जाएं। यदि बाल श्रमिकों को अधिकार दे दिए जाएं तो एक बहुत बड़े वर्ग के सामने समस्या खड़ी हो जाएगी। जिस काम को रोटी के बदले कराया जा रहा है, उसके बदले में मजदूरी देना इस वर्ग को अखरता है। यही कारण है कि यह समस्या स्थायी रूप लिए हुए है। सरकारी कागजों और वास्तविक स्थिति में बहुत बड़ा अंतर है, क्योंकि बाल श्रमिकों के कल्याण के लिए बनी योजनाएं केवल कागजी कार्यवाही तक ही सीमित हंै। यूनिसेफ से लेकर केंद्र और राज्य सरकारों का करोडा़ें का बजट बाल श्रमिकों के कल्याण के लिए आता है। इन सबके बावजूद भी अकेले राजस्थान में 14 लाख बाल श्रमिक हैं जो अत्यंत जोखिम भरे काम में लगे हुए हैं। वैसे भी बाल श्रम के अनेक अदृश्य रूप है जिसमें कहीं न कहीं 14 वर्ष से कम आयु के बच्चे काम करते हैं। सवाल यह भी है किउम्रसीमा 14 वर्ष ही क्यों है, जबकि वयस्कता का पैमाना 18 वर्ष रखा गया है। इसमें असंगठित क्षेत्र का एक बड़ा तबका है जिसका कोई विश्वसनीय आंकड़ा सरकार के पास नहीं है। समस्या से ही समस्या जन्म लेती है और बाल श्रम से घरेलू हिंसा और आपराधिक प्रवृत्तियों का बढ़ना कोई अनोखी बात नहीं है। जब तक जड़ तक नहीं काटा जाएगा तब तक इसी तरह की एक से बढ़कर एक नई समस्याएं पैदा होती रहेंगी। बाल श्रम गलत भी नहीं है, क्योंकि जब तक बच्चे के बाप को नौकरी नहीं मिलेगी तब तक उनके घर का खर्च कैसे चलेगा? सवाल सिर्फ बाल श्रम का नहीं है, बल्कि सवाल सामाजिक स्तर को सुधारने का भी है। होता यह है कि बाल श्रमिक को उसके रोजगार से हटा दिया जाता है, लेकिन अगर उसकी सामाजिक सुरक्षा का खयाल नहीं रखा जाता है तो वह अपराध की तरफ जाने को विवश होता है। भारत की समस्याएं यूरोप और अमेरिका के तरीके से सुलझाने की कोशिश की जा रही है मगर भारतीय संदर्भ अलग है। संयुक्त परिवार आज भी भारतीय समाज की सच्चाई है और समाज की आर्थिक स्थिति कहीं न कहीं पूरे समाज को प्रभावित करती है। अगर देश में यह परिस्थिति है तो साफ है कि बाल श्रम जैसे अपराध इन्हीं की उपज हैं और गांवों से शहरों की ओर बढ़ते पलायन के लिए बाढ़ व प्राकृतिक आपदाओं के साथ प्रशासनिक असफलताएं भी जिम्मेदार हंै। इसलिए बाल श्रम को अलग से देखने की जरूरत नहीं है, क्योंकि पूरे देश की सामाजिक व आर्थिक स्थिति को सुधारना जरूरी है। घर में अपनी इच्छा से काम करना या फिर घर के रोजगार में हाथ बंटाना दोनों को बाल श्रम से अलग देखना पड़ेगा। बचपन को बचाना संपूर्ण मानवता की जिम्मेदारी है, लेकिन यह समाज व सामाजिक ढांचे के हिसाब से तय हो न कि अमेरिका और यूरोप के फॅारमेट को भारत पर लागू किया जाए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)


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