Saturday, January 15, 2011

कितने राज्य चाहिए भारत को

लेखक राज्यों के पुनर्गठन के लिए नए मानक और आधार तय करने की जरूरत बता रहे हैं….

अलग तेलंगाना राज्य की मांग ने कई मौलिक प्रश्न उठाए हैं। मसलन क्या भारतीय राज्यों का गठन औचित्यहीन था? क्या वे तात्कालिक राजनीतिक परिस्थितियों की ही उपज थे? क्या भाषा आदि के आधार पर बनाए गए राज्य अपनी उपयोगिता खो चुके हैं? तो क्या भारत के सभी राज्यों को नए सिरे से पुनर्गठित किए जाने की आवश्यकता है? संप्रग सरकार ने ही तेलंगाना की मांग को बढ़ाया था। यह मांग संप्रग के न्यूनतम कार्यक्रम में शामिल थी। लेकिन तेलंगाना अकेली मांग नहीं है। गोरखालैंड है, विदर्भ है, उत्तर प्रदेश में पूवरंचल है, बुंदेलखंड है। जम्मू-कश्मीर को तोड़कर जम्मू-लेह को अलग राज्य बनाने की मांग भी पुरानी है। ऐसी मांगें बढ़ रही हैं, बढ़ेंगी भी। अलग राज्य की हरेक मांग में विकास में उपेक्षा के तर्क होते हैं। तेलंगाना की मांग में भी यही तर्क है लेकिन न्यायमूर्ति श्रीकृष्ण समिति ने विद्युत, शिक्षा और सड़क आदि तमाम घटकों के तथ्यों सहित तेलंगाना को बाकी आंध्र से बेहतर बताया है। समिति ने संवैधानिक शक्ति से लैस एक विशेष परिषद के गठन सहित एकीकृत आंध्र को श्रेष्ठ विकल्प बताया है। यानी अलग राज्य की मांग के कारण राजनीतिक हैं। अलग राज्यों की मांगें प्राय: राजनीतिक ही होती हैं। जैसे मांगें राजनीतिक होती हैं, वैसे ही मांगों पर विचार करने वाले भी राजनीतिक होते हैं। चुनौती बड़ी है। सत्ता प्राप्ति ही इस विमर्श की केंद्रीय पूंजी है। तेलंगाना का उग्र आंदोलन खतरे की घंटी है। केंद्र झुका तो अन्य राज्यों में भी ऐसी ही मांगे बढ़ेंगी। मान लिया गया है कि छोटे राज्य अच्छी प्रशासनिक इकाई होते हैं लेकिन छोटे राज्य स्थिर राजनीतिक इकाई नहीं होते। गोवा और झारखंड जैसे राज्यों की राजनीतिक अस्थिरता अकसर हास्यास्पद प्रहसन बनती है। पूर्वोत्तर के छोटे राज्य हिंसक आंदोलनों का शिकार रहते हैं। छोटी राज्य इकाई के बावजूद यहां कानून व्यवस्था की समस्या रहती है। उत्तर प्रदेश बड़ा राज्य है, यहां की कानून व्यवस्था भी खराब रहती है। मूलभूत प्रश्न यह है कि भारत में राज्य गठन का आधार और औचित्य है क्या? अंग्रेज विदा हुए, भारत में 562 छोटी-बड़ी राज-इकाइयां छोड़ गए। पट्टाभि सीतारमैया ने संविधान सभा में टिप्पणी की, उन्होंने 562 शेरों को पिंजड़े के बाहर कर दिया। राज्यों के मंत्रालय (सरदार पटेल) ने उन्हें पकड़ लिया। सभा में राज्यों को अधिकार देने पर बहस चली। बालकृष्ण शर्मा ने गंभीर टिप्पणी की, हमारे देश में, जो हमेशा से विभाजन के तरह-तरह के तरीके ढूंढ़ता रहा है, हम प्रांतों को इतने अधिकार न दें कि आगे चलकर देश का फिर विभाजन करना पड़े। राज्यों के अधिकार संविधान में आ गए। राज्यों का सीमा परिवर्तन और नए राज्यों के गठन का अधिकार संसद को मिला। राज्यों की तोड़फोड़ का काम चल निकला। 1953 में मद्रास का हिस्सा निकालकर आंध्र प्रदेश बना। मात्र 55 बरस बाद ही आंध्र के भीतर तेलंगाना की मांग उठी। आज वही दावानल है। राजस्थान और मध्य प्रदेश (राज्य क्षेत्र अंतरण) अधिनियम द्वारा राजस्थान का एक भाग मध्य प्रदेश को मिला। मात्र 40 वर्ष बाद मध्य प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम के जरिए छत्तीसगढ़ बना। बिहार और पश्चिम बंगाल अधिनियम 1956 द्वारा बिहार से प:िम बंगाल को कुछ हिस्से दिए गए लेकिन 43 वर्ष के भीतर ही बिहार को तोड़कर झारखंड बना। गोरखालैंड की मांग जारी है। पंजाब को तोड़कर 1966 में हरियाणा बना। नागालैंड 1962 में बना। उत्तर प्रदेश के एक हिस्से को अलग कर उत्तरांचल बना था लेकिन उत्तर प्रदेश के भी पुनर्विभाजन की मांगें हैं। मुंबई को तोड़कर गुजरात बने अभी 50 वर्ष ही हुए हैं कि विदर्भ की मांग सिर पर है। भारत के राज्य सम्यक विचारोपरांत नहीं बनाए गए। इस कार्रवाई को भाषा के साथ-साथ राजनीतिक आग्रहों और आंदोलनों ने भी प्रभावित किया है। लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों का नया परिसीमन संवैधानिक बाध्यता है। इसी तर्ज पर एक निर्धारित समय के बाद राज्यों का भी नया परिसीमन क्यों नहीं हो सकता? राजनीतिक कारणों से नए राज्यों की ही मांगें आती हैं। वर्तमान राज्यों को जोड़कर बड़ा राज्य बनाने की मांगें कभी नहीं आतीं। वर्तमान राज्य-व्यवस्था में तमाम खामियां हैं। वर्तमान राज्यों के भूक्षेत्र और आबादी में जमीन-आसमान का फर्क हैं। सुशासन और विकास की मांगों के मद्देनजर आदर्श राज्य का कोई मॉडल तो बनाना ही होगा। देश के सभी राज्यों की आबादी और भूक्षेत्र लगभग एक समान क्यों नहीं हो सकते? केवल तोड़ने के ही नहीं, जोड़ने के भी मानक बनाए जाने जरूरी हैं। राज्यों की समूची शक्ति संविधान ने दी है। ऐसी शक्तिशाली संस्था के गठन का कोई औचित्य तो तय करना ही होगा-आबादी, भूक्षेत्र, सांस्कृतिक विविधता, क्षेत्रीय वैशिष्टय, भौगोलिक आधार या सिर्फ राजनीतिक आग्रह। आखिरकार भारत को और कितने राज्य चाहिए? और क्यों चाहिए? वर्तमान संविधान तंत्र 63 वर्ष पूरे कर चुका है, लेकिन आम जनता को संतुष्टि नहीं मिली। निर्मम पूंजीवाद बढ़ा है, कथित राष्ट्रीय विकास दर वस्तुत: पूंजीपतियों की बढ़ी आमदनी है। राजनीति में पूंजी का विनियोग बढ़ा है। इसलिए व्यवसायी राजनेता बढ़े हैं। उनके लिए बड़े कमाऊ पदों की जरूरतें बढ़ी हैं। नए राज्यों की मांगों के पीछे एक कारण यह भी है, लेकिन विकास के धन का अभावग्रस्त क्षेत्रों में हस्तांतरण और उचित तरीके से परिव्यय भी महत्वपूर्ण कारण है। राष्ट्रीय विकास की योजनाएं केंद्रीय योजना आयोग बनाता है। भारी भरकम मंत्रिपरिषद के बावजूद योजना आयोग की अतिसक्रियता का क्या उपयोग है? वित्त आयोग की सिफारिशों का मूल आधार क्या है? विकास की योजनाएं केंद्र क्यों बनाता है? भारत विशाल भूक्षेत्र है। प्रत्यक्ष क्षेत्र की अपनी जरूरतें हैं। अपनी समस्याएं हैं। विकास की योजनाएं जिला/मंडल स्तर पर स्थानीय जरूरतों के अनुसार क्यों नहीं बन सकतीं? राज्यों का पुनर्गठन प्रबंधन सिद्धांत के अनुसार कीजिए। एक राज्य इकाई के मानक, आधार और औचित्य तय कीजिए। सभी राज्यों की एक जैसी विधानसभा, विधायक संख्या तय कीजिए। नया राज्य पुनर्गठन आयोग बनाइए। संसदीय सीटों परिसीमन की तर्ज पर सभी दलों, सांसदों, विधायकों से परामर्श लीजिए। आर्थिक सामाजिक, भूक्षेत्रीय जनसांख्यिकीय सरोकारों को जोडि़ए। भाषा, मजहब और राजनीतिक दुराग्रहों से मुक्त होकर कुछ राज्य तोडि़ए, कुछ राज्य जोडि़ए। 40-50 या इससे भी कम-ज्यादा राज्य बनाइए। रोज-रोज का टंटा खत्म किया जाना बहुत जरूरी है। नए राज्यों को लेकर उठने वाली रोजमर्रा मांगों से राष्ट्र की बड़ी क्षति हुई है। (लेखक उप्र विधान परिषद के सदस्य हैं)


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