Thursday, January 13, 2011

एक पोस्टमार्टम का मेहनताना 10 रुपये

उत्तर प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में कार्यरत डॉक्टर पोस्टमार्टम (पीएम) नहीं करना चाहते, लेकिन नौकरी की मजबूरी में न चाहते हुए भी उन्हें यह काम करना पड़ता है। दरअसल राज्य सरकार पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर को दस और फार्मेसिस्ट को चार रुपये देती है, जो मनरेगा मजदूरों की दिहाड़ी का दसवां हिस्सा भी नहीं है। पीएम के दौरान डाक्टर द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट में मौत की वजह स्पष्ट होती है। मामला संगीन होता है तो डॉक्टरों को अपने खर्च पर अदालतों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। सरकारी नौकरी है सो तैनाती बदलती रहती है लेकिन जहां का मुकदमा होता है वहां की अदालतें तलब कर लेती हैं। कई बार तो संबंधित डॉक्टरों और फार्मेसिस्टों के खिलाफ वारंट भी जारी हो जाते हैं। उत्तर प्रदेश के सरकारी डॉक्टर मरीजों का उपचार करने के साथ ही मृतकों का पोस्टमार्टम भी करते हैं। रूटीन से अलग हटकर किए जाने वाले इस काम के लिए सरकार चिकित्सक को दस व फार्मासिस्ट को 4 रुपये का भुगतान करती है। 40 साल पहले तय की गई इस रकम में संशोधन की जरूरत आज तक महसूस नहीं की गई। नाम न छापने की शर्त पर पोस्टमार्टम करने पहुंचे जिला अस्पताल के एक डाक्टर ने बताया कि उन्होंने तो भत्ता लेना ही छोड़ दिया है। पिछले वर्ष उन्होंने भत्ते की रकम पीएमएस को दे दी थी। वह कहते हैं कि पोस्टमार्टम करना मुश्किल नहीं, कठिनाई कोर्ट के चक्कर लगाने पर होती है। वह कई जगह तैनात रह चुके हैं इसलिए दूसरे जिलों की अदालत में भी जाना पड़ता है। वहां आने-जाने में सैकड़ों रुपये खर्च होते हैं। ऊपर से किसी कारण कोर्ट बंद होने या मजिस्ट्रेट के न बैठने पर नौकरी बचाना मुश्किल हो जाती है। इसी कारण वह पीएम करना नहीं चाहते, लेकिन जबरन ड्यूटी लगा दी जाती है। उन्होंने कहा, वैसे नियम तो यह है कि पीएम हाउस पहुंचने वाले सिपाही को ये पैसे तुरंत स्टाफ को नगद दे देना चाहिए। लेकिन नगद छोडि़ए अगर पैसे लेने हैं तो डॉक्टरों को खुद इस बात का ब्यौरा रखना पड़ता है कि उन्होंने कितने पोस्टमार्टम किए। पीएमएस के पूर्व अध्यक्ष,डा. शशि कांत सक्सेना ने कहा, पीएम भत्ते के दस रुपये देना डॉक्टर का मजाक उड़ाना है। मजदूरी भी इस समय 150 रुपए से कम नहीं है। इन्हीं सब के चलते डाक्टर पीएमएस में नहीं आना चाहते।

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