Friday, March 4, 2011

जातीय जनगणना और सामाजिक सुरक्षा


मूल स्वरूप में जनसंख्या में बदलाव जैविक घटना होने के साथ समाज में सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक व आर्थिक आधारों को प्रभावित करती है। राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना, स्कूलों में दोपहर का भोजन, बीपीएल और एपीएल के माध्यम से आहार का आधार बनाए जाने के कारण भी सटीक जनगणना जरूरी है। इसलिए जातिवार जनसंख्या का लक्ष्य देश के गरीब व वंचित वर्ग को खाद्य और पेयजल जैसी सुरक्षा का उपाय तो होगा ही, सरकारी सेवाओं में आरक्षण किस जाति और वर्ग के लिए जरूरी है, इसकी भी झलक इससे मिलेगी
देश के लोकतांत्रिक सदनों में अब मामले इस दृष्टि से ज्यादा उछाले जाते हैं ताकि विपक्ष को प्रचार मिले अन्यथा जातीय जनगणना के मुद्दे को फिर से उठाने की जरूरत ही नहीं थी। यूपीए सरकार पहले ही जाति आधारित जनगणना का फैसला ले चुकी है। हालांकि पिछड़े तबके से जुड़े लालू, मुलायम और शरद यादव जैसे नेताओं का कहना है कि केवल जाति की गणना से काम चलने वाला नहीं है बल्कि जातियों की आर्थिक, सामाजिक और शैक्षिणक स्थिति का भी पता लगाना चाहिए। जातिगत गिनती के साथ सामाजिक सुरक्षा से जुड़े आंकड़े सामने आते हैं तो इसमें हर्ज नहीं है। गणना की इस पण्राली से कई अहं व नए पहलू सामने आएंगे। वृहत्तर हिन्दू समाज (हिन्दू, जैन, बौद्ध, सिख) में जिस जातीय संरचना को ब्राrाणवादी व्यवस्था का दुष्चक्र माना जाता है, हकीकत में यह कितनी पुख्ता है, इसका खुलासा होगा। मुसलमानों में भी जातिप्रथा पर पर्दा डला है। पिछड़ों की समृद्ध जातियां जाति आधारित जनगणना पर इसलिए दबाव डालती चली आ रही हैं ताकि पिछड़ों को उनके जातीय प्रतिशत के हिसाब से आरक्षण सुविधा का लाभ मिले। आर्थिक और शैक्षिक आंकड़े सामने आने पर आरक्षण की सुविधा से यदि संपन्न पिछड़ों को अलग किया जाता है तो इन आंकड़ों की महत्ता सार्थक होगी। इस तथ्य को नहीं नकारा जा सकता है कि जाति एक चक्र है। यदि जाति चक्र न होती तो अब तक टूट गयी होती। जाति पर जबरदस्त कुठारघात महाभारत काल के भौतिकवादी ऋषि चार्वाक ने किया था। बुद्ध भी धर्म, जाति और वर्णाश्रित व्यवस्था तोड़ समग्र भारतीय नागरिक समाज के लिए समान आचार संहिता प्रयोग में लाए। चाणक्य ने जन्म और जातिगत श्रेष्ठता को तिलांजलि देते हुए व्यक्तिगत योग्यता को मान्यता दी। नानक ने जातीय अवधारणा को अमान्य करते हुए राजसत्ता में धर्म के उपयोग को मानवाधिकारों का हनन माना। कबीर ने भी कहा कि जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजियो ज्ञान। महात्मा गांधी के जाति प्रथा तोड़ने के प्रयास इतने अतुलनीय थे कि उन्होंने ‘अछूतोद्धार’ जैसे आंदोलन चला उनके काम दिनचर्या में शामिल कर आचरण में आत्मसात किये। पर इतने सार्थक प्रयासों के बाद भी जाति टूट नहीं पाई। क्योंकि कुलीन हिन्दू मानसिकता, जाति तोड़क कोशिशों के समानांतर अवचेतन में पैठ जमाए अपनी जातीय अस्मिता और उसके भेद को लेकर लगातार संघर्ष करती रही है। इसी मूल की प्रतिच्छाया हम पिछड़ों और दलितों में देख सकते हैं। मुख्यधारा में आने के बाद न पिछड़ा, पिछड़ा रह जाता है न दलित, दलित। वह भी उन्हीं ब्राrाणवादी हथकंडों को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने लगता है, जो ब्राrाणवादी व्यवस्था के हजारों साल रहे। जातिवार जनगणना और उससे वर्तमान आरक्षण पद्धति में परिवर्तन की उम्मीद को लेकर पिछड़े तबके के नेताओं का जोर है कि पिछड़ी जातियों की गिनती अनुसूचित जाति व जनजातियों की तरह कराई जाए। क्योंकि आरक्षण के संदर्भ में संविधान के अनुच्छेद 16 की जरूरतों को पूरा करने के लिए यह पहल जरूरी है। लेकिन आरक्षण किसी भी जाति के समग्र उत्थान का मूल कभी नहीं बन सकता। आरक्षण के सामाजिक सरोकार केवल संसाधनों के बंटवारे और उपलब्ध अवसरों में भागीदारी से जुड़े हैं। आरक्षण की मांग अब शिक्षित बेरोजगारों को रोजगार और ग्रामीण अकुशल बेरोजगारों के लिए सरकारी योजनाओं में हिस्सेदारी से जुड़ गई है। परंतु जब तक सरकार समावेशी आर्थिक नीतियां अमल में लाकर आर्थिक रूप से कमजोर लोगों तक नहीं पहुंचती तब तक पिछड़ी, निम्न जाति अथवा आय के स्तर पर पिछले छोर पर बैठे व्यक्ति के जीवन स्तर में सुधार नहीं आ सकता। लेकिन पूंजीवाद की पोषक सरकारें समावेशी आर्थिक विकास की पक्षधर क्योंकर होगी? हमारा संविधान प्रत्येक देशवासी को भोजन का अधिकार तो देता है लेकिन सरकारें भूमि के व्यावसायिक अधिग्रहण को जायज ठहराती हैं और साधारण नमक और कंपनियों को पानी का अधिकार दे बुनियादी हकों की समस्याएं खड़ी करती हैं। अक्सर कहा जाता है कि इस्लाम में जातिप्रथा की गुंजाइश नहीं है। इसलिए ज्यादातर मुसलमान जाति आधारित जनगणना नकारते हुए उसके प्रारूप में केवल धर्म और लिंग दर्ज करते हैं। जाति का खाना अक्सर खाली छोड़ दिया जाता है अथवा उसमें मुसलमान लिख दिया जाता है जबकि एम एजाज अली के मुताबिक मुसलमान भी चार श्रेणियों में विभाजित हैं। उच्च वर्ग में सैयद, शेख, पठान, अब्दुल्ला, मिर्जा, मुगल, अशरफ जातियां शुमार हैं तो पिछड़े वर्ग में कुंजड़ा, जुलाहा, धुनिया, दर्जी, रंगरेज, डफाली, नाई, पमारिया आदि। पठारी क्षेत्रों में रहने वाले मुस्लिम आदिवासी जनजातियों की श्रेणी में आते हैं। अनुसूचित जातियों के समतुल्य धोबी, नट, बंजारा, बक्खो, हलालखोर, कलंदर, मदारी, मोची आदि हैं। मुस्लिमों में ये ऐसी प्रमुख जातियां हैं जो पूरे देश में लगभग इन्हीं नामों से जानी जाती हैं। इसके अलावा अन्य राज्यों में ऐसी कई जातियां हैं जो क्षेत्रीयता के दायरे में हैं। जैसे बंगाल में मंडल, विास, चौधरी, राएन, हलदार, सिकदर आदि। यही जातियां बंगाल में मुस्लिमों में बहुसंख्यक हैं। इसी तरह दक्षिण भारत में मरक्का, राऊथर, लब्बई, मालाबारी, पुस्लर, बोरेवाल, गारदीय, बहना, छप्परबंद आदि। उत्तर-पूर्वी भारत के असम, नगालैंड, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर आदि में विभिन्न उपजातियों के क्षेत्रीय मुसलमान हैं। राजस्थान में सरहदी, फीलबान, बक्सेवाले आदि हैं। गुजरात में संगतराश, छीपा जैसी अनेक नामों से जानी जाने वाली बिरादरियां हैं। जम्मू-कश्मीर में ढोलकवाल, गुडवाल, बकरवाल, गोरखन, वेदा (मून) मरासी, डुबडुबा, हैंगी आदि जातियां हैं। इसी प्रकार पंजाब में राइनों और खटीकों की भरमार है। इतनी प्रत्यक्ष जातियों के बावजूद मुसलमानों को लेकर भ्रम है कि ये जातीय दुष्चक्र की गुंजलक में नहीं जकड़े हैं। जाति-विच्छेद पर आवरण कुलीन मुस्लिमों की रणनीति माना जा सकता है। मुसलमानों के सच्चे रहनुमाओं को कोशिश करनी चाहिए कि उनकी गिनती जाति आधारित हो। 1931 में हुई जनगणना में बिहार और उड़ीसा में मुसलमानों की तीन बिरादरियों का जिक्र है- मुस्लिम डोम, मुस्लिम हलालखोर और मुस्लिम जुलाहे। बाकी जातियों को क्यों हटाया गया, इसकी पड़ताल हो तो अच्छा है। ऐसा होता है तो वास्तविक रूप से आर्थिक बदहाली झेल रही जातियों को सरकारी लाभ की योजनाओं से जोड़ा जा सकेगा। पारसियों की घटती आबादी की स्थिति भी जातीय गणना से साफ होगी। क्योंकि हाल में इस समुदाय को प्रजनन सहायता योजना चलाकर जनसंख्या वृद्धि दर बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया गया है। जनगणना में ऐसे उपायों का भी सख्ती से पालन होना चाहिए था जिससे बांग्लादेशी घुसपैठिए इस पंजी में दर्ज न हो पाते? लेकिन ऐसा नहीं किया गया। इनकी भी गिनती होगी। जबकि ये देश के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करने और सुरक्षा की दृष्टि से भारी बोझ हैं। मूल स्वरूप में जनसंख्या में बदलाव जैविक घटना के साथ समाज में सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक व आर्थिक आधारों को प्रभावित करती है। राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना, स्कूलों में दोपहर भोजन, बीपीएल और एपीएल के माध्यम से आहार का आधार बनाए जाने के कारण भी सटीक जनगणना जरूरी है। इसलिए जातिवार जनसंख्या का लक्ष्य देश के गरीब व वंचित वर्ग को खाद्य और पेयजल जैसी सुरक्षा का उपाय तो होगा ही, सरकारी सेवाओं में आरक्षण किस जाति और वर्ग के लिए जरूरी है, इसकी भी झलक मिलेगी। इस लिहाज से मुस्लिम समाज के रहनुमाओं को भी अंतिम छोर पर बैठे अपने समाज की जातिवार जनगणना पर जोर देना चाहिए।


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