लेखक जनांदोलन की आड़ में समाज को बंधक बनाने की प्रवृत्ति पर चिंता जता रहे हैं…
जनांदोलन जनतंत्र का राष्ट्रधर्म होते हैं। मध्यकाल का भक्ति आंदोलन ऐसा ही था। इसने उत्तर से दक्षिण तक राष्ट्र की भावात्मक एकता को मजबूती दी। 1857 का गदर भी पहले जनांदोलन बना और बाद में दमन के कारण स्वाधीनता संग्राम हो गया। अमेरिकी समाज ने अंग्रेजी गुलामी से मुक्ति के लिए जनांदोलन चलाया, बाद में नस्लभेद से मुक्ति के लिए भी सफल आंदोलन हुआ। अफ्रीका में नेल्सन मंडेला ने गांधीवादी तरीके से लंबा जनांदोलन चलाया। गांधी के स्वदेशी आंदोलन से राष्ट्रीय जागरण हुआ, इसी जागरण से बहुआयामी आंदोलन निकले, 1920, 1930 व 1942 के आंदोलनों की आत्मा स्वदेशी थी। गांधी के नेतृत्व में हजारों आंदोलन हुए। उनसे बड़ा आंदोलनकारी दुनिया में दूसरा नहीं हुआ। उन्होंने आंदोलन की एक आदर्श संस्कृति विकसित की। सत्याग्रह को हृदय परिवर्तन का अस्त्र बताया, हिंसा, तोड़फोड़ और उपद्रवों को गलत बताया और इसके लिए अपने पक्ष की भी सार्वजनिक निंदा की। स्वाधीनता संग्राम ने राजनीति, आंदोलन और सार्वजनिक जीवन को अनेक उदात्त मूल्य दिए, लेकिन हाल के दो दशकों से आंदोलनों की दशा, दिशा, नीति और नीयत पर तमाम सवाल उठे हैं। ताजा जाट आरक्षण आंदोलन के रेलजाम और राजधानी की नाकेबंदी जैसे प्रयासों से जनांदोलन के ही मूल सरोकारों पर राष्ट्रीय बहस की जरूरत महसूस की जा रही है। भारत अनेक आंदोलनों की चपेट में है। उत्तर प्रदेश के किसान आंदोलित हैं। टप्पल-मथुरा, आगरा, करछना बारा आदि के किसानों ने जमीन छीने जाने के विरोध में लाठी-गोली खाई है। दादरी, घोड़ी-बछेड़ा, बादलपुर आदि के किसान प्रतिरोध 5-6 बरस के भीतर की घटनाएं हैं। गंगा एक्सप्रेस वे और यमुना एक्सप्रेस वे में लाखों किसानों की जमीन जा रही है। झारखंड के आदिवासी 15 बरस से लड़ रहे हैं। सारे देश में आदिवासियों की उपेक्षा है। एकता परिषद के नेतृत्व में हजारों आदिवासियों ने 300 किलोमीटर लंबी यात्रा की थी। महंगाई और भ्रष्टाचार राष्ट्रीय समस्या हैं। दोनों मुद्दों को लेकर तमाम आंदोलन हुए, लेकिन केंद्र ने किसी भी आंदोलन को महत्व नहीं दिया। बिजली, पानी, जनस्वास्थ्य और पुलिस अत्याचारों के विरुद्ध होने वाले आंदोलन स्थानीय जिला प्रशासन द्वारा दबाए जा रहे हैं। जनतांत्रिक सत्ता द्वारा ही जनरोष की जनतांत्रिक अभिव्यक्ति की उपेक्षा खतरनाक है। सरकार हिंसा की भाषा जल्दी सुनती है, लेकिन गांधीवादी आंदोलनों की उपेक्षा करती है। परिणाम सामने हैं। आंदोलनों की प्रवृत्ति हिंसक हो रही है। कुछेक अपवाद छोड़ राजनीतिक दलों के आंदोलन प्राय: कर्मकांड साबित होते हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य, रोटी और रोजी जैसी बुनियादी समस्याओं पर आंदोलन नहीं होते। तात्कालिक राजनीतिक लाभ-हानि से जुड़े आंदोलन रस्म अदायगी सिद्ध होते हैं। आंदोलन लोकतंत्र का जीवन प्रवाह हैं, लेकिन आरक्षण वाले आंदोलन समूह स्वार्थ से जुड़े होते हैं। शेष समाज उनकी चपेट में आता है। जाट आरक्षण का औचित्य-अनौचित्य अलग विषय है, लेकिन होली जैसे पर्व पर लाखों लोगों की यात्राएं बाधित होना और बीते 21 दिन में सैकड़ों रेलसेवाओं का निरस्त होना असाधारण मसला है? गुर्जर आरक्षण आंदोलन में भी व्यापक अराजकता थी? आरक्षण से जुड़े अन्य तमाम आंदोलनों में भी व्यापक क्षति हुई थी। आरक्षण आंदोलनों में राजनीतिक दल वोट बैंक के हिसाब से मौन या मुखर होते हैं। बाकी जनमानस लाचार रहता है। कश्मीरी अलगाववादी आंदोलनकारी सुरक्षा बलों पर पत्थर चला रहे थे। क्या इसे भी जनांदोलन की श्रेणी में गिना जाना चाहिए? जनांदोलन का उद्देश्य लोकमत का निर्माण और सरकार का ध्यानाकर्षण होता है। जनता को बंधक बनाकर या सुरक्षाबलों को पीटकर जनसहानुभूति नहीं मिलती। जनतंत्र संवाद से चलता है, सतत संवाद से कामयाब होता है। जन और सत्ता का संवाद जरूरी है। 1930 के आंदोलन के पहले उन्होंने कहा कि अपनी प्रगति के लिए पूरा अवसर पाने की दृष्टि से अन्य देशवासियों की तरह हिंदुस्तान के लोगों को स्वाधीनता पाने, अपनी मेहनत का सुख भोगने और जीवन के लिए आवश्यक वस्तुओं को पाने का पूर्ण अधिकार है। गांधीजी की यह बात 80 बरस पुरानी है, लेकिन स्वतंत्र भारत के सत्ताधीशों पर आज भी लागू होती है। आमजन आखिरकार क्या करें? क्या अगले चुनाव का इंतजार करें? कोरे संविधानवाद की दृष्टि से यह एक आदर्श विचार होगा, लेकिन डॉ. लोहिया ने कहा था कि जिंदा कौमें 5 साल तक इंतजार नहीं करतीं। जन दुखी होते हैं, आहत होते हैं, उनकी सुनवाई नहीं होती तो वे आंदोलित होते हैं। प्राणवान जनतंत्र के लिए विचारनिष्ठ जनांदोलन जरूरी हैं, लेकिन सरकारों का चरित्र लगातार संवेदनहीन हो रहा है। वे आंदोलनों को कुचल रही है। बड़े वर्ग में आंदोलनों के प्रति घृणा का भाव बढ़ा है। इसका मूल कारण निहित स्वार्थी आंदोलन हैं। न्यायालयों ने बंद पर रोक लगाई थी। इस पर तमाम सवाल उठे, लेकिन जाट आरक्षण आंदोलन पर कोर्ट का फैसला आमजनों को अच्छा लगा। दरअसल पीछे दो दशकों के बीच आंदोलनों की प्रवृत्ति में काफी बदलाव आए हैं। स्थानीय स्तर के आंदोलन बढ़े हैं, यह शुभ लक्षण है, लेकिन व्यापक राष्ट्रीय हित वाले आंदोलन घटे हैं। जेपी का संपूर्ण क्रांति आंदोलन व्यापक राष्ट्रीय हितों से जुड़ा हुआ था। वीपी सिंह का बोफोर्स भ्रष्टाचार आंदोलन समूचे उत्तर भारत में था। श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन ने अखिल भारतीय सांस्कृतिक जागरण किया था। गंगा, यमुना, जल, जमीन, जंगल से जुड़े पर्यावरण संबंधी आंदोलन बेशक प्रशंसनीय हैं, लेकिन विदेशी पूंजी के भारी हस्तक्षेप को लेकर आंदोलन न होना निराशाजनक है। रोजी-रोजगार, नि:शुल्क स्वास्थ्य सुविधाएं, भ्रष्टाचार मुक्त शासन, अत्याचार मुक्त पुलिस बल के बुनियादी प्रश्न आंदोलन का विषय नहीं बने हैं। निहित स्वार्थी आंदोलन हिंसक उपायों से सरकारों को दबा लेते हैं, लेकिन शांतिपूर्ण आंदोलनकारियों की कोई सुनवाई नहीं होती। जाट और गुर्जर आरक्षण समर्थकों सहित सभी आंदोलनकारियों से फौरन वार्ता न करने का क्या तुक है? पिछले महीने उत्तर प्रदेश में प्रोन्नति में आरक्षण को लेकर जाति युद्ध जैसी स्थिति बनी, सरकार ने फौरन बातचीत क्यों नहीं की? राज्य सरकार ने आंदोलन का स्थान विधानसभा मार्ग से हटाकर ज्योतिबाफुले मार्ग कर दिया है? कई अन्य राज्यों ने भी प्रदर्शन के स्थान बदले हैं। जरूरी है कि आंदोलन के आचारशास्त्र पर राष्ट्रीय बहस हो, असहमति और सविनय अवज्ञा का अधिकार हमारे जनतंत्र की पूंजी है। (लेखक उप्र विधानपरिषद के सदस्य हैं)
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