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Sunday, March 27, 2011

यह कैसी दबंगई है भाई


जाट संघर्ष समिति के आंदोलन से हम सबका भारी नुकसान हो रहा है। ऐसा आंदोलन क्यों, जिसका सबसे ज्यादा नुकसान हमें ही होना है। अंग्रेज चले गए लेकिन आंदोलन में सरकारी सम्पत्तियों को नुकसान पहुंचाने के तरीके को हमने बदलने की कोशिश नहीं की। अब सरकार हमारी है, सरकारी सम्पत्ति हमारे पैसे से बनी है। लेकिन विरोध करते वक्त यह सब हम भूल जाते हैं। अपने ही भाई-बहनों को नुकसान पहुंचाने से हम बाज नहीं आते हैं। वह भी ऐसी मांगों को लेकर जो दादागीरी के अलावा कुछ नहीं है। लोकतंत्र में मांगें उठाना जायज है। लेकिन मांगें मनवाने के तौर-तरीके बदलने की जरूरत नहीं है क्या?
छात्रों को फीस में कटौती चाहिए तो वे अपनी मांग मनवाने के लिए सरकारी बसें जला देते हैं। किसी ग्रुप को किसी खास जगह पर रेलवे स्टेशन बनवाना है तो अपनी मांग बुलंद करने के लिए पुलिस थाने में आग लगा दी जाती है। महंगाई के विरोध में जुलूस निकलते हैं लेकिन अचानक वे हिंसक हो जाते हैं। उद्देश्य होता है, महंगाई का विरोध लेकिन होता यह है कि दुकानें जला दी जाती हैं, बसें जला दी जाती हैं, बस स्टैंड तोड़ दिए जाते हैं, पुलिस वैन को तोड़ा जाता है। दुकानें जलाने से क्या महंगाई कम हो जाएगी? क्या बसें जलाने से कॉलेज की फीस कम हो जाएगी? क्या थाना जलाने से रेलवे स्टेशन बन जाएगा? अब उत्तर प्रदेश और हरियाणा में जाट आंदोलन को ही ले लीजिए। जाट देश के सबसे समृद्ध वगरे में से एक है। 18 वीं सदी में राजस्थान, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में इनका राज चलता था। 1752 में तो भरतपुर सल्तनत का क्षेत्रफल पांच हजार किलोमीटर से भी ज्यादा था। करीब सौ साल पहले जब अंग्रेजों ने दिल्ली को राजधानी बनाने का फैसला किया तो जाट समुदाय को इसका खूब फायदा मिला। राजधानी और उसके आसपास के इलाकों की जमीन की मिल्कियत उन्हीं के पास ही थी। दिल्ली के राजधानी बनने से यहां जमीन की कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई। आजादी के बाद हरित क्रांति के लिए भी वही इलाके चुने गए जहां जाटों का बोलबाला था। हरित क्रांति से बड़े किसानों को खूब फायदा हुआ और बड़े किसानों में जाट समुदाय के ही ज्यादा लोग थे। बात शिक्षा की हो या फिर सरकारी महकमे में ऊंचे ओहदे की, बात राजनीति की हो या फिर कला और विज्ञान की, जाट समुदाय के लोगों ने हर क्षेत्र में बहुत ही अच्छा काम किया है। लेकिन इस समुदाय को अब सरकारी नौकरियों में आरक्षण चाहिए। इनको अदर बैकर्वड क्लास यानी ओबीसी का दर्जा चाहिए। ओबीसी में उन्हें रखा गया है जो सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े रहे हैं। जिस कौम ने कभी देश के बड़े इलाके पर राज किया हो, उसके बारे में यह कहना कि वह सामाजिक पिछड़ेपन की शिकार रही है, सही नहीं होगा। आर्थिक पिछड़ेपन के कुछ मामले हो सकते हैं। लेकिन आर्थिक पिछड़ेपन का शिकार तो देश की आबादी का बड़ा हिस्सा है ही। क्या गरीब ब्राह्मण नहीं हैं, क्या आर्थिक रूप से तंग क्षत्रियों की कमी है। वैश्य समुदाय में भी कई ऐसे हैं जिनको दो वक्त की रोटी नसीब नहीं होती है। जिस देश की कुल आबादी का एक तिहाई से ज्यादा हिस्सा गरीबी रेखा से नीचे हो, वहां हर जाति या समुदाय का एक बड़ा हिस्सा आर्थिक बदहाली में होगा ही। ऐसे में क्या हर जाति और समुदाय को रिजव्रेशन दे दिया जाए। लेकिन अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति को लगता है कि जाट समुदाय के हर मर्ज की दवा रिजव्रेशन ही है। अपनी मांग मनवाने के लिए समिति पिछले तीन हफ्ते से आंदोलन कर रही है। अब आंदोलन का नमूना देखिए। समिति ने ज्योतिबा फुले नगर के काफूरपुर में नेशनल हाईवे नम्बर 24 को लगभग बंद कर दिया गया है। दिल्ली से पूर्व की तरफ जाने वाली ट्रेनों को रोका जा रहा है। इसकी वजह से हर दिन सैकड़ों ट्रेनें रद्द हो रही हैं। अकेले शुक्रवार को 81 ट्रेनें रद्द हुई। रेलवे की तबाही का यह हाल है कि उसे हर दिन करीब 100 करोड़ रुपए का नुकसान हो रहा है। हरियाणा में हो रहे आंदोलन से पावर प्लांट को कोयला नहीं मिल रहा है। हाल यह है कि जहां राज्य में 3200 मेगावाट बिजली उत्पादन की क्षमता है वहां महज 1800 मेगावाट बिजली का ही उत्पादन हो रहा है। हरियाणा एक समृद्ध और इंडस्ट्रियल राज्य है, जहां हजारों इंडस्ट्रियल यूनिटें लगी हैं। इन यूनिट्स को बिजली नहीं मिल रही है। किसानों को भी बिजली समय से नहीं मिल पा रही है। अभी तो इन इलाकों में गर्मी का मौसम शुरू ही हुआ है। फर्ज कीजिए कि तापमान बढ़ता गया और बिजली गुल रही तो लोगों को कितनी तकलीफ होगी। साथ ही हजारों करोड़ रुपये का नुकसान तो हो ही रहा है। लेकिन आंदोलन करने वाले इतने से नहीं मानने वाले हैं। उनके निशाने पर हैं राजधानी दिल्ली। अपनी मांग मनवाने के लिए वे दिल्ली में बाहर से आने वाले जरूरी सामानों की सप्लाई को बाधित करना चाहते हैं। वैसे सुप्रीम कोर्ट की हिदायत के बाद सम्भव है कि ऐसा न हो। लेकिन मेरा सवाल है कि इस तरह के आंदोलन की जरूरत क्या है? जाट संघर्ष समिति के आंदोलन से हम सबका भारी नुकसान हो रहा है। ऐसा आंदोलन क्यों, जिसका सबसे ज्यादा नुकसान हमें ही होना है। दरअसल, विरोध के इस तरीके की शुरुआत आजादी से पहले हुई थी। देश में सरकार अंग्रेजों की थी। अंग्रेज हमारे दुश्मन थे तो ऐसे में सरकार भी दुश्मनों की थी। उस समय आंदोलन का मतलब था, दुश्मन का विरोध और दुश्मन को नुकसान पहुंचाना ताकि वह तुरंत हमारी मांगें मान ले। अंग्रेज चले गए लेकिन आंदोलन में सरकारी सम्पत्तियों को नुकसान पहुंचाने के तरीके को हमने बदलने की कोशिश नहीं की। अब सरकार हमारी है, सरकारी सम्पति हमारे पैसे से बनी है। लेकिन विरोध करते वक्त यह सब हम भूल जाते हैं। अपने ही भाई-बहनों को नुकसान पहुंचाने से हम बाज नहीं आते हैं। वह भी ऐसी मांगों को लेकर जो दादागीरी के अलावा कुछ नहीं है। जाट देश के सबसे दबंग समुदायों में से एक है। लोकसभा की करीब 90 सीटों पर जाटों के वोट से जीत और हार का फैसला होता है। हरियाणा, पश्चिम उत्तर प्रदेश और राजस्थान की राजनीति में जाटों की दबंगई चलती है। हरियाणा में तो कई सालों से मुख्यमंत्री की कुर्सी इसी कौम के प्रतिनिधि को ही मिलती आ रही है। राजधानी दिल्ली के आसपास के इलाकों में इनका बोलबाला है। इन इलाकों पर कब्जा होने की वजह से इनकी ताकत और भी बढ़ जाती है। कहीं आरक्षण की मांग उसी दबंगई का नतीजा तो नहीं है? राजनीतिक दल तो इस दबंगई को अपने पक्ष में करने में लगे ही हुए हैं। लोकतंत्र में मांगें उठाना जायज है। लेकिन मांगें मनवाने के तौरत रीके बदलने की जरूरत नहीं है क्या?


बोझ बना आरक्षण


लेखक उच्चतम न्यायालय से आरक्षण की व्यवस्था को नए सिरे से परिभाषित करने की अपेक्षा कर रहे हैं…

इस माह के प्रारंभ में जाट समुदाय की ओर से दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश और हरियाणा के इलाकों में रेल ट्रैक बाधित करने का जो आंदोलन छेड़ा गया था वह इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश के उपरांत 17 दिन बाद यूपी में तो खत्म हो गया, लेकिन हरियाणा के जाट नेता करीब 21 दिन बाद तब रेल ट्रैक से हटे जब राज्य सरकार पिछड़ा वर्ग आयोग बनाने के लिए तैयार हुई। जाटों के इस आंदोलन के दौरान प्रतिदिन दर्जनों ट्रेनों को रद्द करना पड़ा और लाखों यात्रियों को तरह-तरह की असुविधा उठानी पड़ी। रेलवे को करोड़ों रुपये की चपत भी लगी। हरियाणा के जाट नेता जिस तरह हुड्डा सरकार को झुकाने में सफल रहे उससे यह साफ हुआ कि उन्होंने पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट और उच्चतम न्यायालय के निर्देशों की परवाह नहीं की। जाट नेताओं की दिल्ली को पानी, दूध, सब्जी आदि की आपूर्ति रोकने की धमकी को देखते हुए जब दिल्ली जल बोर्ड और इंडियन आयल ने उच्चतम न्यायालय की शरण ली तो उसने कड़ा रुख अपनाते हुए हरियाणा और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्रियों की ओर से जाट आंदोलन को समर्थन दिए जाने पर न केवल आपत्ति जताई, बल्कि यह भी सुनिश्चित करने को कहा था कि दिल्ली को आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति में कोई बाधा न पहुंचने पाए। इसी दिन पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को रेल ट्रैक खाली कराने के आदेश दिए थे, लेकिन उसकी अनदेखी हुई। ध्यान रहे कि यूपी के रेल ट्रैक तभी खाली हो पाए थे जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने जाट आंदोलनकारियों के प्रति सख्ती दिखाई थी। यह अचरज की बात है कि जाट आंदोलनकारी लगभग एक माह तक रेल यात्रियों को परेशान किए रहे, लेकिन यूपी और हरियाणा की सरकारों ने समय रहते कोई ठोस कदम उठाने से इंकार किया। उल्टे उनकी ओर से जाटों की आरक्षण संबंधी मांग का समर्थन किया गया। यह समझना कठिन है कि जाट आंदोलन के जिन तौर-तरीकों को न्यायपालिका ने गलत माना उन्हें कार्यपालिका क्यों सहन करती रही? अब क्या प्रथम दृष्टया अनुचित नजर आने वाले मामलों में भी उच्चतम न्यायालय को केंद्र और राज्य सरकारों को उनकी जिम्मेदारी का अहसास कराना पड़ेगा? सवाल यह भी उठता है कि क्या कार्यपालिका को हर पेचीदे सामाजिक मामले में न्यायपालिका की आड़ चाहिए? अब यह स्पष्ट है कि न तो केंद्र में सत्तारूढ़ दल आरक्षण संबंधी मांगों का विरोध करने के लिए तैयार हैं और न ही राज्यों में सत्तारूढ़ दल। दरअसल वे किसी समुदाय को नाराज नहीं करना चाहते, भले ही वे कोई अनुचित मांग गलत तरीके से ही क्यों न कर रहे हों? यह पहली बार नहीं है जब न्यायपालिका ने केंद्र अथवा राज्य सरकारों को उनकी जिम्मेदारी का अहसास कराया हो। ऐसे मामले सामने आते ही रहते हैं जिनमें न्यायपालिका को कार्यपालिका के कार्यक्षेत्र में दखल देने के लिए विवश होना पड़ता है। अब तो यह लगता है कि सत्ता में बैठे लोग इस इंतजार में रहते हैं कि न्यायपालिका का आदेश मिले तो वे अव्यवस्था को दूर करने की पहल करें। अनेक बार न्यायपालिका के दखल के चलते उसमें और कार्यपालिका में टकराव की नौबत आ जाती है। कोई मन-मुताबिक निर्णय न होने पर सरकारें न्यायपालिका पर अपने दायरे से बाहर जाकर काम करने का आरोप लगाने लगती हैं। बावजूद इसके आम आदमी की यह धारणा लगातार मजबूत हो रही है कि न्यायपालिका का चाबुक चलने पर ही सरकारें सक्रियता दिखाती हैं। ऐसी धारणा न तो कार्यपालिका के हित में है और न ही लोकतंत्र के, लेकिन समस्या यह है कि सरकारें अपनी वैधानिक और नैतिक जिम्मेदारी समझने के लिए तैयार नहीं। वे अक्सर समस्याओं के समाधान की पहल तभी करती हैं जब उनसे त्रस्त लोग अदालत का दरवाजा खटखटाते हैं। दरअसल जब राजनीतिक दल अपने संकीर्ण स्वार्थो को महत्व देते हैं तब उनके नेतृत्व वाली सरकारें आम आदमी की अपेक्षाओं पर खरा उतरने में नाकाम रहती हैं। ऐसी सरकारें तब और कमजोर साबित होती हैं जब समाज का कोई बड़ा या प्रभावशाली तबका आंदोलनरत होता है। वर्तमान में देश के विभिन्न हिस्सों से आरक्षण की मांगें उठ रही हैं। कभी-कभी ऐसा लगता है कि आरक्षण से वंचित प्रत्येक समुदाय यह मान बैठा है कि सरकारी नौकरियों में रियायत मिलने पर ही उनके लोगों का भला होगा। कोई भी यह सोचने-समझने के लिए तैयार नहीं कि सक्षम तबकों को आरक्षण देना प्रतिभा एवं दक्षता को नजरंदाज करना और एक प्रकार से अकर्मण्यता को बढ़ावा देना है। समय की मांग है कि आरक्षण के मौजूदा स्वरूप पर नए सिरे से बहस हो, लेकिन वोट बैंक की राजनीति के चलते कोई भी राजनीतिक दल आरक्षण व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव के लिए तैयार नहीं। चूंकि आरक्षण का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है इसलिए इस सुविधा से वंचित अनेक समुदाय खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं। स्थिति इसलिए और बिगड़ रही हैं, क्योंकि अनेक समुदायों को वोटों के लालच में आरक्षण प्रदान किया जा रहा है। कोई आश्चर्य नहीं कि केंद्र सरकार जाट नेताओं के समक्ष हथियार डाल दे। यदि जाटों को केंद्रीय सेवाओं में आरक्षण दे दिया जाता है तो यह तय है कि कोई अन्य समुदाय आरक्षण की मांग लेकर सामने आ जाएगा। यह भी हो सकता है कि अन्य पिछड़ा वर्गो में से कोई समुदाय खुद को अनुसूचित जाति में शामिल कराने की मांग करने लगे। अनेक समुदाय इस तरह की मांग कर भी रहे हैं। हालांकि देश के नेताओं को यह समझ में आने लगा है कि मौजूदा आरक्षण व्यवस्था पिछड़ों के उत्थान के बजाय महज वोट बैंक की राजनीति का हथियार बन गई है, लेकिन वे उसकी खामियों पर बोलने के लिए तैयार नहीं। आज इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती कि आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था पर संसद में कोई सार्थक बहस हो सकती है। राजनीतिज्ञों के रवैये को देखते हुए न्यायपालिका के दखल से ही आरक्षण की कोई तर्कसंगत व्यवस्था बनने की उम्मीद है। बेहतर हो कि उच्चतम न्यायालय की पूरी पीठ आरक्षण की नई व्यवस्था का निर्धारण करे। वह पहले भी आरक्षण के संदर्भ में महत्वपूर्ण आदेश जारी कर चुका है। बात चाहे अन्य पिछड़ वर्गो के आरक्षण को मान्यता देने की हो या आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से ज्यादा न होने की या फिर पिछड़े वर्गो में क्रीमी लेयर का निर्धारण करने की-ये सारे काम उच्चतम न्यायालय की ओर से ही किए गए। इसके पहले कि आरक्षण संबंधी मांगें देश को त्रस्त करें और सामाजिकविग्रह बढ़े,उच्चतम न्यायालय को आरक्षण को नए सिरे से परिभाषित करने के लिए आगे आना चाहिए। मौजूदा स्थितियों में यही एक मात्र उम्मीद की किरण है।