अंशु न्यूक्लियर पॉवर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड और फ्रांस की कंपनी अरेवा के बीच हुए समझौते से भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी के चेहरे पर जो खुशी आई, उसकी कीमत भारत के नागरिकों और भारतीय अर्थव्यवस्था को जैतापुर में चुकाने के लिए मजबूर किया जा रहा है। डॉ सिंह इस समय फ्रेंच न्यूक्लियर उद्योग को उबारने वाले तारणहार की भूमिका में हैं। हम यहां यदि होने वाले खर्च के मुद्दे पर चुप भी हो जाएं तो भी सुरक्षा का प्रश्न एक बड़ी चिंता का विषय है। जैतापुर में प्रस्तावित 9900 मेगावाट परमाणु ऊर्जा संयंत्र के लिए कुल 938 हेक्टेयर जमीन ली जानी है, जिसमें 669 हेक्टेयर जमीन माड़वन की है। मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चह्वाण कहते हैं कि स्थानीय लोग जमीन देने के लिए राजी हैं। जब उन्होंने खुद मुंबई में इस मुद्दे पर बातचीत के लिए माड़वन के लोगों को बुलाया तो उन्होंने इस बात से साफ इनकार किया। अब इसका क्या अर्थ निकाल जाए? गांव वालों का पक्ष साफ है कि बातचीत तो उस समय की जाए जब हमें भी अपनी बात कहने का मौका मिले और मुख्यमंत्रीजी उनकी बात सुनते हैं तो परियोजना कार्य रुक जाएगा यानी माड़वन में संयत्र लगाने का फैसला पहले से सुरक्षित है। जैतापुर परमाणु ऊर्जा संयत्र को लेकर कोंकण क्षेत्र में राजनीति तेज हो गई है। परमाणु ऊर्जा संयंत्र के पक्षकार जहां इसे विकास से जोड़कर देख रहे हैं। वहीं इस परियोजना के खिलाफ खड़े लोगों का मानना है कि यह परियोजना कोंकण के विनाश की कहानी का पहला अध्याय होगी। इस मसले पर पर्यावरणविदों का मानना है कि कोंकण की जमीन पर्यावरण के लिहाज से अति संवेदनशील है। यहां 275 किलोमीटर के क्षेत्रफल में जिस तरह परियोजनाओं पर एक साथ काम हो रहा है। उससे साफ है कि कोंकण पर किसी की बुरी नजर है। बेशक माड़वन का मुद्दा हम सभी के लिए गंभीर मुद्दा है। भिड़ कहते हैं, प्रत्यक्ष तौर पर प्रभावित होने वालों की संख्या भले ही दस हजार के आसपास नजर आ रही हो, लेकिन इससे वास्तव में प्रभावित होने वालों की संख्या लाखों में होगी। जैतापुर परियोजना से पूरा कोंकण प्रभावित होगा जो काफी दुर्भाग्यपूर्ण है। जैतापुर परमाणु ऊर्जा संयत्र के काम को छह चरणों में पूरा किया जाना है। योजना के अनुसार पहले चरण में 1650 मेगावाट की ईकाई का काम पूरा होगा। यह दोनों ईकाइयां रत्नागिरी जिले के माड़वन में होंगी। योजना के अनुसार इस परियोजना के पहले चरण को 2013-14 तक पूरा होना है और बचे चार ईकाइयों का काम भी 2018 तक पूरा कर लिया जाना है। वर्तमान में हमारे कुल बिजली उत्पादन मे परमाणु ऊर्जा की भागीदारी 2.90 प्रतिशत की है। देश में इसे 2020 तक बढ़ाकर छह प्रतिशत तक ले जाने की योजना है और 2030 तक इसे तेरह प्रतिशत की भागीदारी में बदल दिया जाएगा। इसके लिए माड़वन जैतापुर की तरह कई परियोजनाओं की देश को जरूरत होगी। बहरहाल बात जैतापुर की करते हैं। जिसमें पांच गांव माड़वन, मीठागवाने, करेल, वारिलवाडा और निवेली की 938 हेक्टेयर जमीन जानी है, लेकिन चर्चा में माड़वन गांव का नाम ही बार-बार आ रहा है। माड़वन को रत्नागिरी जिले में स्वतंत्रता सेनानियों के गांव के रूप में जाना जाता है। इस गांव में आधे दर्जन से अधिक स्वतंत्रता सेनानियों का परिवार रहता है। अंग्रेजों से लड़ने वालों के परिवारों को अब अपनी सरकार से लड़ना पड़ रहा है। वैसे उनके लिए अपनी सरकार अंग्रेज से भी अधिक क्रूर साबित हो रही है। कम से कम अंग्रेजों ने इन्हें अपने घरों से तो बेदखल नहीं किया था। परमाणु ऊर्जा संयत्र के लिए चुनी गई यह जमीन पर्यावरण के लिहाल से अति संवेदनशील है, क्योंकि यहां समुद्र का किनारा होने के साथ-साथ 150 किस्म के पक्षी और 300 किस्म की वनस्पतियां पाई जाती हैं। खास बात यह है कि इनमें कई वनस्पतियां और पक्षियां दुर्लभ श्रेणी में शुमार है। समुद्र के इस मनोरम तटीय क्षेत्र में एक दर्जन से अधिक परमाणु ऊर्जा संयत्र प्रस्तावित हैं, जबकि रत्नागिरी को राज्य सरकार ने हार्टीकल्चर जिला घोषित किया है और इसका पड़ोसी जिला सिंध दुर्ग गोवा से भी लगा हुआ होने के कारण पर्यटकों की खास पसंद रहा है। बड़ी संख्या में गोवा देखने के लिए आने वाले पर्यटक सिंध दुर्ग का रूख करते हैं। पर्यावरणविद इस बात से अचंभित है कि जिस रत्नागिरी को दुनिया भर मे जैव विविधता के हॉट स्पॉट के तौर पर देखा जाता है, उस जिले के लिए परमाणु ऊर्जा करार पर तब हस्ताक्षर होता है जबकि पूरी दुनिया अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता वर्ष का उत्सव मना रही है। साखरी नाटे मछुआरों की बस्ती है। वहां मिले मच्छीमार कृति समिति के उपाध्यक्ष अमजद बोरकर बताते हैं कि समुद्र के साथ हमारा रिश्ता पीढि़यों का है। हमारे पूर्वजों के समय से यह हमें रोटी दे रहा है। सरकार भले ही इस परियोजना को कोंकण और महाराष्ट्र के हित में बता रही है, लेकिन यह विकास का नहीं कोंकण की बर्बादी का समझौता है। टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साईस की एक रिपोर्ट के अनुसार परमाणु ऊर्जा संयत्र के लिए सरकार ने जो स्थान तय किया है वह बिल्कुल उपयुक्त नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक परियोजना का स्थानीय और पर्यावरणीय परिवेश पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ेगा। सरकार तथ्यों को तोड़-मरोड़ रही है और माड़वन के उपजाऊ जमीन को बंजर बनाकर कर पेश कर रही है। जैतापुर के जिस 626.52 हेक्टेयर जमीन को बंजर बताया जा रहा है। उस पर किसान धान, फल, सब्जी आदि उगा रहे हैं। वर्ष 2007 में बाढ़ के कारण बर्बाद हुई फसल का सरकार ने एक करोड़ सैंतीस लाख सात हजार रुपये का मुआवजा दिया था, यदि जमीन बंजर थी तो मुआवजा की जरूरत ही क्या थी? भूकंप के लिहाज से भी यह क्षेत्र जोन तीन में आता है, जिसमें परमाणु संयत्र को शुरू करना कम खतरे की बात नहीं है। स्थानीय लोगों के लिए रेडिएशन का मामला एक बड़ा मुद्दा है। इस बन रहे परमाणु ऊर्जा संयत्र के आसपास जो लोग रह रहे होंगे, उनके स्वास्थ पर इसका पड़ने वाला दुष्प्रभाव एक बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है। गांव वाले पूछते हैं, यदि यह परियोजना इतनी ही सुरक्षित है तो यहां काम करने वाले अधिकारियों के लिए आवास की व्यवस्था संयत्र से पांच-सात किलोमीटर दूर क्यों प्रस्तावित किया गया है? आखिर इस संयत्र में काम करने वाले अधिकारियों व कर्मचारियों के आवास की व्यवस्था परमाणु ऊर्जा संयत्र के परिसर में ही क्यों नहीं किया जा रहा। साफ है कि दाल में कुछ काला है और पूरे तथ्यों को छिपाया जा रहा है, जो जनहित के लिए ठीक नहीं। माड़वन (जैतापुर) में रहने वाले जानना चाहते हैं, यदि फ्रांसीसी कंपनी अरेवा उनके गांव आ रही तो यहां वह कोई समाज सेवा करने तो नहीं आ रही है। वह एक निजी कंपनी है, जो यहां कमाई के इरादे से आएगी और कोंकण की जमीन पर पहली बार वह अपने यूरोपियन प्रेसराइज्ड रिएक्टर तकनीक की जांच भी करेगी। इसे अभी तक कहीं जांचा-परखा नहीं गया है। क्या अरेवा भारत को परमाणु ऊर्जा संयत्र के नाम पर अपनी प्रयोगशाला के तौर पर इस्तेमाल करना चाहती है? (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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