Sunday, March 6, 2011

संस्था की गरिमा


केंद्रीय सतर्कता आयोग को ताकतवर बनाने की भी जरूरत है
सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने देश के मुख्य सतर्कता आयुक्त पीजे थॉमस की नियुक्ति को निरस्त करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि भ्रष्टाचार-निरोधक इस शीर्ष संस्था के मुखिया को पारदर्शी चरित्र का होना चाहिए। यानी इसका नेतृत्व ऐसे व्यक्ति को करना चाहिए, जिसके आचरण पर उंगली न उठाई जा सके। अंगरेजी में एक कहावत है, जिसका अर्थ है कि राजा (सीजर) की पत्नी को संदेह से परे होना चाहिए। इसका सीधा-सा मतलब यह कि महत्वपूर्ण और सार्वजनिक पदों पर बैठने वाले व्यक्ति का आचरण पारदर्शी होना ही चाहिए। तभी केंद्रीय सतर्कता आयोग जैसी संस्था की शुचिता भी बरकरार रह सकेगी।
पीजे थॉमस की नियुक्ति के खिलाफ दायर जनहित याचिका में बहस के दौरान थॉमस के वकील वेणुगोपाल ने अनेक तर्क देकर सर्वोच्च अदालत को यह बताने की कोशिश की थी कि थॉमस पारदर्शी व्यक्तित्व के अधिकारी रहे हैं और केरल में पाम ऑयल घोटाले में उनके खिलाफ आरोप पत्र राजनीतिक कारणों से दायर किया गया था। थॉमस बेईमान हैं या नहीं, यह अलग बहस का विषय है, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति एस एच कपाडिया ने इन तर्कों को यह कहकर काट दिया कि यह आरोप पत्र ही उनके आचरण पर संदेह पैदा करने के लिए काफी है। सीधी-सी बात है, एक ऐसे महत्वपूर्ण पद पर, जहां से देश के मुख्य सतर्कता आयुक्त को देश भर के अधिकारियों के आचरण पर टिप्पणी करनी हो या जांच के आदेश देने हों, संदेह की कोई गुंजाइश ही नहीं होनी चाहिए।
दरअसल सीवीसी की नियुक्ति के समय उच्चाधिकार प्राप्त चयन समिति में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने जब यह मुद्दा उठाया था, तब प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को थॉमस की नियुक्ति के पक्ष में दुराग्रह नहीं करना चाहिए था। लेकिन वे दोनों थॉमस को मुख्य सतर्कता आयुक्त बनाने पर अड़े हुए थे, ऐसे में, उन्होंने नेता विपक्ष की दलीलों को बहुत महत्व नहीं दिया। इस पर सुषमा स्वराज ने अपनी उपेक्षा का आरोप लगाया, क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने हवाला कांडमें निर्णय देते हुए यह स्पष्ट किया था कि ऐसे फैसले विपक्ष के नेता की सहमति से किए जाने चाहिए। अगर ऐसा नहीं होता है, तो फिर चयन समिति में विपक्ष के नेता को रखने का भला क्या औचित्य है? अगर बहुमत के आधार पर ही निर्णय करना था, तब तो समिति के बाकी दो सदस्य प्रधानमंत्री और गृह मंत्री कोई भी निर्णय लेने में सक्षम हैं। इस लिहाज से देखें, तो उच्चाधिकार प्राप्त समिति मात्र दिखावे की रह गई है।
जैन हवाला कांड के मुकदमे की सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने जब देखा कि सीबीआई लगातार प्रधानमंत्री कार्यालय से निर्देश लेती है और स्वतंत्र व्यवहार नहीं कर पाती, तो उसने सीबीआई की स्वायत्तता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से उसे केंद्रीय सतर्कता आयोग के अधीन किए जाने के निर्देश दिए थे। अदालत ने साथ ही, यह भी निर्देश दिया था कि कानून की निगाह में सब बराबर हैंके सिद्धांत का पालन करते हुए किसी भी पद पर बैठे वरिष्ठ अधिकारी या मंत्री के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायत आने पर सीबीआई को सरकार से अनुमति नहीं लेनी होगी। पर विडंबना देखिए कि विनीत नारायणफैसले के बाद शरद पवार की अध्यक्षता में बनी संसदीय समिति ने जो विधेयक तैयार किया, उसमें केंद्रीय सतर्कता आयोग को वह ताकत दी ही नहीं गई, जिससे वह अपना काम पूरी स्वतंत्रता से कर पाता। नतीजतन कहने को तो सीबीआई केंद्रीय सतर्कता आयोग की निगरानी में कार्य करती है, लेकिन वास्तव में उसकी स्थिति आज भी पूर्ववत् है। यानी उच्च पदस्थ अधिकारियों और मंत्रियों के खिलाफ भ्रष्टाचार की जांच करने की उसे छूट नहीं है। ऐसा करने से पहले सीबीआई को प्रधानमंत्री कार्यालय से अनुमति लेनी होती है। विडंबना यह है कि प्रधानमंत्री कार्यालय सीबीआई की ऐसी सभी प्रार्थनाओं पर चुपचाप बैठा रहता है और वर्षों तक अनुमति प्रदान नहीं करता। नतीजतन उच्च पदस्थ भ्रष्ट अधिकारी न सिर्फ अपने पद पर बने रहते हैं, बल्कि प्रधानमंत्री कार्यालय के अघोषित सुरक्षा कवच में अपने अनैतिक कारनामों को डंके की चोट पर अंजाम भी देते रहते हैं। ऐसा अब तक के हर प्रधानमंत्री के कार्यकाल में होता आया है, चाहे वह यूपीए का रहा हो या एनडीए का। इतना ही नहीं, पिछले दिनों इस आयोग से सरकार ने वह अधिकार भी छीन लिया, जिसके तहत वह सीबीआई को केस रजिस्टर करने का निर्देश देता था। ऐसे तमाम प्रमाण हैं, जो यह सिद्ध करते हैं कि केंद्र में सरकार कोई भी हो, वह उच्च पदासीन व्यक्तियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार की जांच नहीं होने देना चाहती। इसलिए केंद्रीय सतर्कता आयोग की लगातार दुर्गति की जा रही है।
सर्वोच्च न्यायालय के मौजूदा फैसले ने भविष्य के लिए यह सुनिश्चित कर दिया कि पारदर्शीका अर्थ वह नहीं होगा, जो कोई भी सरकार मनमाने ढंग से लगाना चाहे। बल्कि सार्वजनिक महत्व के पदों पर नियुक्ति के समय व्यक्ति के आचरण की पूरी पारदर्शिता सुनिश्चित करना चयन समिति का दायित्व होगा। यह बहाना नहीं चलेगा कि समिति को अमुक व्यक्ति के बारे में वही जानकारी थी, जो उसके बायोडाटा में थी। आशा की जानी चाहिए कि भविष्य में फिर कोई पीजे थॉमस पिछले दरवाजे से ऐसे महत्वपूर्ण पदों पर नहीं बैठ पाएगा। इस सबके बावजूद सीवीसी भ्रष्टाचार से निपटने में सक्षम होगा, इसमें संदेह है। इसलिए जरूरी है कि सर्वोच्च न्यायालय हवाला कांडके फैसले का फिर से मूल्यांकन करते हुए सीवीसी को मजबूत बनाने के लिए भी कड़े निर्देश जारी करे। तभी यह आयोग नाम के अनुरूप अपनी सार्थकता सिद्ध कर पाएगा।

No comments:

Post a Comment