जाट संघर्ष समिति के आंदोलन से हम सबका भारी नुकसान हो रहा है। ऐसा आंदोलन क्यों, जिसका सबसे ज्यादा नुकसान हमें ही होना है। अंग्रेज चले गए लेकिन आंदोलन में सरकारी सम्पत्तियों को नुकसान पहुंचाने के तरीके को हमने बदलने की कोशिश नहीं की। अब सरकार हमारी है, सरकारी सम्पत्ति हमारे पैसे से बनी है। लेकिन विरोध करते वक्त यह सब हम भूल जाते हैं। अपने ही भाई-बहनों को नुकसान पहुंचाने से हम बाज नहीं आते हैं। वह भी ऐसी मांगों को लेकर जो दादागीरी के अलावा कुछ नहीं है। लोकतंत्र में मांगें उठाना जायज है। लेकिन मांगें मनवाने के तौर-तरीके बदलने की जरूरत नहीं है क्या?
छात्रों को फीस में कटौती चाहिए तो वे अपनी मांग मनवाने के लिए सरकारी बसें जला देते हैं। किसी ग्रुप को किसी खास जगह पर रेलवे स्टेशन बनवाना है तो अपनी मांग बुलंद करने के लिए पुलिस थाने में आग लगा दी जाती है। महंगाई के विरोध में जुलूस निकलते हैं लेकिन अचानक वे हिंसक हो जाते हैं। उद्देश्य होता है, महंगाई का विरोध लेकिन होता यह है कि दुकानें जला दी जाती हैं, बसें जला दी जाती हैं, बस स्टैंड तोड़ दिए जाते हैं, पुलिस वैन को तोड़ा जाता है। दुकानें जलाने से क्या महंगाई कम हो जाएगी? क्या बसें जलाने से कॉलेज की फीस कम हो जाएगी? क्या थाना जलाने से रेलवे स्टेशन बन जाएगा? अब उत्तर प्रदेश और हरियाणा में जाट आंदोलन को ही ले लीजिए। जाट देश के सबसे समृद्ध वगरे में से एक है। 18 वीं सदी में राजस्थान, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में इनका राज चलता था। 1752 में तो भरतपुर सल्तनत का क्षेत्रफल पांच हजार किलोमीटर से भी ज्यादा था। करीब सौ साल पहले जब अंग्रेजों ने दिल्ली को राजधानी बनाने का फैसला किया तो जाट समुदाय को इसका खूब फायदा मिला। राजधानी और उसके आसपास के इलाकों की जमीन की मिल्कियत उन्हीं के पास ही थी। दिल्ली के राजधानी बनने से यहां जमीन की कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई। आजादी के बाद हरित क्रांति के लिए भी वही इलाके चुने गए जहां जाटों का बोलबाला था। हरित क्रांति से बड़े किसानों को खूब फायदा हुआ और बड़े किसानों में जाट समुदाय के ही ज्यादा लोग थे। बात शिक्षा की हो या फिर सरकारी महकमे में ऊंचे ओहदे की, बात राजनीति की हो या फिर कला और विज्ञान की, जाट समुदाय के लोगों ने हर क्षेत्र में बहुत ही अच्छा काम किया है। लेकिन इस समुदाय को अब सरकारी नौकरियों में आरक्षण चाहिए। इनको अदर बैकर्वड क्लास यानी ओबीसी का दर्जा चाहिए। ओबीसी में उन्हें रखा गया है जो सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े रहे हैं। जिस कौम ने कभी देश के बड़े इलाके पर राज किया हो, उसके बारे में यह कहना कि वह सामाजिक पिछड़ेपन की शिकार रही है, सही नहीं होगा। आर्थिक पिछड़ेपन के कुछ मामले हो सकते हैं। लेकिन आर्थिक पिछड़ेपन का शिकार तो देश की आबादी का बड़ा हिस्सा है ही। क्या गरीब ब्राह्मण नहीं हैं, क्या आर्थिक रूप से तंग क्षत्रियों की कमी है। वैश्य समुदाय में भी कई ऐसे हैं जिनको दो वक्त की रोटी नसीब नहीं होती है। जिस देश की कुल आबादी का एक तिहाई से ज्यादा हिस्सा गरीबी रेखा से नीचे हो, वहां हर जाति या समुदाय का एक बड़ा हिस्सा आर्थिक बदहाली में होगा ही। ऐसे में क्या हर जाति और समुदाय को रिजव्रेशन दे दिया जाए। लेकिन अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति को लगता है कि जाट समुदाय के हर मर्ज की दवा रिजव्रेशन ही है। अपनी मांग मनवाने के लिए समिति पिछले तीन हफ्ते से आंदोलन कर रही है। अब आंदोलन का नमूना देखिए। समिति ने ज्योतिबा फुले नगर के काफूरपुर में नेशनल हाईवे नम्बर 24 को लगभग बंद कर दिया गया है। दिल्ली से पूर्व की तरफ जाने वाली ट्रेनों को रोका जा रहा है। इसकी वजह से हर दिन सैकड़ों ट्रेनें रद्द हो रही हैं। अकेले शुक्रवार को 81 ट्रेनें रद्द हुई। रेलवे की तबाही का यह हाल है कि उसे हर दिन करीब 100 करोड़ रुपए का नुकसान हो रहा है। हरियाणा में हो रहे आंदोलन से पावर प्लांट को कोयला नहीं मिल रहा है। हाल यह है कि जहां राज्य में 3200 मेगावाट बिजली उत्पादन की क्षमता है वहां महज 1800 मेगावाट बिजली का ही उत्पादन हो रहा है। हरियाणा एक समृद्ध और इंडस्ट्रियल राज्य है, जहां हजारों इंडस्ट्रियल यूनिटें लगी हैं। इन यूनिट्स को बिजली नहीं मिल रही है। किसानों को भी बिजली समय से नहीं मिल पा रही है। अभी तो इन इलाकों में गर्मी का मौसम शुरू ही हुआ है। फर्ज कीजिए कि तापमान बढ़ता गया और बिजली गुल रही तो लोगों को कितनी तकलीफ होगी। साथ ही हजारों करोड़ रुपये का नुकसान तो हो ही रहा है। लेकिन आंदोलन करने वाले इतने से नहीं मानने वाले हैं। उनके निशाने पर हैं राजधानी दिल्ली। अपनी मांग मनवाने के लिए वे दिल्ली में बाहर से आने वाले जरूरी सामानों की सप्लाई को बाधित करना चाहते हैं। वैसे सुप्रीम कोर्ट की हिदायत के बाद सम्भव है कि ऐसा न हो। लेकिन मेरा सवाल है कि इस तरह के आंदोलन की जरूरत क्या है? जाट संघर्ष समिति के आंदोलन से हम सबका भारी नुकसान हो रहा है। ऐसा आंदोलन क्यों, जिसका सबसे ज्यादा नुकसान हमें ही होना है। दरअसल, विरोध के इस तरीके की शुरुआत आजादी से पहले हुई थी। देश में सरकार अंग्रेजों की थी। अंग्रेज हमारे दुश्मन थे तो ऐसे में सरकार भी दुश्मनों की थी। उस समय आंदोलन का मतलब था, दुश्मन का विरोध और दुश्मन को नुकसान पहुंचाना ताकि वह तुरंत हमारी मांगें मान ले। अंग्रेज चले गए लेकिन आंदोलन में सरकारी सम्पत्तियों को नुकसान पहुंचाने के तरीके को हमने बदलने की कोशिश नहीं की। अब सरकार हमारी है, सरकारी सम्पति हमारे पैसे से बनी है। लेकिन विरोध करते वक्त यह सब हम भूल जाते हैं। अपने ही भाई-बहनों को नुकसान पहुंचाने से हम बाज नहीं आते हैं। वह भी ऐसी मांगों को लेकर जो दादागीरी के अलावा कुछ नहीं है। जाट देश के सबसे दबंग समुदायों में से एक है। लोकसभा की करीब 90 सीटों पर जाटों के वोट से जीत और हार का फैसला होता है। हरियाणा, पश्चिम उत्तर प्रदेश और राजस्थान की राजनीति में जाटों की दबंगई चलती है। हरियाणा में तो कई सालों से मुख्यमंत्री की कुर्सी इसी कौम के प्रतिनिधि को ही मिलती आ रही है। राजधानी दिल्ली के आसपास के इलाकों में इनका बोलबाला है। इन इलाकों पर कब्जा होने की वजह से इनकी ताकत और भी बढ़ जाती है। कहीं आरक्षण की मांग उसी दबंगई का नतीजा तो नहीं है? राजनीतिक दल तो इस दबंगई को अपने पक्ष में करने में लगे ही हुए हैं। लोकतंत्र में मांगें उठाना जायज है। लेकिन मांगें मनवाने के तौरत रीके बदलने की जरूरत नहीं है क्या?
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