भ्रष्टाचार के आरोपों से जूझ रही यूपीए सरकार के सफाई अभियान की आंच अब नौकरशाही को भी महसूस हो सकती है। कई वरिष्ठ अफसरों के विरोध के बावजूद केंद्र अब नौकरशाहों को चल-अचल संपत्ति घोषित करने के लिए मजबूर कर सकती है। बिहार और मध्य प्रदेश में नौकरशाहों के लिए संपत्ति घोषित करना अनिवार्य होने के बाद केंद्र पर जल्द ही यह फैसला लेने का दबाव बढ़ गया है। नीतीश सरकार के सख्त रवैये से सूबे में तैनात 190 आइएएस, 169 आइपीएस, बिहार प्रशासन सेवा के 2800 तथा बिहार पुलिस सेवा के 350 अफसरों ने अपनी संपत्ति का विवरण सार्वजनिक कर दिया है। ऐसा करने वाला बिहार देश का पहला राज्य हो गया है। इस मसले पर मंगलवार को कैबिनेट सचिव केएम चंद्रशेखर ने सचिवों की समिति (कमेटी ऑफ सेक्रेट्रीज) की बैठक बुलाकर इस दिशा में संभावनाएं भी तलाशीं। नौकरशाही में सबसे ताकतवर इस समिति की बैठक में विधि सचिव डीआर मीणा, कार्मिक मंत्रालय की सचिव अलका सिरोही और प्रधानमंत्री कार्यालय से प्रजापति इस बैठक में मौजूद रहे। सूत्रों के मुताबिक, करीब दो साल पुराने इस प्रस्ताव को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अब जल्द से जल्द लागू करा भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग के अपने वादे पर आगे बढ़ते दिखना चाहते हैं। वैसे भी नेताओं के लिए संपत्ति की घोषणा पहले ही अनिवार्य हो चुकी है। न्यायपालिका ने स्वैच्छिक रूप से इस परंपरा को अपना लिया है। जजों ने स्वैच्छिक रूप से अपनी संपत्तियों की घोषणा कर उन्हें वेबसाइट पर डाल दिया है, लेकिन भ्रष्टाचार के लिए सबसे ज्यादा बदनाम नौकरशाही में वरिष्ठ अफसरों का एक तबका संपत्ति घोषणा को निजता से जोड़कर घोषित करने को तैयार नहीं है। यद्यपि कैबिनेट सचिव समेत केंद्र के करीब 1000 आइएएस और आइपीएस अफसरों ने अपनी संपत्तियों का ब्योरा तैयार कर डीओपीटी को सौंप भी दिया है। बस केवल सरकार के फैसले का इंतजार है। बिहार में नीतीश सरकार ने तो दूसरी बार सत्ता में आने के बाद संपत्ति घोषित करना सबसे पहले अनिवार्य कर दिया। नियम की जद में वहां अवर सचिव स्तर तक के अधिकारी हैं। सूत्रों के मुताबिक, कैबिनेट सचिव के साथ 8 मार्च को हुई बैठक में मुद्दा भी यही था कि किस स्तर तक के अफसरों को संपत्ति घोषणा की जद में लाया जाए। ऐसे नियम का विरोध कर रहे अधिकारियों की निजता के तर्क पर भी विचार हुआ। संकेत हैं कि इस मसले पर सरकार फैसला ले लेगी।
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